भगवानपुर (वैशाली), ब्यूरो रिपोर्ट: सती प्रथा, दहेज प्रथा और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों की तरह ही ‘मृतक भोज’ (मृत्युभोज) भी आज गरीब और पीड़ित परिवारों के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप व सामाजिक बोझ बन चुका है। किसी प्रियजन को खोने के दुख के बीच भोज कराने की यह कुप्रथा कई परिवारों को कर्ज के दलदल में धकेल देती है। इसी रुढ़िवादी परंपरा को तोड़ते हुए वैशाली जिले के भगवानपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत किरतपुर राजाराम (वार्ड संख्या 12) में एक मिसाल पेश की गई है।
हाल ही में सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के उपरांत पटना के पीएमसीएच (PMCH) में 16 जुलाई 2026 को दिवंगत हुए रामएकबाल राय के सम्मान में उनके परिजनों ने कर्मकांड, पाखंड और अंधविश्वास से मुक्त एक गरिमामयी आदरंजलि सभा सह बौद्धिक चिंतन कार्यक्रम का आयोजन किया। दिवंगत रामएकबाल राय पेरियार दिलीप कुमार यादव के पिता थे। रामएकबाल राय सनातनी होते हुए भी जीवन भर कर्मकांड, आडंबर और मृत्युभोज जैसी प्रथाओं के घोर विरोधी रहे। उनके इन्हीं विचारों को जीवंत रखते हुए उनके निवास स्थान पर बिना किसी पारंपरिक कर्मकांड या मृत्युभोज के बौद्धिक पद्धति से श्रद्धांजलि सभा संपन्न हुई।

सामाजिक कुप्रथा के खिलाफ बौद्धिक चिंतन
सती प्रथा और छुआछूत की तरह ही मृत्युभोज भी एक ऐसी सामाजिक बुराई है जो गरीब-दुखी परिवारों की रीढ़ तोड़ देती है। जहां एक ओर परिवार में शोक की लहर होती है, वहीं दूसरी ओर समाज के दबाव में आकर लोगों को कर्ज लेकर सैकड़ों-हजारों लोगों को भोजन कराना पड़ता है। किरतपुर राजाराम में आयोजित इस कार्यक्रम ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि किसी के जाने के बाद पाखंड और दिखावे के बजाय उनके विचारों और आदर्शों को जीवित रखना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।

कार्यक्रम के दौरान मुख्य वक्ताओं और बौद्धिक मार्गदर्शकों ने मृत्युभोज के विरुद्ध खुलकर विचार रखे।
- कबीर संत मान्यवर रमाशंकर साहेब ने कहा कि मानव जीवन का सच्चा मर्म आडंबरों में नहीं, बल्कि कबीर के विचारों पर चलकर समाज में समता और विवेक का प्रसार करने में है।
- भंते एम के राजन (सेवानिवृत्त महाप्रबंधक, बोकारो स्टील प्लांट) ने बौद्धिक पद्धति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आडंबरहीन जीवन शैली अपनाने का आह्वान किया।
- मान्यवर शुद्र शिव शंकर सिंह यादव (अवकाश प्राप्त बीएसएनएल अधिकारी, मुंबई) ने कहा कि सामाजिक बदलाव तभी संभव है जब हम पुरानी कुरीतियों को त्याग कर तर्क और विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरने वाली परंपराओं को अपनाएंगे।
- मान्यवर सतीश दास (पूर्व विधायक) एवं अन्य वरिष्ठ बौद्धिक मार्गदर्शकों ने भी सभा को संबोधित करते हुए इस पहल की जमकर सराहना की और इसे बहुजन समाज के लिए एक प्रेरणादायक कदम बताया।

ग्रामीणों और गणमान्य लोगों की गरिमामयी उपस्थिति
भारतीय मूलनिवासी सांस्कृतिक मंच एवं फूले-अंबेडकरी बहुजन विचारधारा के साथियों, स्थानीय शुभचिंतकों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने इस आदरंजलि सभा में भाग लिया।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से राजेश कुमार, कैलाश कुमार, मिनती देवी, महेश्वरी देवी, दिनेश कुमार राम (शिक्षक), चन्द्र कला देवी, पिंकी देवी, सुनील कुमार, राजेश कुमार, गजेंद्र राम, एवं सुधा देवी, रामेश्वर पासवान उपस्थित रहे। सभी उपस्थित लोगों ने दिवंगत आत्मा को नमन करते हुए समाज से मृत्युभोज जैसी अभिशप्त परंपरा को जड़ से समाप्त करने का संकल्प लिया।
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