1917 में अंग्रेजों ने रखी थी नींव, 1995 से बंद पड़ी है मिल; जिला विकास मंच ने नागरिक मार्च निकाल सरकार को घेरा
समस्तीपुर | 22 फरवरी, 2026 बिहार के औद्योगिक मानचित्र पर कभी अपनी चमक बिखेरने वाली समस्तीपुर चीनी मिल को पुनर्जीवित करने की मांग अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है। रविवार को जिला विकास मंच के बैनर तले शहर की सड़कों पर, कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने सरकारी बस स्टैंड से चीनी मिल चौक तक ‘नागरिक मार्च’ निकालकर शासन-प्रशासन की चुप्पी पर कड़ा प्रहार किया।

हुंकार: “हमारी जमीन, हमारे संसाधन, फिर मिल क्यों बंद?”
मार्च के दौरान “बंद चीनी मिल को चालू करो” और “समस्तीपुर का हक वापस दो” जैसे नारों से पूरा शहर गूंज उठा। सभा की अध्यक्षता करते हुए मंच के संयोजक शत्रुघ्न राय पंजी ने कहा कि यह केवल एक मिल नहीं, बल्कि समस्तीपुर की अस्मिता और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही मिल के पहिये नहीं घूमे, तो यह आंदोलन और उग्र होगा।
हजारों चूल्हों की बुझ गई आग
सभा को संबोधित करते हुए सेवानिवृत्त शिक्षक और मंच के वरिष्ठ सदस्य शंकर साह ने मिल के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान की बदहाली का खाका खींचा। उन्होंने कहा:
“1917 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित यह मिल 5,000 से अधिक परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया थी। आज भी यहाँ चीनी मिल के पास पर्याप्त जमीन है, बिजली और रेल का सुलभ नेटवर्क है और मेहनती श्रमिक उपलब्ध हैं। सरकार की इच्छाशक्ति की कमी के कारण यह विशाल संपत्ति खंडहर में तब्दील हो रही है।”
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की गोलबंदी
आंदोलन को धार देते हुए राजद नेता राकेश ठाकुर और भाकपा माले के सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने साझा अपील की। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि बुद्धिजीवी, छात्र, किसान, मजदूर और व्यवसायी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुँचाएं। वक्ताओं ने सवाल उठाया कि जब बुनियादी ढांचा तैयार है, तो नई इकाइयों के नाम पर करोड़ों खर्च करने वाली सरकार इस चालू योग्य मिल की अनदेखी क्यों कर रही है?
31 सालों का लंबा इंतजार :विदित हो कि समस्तीपुर चीनी मिल 1995 में बंद कर दी गई थी। तीन दशक बीत जाने के बावजूद, राजनीतिक वादों के अलावा धरातल पर कुछ नहीं बदला। मिल चौक पर हुई सभा में उपस्थित वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि अब वे कोरे आश्वासनों से मानने वाले नहीं हैं।
एक नजर में ‘समस्तीपुर चीनी मिल‘ का दर्द:
- स्थापना: 1917 (अंग्रेजी शासनकाल)।
- अस्तित्व का संकट: 1995 से मिल के पहिये थमे।
- ताकत: पर्याप्त भूमि, चौतरफा आवागमन, रेल साइडिंग और बिजली की उपलब्धता।
- प्रभाव: 5000 परिवारों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार छीन गया।
सभा में प्रमुख उपस्थिति: सभा में मुख्य रूप से शंकर साह, सुरेंद्र प्रसाद सिंह, राकेश ठाकुर, उपेंद्र राय, राम विनोद पासवान, पिंकू पासवान, संतोष कुमार निराला, विश्वनाथ सिंह हजारी, शाहीद हुसैन, सुशील कुमार राय, रवि आनंद, जितेंद्र कुमार, जगलाल राय, शंभू राय और मनोज राय सहित सैकड़ों कार्यकर्ता मौजूद रहे।



