ताजपुर/समस्तीपुर | अखिल भारतीय किसान महासभा की प्रखंड कमेटी की एक विस्तारित बैठक मोतीपुर (वार्ड 26) में आयोजित की गई। बैठक में वक्ताओं ने सरकार द्वारा आनन-फानन में लागू की जा रही ‘फार्मर रजिस्ट्री‘ योजना पर तीखा प्रहार किया और इसे किसानों के हक पर डाका डालने की साजिश करार दिया।
रजिस्ट्री से बाहर होंगे किसान, सब्सिडी पर मंडराया संकट
बैठक को संबोधित करते हुए महासभा के जिला सचिव ललन कुमार ने कहा कि फार्मर रजिस्ट्री में खाता नंबर की अनिवार्यता किसानों को ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ से वंचित करने की एक गहरी साजिश है। उन्होंने चेतावनी दी कि अब डीजल अनुदान, खाद-बीज सब्सिडी, फसल क्षति मुआवजा और कृषि यंत्रीकरण जैसे तमाम लाभ इसी रजिस्ट्री के आधार पर मिलेंगे। यदि पोर्टल में खामियां रहीं, तो किसान इन सभी सरकारी योजनाओं से पूरी तरह कट जाएंगे।
ऑनलाइन पोर्टल की खामियों पर उठाए सवाल
अध्यक्षता कर रहे प्रखंड अध्यक्ष ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने तकनीकी पहलुओं पर सरकार को घेरते हुए कहा:
शून्य खाता-खेसरा: अधिकांश ऑनलाइन जमाबंदी पर खाता-खेसरा शून्य अंकित है।
पुराने नाम: जमीन अब भी दादा-परदादा के नाम पर दर्ज है, जिसे सुधारने में प्रशासन विफल रहा है।
सुधार की मांग: सरकार पहले ‘राजस्व महाभियान’ के आवेदनों का निष्पादन करे और पोर्टल पर एक से अधिक जमाबंदी दर्ज करने की सुविधा दे।
नए प्रावधान: उन्होंने मांग की कि किसान रजिस्ट्री में वंशावली और LPC को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
बटाईदार किसानों की अनदेखी
भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने कहा कि वर्तमान में बटाईदारी खेती का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन इस योजना में बटाईदारों के लिए कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने इसे केंद्र की मोदी सरकार की किसान विरोधी नीति बताते हुए संघर्ष तेज करने का आह्वान किया।
आंदोलन की रूपरेखा: विधानसभा तक गूंजेगी आवाज
बैठक में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर चरणबद्ध आंदोलन का निर्णय लिया है:
9 फरवरी 2026: मांगों के समर्थन में प्रखंड मुख्यालय का घेराव।
23 फरवरी 2026: राज्य सरकार को जगाने के लिए विधानसभा का घेराव।
संगठन विस्तार: सदस्यता अभियान में तेजी लाने और पंचायत/प्रखंड सम्मेलनों के आयोजन का निर्णय।
उपस्थिति: बैठक का संचालन ललन दास ने किया। इस दौरान मुंशीलाल राय, संजीव राय, राजदेव प्रसाद सिंह, कैलाश सिंह, मोती लाल सिंह, शंकर महतो, मकसुदन सिंह, अनील सिंह, संजय कुमार सिंह, रंजीत कुमार सिंह समेत दर्जनों किसान नेता और कार्यकर्ता मौजूद थे।
प्रमुख सुर्खियां :
साजिश: किसान रजिस्ट्री में खाता नंबर की अनिवार्यता किसानों को लाभ से रोकने का जरिया – ललन कुमार।
चेतावनी: 9 फरवरी को अपनी मांगों के लिए प्रखंड मुख्यालय घेरेंगे किसान – ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह।
मांग: फार्मर रजिस्ट्री में वंशावली और LPC को भी मिले जगह – ललन दास।
सकरा (मुजफ्फरपुर): राजनीति की बिसात पर जब चुनाव की गोटियां बिछाई जाती हैं, तो विकास के वादे शहद की तरह टपकते हैं। जनता को सुनहरे ख्वाब दिखाए जाते हैं और रातों-रात सड़कों का जाल बिछाने का दावा किया जाता है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही जब इन वादों की परतें उधड़ती हैं, तो अंदर से भ्रष्टाचार का वो घिनौना चेहरा निकलता है जो जनता के खून-पसीने की कमाई को लील चुका होता है। सकरा विधानसभा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण सड़क आज इसी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
चुनावी ‘हड़बड़ी‘ में ‘गड़बड़ी‘ का खेल: बेईमानों की नजर लगी
NH-28 को ढोली रेलवे स्टेशन से जोड़ने वाली यह सड़क, जो सुजावलपुर से नीमतल्ला रोड तक जाती है, आज एक ‘धोखे’ का पर्याय बन चुकी है। विधानसभा चुनाव के समय इस सड़क को आनन-फानन में बनाया गया था। उस वक्त सकरा नगर पंचायत के वार्ड संख्या छह के लोगों को लगा था कि अब उनके दिन बहुरेंगे। यह सड़क इस वार्ड के पूर्वी भाग की जीवनरेखा है, लेकिन आज यही रेखा उनके पैरों में छाले डाल रही है।
आलम यह है कि मात्र छह महीने के भीतर ही यह सड़क ‘छलनी’ हो गई है। जिस पी.सी.सी. सड़क को सालों-साल चलना चाहिए था, वह छह महीने में ही भ्रष्टाचार की गवाही देने लगी है। निर्माण के पहले दिन से ही स्थानीय लोगों ने इसके घटिया मैटेरियल पर सवाल उठाए थे। लोगों ने विरोध किया था कि सीमेंट, बालू और गिट्टी का जो मिश्रण इस्तेमाल हो रहा है, उसमें ईमानदारी कम और बेईमानी ज्यादा है। आज वही शंका सच साबित हो रही है।
“मॉर्निंग वॉक” नहीं, ये “जख्मों का सफर” है
इस सड़क की दुर्दशा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जगह-जगह से गिट्टियां उखड़कर बाहर आ गई हैं। पैदल चलना किसी सजा से कम नहीं है। इस सड़क की दुर्दशा का मंजर रूह कंपा देने वाला है। जगह-जगह से गिट्टियां उखड़कर ऐसे बाहर आ गई हैं जैसे किसी ने जान-बूझकर राहगीरों के लिए कांटे बिछा दिए हों। खाली पैर चलना तो दूर, चप्पल पहनकर चलने वालों का भी संतुलन बिगड़ रहा है।
स्थानीय बुजुर्ग और डायबिटीज के मरीज, जिन्हें डॉक्टरों ने खाली पैर टहलने की सलाह दी है, उनके लिए यह सड़क अब एक दुःस्वप्न बन गई है। सड़क पर बिखरी नुकीली गिट्टियां पैरों को लहूलुहान कर रही हैं। लोग बताते हैं कि अब उन्होंने इस सड़क पर मॉर्निंग वॉक करना ही छोड़ दिया है। क्या विकास की परिभाषा यही है कि जनता को अपने घर के सामने टहलने के लिए भी तरसना पड़े?
भ्रष्टाचार का काला गणित: विभाग और संवेदक की “जुगलबंदी”
यह सड़क मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क उन्नयन योजना के अंतर्गत बनाई गई है (योजना संख्या: L061-T02 (VR38))। सरकारी दस्तावेजों में इसके संवेदक अजय कुमार (कन्हौली विशुनदत्त, मुजफ्फरपुर) हैं। निर्माण की जिम्मेदारी ग्रामीण कार्य विभाग, कार्यप्रमंडल मुजफ्फरपुर पूर्वी-1 के कार्यपालक अभियंता की थी।
आज सकरा की जनता इन ‘साहबों’ से तीखे सवाल पूछ रही है:
साहब, क्या आप ‘धृतराष्ट्र‘ बन गए थे? जब संवेदक खुलेआम मिट्टी और रेत का खेल खेल रहा था, तब आपकी तकनीकी जांच की टीम कहाँ सो रही थी?
लूट की छूट क्यों? पूरे जिले में शायद ही ऐसी कोई सड़क हो जो बनने के साथ ही उजड़ने लगे। क्या अभियंता महोदय को इस खुली लूट की भनक तक नहीं लगी?
भुगतान का आधार क्या था? जब सड़क की गुणवत्ता शून्य थी, तो संवेदक की फाइलों पर हस्ताक्षर कैसे हुए? यह जनता के टैक्स के पैसे की डकैती है।
भ्रष्टाचार का गणित: कौन है जिम्मेदार?
कागजों पर इस सड़क का संवेदक अजय कुमार (कन्हौली विशुनदत्त, मुजफ्फरपुर) है और इसके अनुरक्षण (Maintenance) की तारीख जून 2026 तक है। इसकी कार्यकारी एजेंसी कार्यपालक अभियंता, ग्रामीण कार्य विभाग, कार्यप्रमंडल मुजफ्फरपुर पूर्वी-1 है।
यह साफ तौर पर अभियंता और संवेदक के बीच के अपवित्र गठबंधन का नतीजा है, जिसने जनता के पैसों को अपनी जेबों में भर लिया और सड़क के नाम पर सिर्फ धूल और पत्थर छोड़ दिए।
आर.सी. कॉलेज सकरा के मुख्य द्वार के सामने सड़क पर उखड़ चुकी गिट्टी का विहंगम दृश्य
महत्वपूर्ण संस्थानों का गला घोंटती बदहाली
यह सिर्फ एक सड़क नहीं है, बल्कि सकरा की अर्थव्यवस्था और शिक्षा की धड़कन है। इस मार्ग से हर दिन हजारों रेल यात्री ढोली स्टेशन जाते हैं। इसके अलावा आर.सी. कॉलेज, सुजावलपुर मार्केट, सब्जी मंडी, मछली मंडी और दर्जनों शिक्षण संस्थान इसी रास्ते पर निर्भर हैं। छात्रों को स्कूल जाने में परेशानी होती है, किसानों को अपनी सब्जी मंडी ले जाने में हिचकोले खाने पड़ते हैं और बीमारों को अस्पताल ले जाना एक चुनौती बन गया है।
आर.सी. कॉलेज सकरा के मुख्य द्वार के सामने सड़क पर उखड़ चुकी गिट्टी का दृश्य
सत्ता के गलियारों में ‘सफेद चश्मा’ के साथ नेताओं की खामोशी और ठेकेदारों की मनमानी ने सकरा के विकास को ‘आईसीयू’ में पहुंचा दिया है।”
सबसे दुखद पहलू तो यह है कि सत्ताधारी दल के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता इसी सड़क से प्रतिदिन गुजरते हैं। क्या उनकी आंखों पर सत्ता के अहंकार का ऐसा चश्मा चढ़ा है कि उन्हें उखड़ी हुई गिट्टियां और गड्ढे दिखाई नहीं देते? अगर ये नेता सजग होते और सरकार की योजनाओं को ईमानदारी से धरातल पर उतारने के लिए तत्पर होते, तो आज न सकरा की जनता को यह कष्ट भोगना पड़ता और न ही विधायक जी को ऐसे अवसर का सामना करना पड़ता।
विधायक जी, अब सिर्फ ‘ब्लैकलिस्ट‘ से काम नहीं चलेगा, अब ‘नजीर‘ पेश करने का वक्त है!
सकरा की जनता अब खोखले आश्वासनों से ऊब चुकी है। विधायक जी, आपको आना होगा और अपनी आंखों से इस लूट के स्मारक को देखना होगा। इस भ्रष्ट संवेदक पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने।
विधायक जी, अब वक्त है कि आप ‘माननीय’ होने का धर्म निभाएं। सिर्फ किसी फर्म को ‘ब्लैकलिस्ट’ कर देने से कुछ नहीं होगा। ये भ्रष्ट संवेदक इतने शातिर हैं कि कल अपने परिवार के किसी सदस्य या नई फर्म के नाम पर दोबारा टेंडर ले लेंगे और फिर से सरकार की आंखों में धूल झोंकेंगे।
जनता की स्पष्ट मांगें:
FIR और गिरफ्तारी: संवेदक अजय कुमार और संबंधित लापरवाह अभियंताओं पर सरकारी धन के गबन का आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
संपत्ति की कुर्की: सड़क की मरम्मत का एक-एक पैसा इस भ्रष्ट संवेदक की निजी संपत्ति को बेचकर वसूला जाए।
गारंटी और अनुरक्षण: चूंकि अनुरक्षण की तारीख जून 2026 तक है, अतः इसे तुरंत बिना किसी अतिरिक्त सरकारी खर्च के नए सिरे से बनवाया जाए।
विधायक जी, सकरा के वार्ड नंबर छह की इस सड़क की चीखें शायद आपके दफ्तर तक न पहुंचती हों, लेकिन जनता के दिलों में पल रहा आक्रोश आप तक जरूर पहुंचेगा। जनता की याददाश्त बहुत तेज होती है। अगर आज आपने इस भ्रष्टाचार के गठजोड़ को नहीं तोड़ा, तो कल यही ‘छलनी सड़क’ आपके राजनीतिक भविष्य का रास्ता भी रोक सकती है।
आइये और देखिये इस सड़क के आंसू… और साबित कीजिये कि आप भ्रष्टाचारियों के साथ नहीं, सकरा की जनता के साथ खड़े हैं।
विशेष रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर (सकरा) बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का सकरा प्रखंड इन दिनों पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। यहाँ की मिट्टी महज धूल नहीं, बल्कि 2500 साल पुराने गौरवशाली इतिहास के साक्ष्य उगल रही है। सकरा के तीन प्रमुख गांवों—गनियारी, पटसामा और कुतुबपुर—में बिखरे अवशेष चीख-चीखकर यह बता रहे हैं कि यहाँ कभी मौर्यकालीन और प्रारंभिक गुप्तकालीन सभ्यता की एक भव्य बस्ती हुआ करती थी। लेकिन विडंबना यह है कि जिसे दुनिया के सामने एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पेश किया जाना चाहिए था, वह आज उपेक्षा और अनभिज्ञता के कारण विनाश की कगार पर है।
आस्था के घेरे में दबा इतिहास: ‘यक्षिणी’ बनीं कुलदेवी
सकरा के गनियारी मध्य विद्यालय परिसर में इतिहास और आस्था का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है। विद्यालय निर्माण के समय जमीन की खुदाई के दौरान काले पत्थर की एक प्राचीन प्रतिमा मिली थी। पुरातत्व की समझ न होने के कारण स्थानीय ग्रामीणों ने इसे ईश्वरीय चमत्कार माना और श्रद्धावश एक पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया। आज लोग इसे ‘देवी’ मानकर पूज रहे हैं।
गनियारी मध्य विद्यालय परिसर में नीचे स्थापित’यक्षिणी’ की मूर्ति
जब आरसी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. शांतनु सौरभ ने इस मूर्ति का सूक्ष्म अध्ययन किया, तो एक नया खुलासा हुआ। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों द्वारा पूजी जा रही यह प्रतिमा वास्तव में ‘यक्षिणी’ की है। प्राचीन भारतीय इतिहास में यक्ष-यक्षिणी को वैभव और प्रकृति का रक्षक माना जाता था। डॉ. सौरभ के अनुसार, ऐसी प्रतिमाओं का मिलना इस क्षेत्र में मौर्यकालीन धार्मिक प्रभाव की पुष्टि करता है। आस्था के कारण यह प्रतिमा बची तो हुई है, लेकिन खुले में रहने के कारण प्राकृतिक क्षरण का शिकार हो रही है।
पटसामा की ‘हल्की ईंटें’ और उन्नत तकनीक
कदाने नदी के किनारे स्थित पटसामा डीह (श्यामपुर डीह) प्राचीन स्थापत्य कला का जीवंत प्रमाण है। यहाँ खेतों की जुताई के दौरान ऐसी ईंटें निकलती हैं जो आकार में तो विशाल हैं, लेकिन वजन में आज की ईंटों से आधी हैं। इन ईंटों का रहस्य इनकी निर्माण तकनीक में छिपा है। मौर्यकाल में मिट्टी के साथ धान की भूसी, खरपतवार और विशेष प्रकार के अवशेष मिलाकर इन्हें पकाया जाता था, ताकि इमारतें भूकंपरोधी और हल्की बन सकें।
पटसामा डीह (श्यामपुर डीह) से प्राप्त ईंटों को दिखाते स्थानीय निवासी
डेढ़ लाख वर्ग मीटर में फैले इस टीले के नीचे किसी विशाल राजप्रासाद या बौद्ध विहार के होने की संभावना प्रबल है। ग्रामीणों को अक्सर यहाँ से पत्थर की माला के मनके, प्राचीन सिलौटा और मिट्टी के पात्र (नाद) मिलते रहते हैं, जो एक समृद्ध व्यापारिक और घरेलू जीवन की ओर इशारा करते हैं।
कुतुबपुर डीह: 200 ईसा पूर्व की विकसित बस्ती
कुतुबपुर का ऐतिहासिक टीला लगभग दो लाख वर्ग मीटर के क्षेत्र को कवर करता है। यहाँ की भौगोलिक बनावट सामान्य भूमि से करीब तीन मीटर ऊंची है, जो किसी दबी हुई सभ्यता का स्पष्ट संकेत है। इस स्थल पर बिखरे हुए लाल और काले पॉलिश वाले मृदभांड (बर्तन) पुरातत्वविदों को 150 से 200 ईसा पूर्व के कालखंड में ले जाते हैं। यहाँ कभी दर्जनों प्राचीन कुएं हुआ करते थे, जो इस बात का प्रमाण थे कि यह एक सुनियोजित और सघन बस्ती थी। आज इनमें से अधिकांश कुएं और संरचनाएं मिट्टी के नीचे दम तोड़ चुकी हैं।
कुतुबपुर डीह के उपर बना काली मंदिर का गहवर
विरासत पर संकट: अनजाने में हम मिटा रहे हैं अपना वजूद
सकरा की इस विरासत पर अब दोतरफा खतरा मंडरा रहा है। एक तरफ प्रशासनिक उदासीनता है, तो दूसरी तरफ अनजाने में स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा नुकसान:
खेती के लिए समतलीकरण: ऊंचे टीलों (डीह) को काटकर समतल खेत बनाए जा रहे हैं, जिससे जमीन के नीचे दबे साक्ष्य नष्ट हो रहे हैं।
अतिक्रमण का जाल: कुतुबपुर डीह के पास गैर-मजरूआ जमीन की बंदोबस्ती और निजी निर्माण ने भविष्य में वैज्ञानिक खुदाई के रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं।
पहचान का संकट: गनियारी डीह पर स्कूल और मंदिरों के अनियोजित निर्माण ने प्राचीन टीले के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया है।
विशेषज्ञों की अपील: ‘एएसआई’ के हस्तक्षेप की जरूरत
डॉ. शांतनु सौरभ और अन्य शोधकर्ताओं ने सरकार से गुहार लगाई है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) या बिहार राज्य पुरातत्व विभाग जल्द हस्तक्षेप नहीं करता है, तो मुजफ्फरपुर का यह गौरवशाली अध्याय हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों से मिट जाएगा। उन्होंने स्थानीय जनता से भी अपील की है कि वे इन अवशेषों को पत्थर का टुकड़ा न समझें, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ हिस्सा मानकर इनकी रक्षा करें।
सकरा की जमीन के नीचे दफन यह सभ्यता न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव का विषय हो सकती है। जरूरत है एक इच्छाशक्ति की, ताकि ‘यक्षिणी’ की उस मूर्ति और ‘पटसामा की ईंटों’ को वह सम्मान मिल सके जिसकी वे हकदार हैं। यदि ऐसा हुआ, तो मुजफ्फरपुर का यह क्षेत्र वैशाली की तरह ही अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के केंद्र के रूप में उभर सकता है।
समस्तीपुर | 19 जनवरी 2026 समस्तीपुर जिले की दशकों पुरानी रेल और नागरिक सुविधाओं की मांगों को लेकर अब जन-आंदोलन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सोमवार को स्थानीय डीआरएम चौक पर रेल विकास-विस्तार मंच एवं जिला विकास मंच की एक संयुक्त आपातकालीन बैठक संपन्न हुई। शंकर प्रसाद साह की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में जिले के विकास के प्रति प्रशासनिक उदासीनता पर गहरा रोष व्यक्त किया गया।
मुख्यमंत्री के कर्पूरीग्राम दौरे पर टिकी निगाहें
बैठक में आगामी 24 जनवरी को मुख्यमंत्री के कर्पूरीग्राम आगमन को एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है। मंच के नेताओं ने निर्णय लिया है कि उस दिन जिले की ज्वलंत समस्याओं और नई रेल परियोजनाओं की मांगों को लेकर मुख्यमंत्री को एक स्मार-पत्र सौंपा जाएगा। केवल इतना ही नहीं, जिले के सर्वांगीण विकास की इन मांगों की गूँज लोकसभा और विधानसभा के आगामी बजट सत्र में भी सुनाई दे, इसके लिए जिले के सभी सांसदों और विधायकों को भी ज्ञापन सौंपकर उन पर दबाव बनाया जाएगा।
हवाई अड्डा और रेल नेटवर्क विस्तार मुख्य एजेंडा
मंच ने स्पष्ट किया है कि समस्तीपुर के औद्योगिक और सामाजिक विकास के लिए दूधपूरा में हवाई अड्डा की मंजूरी अब अनिवार्य हो गई है। इसके अलावा, रेल कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए निम्नलिखित नई रेल लाइनों को बजट में शामिल करने की मांग की गई है:
कर्पूरीग्राम-ताजपुर-भगवानपुर रेल लाइन
केबलस्थान-कर्पूरीग्राम रेल लाइन
दलसिंहसराय-पटोरी रेल लाइन
मुक्तापुर-कुशेश्वरस्थान रेल लाइन
जाम की समस्या: मुक्तापुर और अटेरन गुमटी पर ओवरब्रिज की मांग
शहर में बढ़ते ट्रैफिक और रेल गुमटियों पर लगने वाले घंटों के जाम को देखते हुए, मंच ने मुक्तापुर रेल गुमटी और अटेरन चौक रेल गुमटी पर ओवरब्रिज (ROB) निर्माण कार्य तत्काल शुरू करने की पुरजोर वकालत की है। नेताओं का कहना है कि ओवरब्रिज न होने से आम जनता और एम्बुलेंस सेवाओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
“धरोहर” के अस्तित्व पर खतरा: रेल कारखाना की उपेक्षा
बैठक को संबोधित करते हुए मंच के संयोजक शत्रुघ्न राय पंजी ने समस्तीपुर रेल कारखाना की बदहाली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा, “एक लंबी लड़ाई के बाद कारखाना में POH (पीओएच) डब्बा निर्माण कार्य तो शुरू हुआ, लेकिन यह केवल कागजों तक सीमित लग रहा है। न तो सरकार ने इसके लिए भूमि अधिग्रहण किया और न ही बड़ी मशीनें मंगाई गईं। ब्रिटिश काल का यह गौरवशाली कारखाना हमारी धरोहर है और इसके विकास में कोई भी प्रशासनिक कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
ये रहे बैठक में उपस्थित
इस महत्वपूर्ण बैठक में क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। अपने विचार व्यक्त करने वालों में सुरेंद्र प्रसाद सिंह, जीबछ पासवान, उपेंद्र राय, अशोक कुमार, राजेंद्र राय, विश्वनाथ सिंह हजारी और सुशील कुमार प्रमुख थे। सभी ने एक स्वर में कहा कि यदि इस बार मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।
ताजपुर/समस्तीपुर | सरकार द्वारा जल्दबाजी में शुरू की गई ‘फार्मर रजिस्ट्री’ योजना को लेकर किसानों में भारी आक्रोश और चिंता व्याप्त है। अखिल भारतीय किसान महासभा ने इसे किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का सौदा बताया है।
योजना का मुख्य संकट
कृषि विभाग के अनुसार, भविष्य में सरकार की सभी महत्वपूर्ण योजनाएं जैसे:
किसान सम्मान निधि की राशि
डीजल और खाद-बीज पर अनुदान
फसल क्षति मुआवजा एवं यांत्रिकीकरण सब्सिडी
ये सभी लाभ केवल उसी जमीन (रकवा) के आधार पर मिलेंगे जो फार्मर रजिस्ट्री पोर्टल पर दर्ज होगा।
तकनीकी खामियां और जमीनी हकीकत
अखिल भारतीय किसान महासभा के प्रखंड अध्यक्ष ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने मौजूदा व्यवस्था की गंभीर त्रुटियों को उजागर करते हुए कहा कि:
त्रुटिपूर्ण ऑनलाइन रिकॉर्ड: अधिकांश किसानों की ऑनलाइन जमाबंदी पर ‘खाता-खेसरा’ शून्य अंकित है।
पुराने रिकॉर्ड: कई किसानों की जमाबंदी आज भी उनके पिता या दादा के नाम पर है, जिसे अपडेट नहीं किया गया है।
पोर्टल की सीमा: वर्तमान पोर्टल पर एक से अधिक जमाबंदी दर्ज करने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव है, जबकि बिहार के अधिकांश किसानों के पास एक से अधिक जमाबंदी है।
माले की चेतावनी
भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने रविवार को प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि यदि सरकार ने पहले राजस्व महाभियान के तहत आए आवेदनों का ऑनलाइन सुधार नहीं किया, तो यह योजना पूरी तरह फ्लॉप साबित होगी। उन्होंने मांग की है कि पोर्टल में सुधार कर एक से अधिक जमाबंदी दर्ज करने की सुविधा दी जाए, अन्यथा किसानों को भारी सरकारी लाभ से वंचित होना पड़ेगा।
मुख्य मांग: सरकार सबसे पहले राजस्व अभिलेखों में सुधार करे और उसके बाद ही फार्मर रजिस्ट्री को अनिवार्य बनाए, ताकि वास्तविक किसानों को उनका हक मिल सके।
सकरा के कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर ‘डीह’ की बदहाली पर विशेष पड़ताल
मुजफ्फरपुर, बिहार। ब्यूरो रिपोर्ट:
बिहार की मिट्टी के बारे में कहा जाता है कि यहाँ आप जहाँ भी फावड़ा चलाएंगे, वहां से इतिहास की कोई न कोई कहानी जरूर निकलेगी। लेकिन मुजफ्फरपुर जिले का सकरा प्रखंड इन दिनों किसी गौरवशाली गाथा के लिए नहीं, बल्कि अपनी बेबसी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण चर्चा में है। यहाँ की जमीन अपने भीतर एक ऐसी सभ्यता को दबाए बैठी है, जो आज से लगभग 3500 साल पुरानी है। प्रखंड के तीन प्रमुख पुरातात्विक स्थल— कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर — आज संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व की अंतिम सांसे ले रहे हैं।
इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए ये स्थल ‘उत्तरी काली पॉलिशदार मृदभांड संस्कृति‘ (NBPW Phase) के अनमोल खजाने हैं। यह वह कालखंड था जब भारत में वैदिक सभ्यता का सूर्यास्त और शहरी लौह युगीन संस्कृति का उदय हो रहा था। आज इन तीनों स्थलों पर बिखरे हुए काली और लाल पॉलिश के मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े उस दौर के उन्नत शिल्प कौशल की चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है।
समान कालखंड, साझा बर्बादी
इन तीनों स्थलों—कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर—में जो सबसे बड़ी समानता है, वह है इनका समकालीन होना। लगभग 700 ईसा पूर्व के आसपास, जब गंगा के मैदानी इलाकों में महाजनपदों (जैसे वज्जी और मगध) का उदय हो रहा था, तब ये क्षेत्र मानव बस्तियों और प्रशासनिक गतिविधियों से गुलजार थे।
विडंबना यह है कि जहाँ साढ़े तीन हजार साल की प्राकृतिक चुनौतियों, युद्धों और मौसम के थपेड़ों ने इन स्थलों को नहीं मिटाया, वहीं आधुनिक काल की प्रशासनिक उपेक्षा और स्थानीय लोगों की जागरूकता में कमी इन्हें समूल नष्ट कर रही है। स्थानीय ग्रामीण इन्हें महज ‘डीह‘ यानी पुरानी ऊँची जगह भर समझते हैं। उनके लिए यहाँ से निकलने वाली प्राचीन ईंटें और खपड़े सिर्फ निर्माण सामग्री या कचरा हैं। यही कारण है कि इन ऐतिहासिक धरोहरों पर संरक्षण की कोई मुकम्मल दीवार नहीं, बल्कि बदहाली की चादर लिपटी नजर आती है।
1. रामपुर भसौन: कदाने नदी के आगोश में समाती सभ्यता
रामपुर भसौन, जो बाजी बुजुर्ग पंचायत के अंतर्गत आता है, आज प्रकृति और समय की दोहरी मार झेल रहा है। शहीद द्वार से होकर गुजरने वाला ऊबड़-खाबड़ रास्ता सीधे उस इतिहास की ओर ले जाता है, जिसे काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान ने अपनी मुहर लगाकर प्रमाणित किया है।
पुरातत्व की गवाही और विशाल अवशेष
यहाँ की मिट्टी खोदते ही इतिहास बाहर आने लगता है। यहाँ से प्राप्त ईंटों का विशाल आकार (15 इंच लंबी, 9.5 इंच चौड़ी और 2.5 इंच मोटी) यह स्पष्ट संकेत देता है कि यहाँ मौर्यकालीन या उससे भी प्राचीन काल का कोई भव्य निर्माण रहा होगा। खेतों में जुताई के दौरान अक्सर बड़ी हांडियों और दीवारों के अवशेष मिलते रहते हैं।
प्रकृति का प्रहार और नदी का कटाव
इस टीले की सबसे बड़ी दुश्मन फिलहाल कदाने नदी बनी हुई है। नदी की लहरें धीरे-धीरे इस ऐतिहासिक टीले को काटकर अपने भीतर निगल रही हैं। नदी के पानी में आधी डूबी पुरानी दीवारें और तट पर बिखरे लाल-काले मृदभांड किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का दिल चीर देने के लिए काफी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान श्मशान घाट के पास कभी किसी प्राचीन महल या प्रशासनिक केंद्र की मुख्य इमारत रही होगी।
आस्था बनाम अस्तित्व
टीले के मुख्य भाग पर स्थित राम-जानकी मंदिर और मठ सदियों पुरानी परंपरा का केंद्र है। मंदिर के पुजारी शुकदेव दास के अनुसार, यहाँ पूजा-पाठ सैकड़ों वर्षों से होता आ रहा है, लेकिन टीले की वैज्ञानिक प्राचीनता को लेकर कभी कोई आधिकारिक प्रयास नहीं हुआ। आज 1.40 लाख वर्ग मीटर का यह क्षेत्र निजी खेती की चपेट में है, जहाँ प्राचीन कौड़ियां और ऐतिहासिक महत्व के खपड़े ट्रैक्टरों के टायरों के नीचे रौंदे जा रहे हैं।
2. कुलेसरा: ऊँचाई से ढलान की ओर बढ़ता ‘पुरातात्विक स्तूप‘
रामपुर मणि पंचायत में स्थित कुलेसरा डीह को सकरा का सबसे बड़ा और ऊँचा पुरातात्विक टीला होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन यह ‘गौरव’ अब केवल कागजों और यादों तक सीमित रह गया है।
विशालता और निरंतर क्षरण
लगभग 8 लाख वर्ग मीटर में फैला यह टीला कभी साढ़े तीन मीटर की ऊँचाई पर गर्व से खड़ा था। बीते तीन दशकों में विकास की अंधी दौड़ ने इसकी सूरत बदल दी। सड़क निर्माण के लिए यहाँ से अवैध रूप से मिट्टी काटी गई और अंधाधुंध खेती ने इस टीले की मूल संरचना को बिगाड़ दिया है। अब इसकी ऊँचाई घटकर मात्र डेढ़ से दो मीटर रह गई है।
‘सात कुओं‘ का रहस्य और हॉल का जाल
स्थानीय लोककथाओं और किंवदंतियों में यहाँ ‘सात कुओं‘ का जिक्र मिलता है। ग्रामीण बताते हैं कि हाल ही में सड़क निर्माण के दौरान एक प्राचीन कुएं का मुख दिखाई दिया था, जिसे बिना किसी जांच के फिर से मिट्टी से दबा दिया गया। यहाँ दबी हुई मिट्टी की दीवारें और समतल सतह किसी विशाल ‘हॉल’ या सामुदायिक भवन की ओर इशारा करती हैं।
नदी का विस्थापन और व्यापारिक केंद्र
कुलेसरा के पूरब और दक्षिण में कदाने नदी के पुराने बहाव के स्पष्ट निशान आज भी मौजूद हैं। पुरातत्वविदों का अनुमान है कि यह स्थल कभी एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह या जलमार्ग के किनारे स्थित कोई महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र रहा होगा। नदी के एक किलोमीटर दूर खिसक जाने से यहाँ की भौगोलिक स्थिति तो बदल गई, लेकिन जमीन के नीचे दबे साक्ष्य आज भी किसी बड़े खुलासे का इंतजार कर रहे हैं।
3. रघुवरपुर: रोटावेटर की मार और विकास की बलि
प्रखंड मुख्यालय से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित रघुवरपुर की स्थिति सबसे अधिक शोचनीय और हृदयविदारक है। एनएच-28 से सटा होने के बावजूद यह स्थल आज अपनी पहचान खो चुका है।
मिटा दिया गया अस्तित्व
80 के दशक तक के रिकॉर्ड बताते हैं कि यह टीला भी लगभग 3 मीटर ऊँचा था। लेकिन रेल मार्ग के विस्तार, भारी जल निकासी और आधुनिक निर्माण कार्यों के कारण यहाँ मिट्टी का इतना कटाव हुआ कि टीला पूरी तरह समतल हो गया है। जो जगह कभी इतिहास का शिखर थी, वह आज केवल एक निर्जन खेत बनकर रह गई है।
मशीनीकरण का कहर
यहाँ 1.40 लाख वर्ग मीटर भूमि पर अब गहन खेती होती है। रोटावेटर और हैरो जैसे आधुनिक कृषि यंत्रों ने मिट्टी के नीचे दबे उन प्राचीन मृदभांडों (Pottery) को चकनाचूर कर दिया है, जो 3500 सालों से सुरक्षित थे। किसान अनजाने में अपने ही पूर्वजों की विरासत को धूल में मिला रहे हैं।
विशेषज्ञ राय: क्यों महत्वपूर्ण हैं ये स्थल?
पुरातत्वविदों के अनुसार, NBPW (North Black Polished Ware) संस्कृति भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम काल है जब ‘द्वितीय नगरीकरण’ शुरू हुआ था। इसी दौर में सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ, लोहे का कृषि में बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ और बुद्ध-महावीर जैसे महापुरुषों का आगमन हुआ। सकरा के ये स्थल उसी कालखंड के ‘अर्बन सेंटर’ रहे होंगे। यदि यहाँ वैज्ञानिक उत्खनन होता है, तो वैशाली और पाटलिपुत्र के बीच के सांस्कृतिक संबंधों की एक नई कड़ी मिल सकती है।
निष्कर्ष: क्या हम अपनी जड़ों को खो रहे हैं?
सकरा के ये तीनों पुरातात्विक स्थल केवल मुजफ्फरपुर या बिहार के नहीं, बल्कि पूरे भारत की साझा विरासत हैं। वक्त की मांग है कि प्रशासन और समाज नींद से जागे।
तत्काल आवश्यक कदम:
संरक्षण: पुरातत्व विभाग इन स्थलों को तुरंत ‘संरक्षित क्षेत्र’ घोषित करे और इनकी घेराबंदी (Fencing) कराए।
वैज्ञानिक उत्खनन: इन स्थलों पर तत्काल ‘Excavation’ शुरू किया जाए ताकि मौर्य, बुद्ध और गुप्त काल के अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठ सके।
जन-जागरूकता: स्थानीय स्कूलों और पंचायतों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जाए ताकि ग्रामीण इन ‘डीह’ को केवल मिट्टी का ढेर न समझकर अपनी ‘धरोहर’ समझें।
संग्रहालय: इन स्थलों से प्राप्त अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर एक छोटा संग्रहालय बनाया जाए।
अगर आज प्रशासनिक स्तर पर सार्थक पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास को केवल कहानियों में सुनेंगी। धरातल पर दिखाने के लिए हमारे पास केवल धूल और पछतावा बचेगा। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को यह बताने के लायक बचेंगे कि जहाँ वे आज खड़े हैं, वहाँ साढ़े तीन हजार साल पहले एक महान सभ्यता सांस लेती थी?
इतिहास अक्सर अपने पीछे निशान छोड़ जाता है—कभी पत्थरों की इबारत में, तो कभी मिट्टी के मूक अवशेषों में। लेकिन जब इतिहास पर आस्था की परतें चढ़ जाएं और साक्ष्यों के बीच जनश्रुतियों का द्वंद्व शुरू हो जाए, तो सच की तलाश बेहद रोमांचक हो जाती है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर, सकरा प्रखंड का एक छोटा सा गांव ‘रघुनाथपुर दोनमा’ आज एक ऐसे ही ऐतिहासिक और पुरातात्विक रहस्य का केंद्र बना हुआ है।
कदाने नदी के शांत तट पर स्थित एक विशाल मिट्टी का टीला (डीह), जो करीब तीन मीटर ऊँचा है, आज न केवल इतिहासकारों के लिए शोध का विषय है, बल्कि दो समुदायों की आस्था और एक अनसुलझे विवाद की गवाह भी है।
‘रघुनाथपुर दोनमा’ डीह का एक दृश्य
पुरातात्विक साक्ष्य: ईसा पूर्व 700 साल की पदचाप
रघुनाथपुर दोनमा का यह टीला कोई साधारण टीला नहीं है। काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तक ‘कैटलॉग ऑफ आर्किलॉजिकल साइट्स इन बिहार‘ (खंड 2, पृष्ठ 238, क्रम संख्या 13) में इसे विधिवत दर्ज किया गया है। इस पुस्तक में इसे ‘रघुनाथपुर दोनमा उर्फ रघुबरपुर उर्फ मोहम्मदपुर’ के नाम से उल्लेखित किया गया है।
इतिहास की शब्दावली में इस स्थल का काल निर्धारण एनबीपी डब्लू (NBPW – Northern Black Polished Ware) काल के रूप में किया गया है। इतिहास के अध्यापक डॉ. शांतनु सौरभ बताते हैं कि NBPW का अर्थ है ‘उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड’। यह काल भारतीय उपमहाद्वीप में ईसा पूर्व 700 से 200 ईसा पूर्व के बीच का माना जाता है।यानी जब मगध का उत्कर्ष हो रहा था, तब यहाँ के लोग उन्नत कोटि के चमकदार काले बर्तनों का उपयोग कर रहे थे। आज भी खेतों की जुताई में निकलने वाले घड़े के टुकड़े और प्राचीन चौकोर ईंटें इस समृद्ध काल की गवाही देते हैं।
यहाँ की मिट्टी आज भी ‘बोलती’ है। डीह के चप्पे-चप्पे पर काले और लाल मृदभांड (बर्तनों) के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। यहाँ मिलने वाले बर्तनों की चिकनाई और चमक आज भी वैसी ही है, जो उस दौर के उच्च स्तरीय हस्तशिल्प और अग्नि-प्रबंधन को दर्शाती है।
आस्था का संगम और अदृश्य दीवारें
वर्तमान में इस पुरातात्विक स्थल की सूरत ऐतिहासिक कम और धार्मिक ज्यादा नजर आती है। टीले के सबसे ऊँचे शिखर पर बाबा अजगैबीनाथ पीर की मजार है। स्थानीय किंवदंती है कि वे फारस (ईरान) से आए एक सूफी संत थे, जो साधना के लिए यहीं रुक गए।
हैरत की बात यह है कि इसी मजार के ठीक बगल में एक रामनामी झंडा लहरा रहा है और मिट्टी का एक पिंड (ब्रह्म स्थान/देव स्थान) स्थापित है। मजार और हिंदू देव-स्थान के बीच कोई भौतिक दीवार नहीं है। मजार के सेवादार बताते हैं कि “यहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों पीढ़ियों से आते हैं। हिंदू दूध और चादर चढ़ाते हैं, तो मुसलमान फातिहा पढ़ते हैं।” मजार और देव स्थान की सीमा को लेकर दोनों समुदायों के अपने-अपने दावे हैं। जहाँ एक पक्ष इसे प्राचीन काल से कब्रिस्तान बताता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेष मानता है।
लेकिन यह शांति केवल सतह पर दिखती है। इस स्थल की मिल्कियत और प्रकृति को लेकर एक गहरी कानूनी जंग मुजफ्फरपुर सिविल कोर्ट में जारी है। साल 2002 से यहाँ वाद संख्या 144/2002 (मो. एकरामुल हक एवं अन्य बनाम बिहार सरकार एवं अन्य) विचाराधीन है। पिछले 24 वर्षों से चल रहे इस मुकदमे ने इस स्थल के पुरातात्विक विकास को एक तरह से फ्रीज कर दिया है। ग्रामीण बताते हैं कि साल 2002 में ही मजार के पास स्थित देव-स्थान को लेकर हुए विवाद के बाद मामला कोर्ट पहुँचा था। आज यह वाद संख्या ही वह चाबी है, जिससे इस प्राचीन डीह के भविष्य का फैसला होना है।
‘अलशान मियां‘ और विध्वंस की दास्तां
खोजी पड़ताल के दौरान स्थानीय बुजुर्गों और ग्रामीणों के बयानों में एक नाम बार-बार उभरता है—शासक अलशान मियां। ग्रामीण धर्मचन्द राय, विश्वजीत सिंह और सुरेन्द्र राय का दावा है कि उनके पूर्वजों (दादा-परदादा) ने बताया था कि यहाँ एक भव्य मंदिर हुआ करता था।
वे बताते हैं कि करीब 12वीं शताब्दी के आसपास (प्रारंभिक मध्यकाल), उत्तर बिहार में इस्लाम के प्रवेश के समय यहाँ एक भीषण संघर्ष हुआ। कहा जाता है कि अलशान मियां के आक्रमण के दौरान मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। ग्रामीण मानते हैं कि उस युद्ध में जो लोग मारे गए, उन्हें इसी टीले पर दफना दिया गया, जिससे यह एक कब्रिस्तान में बदल गया। स्थानीय लोग आज भी उस दौर को ‘वर्ग संघर्ष’ के परिणाम के रूप में देखते हैं।
रघुनाथपुर दोनमा’ डीह से प्राप्त मृदभांड का एक दृश्य
बाजी घाट का ‘काला पत्थर‘: मंदिर का आखिरी सबूत?
ग्रामीणों के इन दावों को एक ठोस आधार मिलता है पास के ही गौरी शंकर मंदिर से। बाजी घाट पुल के पास, कदाने नदी के दक्षिण तट पर स्थित इस मंदिर में काले पत्थर (Black Basalt) से बनी एक खंडित प्रतिमा का हिस्सा रखा हुआ है। यह वास्तव में एक मानव आकृति का बायां पैर है।
मान्यता है कि यह पैर उसी प्राचीन मंदिर की मूर्ति का हिस्सा है जिसे रघुनाथपुर दोनमा के डीह पर तोड़ा गया था। पीढ़ियों से लोग इस ‘पाषाण चरण’ की पूजा कर रहे हैं। इतिहासकारों के अनुसार, जिस काले पत्थर का उपयोग यहाँ दिखा है, वह पाल कालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) मूर्तिकला की विशेषता है। इसके अलावा, गौरी शंकर मंदिर का शिवलिंग भी अद्वितीय है, जिसमें लिंग के साथ शक्ति (सती) की आकृति उकेरी गई है, जो इस क्षेत्र में तंत्र और शैव मत के प्रभाव को दर्शाती है।
गौरी शंकर मंदिर बाजी में रखा हुआ चरण चिन्ह अंकित पाषाण टुकड़ा
भौगोलिक बनावट और प्राचीन इंजीनियरिंग
यह स्थल प्राचीन इंजीनियरिंग का भी एक नमूना है। करीब 1,57,500 वर्ग मीटर में फैला यह मुख्य डीह चारों तरफ से उपजाऊ खेतों से घिरा है। यहाँ काम करने वाले किसान पवन कुमार महतो बताते हैं कि खेतों की जुताई करते समय अक्सर जमीन के अंदर पक्की दीवारें टकराती हैं। प्राचीन समय में यहाँ जल आपूर्ति के लिए कदाने नदी के अलावा, उत्तर और पश्चिम दिशा में ‘क्षारण‘ (प्राकृतिक जल मार्ग) बना था, जो सुरक्षा और सिंचाई दोनों के काम आता था।
स्थानीय निवासी धर्मचन्द राय और दिवंगत मुकेश सिंह ने इस स्थल की ऐतिहासिकता को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया। उन्होंने यहाँ से मिलने वाले अवशेषों को व्यक्तिगत स्तर पर संग्रह कर सहेजने का सराहनीय कार्य किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों को पहचान सकें।
सरकारी उपेक्षा और मंडराता खतरा
रघुनाथपुर दोनमा की सबसे बड़ी त्रासदी इसकी उपेक्षा है। ‘कैटलॉग ऑफ आर्किलॉजिकल साइट्स’ में दर्ज होने के बावजूद, यहाँ पुरातत्व विभाग का कोई बोर्ड या सुरक्षा घेरा नहीं है।
नाम का भ्रम: कैटलॉग में इसे ‘रघुबरपुर उर्फ मोहम्मदपुर’ कहा गया है, जबकि ग्रामीण बताते हैं कि रघुबरपुर यहाँ से 5 किमी दूर ढोली स्टेशन के पास एक अलग स्थल है। यह दस्तावेजी त्रुटि सुधार की बाट जोह रही है।
अवैध गतिविधि: प्रशासन की अनुमति के बिना टीले की खुदाई करना या मिट्टी हटाना इसकी ऐतिहासिक परतों (Stratigraphy) को हमेशा के लिए नष्ट कर सकता है।
इतिहासकार चेतावनी देते हैं कि यदि यहाँ वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन (Excavation) किया जाए, तो यह स्थल एक बड़ा पर्यटन और शोध केंद्र बन सकता है।
स्थानीय ग्रामीण जिन्होने अपने विचार साझा किये
रघुनाथपुर दोनमा का डीह केवल मिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि बिहार के उस गौरवशाली अतीत का हिस्सा है जिसने मौर्य काल से लेकर पाल काल और फिर सूफी संतों के आगमन तक के समय को देखा है। यहाँ की मजार, यहाँ का ब्रह्म स्थान और यहाँ के मृदभांड—ये सब मिलकर एक ऐसी कहानी बुनते हैं जो आस्था, विवाद और विज्ञान के बीच झूल रही है।
बड़ा सवाल: क्या सकरा के इतिहास को बचा पाएगा प्रशासन?
पुरातत्व विभाग की सूची में नाम होने के बावजूद, रघुनाथपुर दोनमा डीह पर न तो पूरी बाउंड्री है और न ही अवैध खुदाई पर रोक। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहाँ वैज्ञानिक उत्खनन (Excavation) हो, तो उत्तर बिहार के इतिहास की कई नई परतें खुल सकती हैं।
क्या प्रशासन इस अनमोल विरासत को ‘आस्था और विवाद’ की भेंट चढ़ने से बचाएगा, या मिट्टी के ये बुत हमेशा के लिए खामोश हो जाएंगे? अब गेंद प्रशासन और पुरातत्व विभाग के पाले में है। क्या हम इस 2700 साल पुराने पन्ने को इतिहास की किताब से फटने देंगे, या इसे सहेजकर दुनिया को दिखाएंगे? रघुनाथपुर के ‘बोलते बुत’ आज यही सवाल पूछ रहे हैं।
मुजफ्फरपुर (बिहार) बिहार की पावन भूमि सदैव से ही आध्यात्मिकता, रहस्य और ऐतिहासिक गौरव का संगम रही है। वैशाली के लोकतंत्र से लेकर गया की ज्ञान-भूमि तक, इस प्रदेश का हर जिला अपने आंचल में इतिहास की अनमोल कड़ियाँ समेटे हुए है। इसी कड़ी में उत्तर बिहार का मुजफ्फरपुर जिला, जो अपनी मीठी लीची और बाबा गरीबनाथ की कृपा के लिए विश्वविख्यात है, अब एक ऐसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रहस्य के कारण चर्चा में है, जो न केवल धर्मशास्त्रियों बल्कि पुरातत्वविदों को भी अचंभित कर रहा है।
‘गौरी शंकर मंदिर’ बाजी घाट स्थित दुर्लभ शिवलिंग की तस्वीर
मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड के अंतर्गत बाजी घाट स्थित ‘गौरी शंकर मंदिर‘ आज एक वैश्विक पहेली बन चुका है। यहाँ एक ऐसा दुर्लभ शिवलिंग स्थापित है, जिसे दुनिया का एकमात्र दूसरा ऐसा शिवलिंग माना जाता है, जहाँ लिंग रूप में भगवान शिव के साथ माता सती (शक्ति) की मुखाकृति साक्षात विराजमान है। इस शिवलिंग की सबसे बड़ी खूबी इसकी वह कलाकारी है, जिसमें पत्थर के भीतर से माता सती के स्वर्ण जड़ित नेत्र भक्तों को निहारते प्रतीत होते हैं।
कदाने नदी का तट और अलौकिक अवस्थिति
सकरा प्रखंड के सबहा-बरियारपुर मार्ग पर चलते हुए जब आप कदाने नदी के समीप पहुँचते हैं, तो बाजी घाट पुल के ठीक बगल में एक प्राचीन मंदिर है। नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह गौरी शंकर मंदिर सदियों से स्थानीय जनजीवन की आस्था का केंद्र रहा है। लेकिन हालिया शोध और ऐतिहासिक तथ्यों के उजागर होने के बाद इसकी महत्ता कई गुना बढ़ गई है।
इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर और यहाँ का शिवलिंग भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। नदी का तट होने के कारण यह प्राचीन काल में व्यापार और संस्कृति का एक मुख्य मार्ग रहा होगा, जिसकी पुष्टि यहाँ बिखरे अवशेष करते हैं।
स्थापत्य कला का शिखर: पालकालीन शिवलिंग और स्वर्ण नेत्रों का रहस्य
बाजी घाट स्थित ‘गौरी शंकर मंदिर’ में शिवलिंग पर जलाभिषेक की तस्वीर
इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ का शिवलिंग है। विशेषज्ञों और पुरातत्वविदों के प्रारंभिक अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि यह शिवलिंग पालकालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) है। पाल साम्राज्य अपनी उत्कृष्ट पत्थर नक्काशी और धातु कला के लिए जाना जाता था।
कसौटी पत्थर की अजेय चमक: यह शिवलिंग काले कसौटी पत्थर से निर्मित है। आश्चर्य की बात यह है कि हजारों साल बीत जाने के बाद भी इसकी चमक वैसी ही बरकरार है, जैसी निर्माण के समय रही होगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि पत्थर की आभा ऐसी है मानो इस पर अभी-अभी पॉलिश की गई हो।
सती के स्वर्ण नेत्र: इस शिवलिंग के अग्रभाग पर माता सती की मुखाकृति अत्यंत बारीकी से उकेरी गई है। सबसे विस्मयकारी तथ्य यह है कि माता के नेत्रों को स्वर्ण परत (Gold Layer) से मढ़ा गया है। जब मंदिर के गर्भगृह में घी का दीपक जलता है, तो स्वर्ण नेत्रों से परावर्तित होने वाली रोशनी एक अलौकिक ऊर्जा का संचार करती है। यह शिल्प कला का वह दुर्लभ नमूना है जहाँ पाषाण और स्वर्ण का ऐसा अद्भुत संगम दिखता है।
लाा घेरे में खंडित प्रतिमा की तस्वीर जिसमें पैर का अंकण दिखाया गया है
मुगलकाल का वह ‘रूई व्यापारी‘ और चमत्कारिक पुनर्निर्माण
मंदिर का इतिहास जितना प्राचीन है, इसका पुनरुद्धार उतना ही रोमांचक है। मंदिर से जुड़े स्थानीय ग्रामीण सह आचार्य पंडित राम कुमार झा बताते हैं कि मंदिर का वर्तमान गर्भगृह लगभग साढ़े चार सौ साल पुराना है। इसका सीधा संबंध मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल से जुड़ता है।
कथा कुछ इस प्रकार है कि अकबर के समय में दिल्ली का एक खत्री व्यवसायी, जो रूई का बड़ा व्यापार करता था, बाजी घाट के रास्ते अपने माल के साथ गुजर रहा था। उस समय यह प्राचीन शिवलिंग एक खंडहर अवस्था में खुले आकाश के नीचे उपेक्षित पड़ा था।
थकान मिटाने के लिए जब वह व्यापारी बाजी घाट पर रुका और महादेव की वह दुर्दशा देखी, तो उसके मन में गहरी संवेदना जागी। उसने अनायास ही एक संकल्प लिया— “हे महादेव, यदि इस बार मेरे रूई के व्यापार में अप्रत्याशित लाभ हुआ, तो मैं यहाँ आपका एक भव्य मंदिर बनवाऊँगा।”
ईश्वरीय कृपा ऐसी हुई कि अगले ही दिन उस व्यापारी का सारा माल आश्चर्यजनक रूप से ऊंचे दामों पर बिक गया। उसे इतना मुनाफा हुआ कि उसने अपनी प्रतिज्ञा को मान देते हुए, मात्र एक दिन के मुनाफे से इस मंदिर के गर्भगृह का भव्य पुनर्निर्माण करवाया। यह कथा आज भी सकरा की लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग है।
इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना: खजूरिया ईंटें और भूकंप की गवाही
मंदिर की बनावट आज के आधुनिक इंजीनियरों के लिए भी शोध का विषय है। वर्तमान सरपंच डॉ. कामेश्वर झा बताते हैं कि मंदिर के गर्भगृह की दीवारें ‘खजूरिया ईंटों‘ (प्राचीन छोटी ईंटें) से निर्मित हैं।
दीवारों की मजबूती: मंदिर की दीवारों की मोटाई लगभग तीन फीट है।
ईंटों का माप: यहाँ प्रयुक्त ईंटों की लंबाई साढ़े अठारह सेंटीमीटर, चौड़ाई ग्यारह सेंटीमीटर और मोटाई चार सेंटीमीटर है।
भूकंप का परीक्षण: वर्ष 1934 में जब बिहार में महाविनाशकारी भूकंप आया था, जिसमें बड़े-बड़े शहर जमींदोज हो गए थे, उस समय भी इस मंदिर का मुख्य ढांचा और शिवलिंग अडिग रहा। हालांकि उत्तरी अहाते का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन मुख्य मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।
100 साल पुराने कैडस्ट्रल सर्वे मैप में भी इसे बाजी बंजरिया गांव के एकमात्र मंदिर के रूप में दर्शाया गया है, जो इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता को पुख्ता करता है।
अहाते में खंडित प्रतिमा: एक अनसुलझा राज
गौरी शंकर मंदिर के अहाते में काले पत्थर की एक खंडित प्रतिमा का हिस्सा रखा हुआ है, जो अपने आप में कई सवालों को जन्म देता है।
अहाते में खंडित प्रतिमा की तस्वीर जिसमें पैर का अंकण दिखाया गया है
प्रतिमा का केवल बायां पैर दिखाई पड़ता है, जिसमें बहुत ही सुंदर पायल अंकित है।
प्रतिमा के आकार को देखकर विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि यह मूल रूप से लगभग 5 फीट की विशाल प्रतिमा रही होगी।
स्थानीय निवासी अमरनाथ साह के अनुसार, यह प्रतिमा कैसे खंडित हुई, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। लेकिन एक प्रबल मान्यता यह है कि यह प्रतिमा समीप के ही पुरातात्विक स्थल ‘रघुनाथपुर दोनमा‘ के किसी ध्वस्त मंदिर का हिस्सा है। रघुनाथपुर दोनमा को पहले ही ‘नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर‘ (NBPW) संस्कृति के रूप में चिन्हित किया जा चुका है। यदि इस प्रतिमा के शेष हिस्सों की तलाश की जाए, तो इस क्षेत्र के प्राचीन वैभव का एक नया अध्याय खुल सकता है।
खेतों में बिखरा इतिहास: मृदभांड और शोध की आवश्यकता
मंदिर के आसपास के खेतों में आज भी इतिहास बिखरा पड़ा है। पूरब की ओर के खेतों में काले एवं लाल मृदभांड (Pottery) के टुकड़े अक्सर खुदाई या जुताई के दौरान मिलते रहते हैं। ये मृदभांड इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि यहाँ जमीन के नीचे कोई प्राचीन नगरी या सभ्यता दबी हुई है।
रघुनाथपुर दोनमा का पुरातात्विक स्थल यहाँ से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है। नदी के दोनों तटों पर फैली यह पुरातात्विक बेल्ट वैज्ञानिक उत्खनन की मांग कर रही है। यदि भारत सरकार और पुरातत्व विभाग यहाँ गहन शोध करे, तो यह स्थल वैशाली और नालंदा की तरह ही महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
सकरा का यह गौरी शंकर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बिहार के इतिहास का वह खोया हुआ पन्ना है जिसे अभी तक पूरी तरह पढ़ा नहीं गया है। पालकालीन कला, अकबरकालीन निर्माण, और प्राचीन मृदभांडों का यह संगम दुर्लभ है। यहाँ का हर पत्थर, स्वर्ण जड़ित नेत्रों वाली माता सती की वह मुस्कान और कदाने नदी की लहरें—सब मिलकर एक ऐसी गाथा कहते हैं जो सदियों पुरानी है।
आज आवश्यकता है कि इस स्थान को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए और यहाँ की ऐतिहासिकता का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हो। यह मंदिर न केवल मुजफ्फरपुर का गौरव है, बल्कि यह संपूर्ण देश की सांस्कृतिक धरोहर है।
मुजफ्फरपुर के बाजी घाट पर स्थित यह ‘गौरी-शंकर‘ धाम पुकार रहा है—इतिहासकारों को, भक्तों को और उन शोधकर्ताओं को जो मिट्टी के नीचे दबे सच को बाहर लाने का साहस रखते हैं। यहाँ पत्थर बोलते हैं, और स्वर्ण नेत्र साक्षात देवत्व का आभास कराते हैं।
मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के अहियापुर थाना क्षेत्र में मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ बुढ़ी गंडक नदी किनारे एक महिला और उसके तीन मासूम बच्चों के शव दुपट्टे से बंधे हुए बरामद हुए हैं। इस मामले में मृतका के पति द्वारा पुलिस को दिए गए FIR आवेदन ने अपहरणकर्ताओं की खौफनाक साजिश और पुलिस की कथित सुस्ती पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
अहियापुर थाने को दिए गये प्राथमिकी की कॉपी दिखाते हंए मृतका के पति कृष्ण मोहन कुमार
नदी किनारे बंधे मिले चार शव
स्थानीय चंदवारा घाट पुल के नीचे नदी किनारे स्थानीय लोगों ने जब चार शव देखे, तो पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। मृतकों की पहचान 22 वर्षीय ममता कुमारी, उनके 6 वर्षीय पुत्र आदित्य, 4 वर्षीय पुत्र अंकुश और 2 वर्षीय पुत्री कृति के रूप में हुई है। चारों की नृशंस हत्या कर शवों को नदी में फेंक दिया गया था।
FIR आवेदन में खौफनाक कॉल का खुलासा
मृतका के पति कृष्ण मोहन कुमार द्वारा अहियापुर थाने में दिए गए आवेदन (कांड संख्या 79/26) के अनुसार:
लापता होने की सूचना: 10 जनवरी 2026 को सुबह 11:00 बजे ममता बच्चों के साथ मार्केटिंग के लिए निकली थी और वापस नहीं लौटी।
धमकी भरा कॉल: 12 जनवरी की सुबह करीब 3:00 बजे मोबाइल नंबरों 9905528XXX और 8969725XXX से कृष्ण मोहन को कॉल आया।
अपहरण की कबूली: फोन करने वालों ने स्वीकार किया कि उन्होंने ममता और बच्चों का अपहरण कर लिया है।
परिवार को खत्म करने की धमकी: अपराधियों ने साफ तौर पर कहा कि “अगर पुलिस को बताया तो तुम्हारे पूरे परिवार को जान से मारकर फेंक देंगे।”
चंदवारा घाट पुल के नीचे नदी किनारे मिले चार शवों की तस्वीर
पुलिस की भूमिका पर गंभीर आरोप
परिजनों का आरोप है कि 10 जनवरी को गुमशुदगी और 12 जनवरी को अपहरण व धमकी की लिखित जानकारी देने के बावजूद पुलिस ने समय रहते कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। परिजनों का मानना है कि यदि पुलिस उन मोबाइल नंबरों को तत्काल ट्रेस करती, तो आज ये चार जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।
पुलिस की लापरवाही पर भड़के लोग
परिजनों का आरोप है कि 10 जनवरी को गुमशुदगी और 12 जनवरी को धमकी भरे कॉल की जानकारी देने के बावजूद पुलिस ने समय पर ठोस कार्रवाई नहीं की। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पुलिस ने मोबाइल लोकेशन के आधार पर त्वरित कार्रवाई की होती, तो इन चार जिंदगियों को बचाया जा सकता था।
जांच और कार्रवाई
मुजफ्फरपुर के एसएसपी कांतेश कुमार मिश्रा ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए एफएसएल (FSL) और सर्विलांस की टीमें जांच में जुटी हैं। केस के अनुसंधानकर्ता एसआई मिथुन कुमार को बनाया गया है। पुलिस का दावा है कि आरोपियों की पहचान की जा रही है और जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
समस्तीपुर। ताजपुर के भेरोखरा निवासी मनीष पोद्दार और उनके परिवार पर हुई पुलिसिया बर्बरता का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। मनीष पोद्दार को ‘थर्ड डिग्री टॉर्चर’ देने और उनके परिजनों की पिटाई के आरोपी थानाध्यक्ष एवं आईओ (अनुसंधान अधिकारी) के निलंबन को भाकपा माले ने नाकाफी बताया है। माले ने अब दोषियों की बर्खास्तगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।
स्मार पत्र के साथ भाकपा माले के ताजपुर प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह
दोषियों को सस्पेंड नहीं, बर्खास्त करे सरकार: माले
भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने पुलिस अधीक्षक अरविंद कुमार सिंह द्वारा की गई निलंबन की कार्रवाई को ‘आधा-अधूरा’ कदम बताया है। उन्होंने कहा कि पुलिसिया जुल्म जिस स्तर का था, उसमें महज निलंबन न्याय नहीं है।
माले नेता ने आरोप लगाया कि भेरोखरा निवासी संजय पोद्दार के पुत्र मनीष पोद्दार के साथ अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी गईं। पुलिस ने न केवल मनीष के निजी अंगों में पेट्रोल डाला और बर्बरता की, बल्कि उसकी पत्नी को भी चार दिनों तक अवैध रूप से हाजत में बंद रखा। इस दौरान मनीष के पिता और पत्नी के साथ भी मारपीट की गई।
DM और SDM को सौंपा स्मार पत्र
बृहस्पतिवार को भाकपा माले के प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी रौशन कुशवाहा और अनुमंडलाधिकारी दीलीप कुमार से मुलाकात कर एक स्मार पत्र सौंपा। इसमें पुलिसिया दमन के साथ-साथ प्रखंड में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया है।
माले की प्रमुख मांगें:
दोषी पुलिस अधिकारियों और थानाध्यक्ष को तत्काल सेवा से बर्खास्त किया जाए।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए ‘घूस लेते अंचल कर्मचारी’ के वीडियो की उच्च स्तरीय जांच हो।
सभी भूमिहीनों को वास भूमि और सरकारी जमीन पर बसे लोगों को बंदोबस्ती का पर्चा दिया जाए।
आवास योजना में जारी खुलेआम घूसखोरी पर तत्काल रोक लगे।
वंचित गांव-टोलों में संपर्क पथ (सड़क) का निर्माण सुनिश्चित हो।
24 जनवरी को ‘न्याय आंदोलन‘ का आह्वान
प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने घोषणा की कि इन मांगों के समर्थन में और पुलिसिया गुंडागर्दी के खिलाफ 24 जनवरी को ताजपुर के राजधानी चौक पर सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक विशाल मानव श्रृंखला बनाई जाएगी। उन्होंने ताजपुर की जनता से अपील की है कि वे इस ‘न्याय आंदोलन’ में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें ताकि शासन-प्रशासन को जगाया जा सके।