बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर प्रखंड में पुलिस की संवेदनहीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और संदिग्ध शराब कांड को लेकर जन-आंदोलन की नई चिंगारी सुलग गई है। शनिवार को भाकपा माले के बैनर तले सैकड़ों कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने शहर की सड़कों पर उतरकर नीतीश सरकार के ‘सुशासन’ को आईना दिखाया। ‘न्याय मार्च’ के माध्यम से कार्यकर्ताओं ने न केवल पुलिसिया दमन का विरोध किया, बल्कि भ्रष्टाचार में डूबे राजस्व विभाग और शराब माफियाओं के साथ प्रशासन की मिलीभगत पर भी कड़े प्रहार किए।
भाकपा माले के बैनर तले ‘न्याय मार्च’ में पुलिसिया जुल्म और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश प्रकट करते कार्यकर्ता
अस्पताल चौक से गूंजी इंकलाब की आवाज
शनिवार की सुबह ताजपुर का अस्पताल चौक लाल झंडों और सरकार विरोधी नारों से पट गया। भाकपा माले के कार्यकर्ता हाथों में तख्तियां लिए हुए थे, जिन पर पुलिसिया जुल्म और भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लिखे थे। अस्पताल चौक से निकला यह ‘न्याय मार्च’ शहर के मुख्य मार्गों—बाजार क्षेत्र, थाना रोड और गांधी चौक होते हुए पुनः अस्पताल चौक पर पहुंचा, जहां यह एक विशाल आक्रोश सभा में तब्दील हो गया। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे नेताओं ने आरोप लगाया कि ताजपुर पुलिस अब रक्षक नहीं बल्कि भक्षक बन चुकी है।
मनीष पोद्दार कांड: मानवता को शर्मसार करने वाली ‘थर्ड डिग्री‘
सभा के मुख्य वक्ता और खेग्रामस के जिला सचिव जीबछ पासवान ने मनीष पोद्दार के साथ हुई पुलिसिया बर्बरता का जो ब्यौरा दिया, उसने सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर दिए। उन्होंने कहा, “भाजपा-जदयू की नीतीश सरकार में पुलिस बेलगाम हो गई है। महज संदेह के आधार पर एक छोटे दुकानदार, उसकी पत्नी और वृद्ध पिता को उठाकर हाजत में बंद कर देना कानून का माखौल उड़ाना है। हद तो तब हो गई जब मनीष पोद्दार को अमानवीय यातनाएं दी गईं। आरोप है कि पुलिस ने उसके मलद्वार में सिरिंज के माध्यम से पेट्रोल डाला और डंडा घुसेड़ा। यह किसी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है।”
पासवान ने आगे कहा कि पुलिस ने कानून को ताक पर रखकर पीड़ित को 5 दिनों तक अवैध हिरासत में रखा। जब उसकी हालत बिगड़ने लगी और वह बेहोश हो गया, तब जाकर कागजी खानापूर्ति और इलाज की नौटंकी की गई। माले नेताओं ने स्पष्ट किया कि जब तक दोषी थानाध्यक्ष को बर्खास्त नहीं किया जाता, उनका आंदोलन आगे जारी रहेगा।
राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार और ‘रॉबिन ज्योति’ का वायरल विडियो बनने लगा मुद्दा
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलते हुए भाकपा माले के जिला कमिटी सदस्य उपेंद्र राय ने ताजपुर अंचल कार्यालय के राजस्व कर्मचारी रॉबिन ज्योति का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार अब बंद कमरों से निकलकर खुलेआम वीडियो के रूप में जनता के सामने है। रॉबिन ज्योति द्वारा रिश्वत लेते हुए वीडियो वायरल होने के बावजूद प्रशासन की चुप्पी यह साबित करती है कि ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। उपेंद्र राय ने चेतावनी दी, “भ्रष्ट कर्मचारी को बचाने की साजिश रची जा रही है। अगर जिलाधिकारी ने तत्काल प्रभाव से आरोपी को बर्खास्त नहीं किया, तो भाकपा माले कलेक्ट्रेट का घेराव करेगी।”
जहरीली शराब कांड: बहादुरनगर में पसरा मातम और प्रशासनिक लीपापोती
बंगरा थाना क्षेत्र के बहादुरनगर में हुई पिता-पुत्र की संदिग्ध मौत पर ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह और प्रभात रंजन गुप्ता ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि यह मौतें जहरीली शराब पीने से हुई हैं, लेकिन प्रशासन इसे बीमारी या अन्य कारणों का रूप देकर शराब माफियाओं को संरक्षण दे रहा है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार शराबबंदी का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ गांव-गांव में शराब की नदियां बह रही हैं। भाकपा माले ने इस कांड की उच्च स्तरीय जांच और मृतक के परिजनों को मुआवजा देने की मांग की है।
मुख्यमंत्री के आगमन पर विरोध की तैयारी: सुरेंद्र प्रसाद सिंह
सभा की अध्यक्षता कर रहे प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने अपने संबोधन में आंदोलन की भविष्य की रूपरेखा स्पष्ट कर दी। उन्होंने जिला प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि यदि 24 जनवरी से पहले इन तमाम मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कर्पूरीग्राम आगमन पर उनका पुरजोर विरोध किया जाएगा।
सिंह ने कहा, “मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर की धरती पर आ रहे हैं, लेकिन उनके राज में गरीबों और पिछड़ों पर जुल्म हो रहा है। हम मुख्यमंत्री के सामने काली तख्तियां दिखाकर उनसे जवाब मांगेंगे कि आखिर ताजपुर की पुलिस और प्रशासन इतना निरंकुश क्यों है?”
क्षेत्रीय नेताओं की एकजुटता
इस आक्रोश सभा को माले नेता आसिफ होदा, राजदेव प्रसाद सिंह, शंकर महतो, संजीव राय, मो० एजाज, चांद बाबू, मो० नौशाद, मो० शाद, सुनील कुमार शर्मा, मनोज साह, दिनेश प्रसाद सिंह, महावीर सिंह, मो० शकील और रॉकी खान ने भी संबोधित किया। सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि ताजपुर की धरती अब दमन बर्दाश्त नहीं करेगी और इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया जाएगा।
प्रमुख मांगें जिन पर अड़ा है विपक्ष:
थानाध्यक्ष की बर्खास्तगी: मनीष पोद्दार को थर्ड डिग्री टॉर्चर करने वाले थानाध्यक्ष पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज हो।
भ्रष्टाचार पर वार: राजस्व कर्मचारी रॉबिन ज्योति को तत्काल सेवामुक्त किया जाए।
न्यायिक जांच: बहादुरनगर जहरीली शराब कांड की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए।
मुआवजा: पुलिसिया प्रताड़ना के शिकार मनीष पोद्दार को उचित मुआवजा और सरकारी मदद दी जाए।
शाम ढलते-ढलते सभा समाप्त हुई, लेकिन ताजपुर के राजनीतिक गलियारों में इस ‘न्याय मार्च’ ने खलबली मचा दी है। अब देखना यह है कि प्रशासन माले की इन मांगों पर क्या रुख अपनाता है।
मुजफ्फरपुर। उत्तर बिहार के प्रतिष्ठित महंत दर्शन दास महिला महाविद्यालय (MDDM) के सभागार में बिहार विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (बुस्टा) की महाविद्यालय इकाई द्वारा ‘नव-वर्ष मिलन समारोह सह आम बैठक 2026’ का भव्य आयोजन किया गया। यह आयोजन केवल एक औपचारिक मिलन समारोह नहीं, बल्कि शिक्षक एकता और अधिकारों के प्रति संकल्पबद्धता का एक मंच बन गया। कार्यक्रम की मुख्य गूँज ‘संगठन में ही शक्ति है‘ के नारे के साथ पूरे परिसर में सुनाई दी।
निर्भय नेतृत्व की आवश्यकता पर बल
बैठक की अध्यक्षता करते हुए बुस्टा की महाविद्यालय अध्यक्ष डॉ. विनीता झा ने शिक्षक आंदोलन के ऐतिहासिक पन्नों को पलटते हुए वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया। उन्होंने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में शिक्षकों को केवल शैक्षणिक कार्यों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए मुखर होना होगा। डॉ. झा ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “नेतृत्व का पहला और अनिवार्य गुण निर्भयता है। जो व्यक्ति निर्भय नहीं है, वह नेतृत्व के योग्य नहीं हो सकता। एक शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है, इसलिए हमें अपनी समस्याओं पर निर्भीकता से बात करनी होगी।”
बैठक को संबोधित करती बुस्टा की महाविद्यालय अध्यक्ष डॉ. विनीता झा
‘जिंदा हो तो जिंदा नजर आना होगा‘
कार्यक्रम का संचालन और आह्वाहन बुस्टा की महाविद्यालय सचिव डॉ. कुमारी सरोज द्वारा किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में जोश भरते हुए आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब नई पीढ़ी के शिक्षकों को नेतृत्व की कमान संभालनी होगी। उन्होंने कहा, “सफलता और अधिकार थाली में सजाकर नहीं मिलते। अगर हम जीवित समाज का हिस्सा हैं, तो हमें अपनी जीवंतता का प्रमाण देना होगा। अपने वाजिब हक को प्राप्त करने के लिए सत्ता की हठधर्मिता से टकराना अनिवार्य है।” उनके इस वक्तव्य ने उपस्थित शिक्षक समुदाय के बीच ऊर्जा का संचार किया।
संघर्ष ही सफलता की कुंजी: डॉ. किरण झा
विश्वविद्यालय इकाई सचिव डॉ. किरण झा ने इस मौके पर शिक्षक संघ की प्रासंगिकता और उसकी ऐतिहासिक देन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज हम जिन सुविधाओं और सम्मान के साथ कार्य कर रहे हैं, वह पूर्ववर्ती शिक्षक नेताओं के कड़े संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बिना सामूहिक संघर्ष के कुछ भी प्राप्त करना असंभव है। “संगठन ही हमारी वह शक्ति है जो प्रशासन और सरकार को हमारी मांगों पर विचार करने के लिए विवश करती है।”
वरिष्ठ शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति
बैठक के दौरान कॉलेज के विभिन्न विभागों के शिक्षकों ने अपनी समस्याओं और भविष्य की कार्ययोजनाओं पर संवाद किया। इस अवसर पर संगठन को जमीनी स्तर पर और अधिक मजबूत करने के लिए सदस्यता अभियान और नियमित बैठकों पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम में मुख्य रूप से निम्नलिखित पदाधिकारियों और वरिष्ठ शिक्षकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई:
डॉ. निशिकांति (कोषाध्यक्ष)
डॉ. शकीला अज़ीम एवं डॉ. स्वस्ति वर्मा (वरिष्ठ शिक्षिकाएं)
डॉ. प्रियम फ्रांसिस एवं डॉ. आभा कुमारी (सह सचिव)
बैठक को संबोधित करती बुस्टा की विश्वविद्यालय इकाई सचिव डॉ. किरण झा
एकजुटता का संकल्प और शुभकामनाएँ
समारोह के दूसरे चरण में नव-वर्ष 2026 का हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया गया। शिक्षकों ने एक-दूसरे को नवीन वर्ष की शुभकामनाएं दीं और सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे संगठन के झंडे तले एकजुट रहेंगे। वक्ताओं ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि एम.डी.डी.एम. कॉलेज इकाई हमेशा से शिक्षक हितों के लिए अग्रणी रही है।
बैठक के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ सभा का समापन हुआ। इस मिलन समारोह ने यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में बुस्टा अपनी मांगों को लेकर और अधिक आक्रामक और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
सकरा, मुजफ्फरपुर: उत्तर भारत में बढ़ती ठंड और शीतलहर के प्रकोप को देखते हुए सामाजिक सरोकारों की दिशा में एक सराहनीय पहल की गई है। सकरा बाजिद पंचायत के तुलसीमोहनपुर गांव स्थित मांझी टोला में असहाय और मजबूर परिवारों की मदद के लिए राहत सामग्री वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कड़ाके की ठंड से जूझ रहे दर्जनों परिवारों के बीच घर घर जाकर कंबल, स्वेटर और अन्य गर्म कपड़ों का वितरण किया गया।
वरिष्ठ समाजसेवियों ने बढ़ाया मदद का हाथ
सामग्री वितरण कार्यक्रम का नेतृत्व क्षेत्र के चर्चित समाजसेवी एवं पूर्व मुखिया प्रत्याशी राजेश कुमार ने किया। इस पुनीत कार्य में समस्तीपुर से आए अतिथि समाजसेवी रामचंद्र राम और उनकी धर्मपत्नी शकुंतला देवी ने भी विशेष रूप से शिरकत की। इन अतिथियों ने अपने हाथों से बुजुर्गों और बच्चों को गर्म कपड़े पहनाए, जिससे कड़ाके की ठंड में उनके चेहरों पर मुस्कान लौट आई।
महिला को चादर ओढ़ाने के लिए हाथ में चादर लिए शकुंतला देवी
मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म: राजेश कुमार
इस अवसर पर उपस्थित ग्रामीणों को संबोधित करते हुए समाजसेवी राजेश कुमार ने अत्यंत भावुक और प्रेरक विचार साझा किए। उन्होंने कहा, “मानव सेवा ही संसार का सबसे बड़ा धर्म है। दुनिया में असहाय, लाचार और बेबस लोगों की सेवा करने से जो आत्मिक शांति और सच्चा आशीर्वाद मिलता है, वह किसी अन्य कार्य से संभव नहीं है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि इंसानियत और मानवता से बड़ा कोई कर्म नहीं है। समाज के सक्षम लोगों को आगे आकर अपने आसपास के जरूरतमंदों की सुध लेनी चाहिए, ताकि कोई भी गरीब ठंड या अभाव के कारण कष्ट न भोगे।
भावी पीढ़ी को सेवा का पाठ: बेटी लक्ष्मी कुमारी ने भी निभाई भूमिका
इस कार्यक्रम की एक खास विशेषता यह रही कि राजेश कुमार ने अपनी पुत्री लक्ष्मी कुमारी को भी इस अभियान में सक्रिय रूप से शामिल किया। लक्ष्मी ने स्वयं अपने हाथों से जरूरतमंदों की मदद की।
अपनी बेटी को साथ लाने के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए राजेश कुमार ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी बचपन से ही समाज की जमीनी हकीकत और गरीबी को करीब से देखे। उसे यह अहसास हो कि समाज के प्रति हमारी क्या जिम्मेदारी है। मैं उसे इन संस्कारों से रूबरू करा रहा हूँ ताकि भविष्य में जब मैं न रहूँ, तब भी वह मानवता की इस मशाल को जलाए रखे और इसी तरह समाज सेवा के कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाती रहे।”
चादर ओढ़ने के बाद आत्मीय मुद्रा में दिव्यांग व्यक्ति , एवं चादर वितरित करते राजेश राम (दायें से)
ग्रामीणों में खुशी की लहर
भीषण ठंड के इस मौसम में अचानक मिली इस मदद से मांझी टोला के निवासी काफी गदगद नजर आए। ग्रामीणों ने कहा कि जब सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर मदद पहुंचने में देरी होती है, तब राजेश कुमार जैसे समाजसेवियों की पहल उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं होती।
कार्यक्रम के अंत में रामचंद्र राम और शकुंतला देवी ने भी समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि सेवा का यह सिलसिला भविष्य में भी जारी रहेगा। इस मौके पर टोले के गणमान्य व्यक्ति और बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण उपस्थित रहे।
भारत की सांस्कृतिक चेतना में कथाएं केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वे समय के पदचिह्न हैं। झारखंड के देवघर जिले में स्थित बैद्यनाथ धाम (रावणेश्वर धाम) की महिमा तो जगत व्याप्त है, लेकिन मुख्य मंदिर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसी जगह है, जहां अध्यात्म और आधुनिक विज्ञान के तर्क आपस में टकराते हैं। यह स्थान है ‘हरला जोरी’, जहां मौजूद है— रावण कुंड।
1. पौराणिक पृष्ठभूमि: कैलाश से लंका का वो अधूरा सफर
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, लंकाधिपति रावण अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर उन्हें लिंग स्वरूप में लंका ले जा रहा था। महादेव ने शर्त रखी थी कि “रावण, यदि तुमने मुझे रास्ते में कहीं भी पृथ्वी पर रखा, तो मैं वहीं अचल हो जाऊंगा।”
देवता नहीं चाहते थे कि शिव जैसी महाशक्ति का वास लंका में हो। जब रावण देवघर के समीप पहुँचा, तो वरुण देव ने उसके उदर में प्रवेश किया, जिससे उसे तीव्र लघुशंका (Urination) की अनुभूति हुई। रावण दुविधा में था। तभी वहां एक ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु प्रकट हुए। रावण ने उन्हें शिवलिंग थमाया और निवृत्त होने चला गया। वह लघुशंका इतनी दीर्घ और तीव्र थी कि वहां जल का एक बड़ा स्रोत बन गया, जिसे आज रावण कुंड या रावण जोर कहा जाता है।
हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर
2. भौगोलिक साक्ष्य: हरला जोरी का त्रिकोण
स्थानीय विद्वान पूर्णानंद ओझा की कृति ‘हरिला जोरी तीर्थ महात्म्य’ इस स्थान के तीन प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित करती है:
हरला जोरी शिव मंदिर: जहां आज भी भक्त श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।
विष्णुपद मंदिर :हरला जोरी – गया (बिहार) के बाद भारत का यह दूसरा दुर्लभ मंदिर है जहां भगवान विष्णु के पदचिह्न पूजे जाते हैं। माना जाता है कि इसी स्थान पर विष्णु ने शिवलिंग हाथ में लिया था।
रावण कुंड: वह जलधारा जो रावण की लघुशंका से उत्पन्न मानी जाती है।
3. मेडिकल जांच का तर्क: क्या यह जल ‘यूरीन’ के गुणों से युक्त है?
आज का विज्ञान हर तथ्य को प्रमाण की कसौटी पर कसता है। सवाल यह है कि क्या हज़ारों साल बाद भी उस जल में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो उसे मानव मूत्र या किसी विशिष्ट जैविक द्रव्य (Biological Fluid) के करीब ले जाते हैं?
हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर के समीप रावण के द्रारा लघुशंका का प्रतीकरत्मक द्श्य
चमत्कारी उपचार: स्थानीय लोगों का दावा है कि इस कुंड के जल से स्नान करने पर असाध्य चर्म रोग, फोड़े और फुंसियां ठीक हो जाती हैं। आयुर्वेद में ‘स्व-मूत्र चिकित्सा’ (Shivambu Therapy) का वर्णन है। क्या इस कुंड के जल में यूरिया या अमोनिया के कोई सूक्ष्म अंश आज भी विद्यमान हैं?
पैथोलॉजिस्ट का नजरिया: एक जनरल फिजिशियन और पैथोलॉजिस्ट के अनुसार, सामान्यतः मूत्र में यूरिया, क्रिएटिनिन और यूरिक एसिड होता है। यदि हज़ारों साल पहले की किसी घटना के अवशेष जांचने हों, तो उसके लिए ‘सडिमेंटेशन’ और ‘आर्कियोलॉजिकल साइंस’ का सहारा लेना होगा।
4. वैज्ञानिक चुनौतियां और ‘राइट टाइमिंग’
यदि हम आज इस कुंड के जल का सैंपल लें, तो रिपोर्ट ‘नॉर्मल वाटर’ ही आएगी। इसके दो प्रमुख कारण हैं:
प्रदूषण और मिक्सिंग: वर्तमान में रावण कुंड के पास पक्का नाला बना दिया गया है। बारिश के मौसम में आसपास का पहाड़ी पानी इसमें मिल जाता है, जिससे इसकी मौलिकता की जांच करना असंभव हो जाता है।
मई-जून का इंतज़ार: वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इस रहस्य की तह तक जाना है, तो मई या जून की भीषण गर्मी सबसे उपयुक्त समय है। तब बरसाती नाले सूख जाते हैं और केवल वही जल शेष रहता है जो जमीन के भीतर से ‘सोते’ के रूप में निकलता है। तभी लिए गए सैंपल से वास्तविक रसायनिक संरचना का पता चल सकता है।
हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर के समीप रावण के द्रारा किये गये लघुशंका स्थल का द्श्य
5. एक प्राकृतिक रहस्य: जमीन से स्वतः फूटता जल
दिलचस्प बात यह है कि हरला जोरी के पास श्यामा मंदिर परिसर में एक ऐसा हैंडपंप है, जिससे बिना चलाए ही पानी निकलता रहता है। यह इस क्षेत्र के एक विशेष ‘एक्विफर’ (भू-जल स्रोत) की ओर इशारा करता है। क्या रावण की कथा वास्तव में एक विशाल भू-वैज्ञानिक बदलाव (Geological Change) का आध्यात्मिक चित्रण है?
निष्कर्ष: आस्था और तर्क का संगम
रावण कुंड आज भी देवघर की उस लुप्त कड़ी के समान है, जिसे मुख्यधारा के पर्यटकों ने अभी पूरी तरह नहीं पहचाना है। यह स्थान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शोध का केंद्र बनने की योग्यता रखता है। जब तक विज्ञान इस पर अंतिम मुहर नहीं लगाता, तब तक यह आस्था का वह ‘अजस्र स्रोत’ बना रहेगा जो सदियों से बह रहा है और कभी सूखता नहीं।
आगामी अन्वेषण: मई की तपती गर्मी में ‘रावण कुंड‘ की लाइव इन्वेस्टिगेशन
न्यूज भारत टीवी केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करता। हम तथ्यों की गहराई तक जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसलिए, हमने निर्णय लिया है कि हम इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए मई की भीषण गर्मी में एक विशेष ‘लाइव इन्वेस्टिगेशन‘ करेंगे।
हम मई का महीना ही क्यों चुन रहे हैं?
वर्तमान में, वर्षा ऋतु और सामान्य मौसम के कारण ‘रावण कुंड’ का मूल जल आसपास की पहाड़ियों से आने वाले सतही जल (Surface Water) के साथ मिल चुका है। किसी भी वैज्ञानिक जांच के लिए ‘शुद्ध और मूल नमूना’ (Pure Sample) अनिवार्य है।
प्राकृतिक शुद्धता: मई की चिलचिलाती धूप में जब आसपास के तमाम जल स्रोत और बरसाती नाले सूख जाते हैं, तब रावण कुंड का असली स्वरूप उभरता है।
सोते का रहस्य: उस समय जो जलधारा शेष रहेगी, वह सीधे जमीन के भीतर से आने वाला वह ‘सोता’ होगा जिसका वर्णन कथाओं में है।
गंध और संरचना: स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि भीषण गर्मी में इस कुंड के पानी के रंग और गंध में विशिष्ट बदलाव आते हैं, जो सामान्य जल से भिन्न होते हैं।
हमारी जांच के मुख्य बिंदु (Investigation Roadmap):
साइंटिफिक सैंपलिंग (Scientific Sampling): हम विशेषज्ञों और पैथोलॉजिस्ट की एक टीम के साथ ‘हरला जोरी’ पहुंचेंगे। रावण कुंड के उस मूल स्थान से जल का नमूना लिया जाएगा जहां से धारा फूटती है। हम इसकी जांच लैब में कराएंगे ताकि यह पता चल सके कि क्या इसमें अमोनिया, यूरिया, या सल्फर जैसे तत्वों की मात्रा सामान्य से अधिक है।
हाइड्रोलॉजिकल मैपिंग (Hydrological Mapping): हम भू-गर्भ वैज्ञानिकों (Geologists) से यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या यह केवल एक ‘आर्टिसियन वेल’ (पाताल तोड़ कुआं) की प्रक्रिया है या इस विशिष्ट स्थान की मिट्टी और पत्थरों में कुछ ऐसा है जो इस जल को औषधीय बनाता है।
चमत्कार का साक्ष्य: कहा जाता है कि इस कुंड के पानी से चर्म रोग ठीक होते हैं। हम ऐसे लोगों से बात करेंगे जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से इस जल का लाभ उठाया है और इसकी तुलना मेडिकल साइंस के ‘एंटी-बैक्टीरियल’ सिद्धांतों से करेंगे।
ऐतिहासिक साक्ष्यों का मिलान: ‘हरिला जोरी तीर्थ महात्म्य’ के पन्नों को पलटते हुए हम मौके पर उन स्मृति चिन्हों को खोजेंगे जो रावण और भगवान विष्णु के उस संवाद की पुष्टि करते हैं, जिसका उल्लेख विद्वान पूर्णानंद ओझा ने किया है।
एक चुनौती, एक खोज
यह इन्वेस्टिगेशन केवल एक खबर नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और विज्ञान के बीच के सेतु को खोजने का एक प्रयास है। क्या रावण का वह ‘वेग’ आज भी एक जलधारा के रूप में जीवित है? क्या प्राचीन कथाओं में छिपे भौतिक साक्ष्य आज के लैब टेस्ट में खरे उतरेंगे?
मई 2026 (संभावित) में न्यूज भारत टीवी की टीम देवघर की उस तपती धरती पर मौजूद रहेगी, जहां इतिहास और विज्ञान का आमना-सामना होगा।
“सत्य वही है जो प्रमाण की कसौटी पर कसा जाए। बने रहिये हमारे साथ, क्योंकि हम लाएंगे उस रिपोर्ट का परिणाम, जिसका इंतज़ार सदियों से है।”
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मुजफ्फरपुर। शहर के कैप्टन निषाद सभागार में ‘जागृति संस्थान’ के तत्वावधान में प्रख्यात कवि, नाटककार, कहानीकार और समीक्षक डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह का 71वाँ जन्मदिवस समारोह अत्यंत गरिमामय वातावरण में “प्रेरणा पर्व” के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम में विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वानों, साहित्यकारों और शोधार्थियों ने डॉ. सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तृत चर्चा की।
डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह के 71वाँ जन्मदिवस समारोह में शामिल साहित्यकार
साहित्यिक गुरु और साधक के रूप में पहचान
समारोह की अध्यक्षता करते हुए बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रामप्रवेश सिंह ने कहा कि डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह केवल एक सिद्ध साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक साहित्यिक गुरु भी हैं। उन्होंने अपनी रचनाशीलता के प्रकाश से अनेक नए साहित्यकारों को गढ़ा है।
ललित नारायण मिश्र मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र साह ने उन्हें एक ‘साहित्य साधक’ बताते हुए कहा कि उनकी रचनाओं से अनेक विमर्शों की सरणि (धारा) निकलती है। वहीं, संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. निभा शर्मा ने उन्हें शब्द के सच्चे अर्थों में एक ‘साहित्यिक संत’ की संज्ञा दी।
डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह के 71वाँ जन्मदिवस समारोह पर भेंट प्रदान करते अघ्यापक डा. मनोज कुमार सिंह व अन्य (बायें से)
दो सत्रों में वैचारिक और रचनात्मक विमर्श
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन, माल्यार्पण और स्वस्ति पाठ के साथ हुआ। पूरे आयोजन को दो महत्वपूर्ण सत्रों में विभाजित किया गया था:
प्रथम सत्र: आलेख पाठ (रचनाधर्मिता पर चर्चा) इस सत्र में विद्वानों ने डॉ. सिंह की विभिन्न कृतियों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए:
डॉ. राकेश रंजन: “अक्षयवट: एक अप्रतिम नाट्य प्रयोग” पर प्रकाश डाला।
डॉ. पिंकी कुमारी: “मैं भूखा हूँ” काव्य में भूख की शाश्वतता पर चर्चा की।
डॉ. चंद्रदेव सिंह: स्त्री विमर्श के संदर्भ में “माता, पत्नी, कन्या और अन्य कविताएँ” की महत्ता बताई।
डॉ. उमेशचंद्र त्रिपाठी: डॉ. सिंह की कहानी “पहचान” का विश्लेषण करते हुए इसे वर्तमान दौर के संकट की छाया बताया।
अन्य वक्ता: डॉ. रामसंयोग राय, अमरेंद्र कुमार झा और डॉ. राजेंद्र साह ने भी उनके रचना संसार और कृषक वेदना पर प्रभावी आलेख पढ़े।
डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह के 71वाँ जन्मदिवस समारोह में शामिल साहित्यकार एवं परिजन
द्वितीय सत्र: कवि सम्मेलन “फूलों की पंखुड़ियां बोले…” दूसरे सत्र में काव्य रस की वर्षा हुई। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामेश्वर द्विवेदी की अध्यक्षता और डॉ. पंकज कर्ण के संचालन में कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं।
डॉ. पुष्पा गुप्ता ने “फूलों की पंखुड़ियां बोले, है आज जन्मदिन तेरा” पढ़कर डॉ. सिंह को बधाई दी।
डॉ. पंकज कर्ण ने ग़ज़ल “उदासी के सफ़र में धूप को ओढ़ा बिछाया है” से समां बांधा।
गीतकार डॉ. चंद्रदेव सिंह, श्रवण कुमार और विनोद कुमार ने भी अपनी गीतों व कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम को संबोधित करते एम डी डी एम कॉलेज के हिन्दी के प्राध्यापक डा. राकेश रंजन
विशिष्ट जनों के उद्गार
डॉ. अमरेन्द्र ठाकुर: डॉ. सिंह ने अपनी ईमानदारी और कठोर परिश्रम से असंभव को संभव बनाया है।
डॉ. पुष्पा गुप्ता: उनकी कृतियां बोलती हैं, उन पर और अधिक शोध कार्य की आवश्यकता है।
डॉ. रामेश्वर राय: उनके संपर्क में आने वाला पाठक स्वयं लेखक बन जाता है।
डॉ. मनोज कुमार सिंह: उनकी साहित्य-साधना ‘हिमगिरि की स्रोतस्विनी’ (नदी) की तरह है जो निरंतर हरियाली फैला रही है।
“प्रेरणा पर्व” के इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह का साहित्य समाज के हर वर्ग और विमर्श को गहराई से छूता है। कार्यक्रम में भारी संख्या में साहित्य प्रेमी और प्रबुद्ध जन उपस्थित थे।
मुजफ्फरपुर, बिहार। इतिहास की धूल में अक्सर कई ऐसे हीरे दब जाते हैं जिनकी चमक सूरज को मात देने वाली होती है। बिहार की ज्ञान-भूमि मुजफ्फरपुर के ‘रघुनाथपुर दोनमा’ गाँव (सकरा प्रखण्ड) से निकला एक ऐसा ही नाम है— डॉ. जगदीश साहु। वे केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के एक ऐसे ‘ऋषि’ थे जिन्होंने एक हाथ में विज्ञान की मशाल थामी थी और दूसरे हाथ में समाजवाद का झंडा। यह कहानी एक ऐसे महामानव की है जिसने नेहरू के लोकसभा ऑफर को ठुकराया, ऑक्सफोर्ड में रिकॉर्ड बनाया और अंततः ‘पारस पत्थर’ के रहस्य को सुलझाते हुए दुनिया से विदा ली।
डॉ. जगदीश साहु
अभावों की भट्टी में तपा बचपन: संकल्पों का उदय
डॉ. जगदीश साहु का जन्म 1 जनवरी 1925 को एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री जुगेश्वर साहु पेशे से सोनार थे। गाँव की तंग गलियों और फटेहाली के बीच जगदीश का बचपन बीता। अक्सर गरीबी मेधा का गला घोंट देती है, लेकिन यहाँ पिता का संकल्प फौलादी था।
जब गाँव के लोग ताना देते कि “सोनार का बेटा पढ़कर क्या करेगा, इसे दुकान पर बैठाओ”, तब जुगेश्वर साहु ने ऐतिहासिक शब्द कहे थे: “मैं भूखा रह जाऊँगा, घर बेच दूँगा, पर जगदीश को पढ़ाऊँगा।”
जगदीश ने भी पिता के मान को गिरने नहीं दिया। अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए वे बचपन से ही छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। जिला स्कूल मुजफ्फरपुर से 1943 में मैट्रिक प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर उन्होंने अपनी मेधा का पहला परिचय दिया।
संघर्षों से स्वर्ण पदक तक: पटना का वह कठिन दौर
उच्च शिक्षा के लिए वे पटना विश्वविद्यालय पहुँचे, लेकिन नियति ने यहाँ उनकी परीक्षा ली। एम.एससी. (M.Sc.) के दौरान पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए। घर का चूल्हा और पिता की दवा, दोनों की जिम्मेदारी जगदीश के कंधों पर आ गई।
उन्होंने पढ़ाई छोड़ने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। वे दिन में पटना सचिवालय में सहायक (Assistant) के रूप में नौकरी करते और रात भर लैम्प की रोशनी में पढ़ते। 1953 का वह साल मुजफ्फरपुर के लिए गौरव का क्षण था जब जगदीश साहु ने पूरे विश्वविद्यालय में स्वर्ण पदक (Gold Medal) के साथ एम.एससी. उत्तीर्ण की।
ऑक्सफोर्ड का ऐतिहासिक सफर: डेढ़ साल में रची क्रांति
डॉ. साहु की असली उड़ान तब शुरू हुई जब उन्होंने विश्वविख्यात वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन का एक शोध पत्र पढ़ा। उन्होंने अपना शोध सारांश (Synopsis) बॉवेन को भेजा। बॉवेन उनकी प्रतिभा से इतने दंग रह गए कि उन्हें तुरंत ऑक्सफोर्ड बुला लिया।
विश्वविख्यात वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन के साथ प्रयोगशाला में डॉ. जगदीश साहु
11 सितंबर 1956 को वे इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। वहाँ डॉ. साहु ने वह कर दिखाया जो आज भी एक रिकॉर्ड है। जिस पीएचडी (Ph.D.) को पूरा करने में गोरे वैज्ञानिकों को 4 साल लगते थे, डॉ. साहु ने उसे मात्र डेढ़ वर्ष में पूरा कर लिया। उनके शोध पत्र अमेरिका की ‘केमिकल सोसाइटी’ और ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ में प्रमुखता से छापे गए।
विदेशी प्रलोभन और चरित्र की शुचिता: ‘सच्चे भारतीय ‘
ऑक्सफोर्ड में प्रवास के दौरान उनके सामने एक ऐसा प्रलोभन आया जो किसी भी युवा को डगमगा सकता था। एक बड़े विदेशी वैज्ञानिक ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी बेटी से विवाह का प्रस्ताव दिया। साथ ही, इंग्लैंड में ही स्थायी प्रोफेसर की नौकरी और ऐशो-आराम का प्रलोभन भी दिया गया, जिसे इन्होंने अस्वीकार कर दिया, इस घटना के कुछ ही दिनों के बाद, इन्हें रसायन विज्ञान से जुड़े एक विशेष शोध कार्य के लिए ऑक्सफोर्ड में ही आमंत्रित किया गया, जिसमें पत्नी का स्नातक उत्तीर्ण होने की बाध्यता रखी गई, लेकिन डा. साहु पहले से शादी सुदा थे, और पत्नी स्नातक नहीं थी, जिसके कारण इन्होंने शोध को अस्वीकार कर दिया, जब ये किसी झासे में (प्रस्ताव पर सहमत) नहीं हुए और जब ये स्वदेश के लिए वापस चल दिए, तो इनको वहां रोकने का हर संभव प्रयास किया गया, बाद में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के हस्तक्षेप के बाद ये भारत वापस आ सके,
लेकिन डॉ. साहु का चरित्र हिमालय जैसा अडिग था। भारत में उनकी पत्नी इंतज़ार कर रही थीं, जो सामाजिक पैमानों पर शायद उतनी सुंदर नहीं मानी जाती थीं। परंतु डॉ. साहु के लिए वे उनकी अर्द्धांगिनी थीं। उन्होंने उस सुनहरे विदेशी प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया— ” मेरा वतन और मेरा परिवार मेरे लिए सर्वोपरि है।” यह उनके ‘समर्पित पति’ और सच्चे भारतीय होने का सबसे बड़ा प्रमाण था।
स्वदेश वापसी और राजनीति का दंश
डॉ. साहु अपनी मेधा का लाभ बिहार को देना चाहते थे, इसलिए वे 1960 में भारत लौट आए। लेकिन यहाँ उन्हें ‘भाई-भतीजावाद’ और गंदी राजनीति का सामना करना पड़ा। बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने उनके नाम की सिफारिश की, लेकिन कुछ रसूखदारों ने उनकी नियुक्ति रुकवा दी।
आहत होकर वे 1961 में लीबिया चले गए। लीबिया विश्वविद्यालय में उन्हें प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष (HOD) का पद मिला। वहाँ उन्होंने धन और यश दोनों कमाया, लेकिन अपनी मिट्टी की खुशबू उन्हें 1964 में वापस मुजफ्फरपुर खींच लाई।
हिंदी में विज्ञान लेखन: एक क्रांतिकारी पहल
डॉ. साहु का मानना था कि विज्ञान जब तक आम आदमी की भाषा में नहीं होगा, देश आगे नहीं बढ़ेगा। उन्होंने उस दौर में लगभग 20 पुस्तकें हिंदी में लिखीं। ‘मोतीलाल बनारसीदास’ जैसे प्रकाशकों ने उनकी किताबों को घर-घर पहुँचाया। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने उन्हें इस सेवा के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया।
राजनीति के चाणक्य और नेहरू का प्रस्ताव
डॉ. साहु केवल विज्ञान के कमरे में बंद नहीं रहे। वे बिहार की राजनीति के केंद्र बन गए।
नेहरू का ऑफर: देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें मुजफ्फरपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने का टिकट ऑफर किया। लेकिन डॉ. साहु ने विनम्रता से कहा— “नेहरू जी, राजनीति के लिए बहुत लोग हैं, मुझे विज्ञान और शिक्षा की सेवा करने दीजिए।”
नेताओं के मार्गदर्शक: वे जननायक कर्पूरी ठाकुर, डॉ. रामचन्द्र पूर्वे, डॉ. शीतल राम और डॉ. कुमकुम कटियार जैसे बिहार के राजनेताओं के पथ-प्रदर्शक (Mentor) रहे। इन नेताओं ने डॉ. साहु के समाजवादी विचारों से ही अपनी राजनीति को सींचा।
बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में स्थित डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय का दृश्य
सच्चे समाजवादी: ‘लोहिया कॉलेज’ का निर्माण
डॉ. साहु डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनन्य प्रशंसक थे। जब उन्होंने मुजफ्फरपुर में कॉलेज की स्थापना की, तो लोग चाहते थे कि वे इसे अपने माता-पिता का नाम दें। लेकिन इस सच्चे समाजवादी ने उसे एक स्मारक के रूप में ‘लोहिया कॉलेज’ का नाम दिया। उन्होंने अपनी लीबिया की सारी कमाई इस कॉलेज को खड़ा करने में लगा दी।
मुजफ्फरपुर शहर में स्थित डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय परिसर में स्थापित डा. जगदीश साहु एवं डा. लोहिया के स्टैचु का दृश्य
विलक्षण क्षमता: दोनों हाथों से एक साथ लेखन
डॉ. साहु की मेधा का एक और अद्भुत पक्ष था— उनकी ‘एम्बिडेक्सट्रस’ (Ambidextrous) शक्ति। वे ब्लैकबोर्ड पर एक साथ दोनों हाथों से अलग-अलग विषयों के जटिल समीकरण लिख सकते थे। यह दृश्य उनके छात्रों के लिए किसी जादू से कम नहीं होता था। यह उनके मस्तिष्क की असीमित क्षमता का परिचायक था।
अंतिम मिशन: ‘पारस पत्थर’ और अधूरा सपना
अपने जीवन के अंतिम दिनों में डॉ. साहु एक क्रांतिकारी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। बचपन में पिता से सुनी ‘पारस पत्थर’ की लोक-कथाओं को उन्होंने वैज्ञानिक आधार दिया। वे तत्वों के रूपांतरण (Transmutation of Elements) के जरिए सोना बनाने की तकनीक विकसित करने के बहुत करीब पहुँच चुके थे। उनके नोट्स बताते हैं कि वे उस रहस्य की दहलीज पर थे, जिसने सदियों से वैज्ञानिकों को ललचाया था। लेकिन 1969 के दशक में एक अचानक आए हृदय घात (Heart Attack) ने इस महान वैज्ञानिक की जीवन-लीला समाप्त कर दी। उनके साथ ही वह ‘पारस’ का रहस्य भी दफन हो गया।
एक युग का अंत
डॉ. जगदीश साहु का जीवन हमें सिखाता है कि गरीबी केवल एक स्थिति है, अंत नहीं। उन्होंने मुजफ्फरपुर की गलियों से ऑक्सफोर्ड के हॉलों तक का सफर अपनी नैतिकता, मेधा और संघर्ष के दम पर तय किया। आज जब हम लोहिया कॉलेज को देखते हैं या उनकी हिंदी विज्ञान पुस्तकों को पढ़ते हैं, तो हमें उस महान आत्मा का अहसास होता है जिसने सत्ता को ठुकराकर सत्य (विज्ञान) को चुना।
संघर्ष से सफलता का शिखर: मेधा शक्ति और लेखनी के बूते डॉ. जगदीश साहु ने वह किया जो शहर के बड़े अरबपतियों को नसीब नहीं,
सच्चे समाजवादी: डॉ. राम मनोहर लोहिया के प्रति अटूट श्रद्धा
डॉ. जगदीश साहु के जीवन का एक ऐसा पहलू है जो उन्हें अन्य विद्वानों से अलग खड़ा करता है। वे डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से गहरे प्रभावित थे। जब उन्होंने मुजफ्फरपुर में एक कॉलेज की स्थापना का बीड़ा उठाया, तो उनके सामने अपने माता-पिता के नाम पर संस्थान बनाने का विकल्प मौजूद था, जो उस समय एक सामान्य परंपरा थी।
निस्वार्थ कदम: अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता को देने के बावजूद, उन्होंने अपने व्यक्तिगत गौरव के बजाय समाजवाद के पुरोधा डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम को चुना। उन्होंने मुजफ्फरपुर में ‘लोहिया कॉलेज’ की स्थापना की।
विचारधारा की जीत: यह कदम उनके सच्चे समाजवादी होने का प्रमाण था। वे चाहते थे कि शिक्षा का केंद्र किसी व्यक्ति या परिवार की संपत्ति न बनकर एक ऐसी विचारधारा का प्रतीक बने जो समाज केवंचित और पिछड़े वर्ग के उत्थान की बात करती हो।
त्याग की प्रतिमूर्ति: डॉ. साहु ने लीबिया से कमाया हुआ धन और अपना कीमती समय इस कॉलेज को सींचने में लगा दिया। अपने पूर्वजों के नाम के बजाय एक जननायक के नाम पर शिक्षण संस्थान खोलना उनकी उदारता और महानता को दर्शाता है।
डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय परिसर में डा. जगदीश साहु के नाम पर रसायन विज्ञान विभाग का बाहरी दृश्य
डॉ. जगदीश साहु के जीवन को रेखांकित करता घटना क्रम : जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रसायन विज्ञान (Chemistry) के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया।
प्रमुख शोध पत्र (Research Papers)
डॉ. साहु के शोध मुख्य रूप से ‘फोटो केमिस्ट्री’ (Photo Chemistry) और ‘भौतिक रसायन’ (Physical Chemistry) पर केंद्रित थे। उनके कार्यों को अमेरिका और इंग्लैंड के शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों ने मान्यता दी:
The Fluorescence of Acridine and Acridone solutions: यह शोध पत्र अक्टूबर 1958 में अमेरिका की ‘केमिकल सोसाइटी’ द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस कार्य की महत्ता इतनी अधिक थी कि लंदन के ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ ने भी इसे विशेष अनुमति के साथ प्रकाशित किया।
The Absorption spectra of Hill-Reaction oxidants: कैलिफोर्निया के ‘स्टैंडर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के वैज्ञानिकों (जैसे रूडोल्फ जे. मार्कस और जेम्स एल. हैचेट) ने अपने शोध में डॉ. साहु के इस कार्य की सहायता ली थी।
The Effect of Temperature and Viscosity on Fluorescence: 1960 में ‘जर्नल इंडियन केमिकल सोसाइटी’ (Vol. 37) में प्रकाशित इस शोध में उन्होंने कार्बनिक यौगिकों पर तापमान और श्यानता के प्रभाव का अध्ययन किया था।
The Reduction of Kinetics of Nitrobenzene by Acid Stannous Chloride: यह शोध भी 1960 में ‘जर्नल इंडियन केमिकल सोसाइटी’ में प्रकाशित हुआ, जो रासायनिक अभिक्रियाओं की गतिशीलता (Kinetics) पर आधारित था।
The Effect of Temperature on Fluorescence of Solution: 1959 में ‘द जर्नल ऑफ फिजिकल केमिस्ट्री’ (अमेरिकन केमिकल सोसाइटी) में प्रकाशित इस शोध को उनके गुरु डॉ. ई.जे. बॉवेन के साथ संयुक्त रूप से लिखा गया था।
प्रकाशित पुस्तकें (Published Books)
डॉ. साहु ने उस दौर में विज्ञान को हिंदी में लिखने का साहस किया जब विज्ञान की अधिकांश उच्च स्तरीय सामग्री केवल अंग्रेजी में उपलब्ध थी:
विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें: उन्होंने माध्यमिक कक्षाओं से लेकर कॉलेज स्तर तक के छात्रों के लिए लगभग 20 पुस्तकें लिखीं।
प्रकाशन संस्थान: उनकी पुस्तकें प्रसिद्ध प्रकाशक ‘मोतीलाल बनारसीदास’ और ‘बिहार पब्लिकेशन हाउस, पटना’ द्वारा प्रकाशित की गई थीं।
ऐतिहासिक महत्व: डॉ. साहु संभवतः उस समय के पहले ऐसे प्रोफेसर थे जिन्होंने पूरे भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए इतनी बड़ी संख्या में विज्ञान की पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध कराईं। उनकी इन पुस्तकों ने हिंदी माध्यम के छात्रों के बीच विज्ञान के प्रति विश्वास पैदा किया।
Photo Chemistry in the Liquid and Solid States: इस नाम की एक पुस्तक में उनके शोध प्रबंधों (Thesis) और महत्वपूर्ण खोजों को संकलित किया गया है, जिसे ‘द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ से संबद्ध माना जाता है।
सम्मान और मान्यता
स्वर्ण पदक (Gold Medal): 1953 में एम.एससी. में प्रथम आने पर उन्हें स्वर्ण पदक मिला।
ऑक्सफोर्ड रिकॉर्ड: उन्होंने अपनी पीएचडी मात्र डेढ़ वर्ष में पूरी की, जो ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के इतिहास में एक रिकॉर्ड माना गया।
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्: हिंदी में विज्ञान की महान सेवा के लिए उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का ‘सम्मानित सदस्य’ मनोनीत किया गया था।
डॉ. साहु का मानना था कि “सर्वेगुणाः कांचनाश्रयन्ति” (सभी गुण सोने/धन के आश्रित होते हैं) वाली सोच गलत है; उनके लिए ज्ञान और उसकी अभिव्यक्ति (विशेषकर मातृभाषा में) सबसे ऊपर थी।
ऑक्सफोर्ड का संघर्ष: डेढ़ साल में रचा इतिहास
डॉ. साहु 11 सितंबर 1956 को ऑक्सफोर्ड के लिए रवाना हुए थे। वहाँ का जीवन उनके लिए आर्थिक और मानसिक रूप से एक बड़ी परीक्षा थी:
अभूतपूर्व गति: डॉ. साहु ने शोध का विषय ‘फोटो केमिस्ट्री ऑफ एरोमैटिक्स कम्पाउंड्स’ चुना था। जिस शोध कार्य को अन्य छात्र आमतौर पर 3 से 4 वर्षों में पूरा करते थे, डॉ. साहु ने उसे मात्र डेढ़ वर्ष में ही पूरा कर लिया। यह ऑक्सफोर्ड के इतिहास में एक रिकॉर्ड जैसा था।
आर्थिक अभाव और पार्ट-टाइम काम: विदेश में पढ़ाई के दौरान उनके पास पैसों की भारी कमी थी। पत्राचार और रहने का खर्च बहुत अधिक था। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए वे खाली समय में ‘पोर्ट’ (बंदरगाह) पर भारी काम करते थे और रात के समय अस्पताल में रोगियों की सेवा-सुश्रुषा (नर्सिंग हेल्प) का कार्य करते थे ताकि पढ़ाई जारी रह सके।
डॉ. बॉवेन के साथ गुरु-शिष्य संबंध: अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन उनके गुरु थे। डॉ. साहु की मेहनत से वे इतने प्रभावित हुए कि जब डॉ. साहु भारत लौटे, तो डॉ. बॉवेन स्वयं उनसे मिलने और उनकी चर्चा करने के लिए दिल्ली आए थे।
लीबिया का दौर: आत्म-सम्मान के लिए निर्वासन
भारत लौटने के बाद डॉ. साहु को अपनी ही मातृभूमि में उपेक्षा का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उन्हें लीबिया जाना पड़ा:
राजनीति का शिकार: डॉ. साहु जब ऑक्सफोर्ड से लौटे, तो बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने उन्हें ‘रीडर’ पद के लिए अनुशंसित (Recommend) किया था। लेकिन तत्कालीन राजनीति और भाई-भतीजावाद के कारण उनकी नियुक्ति नहीं होने दी गई। इस घटना ने उन्हें मानसिक रूप से काफी चोट पहुँचाई।
लीबिया में सम्मान: बिहार में उचित स्थान न मिलने पर उन्हें विदेश से बुलावा आया। 25 नवंबर 1961 को वे लीबिया विश्वविद्यालय चले गए। वहाँ उन्हें ‘विश्वविद्यालय प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष’ (Head of Department) का प्रतिष्ठित पद मिला।
सफलता और संपत्ति: लीबिया में उन्होंने लगभग तीन साल (1964 तक) बिताए। वहाँ उन्होंने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यश कमाया, बल्कि अच्छी संपत्ति (यश और धन) भी अर्जित की।
वतन की याद: लीबिया में सफलता के बावजूद उन्हें हमेशा अपना वतन याद आता था। वे मानते थे कि “अपने वतन में रहने का ठौर-ठिकाना होना चाहिए।” इसी इच्छा के कारण 1964 में वे सब कुछ छोड़कर वापस मुजफ्फरपुर लौट आए।
मुजफ्फरपुर वापसी और अंतिम पड़ाव
जब वे लीबिया से लौटे, तो बिहार विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. प्यारे लाल श्रीवास्तव के प्रयासों से उन्हें ‘भौतिक रसायन’ के रीडर पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने मुजफ्फरपुर के आमगोला क्षेत्र में जमीन खरीदी और वहाँ बस गए। इसके बाद उनकी ख्याति इतनी फैली कि उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों से उन्हें लगातार व्याख्यानों और परीक्षाओं के लिए निमंत्रण मिलने लगे।
डॉ. साहु का जीवन सिखाता है कि योग्यता को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। डॉ. जगदीश साहु केवल एक महान वैज्ञानिक ही नहीं थे, बल्कि वे एक उच्च कोटि के इंसान और समाजसेवी भी थे।
सादगी और विनम्रता
इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद, डॉ. साहु का जीवन सादगी की मिसाल था। ऑक्सफोर्ड से लौटने और विदेशों में रहने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया। वे मुजफ्फरपुर में ‘एक साधारण शिक्षक’ की तरह ही रहे। वे अक्सर छात्रों और आम लोगों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।
मातृभाषा के प्रति अटूट प्रेम
उस दौर में जब वैज्ञानिक समुदाय में केवल अंग्रेजी का बोलबाला था, डॉ. साहु ने हिंदी भाषा को विज्ञान के प्रचार-प्रसार का माध्यम चुना। उनका मानना था कि जब तक विज्ञान आम आदमी की भाषा में नहीं होगा, देश तरक्की नहीं कर सकता। इसी उद्देश्य से उन्होंने माध्यमिक से लेकर कॉलेज स्तर तक की विज्ञान की पुस्तकें हिंदी में लिखीं, जो उनकी दूरगामी सोच को दर्शाती हैं।
सामाजिक गतिविधियाँ और मार्गदर्शन
शिक्षण के प्रति समर्पण: वे मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज और बिहार विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। वे केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि छात्रों को शोध (Research) की बारीकियां और वैश्विक दृष्टिकोण सिखाते थे।
अकादमिक योगदान: वे उत्तर प्रदेश और बिहार के कई विश्वविद्यालयों में विशेषज्ञ (Expert) के रूप में बुलाए जाते थे। उन्होंने विज्ञान की कठिन गुत्थियों को सरल बनाकर समाज के हर वर्ग तक पहुँचाया।
प्रेरणा पुंज: डॉ. साहु अपने गाँव ‘रघुनाथपुर दोनमा’ और मुजफ्फरपुर के युवाओं के लिए एक जीवंत उदाहरण थे। वे अक्सर युवाओं को अभावों से लड़कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।
सम्मान के प्रति तटस्थता
उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का ‘सम्मानित सदस्य’ बनाया गया और कई अन्य सम्मान मिले, लेकिन वे प्रचार-प्रसार से दूर रहते थे। उनका असली सम्मान उनके द्वारा लिखे गए शोध पत्र और वे पुस्तकें थीं, जो आज भी विज्ञान के छात्रों का मार्गदर्शन करती हैं।
डॉ. जगदीश साहु का अकादमिक जीवन विश्व के कुछ अत्यंत प्रतिष्ठित संस्थानों और विद्वानों के सान्निध्य में बीता। उनके जीवन को गढ़ने वाले संस्थानों और गुरुओं का विवरण इस प्रकार है:
प्रमुख संस्थान जिनसे वे जुड़े रहे
लंगट सिंह (L.S.) कॉलेज, मुजफ्फरपुर: डॉ. साहु ने यहीं से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। यह कॉलेज बिहार के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक रहा है, जहाँ उन्होंने अपनी वैज्ञानिक नींव रखी।
पटना विश्वविद्यालय, बिहार: यहाँ से उन्होंने अपनी एम.एससी. (M.Sc.) की पढ़ाई की। इसी संस्थान में संघर्ष करते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया, जिसने उनके लिए अंतरराष्ट्रीय रास्ते खोले।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, इंग्लैंड: डॉ. साहु के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्थान। यहाँ के ‘केमिकल सोसाइटी’ और प्रयोगशालाओं में उन्होंने वह शोध कार्य किया जिसने उन्हें वैश्विक ख्याति दिलाई।
लीबिया विश्वविद्यालय (University of Libya): यहाँ उन्होंने ‘प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष’ के रूप में सेवा दी। इस संस्थान ने उन्हें वह अंतरराष्ट्रीय सम्मान और मंच प्रदान किया जिसकी बिहार में उस समय कमी महसूस की गई थी।
बिहार विश्वविद्यालय ( बी.आर. अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय), मुजफ्फरपुर: स्वदेश वापसी के बाद वे यहीं भौतिक रसायन के रीडर बने और जीवन के अंतिम पड़ाव तक शिक्षण कार्य से जुड़े रहे।
प्रेरणादायी गुरु और वैज्ञानिक संबंध, डॉ. साहु के जीवन पर उनके गुरुओं का गहरा प्रभाव रहा:
डॉ. ई.जे. बॉवेन (Dr. E.J. Bowen): ये ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के विश्वविख्यात वैज्ञानिक थे। डॉ. साहु ने इन्हीं के मार्गदर्शन में अपनी पीएचडी पूरी की। डॉ. बॉवेन अपने इस भारतीय शिष्य की प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने डॉ. साहु के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण शोध पत्र लिखे, जो अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के जर्नल में प्रकाशित हुए।
रूडोल्फ जे. मार्कस और जेम्स एल. हैचेट: कैलिफोर्निया के ‘स्टैंडर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के इन वैज्ञानिकों के साथ डॉ. साहु का अकादमिक जुड़ाव रहा। उन्होंने डॉ. साहु के शोध ‘हिल-रिएक्शन’ (Hill-Reaction) की मदद से अपनी वैज्ञानिक गुत्थियां सुलझाई थीं।
शोध का मुख्य केंद्र: फोटोकेमिस्ट्री (Photo-Chemistry)
डॉ. साहु का अधिकांश शोध कार्य फोटोकेमिस्ट्री पर आधारित था। यह रसायन विज्ञान की वह शाखा है जो प्रकाश और रासायनिक अभिक्रियाओं के अंतर्संबंधों का अध्ययन करती है।
उनके शोध का मुख्य विषय ‘फ्लोरोसेंस’ (Fluorescence) था, जिसका उपयोग आज आधुनिक चिकित्सा और फोरेंसिक विज्ञान में व्यापक रूप से होता है। उनके गुरु डॉ. बॉवेन और उनके द्वारा की गई खोजें आज भी इस क्षेत्र के शोधार्थियों के लिए संदर्भ का काम करती हैं।
सकरा (मुजफ्फरपुर): सकरा प्रखंड के सकरा वाजिद पंचायत अंतर्गत जहांगीरपुर-सकरा हाई स्कूल मार्ग पर स्थित ‘विजन वैली हॉल’ में भारत की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्रीबाई फुले की 195वीं जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर समाजसेवियों और शिक्षाविदों ने उनके तैल चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया।
सावित्रीबाई फुले की तैल चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करती महिला एवं कार्य क्रम को सम्बोधित करते समाजसेवी राजेश राम
शिक्षा की मशाल जलाने वाली महानायिका
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए समाजसेवी राजेशराम ने सावित्रीबाई फुले के संघर्षमयी जीवन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “सावित्रीबाई फुले ने उस दौर में शिक्षा की अलख जगाई जब महिलाओं और दलितों के लिए शिक्षा के द्वार बंद थे। उनके द्वारा 1848 में पुणे में खोला गया पहला बालिका विद्यालय देश में सामाजिक क्रांति का आधार बना।”
नारी वादी आंदोलन और निस्वार्थ सेवा
वक्ता ममताकुमारी ने उनके नारीवादी दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए कहा, “सावित्रीबाई फुले केवल एक शिक्षिका नहीं, बल्कि भारत के नारीवादी आंदोलन की जननी थीं। उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और विधवा विवाह का समर्थन कर समाज को नई दिशा दी।”
वहीं संगीताकुमारी ने उनके सेवा भाव को याद करते हुए कहा, “जब पुणे में प्लेग महामारी फैली, तो उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों की सेवा की। दलितों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए उनका पूरा जीवन समर्पित रहा, जो आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।”
क्विज प्रतियोगिता में दिखा बच्चों का उत्साह
जयंती के अवसर पर बच्चों के बीच एक क्विज प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चों को सावित्रीबाई फुले के इतिहास और सामान्य ज्ञान से रूबरू कराया गया।
सावित्रीबाई फुले की जयन्ती कार्य क्रम में शामिल छात्रगण
पुरस्कारवितरण: सफल प्रतिभागियों को पदक देकर सम्मानित किया गया।
प्रोत्साहन: सभी बच्चों के बीच कॉपी, कलम, किताब और ‘गुड इंग्लिश’ की पुस्तकें वितरित की गईं।
प्रतिभागीछात्र: प्रतियोगिता में आदर्श कुमार, आयुष कुमार, अनामिका कुमारी, सोनी कुमारी, अल्पना कुमारी, प्रिंस कुमार, सत्यम कुमार, मानस कुमार, अजीत कुमार, दिव्य कुमारी, स्वाति कुमारी, संगम कुमारी, करण कुमार, मनीष कुमार, भोला कुमार, अमित कुमार, रुना कुमारी और रजनी कुमारी सहित दर्जनों छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
उपस्थिति: कार्यक्रम को सफल बनाने में ममता कुमारी, संगीता कुमारी, लक्ष्मी कुमारी के अलावा राजू कुमार, विमलेश कुमार और दीपू कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई और अपने विचारों से जनसमूह को प्रेरित किया।
मुजफ्फरपुर, बिहार। भक्ति की शक्ति जब मौन में विलीन होती है, तो वह ‘सिद्धि’ बन जाती है। उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक ऐसा ही आध्यात्मिक केंद्र है, जो दिखावे की चकाचौंध से कोसों दूर, अपनी दिव्यता और शांति के लिए जाना जाता है। हम बात कर रहे हैं त्राहि अच्युत आश्रम, डिहुली की। यह न केवल एक मंदिर है, बल्कि हजारों भक्तों की आस्था का वह केंद्र है जहाँ पहुँचते ही मन की सारी व्याकुलता शांत हो जाती है। एनएच-28 (NH-28) के करीब स्थित यह आश्रम आज उत्तर बिहार के ‘जगन्नाथ पुरी’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है।
प्रथम दर्शन: जब शिखर ध्वज से मिला हृदय को सुकून
राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर मुजफ्फरपुर से बरौनी की ओर बढ़ते हुए, सकरा प्रखंड के पिपरी चौक के पास जैसे ही आप पहुँचते हैं, आपकी नजरें आसमान को छूते एक विशाल मंदिर के शिखर पर जाकर ठहर जाती हैं। लगभग एक किलोमीटर दूर से ही मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर लहराता हुआ ध्वज भक्तों को अपनी ओर आमंत्रित करता प्रतीत होता है।
अक्सर यात्रियों के कदम यहाँ अनायास ही ठिठक जाते हैं। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। एनएच की गाड़ियों का शोर पीछे छूट जाता है और एक असीम शांति का अनुभव होता है। यहाँ आने वाले भक्तों का कहना है कि यहाँ की मिट्टी में कुछ ऐसी ऊर्जा है कि जो एक बार आता है, वह बार-बार खिंचा चला आता है। लोग आते हैं, ध्यान लगाते हैं, अपनी ‘अर्जी’ महाप्रभु के चरणों में सौंपते हैं और जीवन पथ पर नई शक्ति के साथ वापस लौटते हैं।
स्थापत्य कला: उत्तर बिहार की भूमि पर दक्षिण का सौंदर्य
डिहुली स्थित भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्थापत्य कला की दृष्टि से भी अद्भुत है। इस मंदिर का निर्माण ओडिशा (भुवनेश्वर) के प्रशिक्षित कारीगरों द्वारा किया गया है। मंदिर की बनावट में दक्षिण भारतीय और ओड़िया शैली का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी इतनी बारीकी से उकेरी गई है कि हर आकृति जीवंत जान पड़ती है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में दक्षिण शैली का यह विशाल मंदिर एक ‘अतिरेक आनंद’ की अनुभूति कराता है। मंदिर के प्रवेश द्वार (सिंह द्वार) पर भगवान के रक्षक ‘जय‘ और ‘विजय‘ की प्रतिमाएं स्थापित हैं, साथ ही भैरव जी की उपस्थिति मंदिर की सुरक्षा और धार्मिक मर्यादा को सुनिश्चित करती है।
गर्भगृह की दिव्यता: नीम की लकड़ी से निर्मित विग्रह
त्राहि अच्युत आश्रम के सबसे पावन हिस्से, यानी गर्भगृह में जाने पर वह दृश्य सामने आता है जो आमतौर पर केवल ओडिशा के पुरी में देखने को मिलता है। यहाँ भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाड़ली बहन सुभद्रा के विग्रह स्थापित हैं।
विशिष्ट निर्माण: ये मूर्तियाँ सामान्य पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि विशेष नीम की लकड़ी से बनी हैं। इन मूर्तियों को पुरी के पास बालाकोट में उसी पद्धति से बनाया गया है, जिस पद्धति से पुरी के मुख्य मंदिर की मूर्तियाँ बनती हैं।
क्रम: सिंहासन पर बाईं ओर बलभद्र जी, मध्य में देवी सुभद्रा और दाहिनी ओर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) सुदर्शन चक्र के साथ विराजमान हैं।
शयन व्यवस्था: मंदिर में सेवा का विधान अत्यंत सूक्ष्म है। भगवान के लिए एक शयन कक्ष बनाया गया है, जहाँ रात्रि विश्राम हेतु तीन अलग-अलग रंगों के बिछावन बिछाए जाते हैं। माता सुभद्रा के लिए लाल, बलभद्र जी के लिए हरा और महाप्रभु जगन्नाथ के लिए पीला बिछावन सुरक्षित है।
‘प्रचार नहीं, कर्म‘: आश्रम की अछूती परंपराएं
आज के व्यावसायिक युग में, जहाँ छोटे-छोटे मंदिरों का भी सोशल मीडिया पर जोर-शोर से प्रचार किया जाता है, त्राहि अच्युत आश्रम ने खुद को इस चमक-धमक से दूर रखा है।
आश्रम के सेवादारों और संचालकों की नीति स्पष्ट है—“कर्म ही पूजा है।” जब न्यूज़ भारत टीवी की टीम पहली बार यहाँ पहुँची, तो सेवादारों ने शुरू में बात करने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि वे प्रचार के लिए नहीं, बल्कि जनकल्याण के लिए यहाँ हैं। आश्रम के वर्तमान संचालक महात्मा कपिल जी ने बिना कैमरा और बिना रिकॉर्डिंग के घंटों संवाद किया। उनके विचारों में सादगी और दर्शन की गहराई थी। अंततः, आश्रम के पुराने ट्रस्टी लालबाबू के सहयोग और महात्मा जी की सहृदयता से पहली बार मंदिर के गर्भगृह का दृश्य कैमरे में कैद करने की अनुमति मिली। यह आश्रम की उस नीति का हिस्सा है जहाँ वे भक्त की श्रद्धा को विज्ञापन से ऊपर रखते हैं।
रेत पर ध्यान और ‘दालमा‘ का महाप्रसाद
इस मंदिर की कुछ अनूठी विशेषताएं इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं:
वटगोस्वामी और रेत साधना: मंदिर के सामने ही यज्ञ मंडप और वटगोस्वामी (पीपल/बरगद का पवित्र स्थान) स्थित है। यहाँ आने वाले भक्त फर्श या कुर्सियों के बजाय रेत (बालू) पर बैठकर ध्यान लगाते हैं। ऐसी मान्यता है कि वटगोस्वामी की परिक्रमा करने से भक्त के मन की बात सीधे इष्ट देव तक पहुँच जाती है।
दालमा प्रसाद: यहाँ आने वाले भक्तों को एक विशेष प्रकार का पकवान ‘प्रसाद’ के रूप में दिया जाता है, जिसे ‘दालमा‘ कहा जाता है। यह दाल और सब्जियों के मिश्रण से बनी मीठी खिचड़ी जैसा होता है, जिसका स्वाद और सुगंध भक्तों को तृप्त कर देती है।
सूत्र बंधन: आश्रम का ‘गादी गृह’ वह स्थान है जहाँ भक्तों को मंत्र दीक्षा और रक्षा सूत्र प्रदान किया जाता है। महापुरुष के निर्देशों के अनुसार, यहाँ ‘सूत्र बंधन’ की प्रक्रिया होती है, जिसे भक्त अपनी सुरक्षा और आध्यात्मिक प्रगति का कवच मानते हैं।
दीवारों पर अंकित ‘कृष्ण लीला‘
मंदिर के प्रथम खंड, जिसे प्रार्थना कक्ष भी कहा जाता है, में प्रवेश करते ही भक्त द्वापर युग की यात्रा पर निकल जाता है। दीवारों पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनके मथुरा जाने तक की घटनाओं का सजीव चित्रण किया गया है।
वासुदेव द्वारा यमुना पार कर बाल कृष्ण को नंदगांव पहुँचाना।
पूतना, बकासुर और शकटासुर वध।
कालिया नाग का दमन और गोपियों संग रास।
इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाना। इन चित्रों के ऊपर नवग्रह, नवदुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी इतनी कुशलता से सजी हैं कि पूरा परिसर एक ‘दिव्य कला दीर्घा’ सा प्रतीत होता है।
चार दशकों का यश: स्थापना से अब तक
इस भव्य आश्रम की यात्रा बहुत पुरानी नहीं है, लेकिन इसकी प्रगति चमत्कारिक है।
31 अक्टूबर 1992: इस दिन सबसे पहले ‘गादी गृह’ की नींव रखी गई और स्थापना की गई।
देखते ही देखते, अगले चार दशकों में इस स्थान ने उत्तर बिहार के सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों में अपनी जगह बना ली।
आज यहाँ साल भर में पांच बड़े उत्सव मनाए जाते हैं:
जन्माष्टमी: श्री कृष्ण का जन्मोत्सव।
राधाष्टमी: राधारानी का प्राकट्य दिवस।
अष्ट प्रहरी जन्मोत्सव: वैशाख कृष्ण पक्ष में होने वाला अखंड कीर्तन।
स्थापना दिवस: हर साल 31 दिसंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
वार्षिक यज्ञ: फाल्गुन शुक्ल पक्ष में आयोजित होने वाला विशाल यज्ञ, जिसमें दूर-दूर से साधु-संत और श्रद्धालु जुटते हैं।
आस्था का यह आधुनिक केंद्र
मुजफ्फरपुर का डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम इस बात का प्रमाण है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो, तो बिना किसी शोर-शराबे के भी ईश्वर की महिमा जन-जन तक पहुँच जाती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि लोगों को मानसिक शांति और जीवन की नई दिशा भी प्रदान कर रहा है।
यदि आप कभी एनएच-28 से गुजरें, तो सकरा के इस दिव्य धाम में रुकना न भूलें। यहाँ के ‘दालमा’ प्रसाद का स्वाद और वटगोस्वामी की छाँव में मिलने वाली शांति आपके जीवन की भागदौड़ के बीच एक संजीवनी का काम करेगी।
त्राहि अच्युत आश्रम: सेवा प्रकल्प और व्यवस्थाएं
सेवा प्रकल्प (Service Initiatives)
आश्रम का मूल मंत्र “नर सेवा ही नारायण सेवा” है। यहाँ कई ऐसे कार्य किए जाते हैं जो समाज के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाते हैं:
अन्नपूर्णा सेवा (नि:शुल्क भोजन): आश्रम में आने वाले भक्तों और साधुओं के लिए भोजन की विशेष व्यवस्था रहती है। जैसा कि पहले बताया गया है, यहाँ का ‘दालमा’ और महाप्रसाद विशेष रूप से तैयार किया जाता है। उत्सवों के समय यहाँ विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जहाँ हजारों लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
आध्यात्मिक परामर्श एवं मंत्र दीक्षा: गादी गृह के माध्यम से महापुरुषों द्वारा मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया जाता है। यहाँ जाति-पाति के भेदभाव के बिना सभी को ‘सूत्र बंधन’ और मंत्र प्राप्ति का अधिकार है।
गौ सेवा: आश्रम परिसर में भारतीय नस्ल की गायों के लिए एक गौशाला का संचालन किया जाता है। इन गायों की सेवा को भक्ति का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है और इनके दूध का उपयोग भगवान के भोग और आश्रम की रसोई में किया जाता है।
शिक्षा और संस्कार: समय-समय पर यहाँ बच्चों के लिए संस्कार शिविर आयोजित किए जाते हैं, जहाँ उन्हें भारतीय संस्कृति, योग और नैतिकता की शिक्षा दी जाती है।
ठहरने की व्यवस्था (Accommodation)
चूँकि यह आश्रम एनएच-28 के किनारे स्थित है, यहाँ बड़ी संख्या में दूर-दराज के भक्त आते हैं। उनके रुकने के लिए आश्रम में व्यवस्थित इंतजाम हैं:
अतिथि गृह (Dharamshala): आश्रम परिसर के भीतर ही भक्तों के ठहरने के लिए कमरे बने हुए हैं। ये कमरे आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस होने के बजाय सादगीपूर्ण और स्वच्छ हैं, ताकि भक्त पूरी तरह से आध्यात्मिक वातावरण में रह सकें।
साधु-संत निवास: बाहर से आने वाले महात्माओं और साधुओं के लिए अलग से कुटिया और निवास स्थान की व्यवस्था है। यहाँ के वातावरण को पूरी तरह से शांत रखा जाता है ताकि साधना में कोई बाधा न आए।
विश्राम क्षेत्र: उन यात्रियों के लिए जो केवल कुछ घंटों के लिए रुकना चाहते हैं, बड़े हॉल और छायादार विश्राम स्थल बनाए गए हैं, जहाँ वे मंदिर की शांति का लाभ उठा सकते हैं।
नियम और अनुशासन
आश्रम में रुकने या दर्शन करने वाले भक्तों के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
नशा निषेध: आश्रम परिसर के भीतर किसी भी प्रकार का नशा (बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू आदि) पूर्णतः वर्जित है।
शाकाहार: पूरे परिसर में केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन की ही अनुमति है।
शांति और मौन: मंदिर के गर्भगृह और ध्यान केंद्र (वटगोस्वामी क्षेत्र) में बातचीत करना मना है, ताकि अन्य भक्तों की एकाग्रता भंग न हो।
कैसे पहुँचें?
सड़क मार्ग: मुजफ्फरपुर से बरौनी जाने वाले मार्ग (NH-28) पर सकरा प्रखंड के पिपरी चौक से करीब 1 किमी अंदर डिहुली गांव में यह आश्रम स्थित है। ऑटो या निजी वाहन से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन मुजफ्फरपुर जंक्शन है, जहाँ से आश्रम की दूरी लगभग 20-25 किलोमीटर है।
मुजफ्फरपुर के डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम में आयोजित होने वाले उत्सवों में ‘वार्षिक महायज्ञ‘ सबसे प्रमुख है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था का एक ऐसा सैलाब है जिसमें पूरा उत्तर बिहार उमड़ पड़ता है।
यहाँ होने वाले विशेष उत्सवों और उनकी पूरी प्रक्रिया का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:
त्राहि अच्युत आश्रम के विशेष उत्सव: एक विस्तृत विवरण
वार्षिक महायज्ञ (फाल्गुन शुक्ल पक्ष)
यह आश्रम का सबसे भव्य और महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। यह प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आयोजित किया जाता है (जो अक्सर फरवरी या मार्च के महीने में पड़ता है)।
प्रक्रिया और अनुष्ठान:
ध्वजारोहण: यज्ञ की शुरुआत भव्य ध्वजारोहण के साथ होती है, जहाँ जगन्नाथ स्वामी के विशेष झंडे को मंत्रोच्चार के बीच शिखर पर स्थापित किया जाता है।
कलश यात्रा: इस अवसर पर हजारों की संख्या में महिला श्रद्धालु और कुंवारी कन्याएं पीत वस्त्र धारण कर पास की पवित्र नदियों या सरोवरों से जल भरकर कलश यात्रा निकालती हैं। यह दृश्य अत्यंत मनोरम होता है।
अखंड संकीर्तन: यज्ञ के दौरान ‘हरे कृष्ण-हरे राम’ और ‘त्राहि अच्युत’ मंत्रों का अखंड जाप चलता है। इसे ‘अष्ट प्रहरी’ या उससे भी अधिक समय के लिए निरंतर जारी रखा जाता है।
आहुति और पूर्णाहुति: विद्वान पंडितों और आश्रम के महात्माओं की देखरेख में अग्नि कुंड में आहुतियां दी जाती हैं। समापन के दिन ‘पूर्णाहुति’ होती है, जिसमें शामिल होने के लिए भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम: यज्ञ के दौरान शाम को प्रवचन, भजन संध्या और झांकियों का आयोजन किया जाता है, जो भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
स्थापना दिवस (31 दिसंबर)
आश्रम के लिए 31 दिसंबर का दिन ऐतिहासिक है, क्योंकि इसी दिन 1992 में ‘गादी गृह’ की स्थापना हुई थी।
विशेषता: जहाँ पूरी दुनिया नए साल के जश्न में डूबी होती है, यहाँ भक्त आध्यात्मिक उत्सव मनाते हैं।
प्रक्रिया: इस दिन सुबह विशेष अभिषेक और पूजन होता है। इसके बाद आश्रम के संस्थापक और गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस दिन विशेष ‘महाभंडारा’ आयोजित होता है, जिसमें हजारों लोगों को प्रसाद खिलाया जाता है।
वैशाख कृष्ण पक्ष : अष्ट प्रहरी जन्मोत्सव
यह उत्सव वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है।
प्रक्रिया: इसमें 24 घंटे का अखंड कीर्तन होता है। भक्त टोलियों में बँटकर मृदंग और झाल के साथ झूमते हुए कीर्तन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस निरंतर ध्वनि से आश्रम का वातावरण पूरी तरह शुद्ध और ऊर्जावान हो जाता है।
जन्माष्टमी एवं राधाष्टमी (भाद्रपद मास)
चूँकि यह भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) का मंदिर है, इसलिए जन्माष्टमी यहाँ का प्राण है।
प्रक्रिया:
अर्धरात्रि पूजन: रात्रि 12 बजे भगवान कृष्ण का दुग्धाभिषेक और विशेष श्रृंगार किया जाता है।
नंदोत्सव: अगले दिन ‘नंद के आनंद भयो’ के जयकारों के साथ खिलौने और मिठाइयाँ बांटी जाती हैं।
राधाष्टमी: इसके ठीक 15 दिन बाद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी मनाई जाती है, जिसमें माता राधा के विग्रह का विशेष पूजन होता है।
सूत्र बंधन और गुरु पूर्णिमा
आश्रम में गुरु-शिष्य परंपरा का बहुत महत्व है।
गुरु पूर्णिमा: इस दिन भक्त अपने आध्यात्मिक गुरु (महापुरुष) का दर्शन करने और आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं।
प्रक्रिया: यहाँ भक्तों को ‘सूत्र बंधन‘ की दीक्षा दी जाती है। यह एक रक्षा सूत्र होता है जिसे मंत्रों द्वारा सिद्ध किया जाता है। माना जाता है कि यह सूत्र भक्तों की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है और उन्हें सद्मार्ग पर रखता है।
उत्सव के दौरान भक्तों के लिए विशेष निर्देश
यदि आप इन उत्सवों में शामिल होना चाहते हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:
पंजीकरण: बड़े यज्ञों में शामिल होने और ठहरने के लिए अक्सर पहले से सूचना देनी होती है।
वस्त्र धारण: उत्सवों के दौरान पीला या सफेद वस्त्र धारण करना आश्रम की परंपरा के अनुकूल माना जाता है।
सेवा भाव: यहाँ उत्सवों में ‘श्रमदान’ का बड़ा महत्व है। लोग खुद से झाड़ू लगाना, भोजन परोसना और जूते-चप्पलों की देखभाल करना (जोड़ा सेवा) अपनी खुशी से करते हैं।
मुजफ्फरपुर के डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम में फाल्गुन मास का वार्षिक यज्ञ एक ऐसा अवसर होता है जब पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो जाता है।
फाल्गुन वार्षिक यज्ञ 2026: संभावित तिथियाँ
आश्रम का मुख्य वार्षिक यज्ञ फाल्गुन शुक्ल पक्ष में आयोजित होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में फाल्गुन मास की महत्वपूर्ण तिथियाँ इस प्रकार रह सकती हैं:
संभावित समय: फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च के पहले सप्ताह के बीच।
मुख्य तिथियाँ: फाल्गुन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा (होली) से पहले तक मुख्य आयोजन होते हैं।
विशेष दिन: आमतौर पर फाल्गुन एकादशी से पूर्णिमा के बीच यज्ञ की पूर्णाहुति और विशाल भंडारा होता है।
नोट: सही तिथि के लिए फरवरी माह के प्रारंभ में आश्रम के सूचना पटल या स्थानीय सेवादारों से संपर्क करना उचित रहता है, क्योंकि तिथियाँ चंद्रमा की गणना और स्थानीय पंचांग पर आधारित होती हैं।
आश्रम पहुँचने के लिए परिवहन के साधन
डिहुली (सकरा) स्थित त्राहि अच्युत आश्रम NH-28 पर स्थित होने के कारण यातायात के दृष्टिकोण से बहुत ही सुलभ स्थान पर है।
1. सड़क मार्ग (सबसे सुविधाजनक)
यह आश्रम मुजफ्फरपुर-बरौनी नेशनल हाईवे (NH-28) के बिल्कुल करीब है।
निजी वाहन/टैक्सी: यदि आप मुजफ्फरपुर शहर से आ रहे हैं, तो मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर मार्ग पर करीब 22-25 किलोमीटर की दूरी तय कर पिपरी चौक पहुँचें। वहाँ से गाँव की ओर जाने वाली सड़क से 1 किमी अंदर आश्रम है।
बस सेवा: मुजफ्फरपुर बस स्टैंड (इमलीचट्टी) से समस्तीपुर, बरौनी या बेगूसराय की ओर जाने वाली किसी भी बस में बैठें और पिपरी चौक पर उतरें। यहाँ से मंदिर के लिए ई-रिक्शा और ऑटो हमेशा उपलब्ध रहते हैं।
2. रेल मार्ग
निकटतम बड़ा स्टेशन:मुजफ्फरपुर जंक्शन (MFP)। यहाँ से देश के सभी प्रमुख शहरों (दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, पटना) के लिए ट्रेनें उपलब्ध हैं। स्टेशन से बाहर निकलकर आप सीधे टैक्सी या बस ले सकते हैं।
स्थानीय स्टेशन:ढोली रेलवे स्टेशन (DOL)। यह आश्रम के काफी करीब है (लगभग 8-10 किमी)। यहाँ कुछ पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें रुकती हैं। ढोली से ऑटो लेकर आप सीधे डिहुली आश्रम पहुँच सकते हैं।
3. हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा:जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, पटना (PAT)।
पटना हवाई अड्डे से आश्रम की दूरी लगभग 90-100 किलोमीटर है। हवाई अड्डे से आप सीधे टैक्सी किराए पर ले सकते हैं, जो हाजीपुर होते हुए मुजफ्फरपुर के रास्ते आपको करीब 2.5 से 3 घंटे में आश्रम पहुँचा देगी।
श्रद्धालुओं के लिए सुझाव
भीड़ का प्रबंधन: वार्षिक यज्ञ के दौरान यहाँ लाखों की भीड़ उमड़ती है। यदि आप शांति से दर्शन करना चाहते हैं, तो यज्ञ शुरू होने के एक-दो दिन पहले पहुँचें।
ठहरने की अग्रिम सूचना: यदि आप आश्रम के अतिथि गृह में रुकना चाहते हैं, तो बड़े कार्यक्रमों के दौरान कमरे पहले से भर जाते हैं। इसके लिए आश्रम के पुराने ट्रस्टी या सेवादारों से पहले संपर्क करना बेहतर होता है।
मौसम: फरवरी-मार्च में बिहार का मौसम सुहावना रहता है, लेकिन शाम के समय हल्की ठंड हो सकती है, इसलिए थोड़े ऊनी कपड़े साथ रखें।
मुजफ्फरपुर, बिहार।“ना हो अभी, मगर आखिर तो कदर होगी मेरी, खुलेगा हाले-गुलाम आप पर, गुलाम के बाद।” प्रख्यात शायर हसरत मोहानी का यह शेर आज मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड स्थित ‘नुनफरा’ गांव की गलियों में सिसक रहा है। यह सिसकी किसी आम इंसान की नहीं, बल्कि अगस्त क्रांति के उस महान सेनानी की स्मृतियों की है, जिसने 1942 में अपनी युवा अवस्था की दहलीज पर खड़े होकर भारत माता के पैरों की बेड़ियां काटने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। हम बात कर रहे हैं अमर शहीद अमीर सिंह की, जिनकी शहादत के 83 वर्षों बाद भी आजाद भारत की व्यवस्था उनके जन्मस्थान और शहादत स्थल को उचित सम्मान देने में नाकाम रही है।
अमर शहीद अमीर सिंह का तस्वीर
एक शहादत, जिसने इतिहास लिख दिया पर सम्मान नहीं पाया
11 अगस्त 1942 को जब समूचा देश महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के नारे से आंदोलित था, तब मुजफ्फरपुर का पूर्वी इलाका (सकरा-ढोली क्षेत्र) सशस्त्र क्रांति की ज्वाला में जल रहा था। 11 सितंबर 1942 का वह ऐतिहासिक दिन था। सकरा प्रखंड कांग्रेस आश्रम में स्वतंत्रता सेनानियों की एक गुप्त सभा हुई। जोश इतना था कि आंदोलनकारियों ने सबसे पहले ढोली रेलवे स्टेशन पर तिरंगा फहराया और संचार व्यवस्था ठप करने के लिए रेल की पटरियां उखाड़ दीं।
तत्कालीन थानेदार दीपनारायण सिंह की चेतावनियों को ठेंगा दिखाते हुए इन वीरों की टोली ‘सकरा थाना’ पर तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़ी। इसी टोली में शामिल थे 30 वर्षीय जांबाज अमीर सिंह। जब अंग्रेज पुलिस की गोलियां हवा में गूंज रही थीं, तब अमीर सिंह ने जान की परवाह किए बिना ‘सब निबंधन कार्यालय’ की छत पर तिरंगा फहराने का फैसला किया। जैसे ही वे ऊपर बढ़े, अंग्रेज सिपाहियों की एक गोली उनके सीने को चीरती हुई निकल गई। भारत मां का यह लाडला वहीं शहीद हो गया।
वह बलिदान जो इतिहास के पन्नों में भी धुंधला गया
अमीर सिंह के बलिदान की कहानी केवल उनके प्राण त्यागने तक सीमित नहीं है। उनके पीछे उनके परिवार ने जो झेला, वह रूह कंपा देने वाला है। उनकी पत्नी जयमाला देवी, जिनकी शादी को मात्र दो महीने हुए थे, पति की शहादत की खबर सुनकर सुध-बुध खो बैठीं। एक सुहागिन जिसने अभी अपने हाथों की मेहंदी का रंग भी नहीं उतरने दिया था, उसने अन्न-जल त्याग दिया और ठीक सात महीने बाद अपने पति के पास परलोक सिधार गईं। यह एक ऐसी प्रेम कथा और राष्ट्रभक्ति का संगम है, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।
विडंबना: गुलामी के प्रतीक चमक रहे हैं, शहीदों के घर खंडहर
आज जब हम ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मना चुके हैं, तब मुजफ्फरपुर की धरती पर एक कड़वा सच मुंह चिढ़ा रहा है। जिस अंग्रेज प्रशासक ई.सी. डैनवी के आदेश पर अमीर सिंह पर गोलियां चली थीं, उसका आवास (जो अब ढोली कृषि महाविद्यालय का गेस्ट हाउस है) आज भी शान से चमक रहा है। प्रशासन उसे संवारने के लिए हर साल बजट खर्च करता है।
लेकिन, इसके विपरीत शहीद अमीर सिंह का पैतृक घर खंडहर में तब्दील हो चुका है। परिवार के लोग जैसे-तैसे उनकी यादों को सहेजे हुए हैं। क्या एक आजाद मुल्क में गुलामी के प्रतीकों का संरक्षण शहीदों की विरासत से ऊपर है?
जनप्रतिनिधियों की बेरुखी और जर्जर ‘शहीद द्वार‘
1994 में शहादत के 52 वर्षों बाद तत्कालीन राजस्व मंत्री रमई राम ने बंदरा प्रखंड मुख्यालय से 4 किमी दूर नुनफरा गांव के मोड़ पर एक ‘शहीद द्वार’ बनवाया था। आज उस द्वार की हालत यह है कि उसका प्लास्टर झड़ चुका है, ईंटें बाहर निकल आई हैं और वह किसी भी क्षण गिर सकता है। विडंबना देखिए कि उस क्षेत्र से कई विधायक और सांसद चुनकर आए, लेकिन किसी भी ‘माननीय’ को इतनी फुर्सत नहीं मिली कि अपनी निधि से कुछ हजार रुपये खर्च कर इस द्वार का रंग-रोगन ही करा दें।
नुनफरा गांव के मोड़ पर जर्जर ‘शहीद द्वार’
नुनफरा के ग्रामीणों ने अपने स्तर पर गांव के स्कूल का नाम ‘शहीद अमीर सिंह’ के नाम पर रख दिया था। नेताओं ने खूब वाह-वाही लूटी, लेकिन सरकारी कागजों में आज भी वह नाम दर्ज नहीं हो सका। गांव की आपसी वैमनस्यता और प्रशासनिक सुस्ती ने स्कूल की दीवारों पर लिखा शहीद का नाम तक मिटा दिया है।
शिलापट्टों से नाम गायब: क्या यह षड्यंत्र है?
सकरा, मुरौल और बंदरा प्रखंडों के मुख्यालयों में स्वतंत्रता सेनानियों के नामों के शिलापट्ट लगे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि पूर्वी मुजफ्फरपुर के एकमात्र अगस्त क्रांति के शहीद होने के बावजूद, अमीर सिंह का नाम इन शिलापट्टों से नदारद है। जिन्होंने हजारीबाग जेल की हवा खाई, जिन्होंने सीने पर गोली झेली, उन्हें सरकारी सूचियों में स्थान न मिलना किसी ‘सौतेले व्यवहार’ से कम नहीं है।
76 साल बाद मिली प्रतिमा, पर वो भी उपेक्षित
अमर शहीद अमीर सिंह स्मारक समिति के लंबे संघर्ष के बाद, 2019 में शहादत स्थल (सकरा निबंधन कार्यालय परिसर) पर उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई। लेकिन सम्मान की यह लड़ाई भी आधी-अधूरी ही रही। प्रतिमा स्थल से मात्र 50 मीटर की दूरी पर निबंधन कार्यालय है और 100 मीटर पर थाना व प्रखंड कार्यालय। बावजूद इसके, शहीद दिवस पर किसी भी अधिकारी के पास दो फूल चढ़ाने का समय नहीं होता। स्थानीय कांग्रेस आश्रम के पास ही यह सब घटित होता है, लेकिन नई पीढ़ी के नेताओं को शायद अपनी विरासत का ज्ञान ही नहीं है।
केंद्र सरकार का वह अधूरा वादा
वर्ष 1993 में भारत छोड़ो आंदोलन की स्वर्ण जयंती पर तत्कालीन रेल मंत्री सी.के. जाफर शरीफ ने परिजनों को पत्र लिखकर ढोली रेलवे स्टेशन पर शहीद अमीर सिंह का जीवनवृत्त और चित्र लगाने का प्रस्ताव दिया था। परिजनों ने ढोली स्टेशन का नाम शहीद के नाम पर रखने की मांग की थी। तीन दशक बीत जाने के बाद भी वह फाइल रेल मंत्रालय के किसी कोने में धूल फांक रही है।
सोचिए हमारी अगली पीढ़ी क्या सीखेगी?
यदि हम अपने शहीदों के प्रति इतने निष्ठुर रहेंगे, तो भविष्य की पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति का जज्बा कैसे पैदा होगा? अमीर सिंह ने अपने परिवार का भविष्य, अपनी पत्नी का सुहाग और अपना जीवन जिस देश के लिए कुर्बान किया, क्या वह देश उन्हें एक अदद साफ-सुथरा ‘शहीद द्वार’ और सरकारी अभिलेखों में सम्मानजनक स्थान भी नहीं दे सकता?
यह समय है कि प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज अपनी नींद से जागे। शहीद अमीर सिंह के जन्मस्थल का जीर्णोद्धार, ढोली स्टेशन का नामकरण और राजकीय सम्मान के साथ उनकी स्मृति को सहेजना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अन्यथा, आने वाला इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।
मुजफ्फरपुर (बिहार) बिहार की धरती अपनी कोख में न जाने कितने साम्राज्यों और सभ्यताओं का इतिहास समेटे हुए है। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड के अंतर्गत आने वाला लोहरगामा (लहरगामा) एक ऐसा ही पुरातात्विक स्थल है, जो आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यहाँ वर्तमान में निर्माणाधीन ‘राम जानकी स्टेडियम’ की खुदाई ने उन अवशेषों को धरातल पर ला खड़ा किया है, जो सदियों से जमीन के नीचे दफन थे। लेकिन विडंबना यह है कि इन बेशकीमती साक्ष्यों को सहेजने के बजाय, उन्हें कंक्रीट के नीचे हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है।
स्टेडियम निर्माण और मिट्टी से निकलता इतिहास
लोहरगामा पंचायत के राम जानकी मठ के समीप जब जेसीबी ने स्टेडियम के लिए खुदाई शुरू की, तो वह केवल मिट्टी नहीं बल्कि इतिहास उगलने लगी। खुदाई के दौरान भारी मात्रा में प्राचीन ईंटें, लोढ़ी, सिलौटी, चक्की (जांता) और विभिन्न प्रकार के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) बाहर आए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहाँ कई स्थानों पर मानव कंकालों के अवशेष भी मिले हैं। ये अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहाँ कभी एक सुव्यवस्थित बस्ती या सभ्यता निवास करती थी।
लेकिन इस पुरातात्विक महत्व को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। ग्रामीणों के अनुसार, स्टेडियम के पूर्वी छोर पर खुदाई के दौरान प्राचीन दीवार की संरचना मिली थी, जिसे मजदूरों ने बिना किसी जांच के पुनः नींव के अंदर दबा दिया।
सरकारी दस्तावेजों में पहचान और वर्तमान दुर्दशा
लोहरगामा केवल लोकश्रुतियों में नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों में भी दर्ज है। के.पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पटना द्वारा प्रकाशित ‘कैटलॉग ऑफ आर्केलाजिकल साइट्स इन बिहार‘ (भाग-2, पृष्ठ 10-11) में सकरा प्रखंड की सूची में इसे नौवें स्थान पर रखा गया है।
ऐतिहासिक माप: अभिलेखों के अनुसार इस डीह (टीले) का रकबा 45 हजार वर्ग मीटर और ऊंचाई ढाई मीटर बताई गई है।
अतीत बनाम वर्तमान: बुजुर्गों की मानें तो 35 वर्ष पहले इस मुख्य डीह की ऊंचाई 15 फीट से अधिक थी, जो आज अवैध अतिक्रमण और निर्माण के कारण मात्र 3 फीट रह गई है। यहाँ एक प्राचीन कुआँ था जिसे मिट्टी से भर दिया गया है, और उत्तर दिशा में स्थित एक विशाल तालाब अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें ले रहा है।
स्थापत्य कला और पुरातात्विक साक्ष्य
लोहरगामा से प्राप्त ईंटों का आकार इसकी प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहाँ से प्राप्त ईंटों की लंबाई 35 सेमी, चौड़ाई 14 सेमी और मोटाई 06 सेमी है। दिलचस्प बात यह है कि इसी आकार की ईंटें क्षेत्र के अन्य प्राचीन स्थलों जैसे भसौन के राम जानकी मठ और मतलुपुर के शिव मंदिर के जीर्णोद्धार के समय भी मिली थीं।
यहाँ मिले अवशेषों में दैनिक जीवन की वस्तुएं जैसे कौड़ी और चक्की भी शामिल हैं। जागरूकता की कमी का आलम यह है कि एक स्थानीय किसान यहाँ से प्राप्त प्राचीन चक्की (जांता) का उपयोग खेत में खूंटा ठोकने के लिए कर रहा है। यह हमारी विरासत के प्रति घोर उदासीनता का प्रतीक है।
बौद्ध धर्म से जुड़ाव की संभावना
विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का मानना है कि ‘लहरगामा’ शब्द में लगा ‘गामा‘ प्रत्यय इस स्थल के बौद्ध धर्म से जुड़े होने का संकेत देता है। प्राचीन काल में बौद्ध विहारों या केंद्रों के नाम के पीछे अक्सर ऐसे शब्द जुड़ते थे। यदि यहाँ वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई और शोध किया जाए, तो संभव है कि यह स्थल वैशाली या अन्य समकालीन बौद्ध केंद्रों की कड़ी के रूप में सामने आए।
विकास के नाम पर ‘इतिहास का कत्ल‘
लोहरगामा के मुख्य डीह पर बिना किसी पुरातात्विक अनापत्ति (NOC) के एक के बाद एक सरकारी निर्माण कराए जा रहे हैं।
यहाँ पहले ही विद्यालय, पंचायत सरकार भवन और नलकूप बना दिए गए हैं।
अब स्टेडियम का निर्माण शेष बची कड़ियों को भी नष्ट कर रहा है।
पास ही बहने वाली कदाने नदी और यह टीला एक आदर्श प्राचीन सभ्यता की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हैं, जिसे अनदेखा किया जा रहा है।
इसके संरक्षण की आवश्यकता महत्वपूर्ण
लोहरगामा की मिट्टी से निकले अवशेष चीख-चीखकर पूछ रहे हैं कि क्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना है? यहाँ मिले कंकाल किसके हैं? क्या यह किसी प्राचीन राजमहल का हिस्सा था या किसी भव्य मंदिर का? इन सवालों के जवाब केवल गहन पुरातात्विक जांच (Excavation) से ही मिल सकते हैं।
लोहरगामा पुरातात्विक स्थल के साथ की जा रही छेड़छाड़ केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि अपनी विरासत को बर्बाद करने का एक अपराध है। स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार के पुरातत्व विभाग को अविलंब इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। स्टेडियम निर्माण को रोककर पहले इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जाना अनिवार्य है।
“इतिहास केवल किताबों में नहीं होता, वह हमारी मिट्टी में भी धड़कता है। यदि आज हमने लोहरगामा को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें अपनी जड़ें मिटाने के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।”
लोहरगामा के संदर्भ में जिक्र किया, ‘गामा‘ प्रत्यय वाले गांवों का इतिहास बहुत गहरा है। भाषाई और ऐतिहासिक दृष्टि से ‘गामा’ शब्द संस्कृत के ‘ग्राम‘ का अपभ्रंश है, जो प्राकृत और पाली के प्रभाव से ‘गामा’ बना।
बिहार (विशेषकर मुजफ्फरपुर, दरभंगा और मिथिलांचल) और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इस प्रत्यय वाले कई प्रसिद्ध गांव आज भी हैं।
बिहार के प्रमुख ‘गामा‘ प्रत्यय वाले गांव
बिहार में ‘गामा’ अंत वाले गांव अक्सर प्राचीन बसावट या बौद्ध काल से जुड़े माने जाते हैं:
लोहरगामा / लहरगामा: (मुजफ्फरपुर, सकरा) – यह एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।
सिंघिया-गामा: (समस्तीपुर/दरभंगा क्षेत्र) – यह इस क्षेत्र का काफी प्रसिद्ध गांव है।
नैनगामा: (सहरसा/मधेपुरा क्षेत्र) – यह क्षेत्र भी अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है।
भरगामा: (अररिया जिला) – यह एक पूरा प्रखंड (Block) भी है।
कुशगामा: (दरभंगा जिला) – मिथिला क्षेत्र में स्थित।
बहेड़ा-गामा: (दरभंगा/मधुबनी क्षेत्र)।
पंडुगामा: (मुजफ्फरपुर और वैशाली के सीमावर्ती क्षेत्रों में)।
‘गामा‘ शब्द का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व
इतिहासकारों और भाषाविदों के अनुसार, ‘गामा’ प्रत्यय वाले गांवों के पीछे कुछ विशेष तर्क दिए जाते हैं:
बौद्ध कालीन जुड़ाव: पाली भाषा (जो बौद्ध धर्म की मुख्य भाषा थी) में ‘ग्राम’ को ‘गाम’ या ‘गामा’ कहा जाता था। भगवान बुद्ध के भ्रमण के दौरान कई स्थानों के नाम इसी तरह प्रचलित हुए। उदाहरण के लिए, पाली ग्रंथों में ‘कोटिगामा‘ (जो आज वैशाली के पास है) का उल्लेख मिलता है।
प्राकृत प्रभाव: संस्कृत के शब्दों के सरलीकरण के दौरान ‘ग्राम’ शब्द ‘गाम’ और फिर स्थानीय बोली में ‘गामा’ हो गया।
मठ और विहार: अक्सर जिन गांवों के नाम के अंत में ‘गामा’ लगा होता है, वहां प्राचीन काल में कोई बड़ा मठ, विहार या शिक्षण केंद्र होने के साक्ष्य मिलते हैं (जैसा कि आपके लोहरगामा में मिल रहे हैं)।
सिर्फ बिहार ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों और पड़ोस में भी इसके मिलते-जुलते रूप मिलते हैं:
हरियाणा/पंजाब एवं जम्मू काश्मीर : यहाँ ‘गाम’ या ‘गाँव’ का प्रयोग अधिक होता है।
श्रीलंका: यहाँ भी कई स्थानों के नाम के पीछे ‘गामा‘ लगता है (जैसे: महारगामा), जो शुद्ध रूप से बौद्ध संस्कृति और पाली भाषा के प्रभाव को दर्शाता है।