मुजफ्फरपुर: मुजफ्फरपुर समाहरणालय परिसर इन दिनों एक ऐतिहासिक संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। ‘मनरेगा वॉच’ के नेतृत्व में पिछले 116 दिनों से जारी मजदूरों का धरना अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सरकार की तमाम अनदेखी और तकनीकी पेच-फंसने के बावजूद, 16,000 से अधिक मजदूरों ने अपने हक को पाने की जो जिद्द ठानी है, उसने जिला प्रशासन से लेकर पटना तक की नींद उड़ा दी है।

100 से ज्यादा मजदूर, एक ही संकल्प
भले ही कागज पर 16,000 मजदूरों का संघर्ष है, लेकिन समाहरणालय परिसर में रोज 100 से अधिक मजदूर 116 वें दिन पूरी ताकत और धैर्य के साथ डटे हुए हैं। भीषण गर्मी और तमाम परेशानियों के बीच ये मजदूर केवल एक ही मांग कर रहे हैं—’हमें हमारा रोजगार दो, हमारा बकाया भुगतान करो।’ मुजफ्फरपुर के सभी 16 प्रखंडों से आई ये आवाजें अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी हैं।

मंगलवार को पटना में ‘फिक्स‘ होगा भविष्य
धरने के 116वें दिन, आंदोलन ने एक नई करवट ली है। मनरेगा वॉच के संजय सहनी ने जानकारी दी कि अब गेंद सीधे बिहार सरकार के पाले में है। मंगलवार को पटना में सरकारी अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक तय हुई है। यह बैठक महज औपचारिकता नहीं, बल्कि मजदूरों के भविष्य का फैसला करेगी। मजदूरों ने स्पष्ट कर दिया है कि कल की वार्ता के बाद ही तय होगा कि संघर्ष की अगली रणनीति क्या होगी।

‘VB-G RAM G’ बना मजदूरों का काल
मजदूरों का आरोप है कि सरकार की नई नीति ‘VB-G RAM G’ उनके लिए रोजगार का जरिया बनने के बजाय ‘काल’ बन गई है।
- जॉब कार्ड का खेल: हजारों मजदूरों के जॉब कार्ड या तो डिलीट कर दिए गए हैं या फिर उन पर नई योजनाएं नहीं खोली जा रही हैं।
- ऑफलाइन अटेंडेंस: तकनीकी खामियों के कारण मजदूरों की हाजिरी नहीं लग रही, जिससे काम करने के बावजूद उन्हें मजदूरी नहीं मिल रही।
- बकाया भुगतान: सालों से लंबित भुगतान अभी भी हवा में लटका हुआ है।

सरकारी फाइलों में ‘गोला-बारूद‘, धरातल पर सन्नाटा
दस्तावेजों (पत्रांक 388175, दिनांक 30.03.2026) से खुलासा हुआ है कि मजदूरों के आंदोलन की गूँज पटना तक पहुँच चुकी है। सरकार ने मामले की जाँच के लिए राज्य स्तरीय ‘जाँच दल’ तो गठित कर दिया है, लेकिन मजदूरों का सवाल है—जाँच तो होती रहेगी, पेट की भूख कैसे मिटेगी? जिला प्रशासन की ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ (ATR 2026) का कड़वा सच यह है कि मुशहरी, तरौरा गोपालपुर और नरौली जैसे इलाकों में ‘तकनीकी खामियों’ और ‘प्रोजेक्ट उपलब्ध न होने’ का बहाना बनाकर मजदूरों को काम से वंचित रखा गया है। कहीं ‘Scure’ (सॉफ्टवेयर) का रोना रोया जा रहा है, तो कहीं ‘शहरी क्षेत्र’ बताकर काम देने से मना किया जा रहा है। 15 वर्षों से चल रहे इस मनरेगा विभाग के खेल ने अब मजदूरों की कमर तोड़ दी है।

116 दिनों का ‘अंधेरा‘, और अब मंगलवार की निर्णायक घड़ी
‘मनरेगा वॉच’ के संजय सहनी के नेतृत्व में हो रहे इस धरने में रोज 100 से ज्यादा मजदूर अपनी पूरी ताकत के साथ डटे हैं। मनरेगा के तहत नए निबंधन, पुराने जॉब कार्ड को सक्रिय करने और लंबित भुगतान की मांग केवल कागजों पर नहीं, बल्कि सड़कों पर दम तोड़ रही है।

प्रशासन पर सवाल
संजय सहनी कहते हैं, “116 दिन हो गए, लेकिन सरकार की आंखें तब भी नहीं खुलीं। क्या सरकार नहीं चाहती कि गरीब का चूल्हा जले? हम कोई भीख नहीं मांग रहे, हम अपना कानूनी अधिकार मांग रहे हैं।”
अब सबकी निगाहें मंगलवार को पटना में होने वाली इस बैठक पर टिकी हैं। क्या सरकार मजदूरों के इस 116 दिनों के लंबे संयम और संघर्ष का सम्मान करेगी? या यह आंदोलन आने वाले दिनों में और विकराल रूप लेगा? मुजफ्फरपुर की जनता से लेकर सरकार तक, सबकी नजरें कल के नतीजों पर हैं।



