पटना। बिहार विधान परिषद के बजट सत्र के दौरान सामाजिक और शैक्षणिक असमानता का मुद्दा पूरी प्रखरता के साथ गरमाया। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से आने वाले माननीय सदस्य बंशीधर ब्रजवासी ने सदन में एक संकल्प पेश करते हुए राज्य में समान शिक्षा और समान परवरिश की नीति लागू करने की जोरदार वकालत की। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक देश में ‘नमक-रोटी’ और ‘हलवा-पूरी’ खाने वाले बच्चों के बीच की खाई नहीं भरेगी, तब तक वास्तविक विकास की कल्पना बेमानी है।

गरीबी संयोग है, चुनाव नहीं”: ब्रजवासी का भावुक संबोधन

सदन को संबोधित करते हुए श्री ब्रजवासी ने अपने जीवन के संघर्षों का हवाला देते हुए कहा, “मैं गरीब के घर पैदा हुआ और आज संघर्षों की बदौलत यहाँ खड़ा हूँ। किसी का गरीब के घर जन्म लेना बाय चांस होता है, बाय चॉइस नहीं। यह प्रकृति का संयोग है।”

उन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की सुप्रसिद्ध पंक्तियों—श्वानों को मिलते दूध-भात, भूखे बालक अकुलाते हैं—के जरिए कुपोषण और अभाव की मार झेल रहे बच्चों की मर्मस्पर्शी तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा कि एक शिक्षक के रूप में जब वह स्कूल में भूखे और बासी रोटी खाकर आने वाले बच्चों को देखते हैं, तो उनका ‘लर्निंग आउटकम’ (सीखने की क्षमता) संपन्न बच्चों के बराबर कभी नहीं हो सकता।

सामाजिक समरसता केवल समान शिक्षा प्रणाली से ही संभव

शिक्षा सुधार और सामाजिक समानता की मांग को लेकर सदन में एक अत्यंत भावुक और वैचारिक पक्ष रखते हुए माननीय सदस्य बंशीधर ब्रजवासी ने सुदामा चरित का मार्मिक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जब सांदीपनि मुनि के आश्रम में एक राजकुमार कृष्ण और एक निर्धन सुदामा साथ बैठकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, तभी वह आत्मीयता जन्म लेती है जो बाद में द्वारकाधीश कृष्ण को अपने सखा की दीन दशा देख अश्रुधारा से पैर धोने को विवश कर देती है। सदस्य ने जोर देकर कहा कि ऐसी संवेदनशीलता और सामाजिक समरसता केवल समान शिक्षा प्रणाली से ही संभव है।

बहुरंगीशिक्षा व्यवस्था पर तीखा प्रहार

ब्रजवासी ने देश में व्याप्त दोहरी शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा:

“आज अमीरों के बच्चे सीबीएसई (CBSE) में पढ़ते हैं और गरीबों के बच्चे राज्य बोर्ड में। यह शैक्षणिक असमानता केवल बौद्धिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक दूरी भी बढ़ा रही है। मेरी माँग है कि पूरे देश में एक बोर्ड, एक सिलेबस, एक किताब और एक परीक्षा की नीति लागू हो। ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ की चर्चा तो बहुत है, लेकिन उससे पहले वन नेशन-वन एजुकेशन लागू होना चाहिए।” ताकि गरीब और अमीर के बीच की शैक्षणिक खाई को पाटा जा सके।

उन्होंने वर्ष 2006 में गठित मुचकुंद दुबे आयोग की ‘समान स्कूल प्रणाली’ रिपोर्ट का जिक्र करते हुए सरकार को याद दिलाया कि 2007 में रिपोर्ट सौंपे जाने के बावजूद आज तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।


शिक्षा मंत्री सुनील कुमार का पक्ष: बजट और योजनाओं का दिया हवाला

सदस्य के संकल्प और उनके द्वारा उठाए गए गंभीर सवालों का जवाब देते हुए शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने सदन को आश्वस्त किया कि बिहार सरकार शिक्षा को सर्वांगीण विकास का आधार मानती है और इसी प्रतिबद्धता के कारण राज्य के वार्षिक बजट का 20% हिस्सा अकेले शिक्षा क्षेत्र को आवंटित किया गया है, जो पूरे देश में एक मिसाल है।

शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने सदन के समक्ष निम्नलिखित तथ्य रखे:

  • RTE के तहत आरक्षण: ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’ के तहत निजी स्कूलों में 25% सीटें कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित हैं। इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विभाग लगातार निजी स्कूलों के साथ बैठकें कर रहा है।
  • आवेदन के आँकड़े: मंत्री ने बताया कि अब तक 84,806 आवेदन प्राप्त हुए हैं और अधिकांश बच्चों को स्कूल आवंटित कर दिए गए हैं।
  • कल्याणकारी योजनाओं का जाल: राज्य के 1 करोड़ 9 लाख बच्चों को ‘मिड-डे मील’ दिया जा रहा है। इसके अलावा साइकिल, पोशाक, छात्रवृत्ति और प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से ड्रॉप-आउट रेट कम किया गया है।
  • बुनियादी ढांचा: हर पंचायत में प्लस-टू स्कूल खोल दिए गए हैं और वर्तमान में शिक्षकों की संख्या 5 लाख 87 हजार से अधिक हो चुकी है।

महत्वपूर्ण अवलोकन: सदन में  माननीय सदस्य बंशीधर ब्रजवासी की असंतुष्टि का मुख्य कारण यही था कि सरकार 20% बजट तो खर्च कर रही है, लेकिन वह पैसा ‘समान स्कूल प्रणाली’ के ढांचे को खड़ा करने के बजाय ‘कल्याणकारी योजनाओं’ (साइकिल, भोजन आदि) में अधिक जा रहा है.

वो सिफारिशें जो अभी भी चुनौती बनी हुई हैं

  • समान स्कूल प्रणाली (CSS): मुचकुंद दुबे आयोग  की मुख्य सिफारिश थी कि ‘पड़ोस के स्कूल’ की ऐसी व्यवस्था हो जहाँ अमीर और गरीब का बच्चा एक ही छत के नीचे पढ़े।  शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने स्पष्ट किया कि कक्षा 9 से 12 तक अभी समान परिवेश की नीति लागू नहीं है।
  • मुचकुंद दुबे आयोग की रिपोर्ट पर सीधा क्रियान्वयन: सदन में माननीय सदस्य बंशीधर ब्रजवासी की मुख्य शिकायत यही थी कि सरकार अपनी मौजूदा योजनाओं को तो गिना रही है, लेकिन आयोग द्वारा सुझाए गए बुनियादी ढांचागत बदलावों और विशिष्ट रिपोर्ट पर कोई नया आश्वासन नहीं मिला है।

आश्वासन के बाद संकल्प वापसी

शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने स्पष्ट किया कि कक्षा 1 से 8 तक समान शिक्षा नीति लागू है, हालांकि उच्च माध्यमिक (9वीं से 12वीं) के लिए ‘समान परवरिश’ जैसी कोई विशिष्ट नीति वर्तमान में सरकार के पास विचाराधीन नहीं है।

विपक्ष और प्रस्तावक सदस्य ने सरकार के जवाब को ‘पुरानी योजनाओं का दोहराव’ बताया और मुचकुंद दुबे आयोग की रिपोर्ट पर ठोस आश्वासन न मिलने पर असंतोष जताया। हालांकि, शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के विनम्र अनुरोध और सभापति के निर्देश के बाद, सदन की सहमति से माननीय सदस्य बंशीधर ब्रजवासी ने अपना संकल्प वापस ले लिया।

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