सकरा (मुजफ्फरपुर): मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड स्थित बसंतपुर झिटकाही की पावन धरती पर गुरुवार को भक्ति का ऐसा सैलाब उमड़ा कि आस्था के सारे बांध टूट गए। अशोक विहार होटल के पीछे बने विशाल खेल मैदान में चैत्र नवरात्र के महापर्व पर जब कलश स्थापना के साथ दस दिवसीय भव्य मेले और ‘श्रीराम कथा’ का शंखनाद हुआ, तो पूरा इलाका ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

संध्या आरती के बाद जब अयोध्या धाम की सुप्रसिद्ध कथावाचिका सुश्री साधना शास्त्री व्यासपीठ पर विराजमान हुईं, तो उन्होंने कलयुग के पापों से मुक्ति का ऐसा अचूक मंत्र दिया कि पंडाल में मौजूद हजारों भक्त निशब्द रह गए। शास्त्री जी ने हुंकार भरते हुए कहा— “इंसान उतना पाप कर ही नहीं सकता, जितना उसे जड़ से मिटाने की क्षमता अकेले भगवान के नाम में है।” भजनों की मधुर तान और शास्त्री जी के तार्किक प्रवचनों ने पहले ही दिन श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया, जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो साक्षात अयोध्या की दिव्यता सकरा की इस धरती पर उतर आई हो।

अयोध्या की साधना शास्त्री ने बिखेरी राम नाम की महिमा

संध्या आरती के पश्चात अयोध्या धाम से पधारीं प्रख्यात कथावाचिका सुश्री साधना शास्त्री के द्वारा ‘श्रीराम कथा’ का श्रीगणेश हुआ। कथा के प्रारंभ में स्थानीय महिलाओं ने पारंपरिक रूप से कथावाचिका का तिलक लगाकर और पुष्प वर्षा कर अभिनंदन किया। कार्यक्रम की शुरुआत सुमधुर भजनों से हुई। ‘हरि बोल, मुकुंद बोल, गोपाल बोल, गोविंद बोल’ और ‘तू मृत्युलोक में आया, तूने राम नाम नहीं गाया’ जैसे भजनों पर पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे।

कलयुग में केवल नाम ही आधार: साधना शास्त्री

भक्तों को संबोधित करते हुए साधना शास्त्री ने कलयुग में भगवद नाम की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “कलयुग में भगवान का नाम ही सबसे बड़ा सहारा है। जो गति सतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में सेवा से प्राप्त होती थी, वही परम गति कलयुग में केवल राम नाम संकीर्तन से सुलभ है।” उन्होंने तुलसीदास जी की चौपाई कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रभु का नाम, धाम, रूप और लीला चारों एक ही तत्व हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई पापी व्यक्ति उतना पाप कर ही नहीं सकता, जितना पाप नष्ट करने की क्षमता भगवान के अकेले नाम में है।

कथा श्रवण का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व

कथा के प्रथम दिन की महत्ता बताते हुए शास्त्री जी ने कहा कि पहले दिन की कथा नींव के समान होती है। जब तक हम किसी के महत्व को जानेंगे नहीं, तब तक उससे प्रेम (प्रतीति) नहीं होगा। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे ‘कल आएंगे’ की सोच छोड़कर पहले दिन से ही जुड़ें।

उन्होंने भगवान के निवास स्थान की चर्चा करते हुए वाल्मीकि रामायण का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा:

“जिस प्रकार समुद्र कभी नदियों से नहीं भरता, वैसे ही जिसके कान कथा सुनने से कभी न भरें, भगवान सीता और लक्ष्मण सहित उसके हृदय में सदैव निवास करते हैं।”

जीवन में वाणीऔर समझदारीका संगम जरूरी

रामचरितमानस के बालकाण्ड की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि बाबा तुलसीदास ने सबसे पहले माता सरस्वती और भगवान गणेश की वंदना की है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में ‘वाणी’ (सरस्वती) और ‘विवेक’ (गणेश) दोनों का होना अनिवार्य है। केवल मीठी आवाज होना काफी नहीं है, बल्कि क्या और कैसे बोलना है, इसका ज्ञान (विवेक) ही मनुष्य को सफल बनाता है।

श्रद्धा और विश्वास: अटूट संबंध

कथावाचिका ने एक प्रेरक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि भगवान के प्रति केवल ‘श्रद्धा’ रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन पर ‘अटूट भरोसा’ भी होना चाहिए। उन्होंने लोहे की जंजीर और घास-फूस की रस्सी से कुएं में लटकने वाले दो व्यक्तियों की कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रद्धा से अधिक भक्त के भरोसे के वश में होते हैं। उन्होंने कहा कि पार्वती जी श्रद्धा हैं और शिव जी विश्वास हैं; जैसे पति के बिना पत्नी अधूरी है, वैसे ही श्रद्धा के बिना विश्वास और विश्वास के बिना श्रद्धा का कोई मूल्य नहीं है।

गुरु वंदना से हुआ माहौल भावुक

कथा के अंतिम चरण में गुरु की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि गुरु साक्षात परमेश्वर का रूप हैं जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने-अपने गुरुओं का स्मरण करने का आह्वान किया। अंत में ‘गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना’ भजन के साथ प्रथम दिन की कथा का विश्राम हुआ, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया।

भक्ति और शांति के संकल्प के साथ प्रथम दिन का विश्राम

कथा के प्रथम दिन का समापन आरती और सामूहिक वंदना के साथ हुआ, जहाँ श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे आने वाले नौ दिनों तक संयम और श्रद्धा के साथ प्रभु की भक्ति में लीन रहेंगे। अयोध्या से पधारीं सुश्री साधना शास्त्री की ओजस्वी वाणी ने न केवल सकरा के बसंतपुर झिटकाही को भक्तिमय कर दिया, बल्कि समाज में ‘विवेक और विश्वास’ की स्थापना का संदेश भी दिया।

अशोक विहार खेल मैदान में आयोजित यह दस दिवसीय महापर्व अब आने वाले दिनों में और भी भव्य रूप लेगा, जिसमें भगवान राम के जन्म से लेकर रावण वध तक की लीलाओं का सजीव वर्णन किया जाएगा। आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि 28 मार्च, शनिवार को विजयदशमी के पावन अवसर पर भव्य शोभायात्रा और देवी विसर्जन के साथ इस विशाल अनुष्ठान का विधिवत समापन होगा। तब तक, यहाँ का वातावरण ‘जय श्रीराम’ और ‘माँ दुर्गे’ के जयकारों से गूंजता रहेगा, जो क्षेत्र के लोगों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है।

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