सकरा (मुजफ्फरपुर): जिस महापुरुष ने भारत के संविधान से करोड़ों दलितों, पिछड़ों और वंचितों के जीवन में उजाला भरा, वही महापुरुष सकरा के ‘सुरक्षित’ विधानसभा क्षेत्र के रहनुमाओं की अनदेखी के कारण खुद अंधेरे में रहने को मजबूर थे। लेकिन कहते हैं न कि नेताओं की नजर चुनाव पर होती है और इंसान की नजर जरूरत पर।” जब सिस्टम की आंखें बंद हो गईं, तो मजदूरों के पसीने की कमाई ने वह कर दिखाया, जिससे सफेदपोशों के चेहरे फीके पड़ गए।

“नेताओं के पास ‘बजट’ का रोना, मजदूरों के पास ‘श्रद्धा’ का खजाना: जगमगा उठी बाबा साहेब की प्रतिमा”

विधायक का पड़ोसऔर सिस्टम का मौन

अजीब विडंबना है कि सकरा के सबहा चौक स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा स्थल से महज कुछ कदमों की दूरी पर क्षेत्र के माननीय विधायक का आवास है। रात के सन्नाटे में विधायक जी का महल तो दूधिया रोशनी में जगमगाता रहता था, लेकिन संविधान निर्माता की प्रतिमा पर शाम ढलते ही घुप अंधेरा छा जाता था।

सकरा एक सुरक्षित सीट है, लेकिन अफसोस कि यहाँ के सत्ताधारियों को यह याद रखने की फुर्सत नहीं रही कि जिस ‘आरक्षण’ और ‘सुरक्षित सीट’ की बदौलत वे आज सत्ता का मलाईदार सुख भोग रहे हैं, वह अधिकार दिलाने वाले बाबा साहेब ही थे।

सिस्टम सो गया, तो श्रमने मशाल थामी

सकरा नगर पंचायत की उदासीनता और अधिकारियों की ‘मोतियाबिंद’ वाली दृष्टि के खिलाफ सकरा बाजिद पंचायत (मंसूरपुर) के अंकज कुमार राम और उनके साथियों ने मोर्चा संभाला। ये कोई रईस ठेकेदार या फंड का रोना रोने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले प्लंबर और मजदूर हैं।

“पसीने की कमाई से महकी श्रद्धा: तस्‍वीर में प्लंबर मजदूरों ने चंदा कर बाबा साहेब के आंगन में भरा उजाला”
  • नायक: अंकज कुमार राम
  • सहयोगी: विजय कुमार, रंजन कुमार, नूर आलम और कुलदीप राम।

इन मेहनतकशों ने अपनी मजदूरी के चंद रुपयों से चंदा इकट्ठा किया और प्रतिमा स्थल पर लाइटिंग की शानदार व्यवस्था कर दी। इन मजदूरों ने समाज को आईना दिखाया है कि बाबा साहेब के प्रति सच्ची श्रद्धा मंचों से दिए जाने वाले लंबे-चौड़े भाषणों में नहीं, बल्कि उनके सम्मान को सुरक्षित रखने में है।

सियासतदानों के गाल पर करारा तमाचा

मजदूरों द्वारा किया गया यह कार्य उन लोगों के लिए एक नजीर है जो बाबा साहेब के नाम पर राजनीति तो चमकाते हैं, लेकिन उनकी प्रतिमा को दो यूनिट बिजली देने में भी उनका बजट आड़े आ जाता है। शायद सियासत की रोटी सेंकने वालों के लिए महापुरुषों की प्रतिमाएं सिर्फ साल में दो बार माल्यार्पण और फोटो खिंचवाने (फोटो-ऑप) के ही काम आती हैं।


एक बड़ा सवाल: सिर्फ रोशनी काफी है या गरिमा भी?

मजदूरों ने अंधेरा तो छांट दिया, लेकिन अब सवाल प्रशासन की नीयत पर है। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और युवाओं की मांग है कि:

  1. पार्क का स्वरूप: सबहा चौक स्थित इस प्रतिमा स्थल को एक छोटे और सुव्यवस्थित पार्क का रूप दिया जाए, ताकि इसकी गरिमा बनी रहे।
  2. सफाई का सवाल: लाइटिंग के बाद अब स्थल की नियमित साफ-सफाई एवं सीढी का पलास्‍टर एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
  3. कमिटी की सख्त जरूरत: केवल इस स्थल ही नहीं, बल्कि सकरा की अन्य महापुरुषों की प्रतिमाओं की देख-रेख के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी के अधीन एक विशेष कमिटी बनाई जाए। जो केवल इन स्थलों की सुरक्षा, बिजली और सफाई का जिम्मा संभाले, ताकि भविष्य में किसी मजदूर को अपना पेट काटकर सिस्टम का गड्ढा न भरना पड़े।

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