Friday, October 9, 2026

लोहरगामा: विकास की नींव तले दबती एक प्राचीन सभ्यता की चीख

लहरगामा डीह से प्राप्‍त ईंटों को दिखाता ग्रामीण

मुजफ्फरपुर (बिहार) बिहार की धरती अपनी कोख में न जाने कितने साम्राज्यों और सभ्यताओं का इतिहास समेटे हुए है। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड के अंतर्गत आने वाला लोहरगामा (लहरगामा) एक ऐसा ही पुरातात्विक स्थल है, जो आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यहाँ वर्तमान में निर्माणाधीन ‘राम जानकी स्टेडियम’ की खुदाई ने उन अवशेषों को धरातल पर ला खड़ा किया है, जो सदियों से जमीन के नीचे दफन थे। लेकिन विडंबना यह है कि इन बेशकीमती साक्ष्यों को सहेजने के बजाय, उन्हें कंक्रीट के नीचे हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है।

लहरगामा  डीह  पर   स्‍टेडियम के लिए बनाया जा रहा चाहारदीवार

स्टेडियम निर्माण और मिट्टी से निकलता इतिहास

लोहरगामा पंचायत के राम जानकी मठ के समीप जब जेसीबी ने स्टेडियम के लिए खुदाई शुरू की, तो वह केवल मिट्टी नहीं बल्कि इतिहास उगलने लगी। खुदाई के दौरान भारी मात्रा में प्राचीन ईंटें, लोढ़ी, सिलौटी, चक्की (जांता) और विभिन्न प्रकार के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) बाहर आए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहाँ कई स्थानों पर मानव कंकालों के अवशेष भी मिले हैं। ये अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहाँ कभी एक सुव्यवस्थित बस्ती या सभ्यता निवास करती थी।

लेकिन इस पुरातात्विक महत्व को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। ग्रामीणों के अनुसार, स्टेडियम के पूर्वी छोर पर खुदाई के दौरान प्राचीन दीवार की संरचना मिली थी, जिसे मजदूरों ने बिना किसी जांच के पुनः नींव के अंदर दबा दिया।

सरकारी दस्तावेजों में पहचान और वर्तमान दुर्दशा

लोहरगामा केवल लोकश्रुतियों में नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों में भी दर्ज है। के.पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पटना द्वारा प्रकाशित ‘कैटलॉग ऑफ आर्केलाजिकल साइट्स इन बिहार‘ (भाग-2, पृष्ठ 10-11) में सकरा प्रखंड की सूची में इसे नौवें स्थान पर रखा गया है।

  • ऐतिहासिक माप: अभिलेखों के अनुसार इस डीह (टीले) का रकबा 45 हजार वर्ग मीटर और ऊंचाई ढाई मीटर बताई गई है।
  • अतीत बनाम वर्तमान: बुजुर्गों की मानें तो 35 वर्ष पहले इस मुख्य डीह की ऊंचाई 15 फीट से अधिक थी, जो आज अवैध अतिक्रमण और निर्माण के कारण मात्र 3 फीट रह गई है। यहाँ एक प्राचीन कुआँ था जिसे मिट्टी से भर दिया गया है, और उत्तर दिशा में स्थित एक विशाल तालाब अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें ले रहा है।

स्थापत्य कला और पुरातात्विक साक्ष्य

लोहरगामा से प्राप्त ईंटों का आकार इसकी प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहाँ से प्राप्त ईंटों की लंबाई 35 सेमी, चौड़ाई 14 सेमी और मोटाई 06 सेमी है। दिलचस्प बात यह है कि इसी आकार की ईंटें क्षेत्र के अन्य प्राचीन स्थलों जैसे भसौन के राम जानकी मठ और मतलुपुर के शिव मंदिर के जीर्णोद्धार के समय भी मिली थीं।

यहाँ मिले अवशेषों में दैनिक जीवन की वस्तुएं जैसे कौड़ी और चक्की भी शामिल हैं। जागरूकता की कमी का आलम यह है कि एक स्थानीय किसान यहाँ से प्राप्त प्राचीन चक्की (जांता) का उपयोग खेत में खूंटा ठोकने के लिए कर रहा है। यह हमारी विरासत के प्रति घोर उदासीनता का प्रतीक है।

लहरगामा  डीह से प्राप्‍त ईंटों  को  दिखाता ग्रामीण

बौद्ध धर्म से जुड़ाव की संभावना

विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का मानना है कि ‘लहरगामा’ शब्द में लगा ‘गामा‘ प्रत्यय इस स्थल के बौद्ध धर्म से जुड़े होने का संकेत देता है। प्राचीन काल में बौद्ध विहारों या केंद्रों के नाम के पीछे अक्सर ऐसे शब्द जुड़ते थे। यदि यहाँ वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई और शोध किया जाए, तो संभव है कि यह स्थल वैशाली या अन्य समकालीन बौद्ध केंद्रों की कड़ी के रूप में सामने आए।

विकास के नाम पर ‘इतिहास का कत्ल‘

लोहरगामा के मुख्य डीह पर बिना किसी पुरातात्विक अनापत्ति (NOC) के एक के बाद एक सरकारी निर्माण कराए जा रहे हैं।

  • यहाँ पहले ही विद्यालय, पंचायत सरकार भवन और नलकूप बना दिए गए हैं।
  • अब स्टेडियम का निर्माण शेष बची कड़ियों को भी नष्ट कर रहा है।
  • पास ही बहने वाली कदाने नदी और यह टीला एक आदर्श प्राचीन सभ्यता की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हैं, जिसे अनदेखा किया जा रहा है।

इसके संरक्षण की आवश्‍यकता महत्‍वपूर्ण

लोहरगामा की मिट्टी से निकले अवशेष चीख-चीखकर पूछ रहे हैं कि क्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना है? यहाँ मिले कंकाल किसके हैं? क्या यह किसी प्राचीन राजमहल का हिस्सा था या किसी भव्य मंदिर का? इन सवालों के जवाब केवल गहन पुरातात्विक जांच (Excavation) से ही मिल सकते हैं।

लोहरगामा पुरातात्विक स्थल के साथ की जा रही छेड़छाड़ केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि अपनी विरासत को बर्बाद करने का एक अपराध है। स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार के पुरातत्व विभाग को अविलंब इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। स्टेडियम निर्माण को रोककर पहले इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जाना अनिवार्य है।

“इतिहास केवल किताबों में नहीं होता, वह हमारी मिट्टी में भी धड़कता है। यदि आज हमने लोहरगामा को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें अपनी जड़ें मिटाने के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।”

लोहरगामा के संदर्भ में जिक्र किया, ‘गामा‘ प्रत्यय वाले गांवों का इतिहास बहुत गहरा है। भाषाई और ऐतिहासिक दृष्टि से ‘गामा’ शब्द संस्कृत के ‘ग्राम‘ का अपभ्रंश है, जो प्राकृत और पाली के प्रभाव से ‘गामा’ बना।

बिहार (विशेषकर मुजफ्फरपुर, दरभंगा और मिथिलांचल) और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इस प्रत्यय वाले कई प्रसिद्ध गांव आज भी हैं।

बिहार के प्रमुख ‘गामा‘ प्रत्यय वाले गांव

बिहार में ‘गामा’ अंत वाले गांव अक्सर प्राचीन बसावट या बौद्ध काल से जुड़े माने जाते हैं:

  • लोहरगामा / लहरगामा: (मुजफ्फरपुर, सकरा) – यह एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।
  • सिंघिया-गामा: (समस्तीपुर/दरभंगा क्षेत्र) – यह इस क्षेत्र का काफी प्रसिद्ध गांव है।
  • नैनगामा: (सहरसा/मधेपुरा क्षेत्र) – यह क्षेत्र भी अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है।
  • भरगामा: (अररिया जिला) – यह एक पूरा प्रखंड (Block) भी है।
  • कुशगामा: (दरभंगा जिला) – मिथिला क्षेत्र में स्थित।
  • बहेड़ा-गामा: (दरभंगा/मधुबनी क्षेत्र)।
  • पंडुगामा: (मुजफ्फरपुर और वैशाली के सीमावर्ती क्षेत्रों में)।

‘गामा‘ शब्द का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व

इतिहासकारों और भाषाविदों के अनुसार, ‘गामा’ प्रत्यय वाले गांवों के पीछे कुछ विशेष तर्क दिए जाते हैं:

  • बौद्ध कालीन जुड़ाव: पाली भाषा (जो बौद्ध धर्म की मुख्य भाषा थी) में ‘ग्राम’ को ‘गाम’ या ‘गामा’ कहा जाता था। भगवान बुद्ध के भ्रमण के दौरान कई स्थानों के नाम इसी तरह प्रचलित हुए। उदाहरण के लिए, पाली ग्रंथों में ‘कोटिगामा‘ (जो आज वैशाली के पास है) का उल्लेख मिलता है।
  • प्राकृत प्रभाव: संस्कृत के शब्दों के सरलीकरण के दौरान ‘ग्राम’ शब्द ‘गाम’ और फिर स्थानीय बोली में ‘गामा’ हो गया।
  • मठ और विहार: अक्सर जिन गांवों के नाम के अंत में ‘गामा’ लगा होता है, वहां प्राचीन काल में कोई बड़ा मठ, विहार या शिक्षण केंद्र होने के साक्ष्य मिलते हैं (जैसा कि आपके लोहरगामा में मिल रहे हैं)।

सिर्फ बिहार ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों और पड़ोस में भी इसके मिलते-जुलते रूप मिलते हैं:

  • हरियाणा/पंजाब एवं जम्‍मू काश्‍मीर  : यहाँ ‘गाम’ या ‘गाँव’ का प्रयोग अधिक होता है।
  • श्रीलंका: यहाँ भी कई स्थानों के नाम के पीछे ‘गामा‘ लगता है (जैसे: महारगामा), जो शुद्ध रूप से बौद्ध संस्कृति और पाली भाषा के प्रभाव को दर्शाता है।

 

समस्तीपुर का ‘गुप्त खजाना’: 135 ऐतिहासिक स्थलों में दबा है सदियों का गौरवशाली इतिहास!

विशेष रिपोर्ट: न्यूज़ भारत टीवी

बिहार की भूमि को यदि ‘इतिहास की जननी’ कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब हम बिहार के पुरातात्विक मानचित्र पर दृष्टि डालते हैं, तो नालंदा के खंडहर, वैशाली का लोकतंत्र, राजगीर की पहाड़ियाँ और गया के आध्यात्मिक अवशेष स्वतः ही मस्तिष्क में उभर आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी बिहार के हृदय स्थल में बसा समस्तीपुर जिला आज एक ऐसी पुरातात्विक क्रांति की दहलीज पर खड़ा है, जो बिहार के प्राचीन इतिहास के कई पन्नों को फिर से लिखने की क्षमता रखता है?

हालिया शोधों और काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान की रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। समस्तीपुर जिले में 135 से अधिक पुरातात्विक स्थलों को चिन्हित किया गया है। ये स्थल केवल मिट्टी के ढेर नहीं हैं, बल्कि नवपाषाण काल से लेकर गुप्त काल तक के छह सांस्कृतिक चरणों के मूक गवाह हैं।

पुरातात्विक उपेक्षा और छिपे हुए खजाने

पूरे बिहार में पुरातात्विक स्थलों की संख्या 2,500 से अधिक है, और यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। विडंबना यह है कि इनमें से केवल 5 प्रतिशत जानकारी ही आम जनता तक पहुँच पाई है, वह भी आधी-अधूरी। शेष 95 प्रतिशत विरासत आज भी सरकारी फाइलों में कैद है। समस्तीपुर के ये 135 स्थल भी एक ऐसे कुशल शोधकर्ता और उत्खनन की राह देख रहे हैं, जो इन्हें काल के गर्त से निकालकर इनकी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित कर सके।

न्यूज़ भारत टीवी ने इस अनकही कड़ी को एक सूत्र में पिरोने का बीड़ा उठाया है। हम केवल उन 135 स्थलों की बात नहीं कर रहे, बल्कि उन दर्जनों अन्य क्षेत्रों को भी प्रकाश में ला रहे हैं जो पर्यटन और शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, किंतु आधिकारिक सूचियों से अब तक गायब हैं।

नाम के पीछे का इतिहास: सोमवस्ती से समस्तीपुर तक

समस्तीपुर का नामकरण अपने आप में एक ऐतिहासिक पहेली है। इसके पीछे कई रोचक किंवदंतियाँ और ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं:

  • सोमवस्ती और आर्य परंपरा: प्राचीन काल में इस क्षेत्र को ‘सोम बस्ती’ या ‘सोमवती’ कहा जाता था। सोम, जो आर्यों के प्रमुख देवता थे, के नाम पर इसका नाम ‘सोमवस्तीपुर’ पड़ा, जो कालांतर में ‘समवस्तीपुर’ और अंततः ‘समस्तीपुर’ बन गया।
  • शम्सुद्दीन इलियास का प्रभाव: एक अन्य मत के अनुसार, बंगाल के सुल्तान हाजी शम्सुद्दीन इलियास ने इस शहर को बसाया था, जिससे इसका नाम ‘शम्सुद्दीनपुर’ पड़ा और बाद में यह समस्तीपुर के रूप में विख्यात हुआ।
  • मिथिला का प्रवेश द्वार: समस्तीपुर को मिथिला का प्रवेश द्वार माना जाता है। लोकश्रुति है कि यहाँ आकर मिथिला की ‘समस्त अस्थियां’ (सीमाएं या अवशेष) समाप्त हो जाती थीं, इसलिए इसे समस्तीपुर कहा गया।
  • सिल्लिंग और सिक्के: दलसिंहसराय के पगड़ा पंचायत में उत्खनन के दौरान कुषाणकालीन सिक्के और ब्राह्मी लिपि में ‘समस’ अंकित सिल्लियां मिली हैं, जो इसके नामकरण पर ऐतिहासिक प्रकाश डालती हैं।

सांस्कृतिक विरासत के छह चरण

समस्तीपुर की मिट्टी में सभ्यता के विकास के छह प्रमुख चरण दबे हुए हैं। यहाँ नवपाषाण काल के पत्थरों के औजारों से लेकर गुप्त काल की भव्य मूर्तिकला तक के अवशेष मिलते हैं। इस क्षेत्र ने ओइनवार, खण्डेवाल और द्रोणवार जैसे प्रतापी राजवंशों का शासन देखा है।

पांड का उत्खनन: एक नई दिशा

दलसिंहसराय का ‘पांड’ आज पुरातत्वविदों के लिए आकर्षण का केंद्र है। चेचर और चिरांद के बाद, पांड ही वह स्थल है जिसने बिहार के प्राचीन इतिहास को नई गहराई दी है। यहाँ के उत्खनन ने साबित कर दिया है कि समस्तीपुर प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों का मुख्य केंद्र था।

प्रमुख पुरातात्विक स्थल और उनकी महत्ता

समस्तीपुर के विभिन्न प्रखंडों में बिखरी विरासत की एक संक्षिप्त झलक नीचे दी गई है:

स्थल का नामसंबंधित काल/महत्ताविशेषता
पांड (दलसिंहसराय)ताम्रपाषाण से मध्यकालबिहार का महत्वपूर्ण उत्खनन स्थल
गरीया डीहकुषाण कालप्राचीन सिक्कों और मिट्टी के बर्तनों के अवशेष
विशनपुर मेढ़ी व बेला मेघगुप्त कालस्थापत्य कला और धार्मिक अवशेष
नेमी डीह (हसनपुर)ताम्रपाषाण कालपांड के समान प्राचीन और विस्तृत
गनपुर डीह (सरायरंजन)कुषाण कालव्यापारिक केंद्र होने के साक्ष्य
सूरजपुर (मोरवा)कुषाण कालसांस्कृतिक विकास का कालखंड
मोरवा गढ़गुप्त कालसामरिक और प्रशासनिक महत्व
करियन डीह (शिवाजीनगर)प्राचीन कालमहान दार्शनिक उदयनाचार्य की कर्मभूमि

सामाजिक और धार्मिक सद्भाव की स्थली

समस्तीपुर केवल ईंटों और पत्थरों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह लोक आस्था का भी संगम है:

  • बाबा अमरसिंह स्थान (षिउरा): निषाद समाज की अटूट आस्था का केंद्र।
  • विद्यापति धाम: महान मैथिली कवि विद्यापति की निर्वाण स्थली, जो शिव भक्तों के लिए काशी के समान है।
  • खुदनेश्वर स्थान (मोरवा): हिंदू-मुस्लिम एकता का अनूठा प्रतीक, जहाँ एक ही परिसर में मंदिर और मजार स्थित हैं।
  • संत दरिया आश्रम (पटोरी): दरियापंथियों का सबसे बड़ा केंद्र, जो मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की याद दिलाता है।
  • रोसड़ा कबीर मठ और निरंजन स्थान: यहाँ की विविध धार्मिक परंपराओं को दर्शाते हैं।

आधुनिक इतिहास और विद्वता की धाक

अंग्रेजों के आगमन से पहले ही दिल्ली, जौनपुर और बंगाल के शासकों की नजर समस्तीपुर की उर्वर भूमि पर थी, जिसे ‘सोना उगलने वाली मिट्टी’ कहा जाता था। 1874 में बिहार में पहली बार रेल का इंजन इसी जिले की धरती पर दौड़ा था, जो इसके आर्थिक महत्व को दर्शाता है।

साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में भी यहाँ के विद्वानों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धाक रही है। शिवाजीनगर प्रखंड के करियन डीह से ‘श्रुति संदेश’ नामक पत्रिका का संपादन हुआ, जिसे भारत की संभवतः प्रथम हस्तलिखित पत्रिका माना जाता है। यह तथ्य प्रमाणित करता है कि यहाँ की धरती सदियों से बौद्धिक चेतना का केंद्र रही है।

आज समस्तीपुर की यह समृद्ध विरासत संकट में है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण कई पुरातात्विक टीलों (डीह) पर बस्तियाँ बस गई हैं। अतिक्रमण और जागरूकता के अभाव में प्राचीन अवशेष नष्ट हो रहे हैं। ‘काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान’ की सूची में शामिल 135 स्थल आज भी केवल फाइलों तक सीमित हैं।

            समस्तीपुर जिले के कण-कण में इतिहास रचा-बसा है। यदि इन 135 स्थलों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और पर्यटन विकास किया जाए, तो समस्तीपुर न केवल बिहार बल्कि वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नालंदा और वैशाली के समकक्ष खड़ा हो सकता है। न्यूज़ भारत टीवी का यह प्रयास समाज और सरकार को जगाने की एक कोशिश है ताकि हम अपनी जड़ों को पहचान सकें और उन्हें सहेज सकें।

इन स्थलों को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि हम सभी की है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह बता पाएंगे कि जिस मिट्टी पर वे चल रहे हैं, उसके नीचे सम्राटों का वैभव और ऋषियों का ज्ञान दबा पड़ा है?

महा-रिर्पोट: मिथिला की वह विस्मृत राजधानी, जहाँ ‘खेलन कवि’ विद्यापति का बचपन खिला और कलम जवान हुई

ओइनी डीह एक का दृश्‍य

आलेख: एस.एस. कुमार ‘पंकज’


इतिहास के मलबे में दबी एक गौरवगाथा

इतिहास की यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अक्सर उन पन्नों को खो देता है, जहाँ किसी संस्कृति की नींव रखी गई होती है। बिहार के समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड का वैनी गांव आज अपनी इसी गुमनामी पर सिसक रहा है। यह केवल एक साधारण गांव नहीं, बल्कि मध्यकालीन मिथिला की वह धड़कन थी, जिसकी गूँज कभी दिल्ली की सल्तनत से लेकर बंगाल के पंचगौर तक सुनाई देती थी। यह वह पवित्र भूमि है, जिसकी मिट्टी में महाकवि विद्यापति का बचपन बीता, जहाँ उन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं को शब्द दिए और जहाँ ओइनवार राजवंश के प्रतापी राजाओं का राज्याभिषेक हुआ।

आज न्यूज़ भारत टीवी की इस विशेष और विस्तृत रिपोर्ट में हम वैनी (प्राचीन ओइनी) के गौरवशाली अतीत, इसके साहित्यिक महत्व, स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका और वर्तमान में प्रशासनिक उपेक्षा की पड़ताल करेंगे।


इतिहास के दर्पण में ओइनी की पहचान

ओइनी गांव की ऐतिहासिकता निर्विवाद है। प्रसिद्ध भाषाविद डॉ. ग्रियर्सन ने स्वतंत्रता पूर्व ही अपने शोध पत्रों में इस स्थल को रेखांकित किया था। दरभंगा गजेटियर के अनुसार, 1325 से 1525 ईस्वी के बीच मिथिला पर ओइनवार राजवंश का शासन रहा।

जब कर्नाट वंश के अंतिम शासक हरिसिंह देव गयासुद्दीन तुगलक के आक्रमण के कारण नेपाल की पहाड़ियों में चले गए, तब मिथिला में अराजकता फैल गई थी। उस संक्रमण काल में प्रशासनिक और सांस्कृतिक स्थिरता लाने का श्रेय इसी ओइनवार राजवंश को जाता है, जिसकी पहली राजधानी ओइनी (वैनी) ही थी। समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर भी इसे ऐतिहासिक स्थल के रूप में स्वीकार किया गया है।


ओइनवार शासक और ओइनी का वैभव

कामेश्वर ठाकुर के बाद भोगेश्वर ठाकुर और गणेश्वर ठाकुर ने ओइनी से ही शासन किया। इतिहास के अनुसार, इस वंश में कुल 17 राजा हुए। गणेश्वर ठाकुर के शासनकाल में ओइनी अपनी समृद्धि के शिखर पर था।

हालांकि, सत्ता के संघर्ष में गणेश्वर ठाकुर की छल से हत्या कर दी गई, जिसके बाद उनके पुत्रों—कीर्ति सिंह और वीर सिंह—को निर्वासित जीवन जीना पड़ा। उन्होंने ओइनी से कुछ दूर ‘विरसिणपुर’ (वर्तमान कल्याणपुर के पास) में शरण ली। बाद में जौनपुर के सुल्तान की मदद से कीर्ति सिंह ने पुनः अपना राज्य प्राप्त किया। करीब 75 वर्षों तक ओइनी मिथिला की राजधानी बनी रही, जब तक कि देवसिंह देव ने राजधानी को लहेरियासराय के निकट ‘देकुली’ नहीं बदल दिया।


ओइनी से ‘चकले वैनी‘ का सफर—नामकरण और भूगोल का रहस्य

समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड का वैनी गांव आज एक उपेक्षित पुरातात्विक स्थल बनकर रह गया है। लेकिन यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पता चलता है कि यह स्थल कभी तत्कालीन मिथिला राज्य की राजधानी रहा है।

बौद्ध काल से मुगल काल तक का सफर

इतिहासकार बताते हैं कि बौद्ध काल में इस क्षेत्र को ‘अयणी‘ गांव के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र अपनी उर्वरता और नदियों के समीप होने के कारण हमेशा से सामरिक महत्व का रहा। समय के साथ बदलते-बदलते बारहवीं शताब्दी तक यह नाम ‘अयणी’ से अपभ्रंश होकर ‘ओइनी‘ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इसी ‘ओइनी’ शब्द से इस क्षेत्र पर शासन करने वाले ब्राह्मण राजवंश का नाम ‘ओइनवार राजवंश‘ पड़ा।

अंग्रेजी ‘उच्चारण दोष‘ और वैनी का जन्म

मुगल काल के पतन के बाद जब भारत में अंग्रेजों का शासन आया, तो उनके भाषाई उच्चारण दोष ने इस गांव की पहचान को नया मोड़ दे दिया। अंग्रेज अधिकारियों के लिए ‘ओइनी’ बोलना कठिन था, सो अंग्रेज अधिकारी इसे वइनी बोलने लगे, और वहीं से उन्होंने दस्तावेजों में इसे ‘वइनी‘ (Waini) लिखना शुरू किया। आज राजस्व दस्तावेजों में इसका नाम विस्तारित होकर ‘चकले वैनी‘ हो चुका है।


स्वतंत्रता की ज्वाला—खुदीराम बोस और पूसा रेलवे स्टेशन

वैनी का इतिहास केवल मध्यकालीन राजाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान और भावुक कर देने वाली घटना भी इसी मिट्टी से जुड़ी है।

पूसा रेलवे स्टेशन : मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर रेलखंड पर स्थित खुदीराम बोस पूसा रेलवे स्टेशन वास्तव में इसी वैनी गांव की जमीन पर अवस्थित है। प्रारंभ में इस स्टेशन का नाम ‘वैनी पूसा‘ ही था। 18 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे को चूमने वाले महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस की गिरफ्तारी इसी पूसा (वैनी) रेलवे स्टेशन के पास से हुई थी।

11 अगस्त 1908 को जब वे किंग्सफोर्ड पर बम फेंकने के बाद भाग रहे थे, तब वे पैदल ही कई मील का सफर तय कर वैनी पहुंचे थे। थके-हारे और भूखे खुदीराम ने यहाँ पानी मांगा और यहीं पुलिस के हत्थे चढ़ गए। आज स्टेशन का नाम बदलकर खुदीराम बोस पूसा कर दिया गया है, जो इस गांव के लिए गौरव की बात है, लेकिन इसके कारण वैनी की प्राचीन ‘राजधानी’ वाली पहचान कहीं पीछे छूट गई है।

आज यह गांव शहरीकरण और राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के प्रभाव में अपनी मौलिक पहचान खो रहा है। नई पीढ़ी इसे केवल ‘पूसा रोड’ के नाम से जानती है, और ‘वैनी’ शब्द जनमानस की स्मृति से ओझल होता जा रहा है।


वैनी के शिवसिंह डीह के पास खेत से मिला नरसिंह भगवान की खंडित काले प्रस्‍तर की मूर्ति को दिखाते स्‍थानिय ग्रामीण

साहित्य का तीर्थ—हिंदी और मैथिली के लिए ‘काशी‘ से कम नहीं

हिंदी और मैथिली साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों और छात्रों के लिए वैनी गांव का महत्व किसी ‘काशी‘ या ‘प्रयाग’ से कमतर नहीं है। यह वह स्थल है जहाँ साहित्य की धारा ने अपना रुख मोड़ा था।

विद्यापति की कर्मभूमि और गुरु परंपरा

विद्यापति ने ओइनवार राजवंश के जिन राजाओं के आश्रय में रहकर अपनी रचनाओं को लिखा, उनकी चर्चा के बिना हिंदी साहित्य का इतिहास अधूरा है। कीर्ति सिंह देव, शिव सिंह देव और भव सिंह देव जैसे राजाओं का उल्लेख विद्यापति के साहित्य में गौरव के साथ मिलता है। विद्वानों का मत है कि विद्यापति कीर्तिलता और कीर्तिपताका जैसी कालजयी रचनाएं इसी ओइनी की मिट्टी पर बैठकर लिखी गईं।

विद्यापति ने यहाँ पंडित हरिमिश्र के सानिध्य में विद्या अध्ययन किया था। पंडित हरिमिश्र का भतीजा पक्षधर मिश्र विद्यापति के सहपाठी थे। साहित्य के छात्रों के लिए यह स्थल एक ‘जीवंत पुस्तकालय’ की तरह है, जहाँ विद्यापति के ‘खेलन कवि’ से ‘महाकवि’ बनने का सफर दफन है।


ओइनवार राजवंश—मिथिला के नए युग का सूत्रपात

वैनी के इतिहास को समझने के लिए हमें ओइनवार राजवंश के उदय को समझना होगा। यह मिथिला के इतिहास का वह अध्याय है जिसने ‘कर्नाट वंश’ के पतन के बाद इस क्षेत्र की बागडोर संभाली।

कौन थे ओइन ठाकुर?

इतिहास के पन्ने बताते हैं कि कर्नाट वंश के अंतिम शासक राजा हरिसिंह देव के अत्यंत विश्वासपात्र और राजपुरोहित कामेश्वर झा (ठाकुर) ओइनी गांव के ही मूल निवासी थे। उनके पूर्वजों के बारे में उल्लेख मिलता है कि जगतपुर निवासी हिंगू ठाकुर के पुत्र और जयपति ठाकुर के पौत्र नाथ ठाकुर को तत्कालीन शासकों द्वारा सरैसा परगना का ‘ओइनी’ गांव छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) या धार्मिक अनुदान के रूप में मिला था। ओइनी गांव का स्वामी होने के कारण नाथ ठाकुर के वंशज ‘ओइनवार‘ कहलाए।

1353 ईस्वी: एक ऐतिहासिक मोड़

समय था चौदहवीं शताब्दी का। दिल्ली की सल्तनत पर गयासुद्दीन तुगलक के बाद फिरोजशाह तुगलक का प्रभाव बढ़ रहा था। 1323-24 के आसपास जब तुगलक सेना ने मिथिला के सिमरांवगढ़ (नेपाल की तराई) पर धावा बोला, तो राजा हरिसिंह देव ने प्रतिरोध के बजाय अपने परिवार और खजाने के साथ हिमालय की कंदराओं में शरण लेना बेहतर समझा। जाने से पहले उन्होंने शासन का गुरुतर दायित्व अपने विद्वान पुरोहित कामेश्वर ठाकुर को सौंपा।

आगे चलकर 1353 ईस्वी में सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने आधिकारिक तौर पर कामेश्वर ठाकुर को मिथिला का ‘करद राजा’ (Tributary King) नियुक्त किया। कामेश्वर ठाकुर ने ओइनी को अपनी प्रथम राजधानी बनाया और यहीं से ओइनवार राजवंश का 174 वर्षों का शासनकाल शुरू हुआ।


ओइनवार शासक और ओइनी का स्वर्णकाल

ओइनी गांव केवल एक निवास स्थान नहीं था, बल्कि यह शक्ति का केंद्र था। कामेश्वर ठाकुर द्वारा स्थापित इस राजवंश में कुल 17 राजा हुए, जिन्होंने मिथिला की कला, संस्कृति और न्याय व्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

गणेश्वर ठाकुर का शासन और त्रासदी

कामेश्वर ठाकुर के बाद भोगेश्वर ठाकुर और उनके उपरांत गणेश्वर ठाकुर ने ओइनी से शासन किया। गणेश्वर ठाकुर के समय में ओइनी एक समृद्ध नगरी के रूप में विकसित हुई। लेकिन 1371 ईस्वी के आसपास, ‘अस्लान’ (अलसान)  नामक एक विश्वासघाती और साम्राज्यलोभी तुर्क हमलावर ने गणेश्वर ठाकुर की छल से हत्या कर दी। इस घटना ने ओइनी को रक्तपात से भर दिया। गणेश्वर के छोटे पुत्रों (कीर्ति सिंह और वीर सिंह) को अपनी जान बचाने के लिए ओइनी छोड़कर निर्वासित जीवन जीना पड़ा।

कीर्ति सिंह और ओइनी की पुनर्वापसी

विद्यापति की पुस्तक ‘कीर्तिलता’ में इस निर्वासन और संघर्ष का मार्मिक वर्णन है। गणेश्वर ठाकुर के पुत्रों ने जौनपुर के सुल्तान इब्राहिम शाह शर्की से मदद मांगी। एक भीषण युद्ध के बाद उन्होंने अपने पिता के हत्यारे अस्लान को पराजित किया। इस युद्ध में वीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन कीर्ति सिंह ने 1402 ईस्वी में पुनः मिथिला का सिंहासन प्राप्त किया और ओइनी को फिर से राजधानी के गौरव से मंडित किया।

राजधानी का स्थानांतरण: इस वंश के शासक देवसिंह ने पहली बार ओइनी से हटाकर ‘देकुली’ (लहेरियासराय के पास) को राजधानी बनाया। हालांकि, सांस्कृतिक केंद्र के रूप में ओइनी का महत्व बना रहा।


विद्यापति की कर्मस्थली—साक्ष्यों और तर्कों की कसौटी पर

मिथिलांचल का बच्चा-बच्चा विद्यापति की पदावली गाते हुए बड़ा होता है। लेकिन विद्यापति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कालखंड कहाँ बीता? इस पर शोधार्थियों के बीच गहन चर्चा है। वैनी के विद्वानों और ऐतिहासिक स्रोतों का दावा है कि विद्यापति का किशोरावस्था और उनकी लेखनी का उत्कर्ष इसी ओइनी की मिट्टी में हुआ।

गणपति ठाकुर का ओइनी निवास

विद्यापति के पिता गणपति ठाकुर, राजा गणेश्वर ठाकुर के मुख्य सभासद और राज पंडित थे। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो राजा की राजधानी ओइनी थी। विद्यापति का पैतृक घर मधुबनी जिले के ‘बिस्फी’ गांव में था। ओइनी से बिस्फी की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। 14वीं शताब्दी में, जब रास्ते दुर्गम थे और बीच में गंडक, बागमती तथा कमला जैसी नदियाँ उफान पर रहती थीं, यह किसी भी तरह संभव नहीं था कि गणपति ठाकुर प्रतिदिन बिस्फी से ओइनी दरबार आ सकें। अतः यह स्पष्ट है कि गणपति ठाकुर अपने परिवार के साथ ओइनी के राजदरबार के समीप ही निवास करते थे।

‘खेलन कवि‘ और शिवसिंह की मित्रता

विद्यापति राजा शिवसिंह के बाल सखा थे। शिवसिंह, देवसिंह के पुत्र थे। विद्यापति ने अपने साहित्य में स्वयं को ‘खेलन कवि‘ कहा है। इसका अर्थ है वह कवि जो राजा के साथ खेलते-कूदते बड़ा हुआ। यदि राजा का बचपन ओइनी की राजधानी में बीता, तो निश्चित रूप से विद्यापति का बचपन भी इसी मिट्टी में बीता। पंडित हरि मिश्र के गुरुकुल की चर्चा आती है, जहाँ विद्यापति और शिवसिंह ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी। वैनी गांव के आसपास ऐसे प्राचीन गुरुकुलों के अवशेषों पर अनुसंधान की भारी आवश्यकता है।

कीर्तिलता की रचना स्थली

विद्यापति ने ‘कीर्तिलता’ की रचना 1402 से 1410 के बीच की थी। उस समय कीर्ति सिंह ओइनी से शासन कर रहे थे। ग्रंथ की भाषा और उसमें वर्णित ओइनी के वैभव तथा विध्वंस का चित्रण इस बात का प्रमाण है कि विद्यापति ने इसकी रचना ओइनी के राजदरबार में बैठकर ही की थी।


पुरातात्विक संपदा—मिट्टी में दबे साम्राज्य के अवशेष

वैनी गांव के उत्तर में दो विशाल टीले हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ‘शिवसिंह डीह‘ के नाम से पुकारते हैं। ये टीले आज भी अपने भीतर इतिहास के कई रहस्य दबाए हुए हैं।

खुदाई में मिले अवशेष

ग्रामीणों के अनुसार, इन टीलों के पास अक्सर प्राचीन वस्तुएं मिलती रहती हैं:

  1. सिक्के और मुद्राएं: यहाँ से स्वर्ण और ताम्र सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  2. काले पत्थर की मूर्तियां: खेती के दौरान नरसिंह भगवान की खंडित प्रतिमाएं मिली हैं।
  3. मृदभांड: गुप्तकालीन और मध्यकालीन मिट्टी के बर्तन।
  4. नर कंकाल: 25 जून 2011 को यहाँ खुदाई के दौरान एक नर कंकाल मिला था, जो बैठने की मुद्रा में था। इससे पहले भी ऐसे अवशेष मिले हैं, जिन्हें प्रशासन ने रहस्य की चादर में लपेट दिया।

वैनी मठ और प्राचीन कुएं

गांव में स्थित वैनी मठ और उसके पास का पुराना कुआँ अपनी बनावट में अनूठा है। मठ की नींव में प्रयुक्त होने वाली ईंटें (खजुरिया ईंट) अत्यंत प्राचीन हैं। मठ के वर्तमान मठाधीश डॉ. नरसिंह दास के अनुसार, यह स्थल कभी तीन बड़े मठों का केंद्र था, जो अब विध्वंस के कारण लुप्त हो रहे हैं।


वैनी के शिवसिंह डीह के पास खेत से मिलाे चक्‍की को दिखाते स्‍थानिय ग्रामीण

विदेशी आक्रमण और ओइनी का विध्वंस

ओइनी का पतन दो बार हुए विदेशी आक्रमणों के कारण हुआ।

  1. पहला विध्वंस अस्लान (अलसान) के सैनिकों ने किया, जिसने राजा गणेश्वर ठाकुर की हत्या के बाद ओइनी में भयंकर रक्तपात मचाया।
  2. दूसरा विध्वंस तब हुआ जब जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह ने आक्रमण किया। उसने राजा शिवसिंह की पैतृक राजधानी ओइनी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। यही कारण है कि आज यहाँ भव्य महलों के स्थान पर केवल मिट्टी के टीले बचे हैं।

वर्तमान त्रासदी—प्रशासनिक उपेक्षा और अतिक्रमण

यह इस न्यूज़ रिपोर्ट का सबसे कड़वा सच है। जिस स्थल को ‘राष्ट्रीय विरासत’ घोषित होना चाहिए था, वह आज ‘पंचायत सरकार भवन‘ के नाम पर ढहाया जा रहा है।

इतिहास पर कंक्रीट का प्रहार

शिवसिंह डीह के पश्चिमी हिस्से पर पंचायत भवन की नींव डालकर इसके इतिहास को मटियामेट करने का प्रयास किया गया है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि भवन निर्माण के लिए की गई खुदाई के दौरान कई बहुमूल्य पुरावशेष गायब कर दिए गए।

वैनी के शिवसिंह डीह के पीछे वाले डीह  पर पंचायत भवन के निर्माण के लिए खोदे जाने का दृश्‍य  

विद्यापति कर्मभूमि उत्थान मंच का संघर्ष

स्थानीय ग्रामीण और विद्वान रमेश झा ‘गुलाब‘ के नेतृत्व में ‘विद्यापति कर्मभूमि उत्थान मंच’ के माध्यम से वर्षों से इस स्थल के संरक्षण की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने विद्यापति की निर्वाण भूमि (विद्यापति नगर) को तो पर्यटन मानचित्र पर स्थान दिया, लेकिन उनकी कर्मभूमि वैनी को लावारिस छोड़ दिया।

मंच के अध्यक्ष रमेश झा ‘गुलाब‘ कहते हैं, “जिले भर में विद्यापति से संबंधित एक ‘विद्यापति नगर‘ ही प्रसिद्ध है, जहाँ उन्होंने प्राण त्यागे थे। लेकिन जहाँ विद्यापति ने अपना बहुमूल्य समय बिताया, उस ओइनी का सरकारी स्तर पर कोई नाम लेने वाला नहीं है। अब तो इस ऐतिहासिक धरती पर पंचायत भवन बनाकर इसे हमेशा के लिए मिटाने की कोशिश हो रही है।”


एक अपील : क्या हम अपनी जड़ों को बचा पाएंगे?

वैनी (ओइनी) केवल एक गांव नहीं, बल्कि मिथिला की अस्मिता का प्रतीक है। यह वह स्थान है जहाँ से मिथिला के महानतम कवि की प्रेरणा का स्रोत फूटता था। जहाँ की मिट्टी में गोनू झा, गंगेश उपाध्याय और दामोदर मिश्र जैसे विद्वानों के पैरों की छाप है।

प्रशासनिक उपेक्षा का आलम यह है कि इतने महत्वपूर्ण स्थल को जिला स्तरीय पर्यटन सूची में भी शामिल नहीं किया गया है। यदि आज हम इस ‘विस्मृत राजधानी’ को नहीं बचाते हैं, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें इस सांस्कृतिक अपराध के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।

न्यूज़ भारत टीवी इस विस्तृत रिपोर्ट के माध्यम से बिहार सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और संस्कृति मंत्रालय से अपील करता है कि:

  • वैनी के शिवसिंह डीह का वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए।
  • पंचायत भवन जैसे अवैध निर्माणों को रोककर इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए।
  • यहाँ एक ‘विद्यापति शोध केंद्र’ और संग्रहालय की स्थापना की जाए।
  • वैनी को राजकीय सम्मान के साथ ‘विद्यापति की कर्मभूमि’ और ‘स्वतंत्रता संग्राम स्मारक’ के रूप में विकसित किया जाए।
  • हिंदी और मैथिली के छात्रों के लिए यहाँ शोध केंद्र की स्थापना हो।

मिथिला का गौरव तभी सुरक्षित रहेगा जब हम अपनी जड़ों का सम्मान करना सीखेंगे। वैनी की मिट्टी आज भी पुकार रही है—क्या कोई है जो उसके दफन इतिहास को आवाज दे सके?


ब्यूरो रिपोर्ट: न्यूज़ भारत टीवी (समस्तीपुर) विशेष सहयोग: स्थानीय ग्रामीण एवं प्रबुद्ध नागरिक

मुजफ्फरपुर के सकरा में ‘सेव क्रांति’: कश्मीरी फिजाओं को मात दे रही है बिहार की धरती, जेठ की दुपहरी में लहलहाए फल

खास रिपोर्ट: सकरा (मुजफ्फरपुर)

बिहार के खेतों में धान और गेहूं की लहलहाती फसलें देखना आम बात है, लेकिन अगर हम कहें कि मुजफ्फरपुर की तपती गर्मी में अब कश्मीरी सेव के गुच्छे लटक रहे हैं, तो शायद आपको यकीन न हो। लेकिन सकरा प्रखंड के हसनपुर बंगाही गांव में यह हकीकत बनकर उभर रहा है। यहां के एक प्रयोगधर्मी युवा किसान हर्ष रंजन उर्फ सोनू जी ने अपनी मेहनत से बिहार की मिट्टी पर ‘सेव का सपना’ साकार कर दिया है। इन्‍हों  ने अपनी मेहनत और नवाचार से वह कर दिखाया है जो कभी नामुमकिन लगता था। बिहार की उपजाऊ मिट्टी में अब सेव की फसल न केवल लहलहा रही है, बल्कि उसमें फूल और फल भी आने लगे हैं।

47 डिग्री का टॉर्चर और सेव की बहार

आमतौर पर माना जाता है कि सेव केवल ठंडे प्रदेशों की फसल है। लेकिन सोनू जी के बागान में ‘हरमन 99′ प्रजाति के 125 पौधों ने इस धारणा को बदल दिया है। जहां पारा 46-47 डिग्री तक पहुंच जाता है, वहां जेठ की तपती दुपहरी और बरसात के थपेड़ों के बीच सेव के ये पौधे न केवल जीवित हैं, बल्कि अब फूलों और फलों से लद चुके हैं। यह बिहार के कृषि इतिहास में एक मील का पत्थर है।

सकरा प्रखंड के हसनपुर बंगाही गांव के एक युवा किसान, हर्ष रंजन उर्फ सोनू अपने सेव के खेत में

मल्टी-लेयर फार्मिंग: एक खेत, चार फसलें और बंपर कमाई

सोनू जी ने केवल खेती नहीं की, बल्कि खेती की कला को विज्ञान से जोड़ा है। उन्होंने आधे एकड़ की जमीन का ऐसा ‘मैनेजमेंट’ किया है कि जानकार भी हैरान हैं:

  1. मुख्य फसल: सेव की बागवानी।
  2. पूरक फसल: सेव की कतारों के साथ पपीते के पेड़।
  3. बीच का सदुपयोग: पपीते और सेव के बीच खाली जगह में मिर्च की खेती।
  4. मिट्टी की उर्वरता: बचे हुए हिस्सों में मसूर की दाल की बुआई।

फायदा क्या है? सोनू जी बताते हैं कि सेव की फसल अप्रैल-मई में तैयार होती है। तब तक पपीता और मिर्च किसान को निरंतर आमदनी देते रहते हैं। साथ ही, पपीते और सेव दोनों को पानी की समान मात्रा चाहिए होती है, जिससे सिंचाई का खर्च और मेहनत आधी हो जाती है।

बिना यूरिया-DAP: पूरी तरह ‘केमिकल फ्री‘ बागवानी

आज के दौर में जहां फसलों में जहरीले कीटनाशकों की भरमार है, वहीं सोनू जी ने पूर्णतः जैविक (Organic) तरीका अपनाया है।

  • कीटों के लिए ‘हनी ट्रैप‘: पौधों को कीड़ों से बचाने के लिए उन्होंने बाजार से जहर खरीदने के बजाय ‘कीट ट्रैप मशीन’ का इस्तेमाल किया। यह एक लैंपनुमा डब्बा है जिसमें मादा कीड़ा की सुगंध होती है, जिसके आकर्षण में आकर सारे नर कीड़े डब्बे में फंस जाते हैं।
  • स्मार्ट सिंचाई: गर्मी में तापमान को नियंत्रित रखने के लिए पूरे खेत में पाइपलाइन का जाल बिछाया गया है, जिससे जरूरत के अनुसार नमी बरकरार रखी जाती है।

बिहार के किसानों के लिए ‘उम्मीद की किरण‘

सोनू जी ने 20 फरवरी 2022 को इस सफर की शुरुआत की थी। शुरुआती चुनौतियों में कुछ पौधे सूखे भी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आज उनका बागान सुकून देने वाला नजारा पेश कर रहा है। सेव का पेड़ अमरूद के पेड़ जैसा दिखता है और तीन साल में पूरी तरह फलदार हो जाता है।

मुजफ्फरपुर का यह प्रयोग अब पूरे बिहार के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। सकरा की यह कामयाबी चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो बिहार की मिट्टी सोना भी उगल सकती है और कश्मीर के स्वाद को अपने आंगन में उतार सकती है। अब बिहार के किसान भी सेव बेचकर लाखों रुपये कमाने का सपना देख सकते हैं।

विशेष रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर में जीवंत हो रहे  हैं  ‘ पशुपतिनाथ’, खुदाई में मिलीं 3500 साल पुरानी परतें, खोल रही हैं इतिहास के राज

मुजफ्फरपुर (बिहार): बिहार की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक धरती पर एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड अंतर्गत मतलुपुर में स्थित प्राचीन बाबा खगेश्वरनाथ महादेव मंदिर अब नए कलेवर में नजर आएगा। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता बल्कि अपनी अद्भुत पुरातात्विक विरासत के लिए भी चर्चा में है। नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू हो चुका है, जिसके पूर्ण होते ही यह उत्तर बिहार का एक प्रमुख पर्यटन और आस्था का केंद्र बन जाएगा।

खुदाई में मिला इतिहास का ‘टाइम कैप्सूल‘

मंदिर के बाहरी स्वरूप को भव्य बनाने के लिए जब मुख्य गर्भ गृह के चारों ओर खुदाई शुरू हुई, तो वहां से इतिहास की ऐसी परतें निकलीं जिन्होंने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है। करीब 12 फीट की गहराई तक की गई खुदाई में मंदिर निर्माण के तीन अलग-अलग कालखंड (लेयर्स) स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं:

खगेश्‍वरनाथ-महादेव-मंदिर-का-एक-दृश्‍य
  1. ऊपरी परत (करीब 200-300 साल पुरानी): सतह से 4 फीट की गहराई तक जो ईंटें और दीवारें मिली हैं, वे आधुनिक काल से ठीक पहले के निर्माण को दर्शाती हैं।
  2. मध्य परत (करीब 800 साल पुरानी): 8 फीट की गहराई पर मिली संरचनाएं मध्यकालीन भारत की वास्तुकला की याद दिलाती हैं।
  3. प्राचीनतम आधार (3000-3500 साल पुराना): सबसे निचली परत और शिवलिंग का आधार तल पुरातत्वविदों के अनुसार 3500 साल तक पुराना हो सकता है। शिवलिंग जिस ‘कसौटी पत्थर’ के आधार पर टिका है, वह इसकी प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

यहाँ से पूर्व में भी पाल कालीन काली पत्थर की मूर्तियाँ प्राप्त हुई थीं, जिन्हें मंदिर प्रशासन ने ससम्मान परिसर में ही स्थापित किया है।

पशुपतिनाथ की प्रतिकृति: भक्तों का अनूठा संकल्प

इस मंदिर का कायाकल्प किसी सरकारी अनुदान से नहीं, बल्कि आम जनमानस के सहयोग से हो रहा है। मंदिर के चारों ओर पशुपतिनाथ मंदिर (काठमांडू) की तर्ज पर नक्काशीदार दीवारों और भव्य गुंबद का निर्माण शुरू हो गया है। मंदिर परिसर में पशुपतिनाथ मंदिर की एक विशाल प्रतिकृति (तस्वीर) लगाई गई है, जिसे गाइड मानकर कारीगर दिन-रात काम कर रहे हैं।

खगेश्‍वरनाथ-महादेव-मंदिर-में-निर्माण-कार्य-का-दृश्‍य.

विशिष्ट पहचान: लाल शिवलिंग और माता पार्वती का ‘लिंग‘ स्वरूप

खगेश्वरनाथ मंदिर की तुलना अक्सर काशी विश्वनाथ और रामेश्वरम से की जाती है। इसका कारण यहाँ स्थापित दुर्लभ लाल पत्थर का शिवलिंग है। पूरे भारत में ऐसे शिवलिंग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।

इसके साथ ही, यहाँ एक ऐसी विशेषता है जो दुनिया में कहीं और नहीं देखी गई— माता पार्वती का ‘लिंग‘ स्वरूप। यद्यपि यह पुरातात्विक मूर्ति खंडित अवस्था में है, लेकिन इसकी महत्ता को देखते हुए इसे सुरक्षित रखा गया है और उसी विधान से पूजा की जाती है। इस खंडित मूर्ति की ऐतिहासिकता को देखते हुए 1950 में पास में ही माता पार्वती की भगवान शिव को नमन करती हुई एक अन्य सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई थी।

रामायण काल से जुड़ा नाता और ‘खगेश्वर‘ नाम की महिमा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही भूमि है जहाँ भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी का निवास था। रामायण युद्ध के दौरान जब मेघनाद ने नागपाश से राम-लक्ष्मण को बांध दिया था, तब गरुड़ जी ने ही उन्हें मुक्त कराया था। उस समय गरुड़ जी के मन में श्री राम के ईश्वर होने पर संशय उत्पन्न हुआ था।

कहा जाता है कि गरुड़ जी (पक्षियों के राजा यानी ‘खग’) की जिज्ञासा और शंका का समाधान भगवान शिव ने इसी स्थान पर संवाद के माध्यम से किया था। इसी कारण इस स्थान का नाम खगेश्वरनाथ पड़ा। आज भी यहाँ गरुड़ जी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जो खुदाई के दौरान ही प्राप्त हुई थी।

काशी जैसी परंपरा : मंदिर और श्मशान का संगम

इस मंदिर की एक और दुर्लभ बात इसका श्मशान से सटा होना है। मंदिर के उत्तर-पूर्व दिशा में ‘पूरनी पोखर‘ श्मशान स्थित है। सनातन परंपरा में काशी के अलावा बहुत कम ऐसे स्थान हैं जहाँ मंदिर और श्मशान एक साथ हों। यह संरचना भगवान शिव के ‘महाकाल’ स्वरूप और जीवन-मृत्यु के शाश्वत सत्य को प्रदर्शित करती है।

मतलुपुर का यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता का गवाह है। जैसे-जैसे निर्माण कार्य आगे बढ़ रहा है, लोग न केवल इसके भव्य स्वरूप को देखने के लिए उत्सुक हैं, बल्कि यहाँ की मिट्टी से निकल रहे इतिहास को जानने के लिए भी लालायित हैं। आने वाले समय में बाबा खगेश्वरनाथ महादेव मंदिर अपनी प्राचीनता और भव्यता के संगम से पूरे देश को गौरवान्वित करेगा।