“सरकार मौन, किसान परेशान: क्या बंगाल की तर्ज पर बिहार में भी होगी आलू की सरकारी खरीद?”
ताजपुर/समस्तीपुर | 28 फरवरी 2026
आलू उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले समस्तीपुर जिले के ताजपुर, पूसा, मोरबा और सरायरंजन प्रखंडों के किसानों के चेहरे पर इन दिनों मायूसी छाई है। कभी ‘सफेद सोना’ कहा जाने वाला आलू आज किसानों के लिए गले की फांस बन गया है। मंडियों में आलू की कीमत गिरकर महज 5 से 6 रुपये प्रति किलो रह गई है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक चोट पहुँच रही है।

लागत भी नहीं निकल पा रही
अखिल भारतीय किसान महासभा के नेता सह आलू उत्पादक किसान ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह ने बताया कि बीज, खाद, जुताई, सिंचाई और मजदूरी मिलाकर आलू की उत्पादन लागत करीब 15 रुपये प्रति किलो आती है। ऐसे में 5-6 रुपये में फसल बेचना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। 25 वर्षों से खेती कर रहे किसान दिनेश प्रसाद सिंह कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में आलू की इतनी कम कीमत कभी नहीं देखी।
कम पैदावार के बावजूद कीमतों में गिरावट ने चौंकाया
हैरानी की बात यह है कि इस बार जिले में आलू की पैदावार भी उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई है। कम उत्पादन के बावजूद कीमतों का इतना गिरना कृषि विशेषज्ञों और व्यापारियों की समझ से परे है। मंडी के गद्दीदार मंजीत कुमार सिंह और श्यामबाबू सिंह के अनुसार, बाजार में मांग की कमी और बाहरी राज्यों से आलू की भारी आवक कीमतों में गिरावट का मुख्य कारण है।
कोल्ड स्टोरेज की समस्या और मजबूरी की बिक्री
किसानों का कहना है कि कोल्ड स्टोरेज की क्षमता सीमित है और भंडारण शुल्क का अतिरिक्त बोझ वहन करना उनके बस की बात नहीं है। मोतीपुर, फतेहपुर और रहीमाबाद के किसानों ने बताया कि नकदी की तत्काल जरूरत के कारण छोटे और सीमांत किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं।
किसानों की प्रमुख मांगें:
आंदोलन की चेतावनी
भाकपा माले के प्रखंड सचिव सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सरकारी खरीद शुरू नहीं हुई, तो किसान भविष्य में आलू की खेती से मुंह मोड़ लेंगे। किसान महासभा और भाकपा माले ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने जल्द समाधान नहीं निकाला, तो वे सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने को बाध्य होंगे।



