सकरा नगर पंचायत में ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’; भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ीं स्ट्रीट लाइटें दिन में उगल रही हैं रोशनी, डस्टबिन हुए बदहाल
रिपोर्ट : एस.एस. कुमार ‘पंकज’
सकरा (मुजफ्फरपुर) : कहते हैं कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? मुजफ्फरपुर जिले की सकरा नगर पंचायत वर्तमान में इसी विडंबना से जूझ रही है। यहाँ विकास की गंगा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का गंदा नाला बह रहा है। नगर पंचायत की सत्ता के गलियारों से लेकर गलियों के मोड़ तक, हर तरफ घोटाले की गूँज है। हालत यह है कि खुद नगर पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधि (पार्षद) ही चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यहाँ सबकुछ ‘लूट’ की भेंट चढ़ चुका है। पिछले कुछ महीनों में जारी हुए पत्रांकों ने इस नगर पंचायत की उस काली हकीकत को उजागर कर दिया है, जिसे अब तक सरकारी फाइलों के अंबार के नीचे दबा कर रखा गया था।

दिनदहाड़े उजाले का अंधेर: हाई मास्ट लाइट घोटाला
सकरा की सड़कों पर भ्रष्टाचार का सबसे जीवंत और शर्मनाक सबूत देखना हो, तो दोपहर के समय यहाँ की सड़कों पर नजर डालिए। जहाँ सूरज अपनी पूरी रोशनी बिखेर रहा होता है, वहीं लाखों की लागत से लगी हाई मास्ट लाइटें दिन के उजाले में जल रही होती हैं। पत्रांक 126 (दिनांक 26.09.2025) के अनुसार, नगर पंचायत में हाई मास्ट लाइट की खरीद और स्थापना में भारी अनियमितता बरती गई है। पार्षदों का आरोप है कि प्रति यूनिट लाइट पर 8 से 9 लाख रुपये का भुगतान दिखाया गया है, लेकिन धरातल पर लगी लाइटें बेहद घटिया दर्जे की हैं। तकनीकी खराबी और सेंसर की अनुपलब्धता के कारण ये लाइटें रात के बजाय दिन में जलती हैं। यह न केवल सरकारी राजस्व और बिजली की भीषण बर्बादी है, बल्कि उस सिंडिकेट की पोल खोलता है जिसने ‘कमीशन’ के चक्कर में जनता के पैसे से खिलवाड़ किया है। सकरा की जनता पूछ रही है—क्या यह विकास है या दिनदहाड़े डकैती?

डस्टबिन बना ‘खूँटा’: वार्ड संख्या 8 में वीरेंद्र राय के मकान के पास मुख्य सड़क पर स्थिति और भी चौंकाने वाली है। स्वच्छता अभियान के तहत लाखों खर्च कर लगाए गए डस्टबिन का उपयोग अब कूड़ा डालने के बजाय गायों को बांधने के लिए किया जा रहा है।
डस्टबिन का ‘कचरा‘ और कागजों पर सफाई
स्वच्छता के नाम पर सकरा नगर पंचायत ने जो ‘खेल’ खेला है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। पत्रांक 126 में ही इस बात का साक्ष्यों के साथ उल्लेख है कि स्वच्छता अभियान के तहत खरीदी गई सामग्री में बंदरबांट की गई है।
- बाल्टी घोटाला: आरोप है कि जो बाल्टियाँ कागजों पर 164 रुपये प्रति नग की दर से खरीदी दिखाई गई हैं, उनकी वास्तविक बाजार कीमत महज 40 रुपये है।
- बदहाल डस्टबिन: आज सकरा की गलियों में लगे डस्टबिन खुद कचरा बन चुके हैं। घटिया प्लास्टिक और कमजोर बनावट के कारण ये कुछ ही महीनों में टूटकर बिखर गए हैं।
जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये नाली की गंदगी की तरह बहा दिए गए और बदले में मिला तो सिर्फ टूटा हुआ प्लास्टिक और बजबजाते सड़को पर कूड़े का अम्बार ।

वार्ड 1 की ज़मीनी हकीकत: पार्षद के द्वार पर ‘लावारिस’ हुआ डस्टबिन
नगर पंचायत सकराके वार्ड संख्या 01 से आई यह तस्वीर प्रशासन के दावों की पोल खोलती है। हैरानी की बात यह है कि यह नज़ारा कहीं और नहीं, बल्कि खुद पार्षद अरुण गुप्ताके आवास के ठीक सामने का है।
मुख्य बातें जो सवाल खड़े करती हैं:
प्रकृति का कब्ज़ा:डस्टबिन का लताओं और झाड़ियों से लिपटा होना यह बताता है कि यहाँ महीनों से न तो सफाई कर्मी पहुँचे हैं और न ही किसी ने इसे खाली करने की ज़हमत उठाई है।
पार्षद की उदासीनता:जब जनप्रतिनिधि के अपने घर के सामने सफाई का यह आलम है, तो आम जनता की गलियों की स्थिति क्या होगी?
लाखों की बर्बादी:जनता के टैक्स के पैसों से खरीदे गए ये डस्टबिन अब केवल शो-पीस बनकर रह गए हैं।
जनता का सवाल:
“क्या डस्टबिन केवल फोटो खिंचवाने और कागजों पर सफाई दिखाने के लिए लगाए गए थे? अगर पार्षद के घर के सामने ही सफाई नहीं है, तो पूरे वार्ड की जिम्मेदारी किसके भरोसे है?”
अविश्वास की आग: जब अपनों ने ही दिखाया आईना
नगर पंचायत की राजनीति में ‘हमाम में सब नंगे’ होने की चर्चा तब आम हो गई, जब खुद उपाध्यक्ष और पार्षदों ने मुख्य पार्षद (अध्यक्ष) के खिलाफ बगावत कर दी। पत्रांक 104 (दिनांक 05.08.2025) के माध्यम से मुख्य पार्षद मोहम्मद हैदर अली के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया गया।
इस पत्र में पार्षदों ने जो आरोप लगाए हैं, वे किसी भी लोकतांत्रिक संस्था के लिए शर्मनाक हैं:
- तानाशाही रवैया: अध्यक्ष द्वारा निर्वाचित सदस्यों की अवहेलना और मनमानी।
- भ्रष्टाचार में संलिप्तता: विकास योजनाओं में पारदर्शिता का पूर्ण अभाव।
- वित्तीय गबन: सरकारी फंड का निजी लाभ के लिए बंदरबांट।
यह अविश्वास प्रस्ताव साबित करता है कि सकरा नगर पंचायत के भीतर ‘ऑल इज वेल’ नहीं है, बल्कि लूट की मलाई के बंटवारे को लेकर तलवारें खिंची हुई हैं।

बिना वर्क ऑर्डर के जेसीबी: ‘गुंडाराज‘ का ट्रेलर
प्रशासनिक अराजकता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि वार्ड संख्या 05 में बिना किसी आधिकारिक आदेश के ही सरकारी संपत्ति को तहस-नहस कर दिया गया। पत्रांक 494/2025 (दिनांक 19.08.2025) में उपाध्यक्ष रणवीर कुमार सिंह ने गंभीर शिकायत की है कि चुलाही राय के घर से बच्चू बाबू के घर तक बनी-बनाई पीसीसी सड़क को जेसीबी लगाकर उखाड़ दिया गया।
हैरानी की बात यह है कि इस कार्य के लिए कोई ‘वर्क ऑर्डर‘ (कार्य आदेश) जारी नहीं किया गया था। बिना किसी टेंडर या आदेश के सड़क तोड़ना न केवल वित्तीय अपराध है, बल्कि यह दर्शाता है कि यहाँ कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। क्या यह केवल सड़क तोड़ना था या पुराने काम को नया दिखाकर फिर से पैसा हड़पने की साजिश?

अवैध नियुक्तियों का ‘भर्ती मेला‘ और गबन का खेल
सकरा नगर पंचायत अब ‘नौकरी की मंडी’ बन चुकी है। पत्रांक 126 और 127 (दिनांक 26.09.2025) में पार्षदों ने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक को सूचित किया है कि यहाँ समूह ‘ग’ और ‘घ’ के पदों पर अवैध तरीके से नियुक्तियाँ की गई हैं।
- भाई-भतीजावाद: बिना किसी सार्वजनिक विज्ञापन या चयन प्रक्रिया के, मुख्य पार्षद और उनके करीबियों ने अपने सगे-संबंधियों को नौकरी पर रख लिया।
- सांप्रदायिक समीकरण का आरोप: पत्रों में स्पष्ट आरोप है कि नियुक्तियों में एक विशेष ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण का पालन कर अन्य वर्गों की अनदेखी की गई है, जिससे सामाजिक वैमनस्य का खतरा बढ़ गया है।
- फर्जी मजदूर: कागजों पर सफाई मजदूरों की एक लंबी फौज दिखाई जाती है, जिनका भुगतान हर महीने संवेदक और अधिकारियों की जेब में जाता है। धरातल पर सफाई करने वाला कोई नहीं है, लेकिन सरकारी खजाने से ‘वेतन’ नियमित रूप से निकल रहा है।

पत्रांकों के आईने में प्रशासनिक अवहेलना
सकरा नगर पंचायत में जो पत्र विगत महीनों में जारी हुए, वे भ्रष्टाचार की पूरी कहानी क्रमवार बयां करते हैं:
- पत्रांक 126: भ्रष्टाचार के पांच बिंदुओं का कच्चा चिट्ठा (हाई मास्ट, डस्टबिन, अवैध बहाली, आचार संहिता उल्लंघन)।
- पत्रांक 127: पार्षद अरुण गुप्ता द्वारा स्वच्छता प्रबंधक और संवेदक की मिलीभगत से लाखों के गबन का खुलासा।
- पत्रांक 104: अविश्वास प्रस्ताव, जो सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की ईमानदारी पर बड़ा सवालिया निशान है।
स्व-प्रचार और आचार संहिता की धज्जियां
विकास कार्यों के साइन बोर्ड और स्वागत द्वारों पर सरकारी राशि का उपयोग कर मुख्य पार्षद द्वारा अपनी तस्वीरें लगवाना नियमों का खुला उल्लंघन है। पार्षदों का आरोप है कि सरकारी मंचों और संपत्तियों का उपयोग निजी राजनीतिक विज्ञापन के लिए किया जा रहा है, जबकि आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है।

निष्कर्ष: क्या जांच होगी या फाइलों में दबेगा सच?
सकरा नगर पंचायत की वर्तमान स्थिति ‘भ्रष्टाचार के दलदल’ जैसी है, जहाँ जितना गहरा खोदा जाए, उतना ही कीचड़ निकल रहा है। जिलाधिकारी, विभागीय मंत्री और माननीय मुख्यमंत्री तक इन पत्रों का पहुँचना यह दर्शाता है कि मामला अब स्थानीय स्तर से बाहर निकल चुका है।
जनता देख रही है कि कैसे उसकी गाढ़ी कमाई के पैसे से दिन में लाइटें जलाई जा रही हैं और कैसे भ्रष्टाचार के डस्टबिन में उनके हकों को फेंका जा रहा है। अब सवाल प्रशासन से है—क्या इन पत्रांकों पर संज्ञान लेकर दोषियों को जेल भेजा जाएगा, या फिर ‘हमाम में सब नंगे’ वाली बात सच साबित होगी और जांच की फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाएंगी?
घटनाक्रम एवं प्रमुख आरोप
| तिथि | पत्रांक संख्या | घटनाक्रम / प्रमुख आरोप |
| 05 अगस्त, 2025 | पत्रांक- 104 | अविश्वास प्रस्ताव: मुख्य पार्षद मोहम्मद हैदर अली के खिलाफ उपाध्यक्ष और पार्षदों ने मोर्चा खोला। शक्तियों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का पहला औपचारिक दस्तावेज सामने आया। |
| 19 अगस्त, 2025 | पत्रांक- 494 | प्रशासनिक अराजकता: वार्ड संख्या 05 में बिना किसी ‘वर्क ऑर्डर’ के जेसीबी चलाकर सरकारी सड़क को ध्वस्त करने का मामला। उपाध्यक्ष ने FIR दर्ज करने की मांग की। |
| 26 सितम्बर, 2025 | पत्रांक- 126 | महा-खुलासा (5 आरोप): मुख्यमंत्री और डीएम को भेजी गई चिट्ठी। इसमें हाई मास्ट लाइट, ₹164 वाली बाल्टी को ₹40 में खरीदने, अवैध बहाली और विज्ञापन में फोटो चमकाने जैसे 5 गंभीर आरोप लगे। |
| 26 सितम्बर, 2025 | पत्रांक- 127 | गबन का आरोप: पार्षद अरुण गुप्ता द्वारा स्वच्छता प्रबंधक और संवेदक की मिलीभगत से लाखों रुपये के वित्तीय गबन और ‘फर्जी मजदूरों’ के नाम पर पैसे निकालने का सनसनीखेज खुलासा। |

सकरा की जनता जाग चुकी है : जवाब तो देना होगा
जवाब कब देंगे : सकरा नगर पंचायत की जनता जानना चाहती है इन सवालों के जवाब ?
1. कार्यपालक पदाधिकारी (EO) से तीखे सवाल
- पत्रांक 126 में उल्लेखित हाई मास्ट लाइटों के दिन में जलने और तकनीकी रूप से खराब होने के बावजूद, संवेदक को पूर्ण भुगतान किस आधार पर किया गया? क्या आपने भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया था?
- पार्षदों ने पत्रांक 127 में फर्जी मजदूरों के नाम पर लाखों के गबन का आरोप लगाया है। क्या कार्यालय के पास उन मजदूरों का मस्टर रोल और आधार लिंकिंग डेटा उपलब्ध है? यदि नहीं, तो भुगतान कैसे हो रहा है?
- पत्रांक 494 के अनुसार, वार्ड 05 में बिना किसी ‘वर्क ऑर्डर’ के सरकारी सड़क तोड़ी गई। एक जिम्मेदार अधिकारी के नाते आपने अब तक दोषी व्यक्ति या संवेदक पर FIR दर्ज क्यों नहीं की?
- पत्रों में आरोप है कि पिछले कई महीनों से बोर्ड की बैठक नहीं हुई है। नियमतः बैठक बुलाना आपकी जिम्मेदारी है; क्या आप किसी दबाव में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित कर रहे हैं?
- अवैध नियुक्तियों के आरोपों पर आपकी क्या सफाई है? क्या इन नियुक्तियों के लिए बिहार नगरपालिका चयन बोर्ड के नियमों का पालन किया गया या यह पूरी तरह ‘बैकडोर एंट्री’ है?

2. मुख्य पार्षद (अध्यक्ष) से तीखे सवाल
- आपके विरुद्ध पत्रांक 104 के तहत अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है और आपके अपने ही साथी भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। क्या आप अब भी मानते हैं कि आपको सदन का विश्वास प्राप्त है?
- सरकारी पैसे से बने स्वागत द्वारों और बोर्डों पर आपकी व्यक्तिगत तस्वीर का क्या औचित्य है? क्या यह सरकारी धन का उपयोग निजी ब्रांडिंग और राजनीतिक लाभ के लिए करना नहीं है?
- ₹164 वाली डस्टबिन बाल्टियों की जगह ₹40 की घटिया सामग्री बांटने के आरोपों पर आपका क्या कहना है? क्या इस खरीद में आपकी मौन सहमति शामिल थी?
- नियुक्तियों में ‘MY’ समीकरण और भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप लग रहे हैं। क्या आप उन कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक करने की चुनौती स्वीकार करेंगे ताकि पारदर्शिता सिद्ध हो सके?
- विकास कार्यों में पार्षदों की अनदेखी क्यों की जा रही है? क्या नगर पंचायत का विकास केवल आपकी पसंद के कुछ चहेते वार्डों और संवेदकों तक सीमित है?

3. उप मुख्य पार्षद (उपाध्यक्ष) से तीखे सवाल
- आपने पत्रांक 494 में सड़क तोड़ने के गंभीर आरोप लगाए हैं। क्या आपके पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि इसमें मुख्य पार्षद या किसी विशेष अधिकारी की मिलीभगत थी?
- आप स्वयं व्यवस्था का हिस्सा हैं, फिर भी आपको मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक पत्र भेजने की नौबत क्यों आई? क्या नगर पंचायत के भीतर शिकायत निवारण का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है?
- अविश्वास प्रस्ताव लाने में हुई देरी क्या यह संकेत नहीं देती कि पहले ‘तालमेल’ बिठाने की कोशिश हुई और बात न बनने पर बगावत की गई? ‘हमाम में सब नंगे’ वाली चर्चा पर आपका क्या कहना है?
- क्या आप उन ‘फर्जी मजदूरों’ और ‘घटिया लाइटों’ की सूची जनता के सामने लाएंगे, जिनका जिक्र आपने अपने पत्रों में किया है?
- यदि प्रशासन इन पत्रों पर कार्रवाई नहीं करता है, तो आपका अगला कदम क्या होगा? क्या आप केवल पत्र तक सीमित रहेंगे या इस भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे?

शिकायतकर्ता पार्षदों से सीधे सवाल: अब तक चुप क्यों थे?
नगर पंचायत के भ्रष्टाचार के विरुद्ध बिगुल फूंकने वाले वार्ड पार्षदों की भूमिका पर भी जनता सवाल उठा रही है। इन 5 सवालों का जवाब शिकायतकर्ता पार्षदों को भी देना चाहिए:
भ्रष्टाचार के विरुद्ध बिगुल फूंकने वाले वार्ड पार्षदों का नाम
| क्र.सं. | नाम | पद | मुख्य भूमिका / पत्रांक |
| 1 | रणवीर कुमार सिंह | उप मुख्य पार्षद | अविश्वास प्रस्ताव (105) और सड़क तोड़ने की शिकायत (494) के मुख्य हस्ताक्षरकर्ता। |
| 2 | अरुण गुप्ता | पार्षद, वार्ड संख्या 01 | गबन (127) और सामग्री खरीद में घोटाले (126) के मुख्य शिकायतकर्ता। |
| 3 | इन्दु देवी | पार्षद, वार्ड संख्या 11 | अविश्वास प्रस्ताव और सामूहिक शिकायत पत्रों पर हस्ताक्षर। |
| 4 | अमित कुमार | पार्षद, वार्ड संख्या 10 | अविश्वास प्रस्ताव और भ्रष्टाचार विरोधी पत्रों पर हस्ताक्षर। |
| 5 | उदय कुमार | पार्षद, वार्ड संख्या 09 | अविश्वास प्रस्ताव और बोर्ड बैठक न बुलाने संबंधी विरोध पत्र पर हस्ताक्षर। |
| 6 | मो. सेराजुद्दीन | पार्षद, वार्ड संख्या 08 | अविश्वास प्रस्ताव एवं नगर पंचायत की कार्यप्रणाली के विरोध में हस्ताक्षर। |
| 7 | सुशीला देवी | पार्षद, वार्ड संख्या 07 | अविश्वास प्रस्ताव और अवैध बहाली के विरोध में हस्ताक्षर। |
| 8 | रीता कुमारी | पार्षद, वार्ड संख्या 06 | अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर। |
- देर से क्यों जागी चेतना? भ्रष्टाचार के जिन मामलों (हाई मास्ट लाइट, डस्टबिन खरीद) का जिक्र आप आज कर रहे हैं, ये प्रक्रियाएं महीनों से चल रही थीं। जब तक टेंडर पास हो रहे थे और काम शुरू हुआ, तब तक आपने बोर्ड की बैठकों में लिखित विरोध क्यों दर्ज नहीं कराया?
- “हिस्सेदारी” का टकराव या जनहित? स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, यह लड़ाई तब शुरू हुई जब मलाई की बंदरबांट में “तालमेल” नहीं बैठ पाया। क्या आप यह गारंटी दे सकते हैं कि आपकी नाराजगी व्यक्तिगत हितों के बजाय पूरी तरह जनहित में है?
- गबन का हिस्सा: पार्षदों का आरोप है कि सामानों की खरीद में भारी कमीशन खोरी हुई है। क्या आपके अपने वार्डों में वितरित हुए सामानों की गुणवत्ता पर आपने उसी समय सवाल उठाए थे, या आप भी उस समय “मौन सहमति” का हिस्सा थे?
- अविश्वास प्रस्ताव की टाइमिंग: अविश्वास प्रस्ताव लाने का समय तब क्यों चुना गया जब भ्रष्टाचार के पत्र सार्वजनिक हुए? क्या यह केवल मुख्य पार्षद पर दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाने की एक रणनीति है?
- सबूतों की जिम्मेदारी: आपने जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री को पत्र तो लिख दिए, लेकिन क्या आपके पास इन घपलों के ऐसे ठोस तकनीकी सबूत (जैसे लैब टेस्ट रिपोर्ट या वित्तीय अनियमितता के पक्के दस्तावेज) हैं जो कोर्ट में टिक सकें, या ये केवल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की राजनीति है?

पर्दे के पीछे का ‘सियासी खेल’: जुबान खोलने पर पाबंदी और रसूखदारों का संरक्षण
सकरा नगर पंचायत में भ्रष्टाचार की आग को दबाने के लिए अब ‘डराओ और राज करो’ की नीति अपनाई जा रही है। स्थानीय गलियारों में दबी जुबान से चर्चा है कि इस पूरे खेल को एक ‘कद्दावर राजनेता’ का संरक्षण प्राप्त है, जिसके इशारे पर शिकायतों को रद्दी की टोकरी में डालने का दबाव बनाया जा रहा है। आलम यह है कि जो पार्षद कल तक पत्रों पर हस्ताक्षर कर रहे थे, आज वे मीडिया के कैमरों के सामने आने से कतरा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो बागी पार्षदों को परोक्ष रूप से धमकाया जा रहा है और यह संदेश दिया जा रहा है कि—“जो हुआ सो हुआ, अब आगे बढ़े तो खैर नहीं।” पत्रकारों के सवालों पर पार्षदों का बगलें झांकना या बहाने बनाना इस बात का पुख्ता संकेत है कि ‘सिस्टम’ के खिलाड़ियों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। यह डरावनी खामोशी सवाल उठाती है कि क्या सकरा के इन जनप्रतिनिधियों की जुबान किसी राजनीतिक दबाव में सिली गई है या फिर वे खुद किसी बड़े समझौते के इंतजार में अपनी ही शिकायतों से कदम पीछे खींच रहे हैं? यह ‘मैनेजमेंट’ का खेल भ्रष्टाचार से भी ज्यादा खतरनाक मोड़ पर पहुँच चुका है।

प्रशासनिक शिथिलता या मौन सहमति? सवालों के घेरे में कार्यपालक पदाधिकारी
सकरा नगर पंचायत में मचे इस महा-संग्राम में सबसे गंभीर उंगली कार्यपालक पदाधिकारी (EO) की कार्यशैली पर उठ रही है। एक प्रशासनिक अधिकारी का मूल दायित्व सरकारी धन की सुरक्षा और नियमों का पालन सुनिश्चित करना होता है, लेकिन यहाँ EO अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह ‘फेल्योर’ साबित हुए हैं। हाई मास्ट लाइटों का दिन में जलना और बिना वर्क ऑर्डर के सड़कों का तोड़ा जाना जैसी घटनाएं उनके नाक के नीचे होती रहीं, लेकिन उन्होंने कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। पार्षदों का आरोप है कि EO केवल रबर स्टैंप बनकर रह गए हैं और मुख्य पार्षद की मनमानियों को रोकने के बजाय उन्हें मूक सहमति दे रहे हैं। वित्तीय गबन की शिकायतों के बाद भी संवेदकों के भुगतानों पर रोक न लगाना और भ्रष्टाचार की फाइलों पर कुंडली मारकर बैठना यह दर्शाता है कि प्रशासन की पारदर्शिता शून्य हो चुकी है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि पद की गरिमा के साथ भी बड़ा खिलवाड़ है, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाड़ियों के हौसले बुलंद कर दिए हैं।

लोकतंत्र की शुचिता पर ‘अविश्वास’ का दाग
सकरा नगर पंचायत का वर्तमान परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि यहाँ विकास की योजनाएँ केवल कागजों और कमीशनों तक सीमित रह गई हैं। एक ओर जहाँ हाई मास्ट लाइटों का दिन में जलना और डस्टबिनों की बदहाली वित्तीय गबन का प्रत्यक्ष प्रमाण दे रही है, वहीं दूसरी ओर बिना वर्क ऑर्डर के सड़कों का ध्वस्तीकरण और अवैध बहाली के आरोप प्रशासनिक अराजकता की पराकाष्ठा है।
मुख्य पार्षद के विरुद्ध पार्षदों का एकजुट होना और ‘हमाम में सब नंगे’ जैसी चर्चाएं यह संकेत देती हैं कि संस्था के भीतर पारदर्शिता और आपसी विश्वास पूरी तरह खत्म हो चुका है। मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी तक पहुँचे ये पत्रांक महज शिकायतें नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक संस्था के विफल होने की चेतावनी हैं। यदि इस मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच नहीं की गई और दोषियों पर सख्त कार्रवाई (FIR) नहीं हुई, तो सरकारी खजाने की लूट का यह ‘सकरा मॉडल’ अन्य निकायों के लिए एक गलत नजीर बन जाएगा। अंततः, इस सत्ता संघर्ष और भ्रष्टाचार के खेल में सबसे बड़ा नुकसान सकरा की आम जनता का हो रहा है, जो टैक्स देने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं और ईमानदारी के शासन के लिए तरस रही है।



