एस.एस.कुमार ‘पंकज’
समीक्षा प्रकाशन से प्रकाशित हो रही है लेखक की 17वीं कृति; बज्जिका भाषा के गौरव को पुनर्जीवित करने का प्रयास
पटना/मुजफ्फरपुर। साहित्य और संस्कृति के संगम से उपजी लोकगाथाएं जब महाकाव्य का रूप लेती हैं, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास बन जाती है। इसी कड़ी में, सुप्रसिद्ध साहित्यकार हरि विलास राय की बहुप्रतीक्षित कालजयी कृति ‘बसावन-बख्तौर (बज्जिका महाकाव्य)‘ शीघ्र ही पाठकों के बीच आ रही है। समीक्षा प्रकाशन (दिल्ली/मुजफ्फरपुर) द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक न केवल बज्जिका भाषा के साहित्य को समृद्ध करेगी, बल्कि समाज के उन लोकनायकों की वीरता को भी स्वर देगी, जिन्होंने सदियों से जनमानस के हृदय में ‘लोक देवता’ के रूप में स्थान बना रखा है।

लोक देवता से महाकाव्य तक का सफर
लेखक हरि विलास राय का लोकनायकों के प्रति अनुराग किसी से छिपा नहीं है। यह उनकी 17वीं कृति है। इससे पूर्व भी उन्होंने बाबा बसावन और बाबा बख्तौर के शौर्य को अपनी लेखनी के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। उनकी पूर्व प्रकाशित कृतियों में बज्जिका नाटक ‘लोक देवता बाबा बसावन‘ और ‘लोक देवता बाबा बख्तौर‘ को पाठकों ने खूब सराहा था। वहीं, हिंदी में रचित ‘बसावन बख्तौर चरित मानस‘ ने तो लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे।
हिन्दी कृति की अपार सफलता के बाद, बज्जिका क्षेत्र के पाठकों और मातृभाषा प्रेमियों की ओर से निरंतर यह मांग उठ रही थी कि इन लोक देवताओं की वीरगाथा को उनकी अपनी मिट्टी की बोली—’बज्जिका’ में महाकाव्य के रूप में पिरोया जाए। जनभावनाओं का सम्मान करते हुए, हरि विलास राय ने अपनी लेखनी से इस ‘बसावन बख्तौर बज्जिका महाकाव्य’ का सृजन किया है।

कौन थे बसावन, बखतौर और शक्तिरूपा माता गहिल ?
बज्जिका क्षेत्र के लोक-साहित्य और जनमानस में बाबा बसावन और बाबा बखतौर का नाम केवल वीरों के रूप में नहीं, बल्कि शोषितों के रक्षक ‘लोक देवता’ के रूप में अंकित है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, बाबा बसावन का अवतार वैशाली के पानापुर लंगा ग्राम में यादव कुल की माता बहुरा की कोख से तब हुआ था, जब सामंती शक्तियों द्वारा निर्बलों का शोषण चरम पर था. वे प्राचीन इतिहास के ऐसे प्रथम पुरुष माने जाते हैं जिन्होंने हलवाहों और चरवाहों को संगठित कर एक विशाल सेना तैयार की और अत्याचारी राजा दलेल सिंह की गोगरी जेल पर चढ़ाई कर न केवल अपने भाई संतोषी को छुड़ाया, बल्कि 700 कैदियों को दासता से मुक्त कराया. उनकी वीरता का लोहा मानकर अंततः सामंतों को उनके समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा. बसावन और बख्तौर केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक ‘चरवाहा संस्कृति’ के रक्षक और संगीत प्रेमी भी थे। हाथ में बांसुरी और मन में क्रांति की ज्वाला लिए इन वीरों ने ‘भुइयां संघ’ बनाकर शोषितों, दलितों, पिछड़ों और पशुपालकों को एकजुट किया।

इसी शौर्य परंपरा की दूसरी कड़ी बाबा बखतौर हैं, जिनका जन्म सहरसा जिले के गढ़िया रसलपुर (नोला पंचायत) में हुआ था. बाबा बसावन और बखतौर, दोनों ही अदम्य साहसी, स्वाभिमानी और पशुपालक संस्कृति के अनन्य उपासक थे. इन दोनों वीरों की अटूट श्रद्धा माता गहिल में थी, जो उनकी कुलदेवी थीं. माता गहिल को ‘आदिशक्ति जगदम्बा’ का रूप माना जाता है, जिन्हें लोक में ‘सहस्र चंडी’ या ‘गहिलवार’ के रूप में पूजा जाता है. आज भी पानापुर लंगा में बाबा बसावन, बाबा बखतौर और माता गहिल की प्रतिमाएं एक साथ स्थापित हैं, जहाँ भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए दुग्धाभिषेक करते हैं. यह स्थान आज भी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और अटूट लोक-आस्था के ‘सिद्धि-पीठ’ के रूप में जीवंत है.
महाकाव्य में वर्णन है कि कैसे इन नायकों ने तत्कालीन अत्याचारी शासकों और जनपदीय सामंत दलेल सिंह के दमनकारी चक्र को चुनौती दी। यह पुस्तक उस कालखंड का सजीव चित्रण करती है जब समाज का एक बड़ा वर्ग अपनी रक्षा के लिए किसी त्राता की राह देख रहा था।

कृति की विशेषताएं: एक सांस्कृतिक दस्तावेज
डॉ. शत्रुघ्न राय ‘शशांक’ ने पुस्तक की समीक्षा में इसे “संस्कृति का दस्तावेज और बसावन-बख्तौर के चरित का दर्पण” बताया है। पुस्तक की भाषा में वह ओज और माधुर्य है जो पाठक को सीधे उस युग से जोड़ देता है।
- कला और शौर्य का संगम: नायकों को तेजस्वी रूप में दिखाया गया है, जिनके साथ बाघ और धर्मध्वजा उनकी शक्ति और शुचिता के प्रतीक हैं।
- विस्तृत रचना संसार: हरि विलास राय की लेखनी का विस्तार ‘सती सुलोचना’ से लेकर ‘वज्जिकामृत’ और ‘अंगार के फूल’ जैसी विधाओं तक फैला हुआ है।
- प्रेरणा का स्रोत: यह महाकाव्य कबीर के सिद्धांतों की तरह ही समाज को एक नई दिशा दिखाने का सामर्थ्य रखता है।
लेखक परिचय: कलम के धनी हरि विलास राय
वैशाली जिले के हाजीपुर सदर (ग्राम-नैनहा) के मूल निवासी हरि विलास राय (जन्म: 07.05.1946) ने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य की सेवा में समर्पित कर दिया है। पिता स्व. सीताराम राय और माता स्व. धनपति देवी के संस्कारों को आत्मसात कर उन्होंने बज्जिका और हिन्दी साहित्य को कई अनमोल रत्न दिए हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों की सूची लंबी है, जिसमें ‘राजर्षि मोरध्वज’, ‘भक्ति-सरिता’, और ‘संस्मरण के आईने में’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं।

बहुआयामी रचना संसार: सत्रह कृतियों के शिल्पी
हरि विलास राय का साहित्यिक सफर केवल लोकगाथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने विविध विधाओं में अपनी लेखनी का लोहा मनवाया है। उनकी सत्रहवीं कृति के रूप में ‘बसावन-बख्तौर’ महाकाव्य के आगमन से पूर्व उनकी 16 अन्य पुस्तकें साहित्य जगत को समृद्ध कर चुकी हैं। उनके रचना संसार में ‘सती सुलोचना‘ (प्रबंध काव्य), ‘वज्जिकामृत‘ (काव्य संग्रह) और ‘बंजारन‘ (कहानी संग्रह) जैसी महत्वपूर्ण बज्जिका रचनाएँ शामिल हैं। वहीं हिंदी साहित्य में उन्होंने ‘राजर्षि मोरध्वज‘ (खंड काव्य), ‘अंगार के फूल‘ (काव्य संग्रह), ‘भक्ति-सरिता‘ जैसी कालजयी कृतियों का सृजन किया है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री स्व. दीप नारायण सिंह के व्यक्तित्व पर ‘संस्मरण के आईने में‘ लिखकर अपनी गद्य क्षमता का भी परिचय दिया है। उनकी कृतियों की यह विस्तृत सूची दर्शाती है कि वे समाज, संस्कृति और लोक-आस्था के एक गंभीर अध्येता और साधक हैं।

साहित्यकारों में उत्साह
समीक्षा प्रकाशन के इस प्रयास की साहित्य जगत में चौतरफा प्रशंसा हो रही है। विद्वानों का मानना है कि क्षेत्रीय भाषाओं में ऐसे उच्च स्तरीय महाकाव्यों के आने से नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सकेगी। बसावन-बख्तौर का चरित्र आज के युवाओं के लिए भी प्रासंगिक है, जो स्वाभिमान और न्याय के लिए लड़ने की प्रेरणा देता है।
यह पुस्तक जल्द ही प्रमुख पुस्तक केंद्रों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगी। बज्जिका भाषी समाज के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है जब उनके अपने नायकों की गाथा एक ‘महाकाव्य’ के रूप में प्रतिष्ठित होने जा रही है।






