एस.एस.कुमार ‘पंकज’
मुजफ्फरपुर/दरभंगा: उत्तर बिहार की हृदयस्थली कहे जाने वाले दो प्रमुख जिलों—मुजफ्फरपुर और दरभंगा—के बीच सीधी रेल सेवा का सपना अब साकार होने के करीब है। वर्ष 2025 में इस परियोजना का फाइनल लोकेशन सर्वे (FLS) पूरा होना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस सर्वे के साथ ही एक ऐसा ऐतिहासिक और तकनीकी तथ्य उभरकर सामने आया है जो रेल मंत्रालय के बजट को 50 से 60 प्रतिशत तक कम कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेलवे प्रशासन मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर रेलखंड पर स्थित सिलौत स्टेशन से आजादी के पूर्व चलने वाली ‘सिलौत-आथर-बिन्दा‘ रेल लाइन को पुनर्जीवित करता है और उसके आगे ‘पुरानी दरभंगा रोड‘ की खाली जमीन का उपयोग करता है, तो यह परियोजना न केवल किफायती होगी बल्कि मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच सीधी रेल सेवा की सबसे बड़ी समस्या ‘भूमि अधिग्रहण’ का स्थायी समाधान भी हो जाएगा ।

परियोजना की सफलता की कुंजी: सिलौत-आथर-बिन्दा मार्ग का पुनरुद्धार
इस पूरी परियोजना की सफलता की कुंजी सिलौत से निकलने वाली पुरानी रेल लाइन में छिपी है। ऐतिहासिक और राजस्व रिकॉर्ड (मुजफ्फरपुर गजेटियर) इसकी पुष्टि करते हैं कि रेलवे के पास यहाँ पहले से ही एक मजबूत आधार मौजूद है।

- 14 किलोमीटर का तैयार गलियारा: सिलौत स्टेशन से बोचहां ब्लॉक के आथर-बिन्दा गांव तक लगभग 14 किलोमीटर रेल भूमि आज भी रेलवे के नाम पर चर्चा में है।
- शून्य अधिग्रहण लागत: मुजफ्फरपुर से सिलौत (12 किमी) तक ट्रैक चालू है। यदि सिलौत से आथर तक की 14 किमी पुरानी जमीन को जोड़ दिया जाए, तो कुल 26 किमी का मार्ग लगभग बिना किसी अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण के तैयार हो जाएगा।
- विवाद रहित निर्माण: नई जमीन खरीदने पर जहाँ कोर्ट-कचहरी और मुआवजे के विवादों में साल बीत जाते हैं, वहीं अपनी ही जमीन पर रेलवे तत्काल कार्य शुरू कर सकता है।

पुरानी दरभंगा रोड: लागत घटाने का ‘ब्रह्मास्त्र‘
आथर से आगे की राह और भी आसान हो सकती है यदि रेलवे ‘पुरानी दरभंगा रोड’ की जमीन के विकल्प पर विचार करे। यह इस परियोजना के लिए सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सुझाव है।
- सरकारी जमीन का सदुपयोग: आथर एवं आथर से आगे बखरी होते हुए पुरानी दरभंगा रोड की जमीन कई किलोमीटर तक बेकार पड़ी है। यह जमीन वर्तमान में एक साधारण सड़क के रूप में उपयोग हो रही है या उपेक्षित है।
- मैठी टोल प्लाजा तक कनेक्टिविटी: यह सड़क मार्ग आथर से होते हुए सीधे मैठी टोल प्लाजा के पास तक जाता है। यदि इस अलाइनमेंट पर रेल ट्रैक बिछाया जाता है, तो निजी भूमि के अधिग्रहण की आवश्यकता न्यूनतम हो जाएगी।
- 50% तक रह जाएगी लागत: विशेषज्ञों का अनुमान है कि केवल सिलौत-आथर बिन्दा मार्ग के उपयोग से, भूमि मुआवजे पर होने वाला खर्च इतना कम हो जाएगा कि परियोजना की कुल लागत अपनी मूल अनुमानित राशि की महज 50 से 60 प्रतिशत रह जाएगी।

यह विकल्प मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई लाइन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच सीधी रेल लाइन का निर्माण एक “इंजीनियरिंग चुनौती” से अधिक “भूमि अधिग्रहण चुनौती” है। यह विकल्प तीन कारणों से महत्वपूर्ण है:
- आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability): रेलवे के पास सीमित बजट होता है। लागत आधी होने से इस प्रोजेक्ट को रेलवे बोर्ड से तत्काल मंजूरी और फंड मिलना आसान हो जाएगा।
- समय की बचत: बिहार में नई जमीन अधिग्रहित करने में औसतन 5 से 10 साल लग जाते हैं। सरकारी और पुरानी रेलवे जमीन मिलने से यह प्रोजेक्ट 3 साल के भीतर धरातल पर उतर सकता है।
- विस्थापन का अभाव: नई लाइन बिछाने के लिए घनी आबादी वाले गांवों को उजाड़ना पड़ता है। पुरानी रोड और रेल मार्ग का उपयोग करने से लोगों के घर और उपजाऊ खेत कम-से-कम प्रभावित होंगे।

आथर : मुजफ्फरपुर में औद्योगिक क्रांति की जननी थी यह जमीन
इस मार्ग का इतिहास भारत के औद्योगिक उदय से जुड़ा है। 1836 में बोचहां के विशुनपुर जगदीशपुर (आथर) में अंग्रेज उद्योगपति आर्थर और बटलर ने एक विशाल इकाई लगाई थी।
- तिरहुत रेल का हिस्सा: 1904-1905 इस्वी में सिलौत-आथर मार्ग के विस्तार की चर्चा मिलती है। उस समय उत्तर पश्चिम बंगाल रेलवे ने यहाँ नील और चीनी की ढुलाई के लिए पटरियाँ बिछाई थीं।
- भारत वैगन की नींव: आज का ‘भारत वैगन’ (मुजफ्फरपुर) असल में आथर की ही फैक्ट्री का विस्तार है जिसे 1877 में शिफ्ट किया गया था। इस मार्ग को पुनर्जीवित करना उस गौरवशाली इतिहास को सम्मान देना होगा।

प्रस्तावित स्टेशनों का ढांचा और विकास की उम्मीद
नई प्रस्तावित लाइन (लगभग 60 से 67 किमी) पर पड़ने वाले स्टेशनों का महत्व इस मार्ग के पुनरुद्धार एवं बदलाव से कई गुना बढ़ जाएगा:
| स्टेशन का नाम | जिला | महत्व और वर्तमान स्थिति |
| मुजफ्फरपुर जंक्शन | मुजफ्फरपुर | उत्तर बिहार का सबसे बड़ा जंक्शन |
| सिलौत | मुजफ्फरपुर | जंक्शन पॉइंट जहाँ से आथर लाइन अलग होगी |
| आथर/बखरी | मुजफ्फरपुर | ऐतिहासिक औद्योगिक केंद्र, पुरानी रोड का मिलन स्थल, आगे अन्य विकल्प |
| विद्यारोज/घोसरम्मा | मुजफ्फरपुर | कृषि उपज का बड़ा केंद्र |
| माधोपुर पंडौल | सीमावर्ती | मुजफ्फरपुर-दरभंगा का व्यापारिक बॉर्डर |
| डिलाही/पंडासराय | दरभंगा | लहेरियासराय कोर्ट और स्वास्थ्य केंद्र से जुड़ाव |

‘टापू‘ बन चुके गांवों को नई संजीवनी
आथर और बखरी जैसे गांव जो वर्तमान में बूढ़ी गंडक और खराब सड़क तंत्र के कारण विकास की दौड़ में पिछड़ गए हैं, उनके लिए यह रेल मार्ग एक वरदान होगा। पुरानी दरभंगा रोड की जमीन का उपयोग करने से बखरी और मैठी के आसपास एक नया ‘लॉजिस्टिक हब‘ विकसित हो सकता है।
- लघु उद्योगों की वापसी: पुरानी रेल जमीन के किनारे फिर से लघु उद्योगों की स्थापना हो सकती है।
- सस्ता माल परिवहन: व्यापारियों के लिए मुजफ्फरपुर और दरभंगा के बीच माल भेजना 40% तक सस्ता हो जाएगा।

राजनीतिक इतिहास और वर्तमान उम्मीदें
इस रेल मार्ग के लिए संघर्ष दशकों पुराना है।
- 2008 का वादा: तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने सिंहवाड़ा में इसकी आधारशिला रखी थी, लेकिन पर्याप्त बजट और सटीक सर्वे के अभाव में वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
- 2023-25 का एक्शन मोड: वर्ष 2023 के बजट में पहली बार इसके लिए 20 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। अब FLS का पूरा होना यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार इस बार इसे धरातल पर उतारने के लिए गंभीर है।

सरकार के पास ऐतिहासिक अवसर : सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग और पुरानी दरभंगा रोड के हिस्से में छिपा है ‘कॉस्ट-कटिंग‘ का फॉर्मूला
मुजफ्फरपुर-दरभंगा नई रेल लाइन महज एक रेल पटरी नहीं, बल्कि उत्तर बिहार के खोए हुए औद्योगिक गौरव की वापसी है। यह स्पष्ट है कि सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग को पुनर्जीवित करना न केवल ऐतिहासिक न्याय होगा, बल्कि यह इस प्रोजेक्ट को ‘इकोनॉमिकली वायबल‘ (आर्थिक रूप से व्यावहारिक) बनाने का एकमात्र तार्किक रास्ता है । आथर से बखरी एवं मैठी तक पुरानी दरभंगा रोड की अनुपयोगी जमीन को इसमें शामिल करने का विकल्प, इस प्रोजेक्ट को सफल बनाने का एक महत्वपूर्ण बिन्दु बन सकता है ।

रेल मंत्रालय सिलौत-आथर-बिन्दा रेल मार्ग की अपनी 14 किलोमीटर पुरानी जमीन को ढूंढ निकालता है, तो बजट में अरबों की बचत होगी और निर्माण कार्य में लगने वाला समय भी काफी कम हो जाएगा। आने वाले समय में रेल मंत्रालय अपनी 14 किलोमीटर पुरानी जमीन और राज्य सरकार की अनुपयोगी सड़क की भूमि को चिन्हित कर ले, तो बजट में अरबों की बचत होगी। अब गेंद केंद्र और राज्य सरकार के पाले में है—क्या वे महंगे अधिग्रहण की ओर जाएंगे या अपनी ही पुरानी विरासत का हाथ थामकर लागत को आधा करेंगे?



