सरायरंजन, समस्तीपुर (03 फरवरी, 2026):

समस्तीपुर जिले के सरायरंजन प्रखंड अंतर्गत खालिसपुर गांव की अल्पसंख्यक बस्ती में आज एक नई उम्मीद की किरण देखी गई। यहाँ बीड़ी निर्माण कार्य में लगे श्रमिक परिवारों की महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार से जोड़ने के लिए संचालित सिलाई प्रशिक्षण केंद्र का जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव, सुरेंद्र कुमार ने औचक निरीक्षण किया।

सिलाई प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रही महिलायें

इस दौरान उन्होंने प्रशिक्षण ले रही महिलाओं और किशोरियों से बातचीत की और उनके द्वारा बनाए जा रहे कपड़ों की बारीकियों को समझा। इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य उन परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है जो पीढ़ियों से बीड़ी बनाने के जोखिम भरे कार्य में लगे हैं।

अखबार के जरिए सीखी जा रही है कटिंग की बारीकियां

निरीक्षण के दौरान यह दिलचस्प नजारा देखने को मिला कि सीखने वाली महिलाएं सीधे कपड़े पर कैंची चलाने के बजाय पहले समाचार पत्रों (अखबारों) का उपयोग कर रही हैं। प्रशिक्षिका ने बताया कि अखबार पर कटिंग का अभ्यास करने से कपड़े की बर्बादी नहीं होती और महिलाएं निडर होकर सही माप और आकार काटना सीख पाती हैं। चित्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि महिलाएं जमीन पर बैठकर पूरी एकाग्रता के साथ अखबारों को कपड़ों के पैटर्न के रूप में काट रही हैं।

सिलाई प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रही महिलायें

ट्रेनिंग में सिखाई जा रही हैं तकनीकी बारीकियां

प्रशिक्षण के दौरान महिला ट्रेनर ने महिलाओं को सिलाई की गहरी तकनीकी जानकारी साझा की। प्रशिक्षण में ‘कली’ और ‘नेफा’ जोड़ने की प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया जा रहा है:

  • सटीक माप: प्रशिक्षिका ने बताया कि कमर की पट्टी काटने के बाद कली को साढ़े पांच इंच (5.5″) पर काटा जा रहा है।
  • नेफा जोड़ने का सही तरीका: ट्रेनर ने समझाया कि नेफा हमेशा उल्टी पट्टी (उल्टा हिस्सा) की तरफ से जोड़ा जाता है, ताकि उसे पलटने पर वह बिल्कुल सीधा और फिनिशिंग के साथ नजर आए। यदि इसे सीधे में जोड़ा जाए तो वह उल्टा हो जाएगा।
  • कुर्ती निर्माण की प्रक्रिया: सिलाई को अंतिम रूप देने के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि पहले बाजू (आस्तीन) बनाई जाती है, फिर घेरा लगाया जाता है और अंत में गोलाई के साथ मोड़कर कुर्ती तैयार की जाती है।

वैकल्पिक रोजगार से बदलेगी तस्वीर

निरीक्षण के बाद जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव सुरेंद्र कुमार ने कहा, “बीड़ी श्रमिक परिवारों की महिलाओं के पास कौशल की कमी नहीं है, बस उन्हें सही दिशा देने की जरूरत है। सिलाई प्रशिक्षण से ये महिलाएं न केवल अपने परिवार के कपड़े खुद सिल सकेंगी, बल्कि बाजार से जुड़कर अपनी आय का एक नया और सम्मानजनक जरिया भी बना सकेंगी।”

मौके पर मौजूद प्रशिक्षुओं में भारी उत्साह देखा गया। उनका मानना है कि बीड़ी बनाने के काम में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम अधिक हैं, ऐसे में सिलाई एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प है।

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