मुजफ्फरपुर/समस्तीपुर। संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की 649वीं जयंती के शुभ अवसर पर उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों में वैचारिक पुनर्जागरण की एक नई लहर देखने को मिली। इस अवसर पर प्रखर वक्ता और समाजसेवी डॉ. राजेश कुमार ने मुजफ्फरपुर के सकरा और तुर्की प्रखंड सहित समस्तीपुर जिले के नाजीरगंज और हाजीपुर के विभिन्न क्षेत्रों में सघन दौरा किया। उन्होंने न केवल गुरु रविदास जी को नमन किया, बल्कि कला, झांकी और गीतों के माध्यम से समाज को उनके गौरवशाली किंतु संघर्षपूर्ण इतिहास से रूबरू कराया।

इतिहास का जीवंत चित्रण: “क्यों बांधा गया कमर में झाड़ू?”
आयोजन के दौरान डॉ. राजेश ने एक विशेष झांकी प्रस्तुत की, जो वहां मौजूद जनसमूह के लिए आकर्षण और आत्मचिंतन का केंद्र बनी रही। उन्होंने अत्यंत भावुक और तार्किक ढंग से उन कुरीतियों की व्याख्या की, जो सदियों पहले उनके पूर्वजों पर थोपी गई थीं:
- गले में हांडी (कटिया): उन्होंने बताया कि एक समय था जब तथाकथित अछूत माने जाने वाले लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर थूकने तक की अनुमति नहीं थी, उन्हें गले में बर्तन (कटिया) लटकाना पड़ता था।
- कमर में झाड़ू: मार्ग पर चलते समय पैरों के निशान मिटाने के लिए कमर में झाड़ू बांधनी पड़ती थी, ताकि धरती “अपवित्र” न हो।
- पैरों में घुंघरू: डॉ. राजेश ने समझाया कि पैरों में घुंघरू इसलिए बांधे गए थे ताकि उनकी आहट सुनकर “उच्च वर्ग” के लोग अपना रास्ता बदल लें और उनकी छाया से बच सकें।
इस कला प्रदर्शन का उद्देश्य समाज को यह अहसास दिलाना था कि आज वे जिस आजादी और सम्मान की सांस ले रहे हैं, उसके पीछे उनके पूर्वजों का कितना बड़ा बलिदान और अपमान रहा है।
शिक्षा: विकास की एकमात्र कुंजी
डॉ. राजेश कुमार ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रसिद्ध मूलमंत्र— “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो”—पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि गुलामी की बेड़ियों को काटने का एकमात्र हथियार “शिक्षा” है।
उन्होंने डॉ. अंबेडकर के शब्दों को दोहराते हुए कहा, “शिक्षा उस शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा, वह दहाड़ेगा”। उन्होंने समाज के हर वर्ग, विशेषकर वंचित समाज से अपील की कि वे अपने बच्चों की शिक्षा के साथ किसी भी कीमत पर समझौता न करें।

नारा: “आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे”
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बच्चों और अभिभावकों में जोश भरते हुए प्रेरक नारे लगवाए। उन्होंने कहा, “नोन-रोटी खाएंगे, फिर भी स्कूल जाएंगे” और “आधी रोटी खाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे”। डॉ. राजेश का स्पष्ट संदेश था कि यदि समाज को देश और दुनिया के मुख्यधारा में शामिल होना है, तो उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को उच्च शिक्षा से लैस करना ही होगा।
सांस्कृतिक और वैचारिक समागम
तस्वीरों में देखा जा सकता है कि मंच पर पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे ढोलक और तबले के साथ स्थानीय कलाकारों ने भक्ति और वैचारिक गीतों की प्रस्तुति दी। डॉ. राजेश खुद एक हाथ में लाठी और गले में प्रतीकात्मक ‘कटिया’ लेकर मंच पर खड़े होकर समाज को जागृत करते नजर आए।
यह कार्यक्रम केवल एक जयंती समारोह न रहकर, एक वैचारिक पाठशाला बन गया, जिसने लोगों को अपने अतीत पर गर्व करने और भविष्य को शिक्षा के माध्यम से उज्ज्वल बनाने की प्रेरणा दी।




