जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र और ‘क्राई‘ ने बजट का किया त्वरित विश्लेषण; जीडीपी में बाल बजट की हिस्सेदारी अभी भी 0.34 प्रतिशत पर सिमटी
समस्तीपुर/पटना | 02 फरवरी, 2026 केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए आम बजट 2026-27 पर बच्चों के अधिकारों के लिए समर्पित संस्थाओं ने अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दी है। समस्तीपुर में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए पिछले 30 वर्षों से सक्रिय संस्था जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र और राष्ट्रीय संस्था चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) ने बजट को एक ‘सकारात्मक संकेत’ तो बताया है, लेकिन साथ ही निवेश की गति पर सवाल भी उठाए हैं।

आंकड़ों की जुबानी: बढ़ोतरी तो हुई पर क्या है पर्याप्त?
संस्था द्वारा किए गए बजट विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2026-27 के लिए बच्चों से संबंधित कुल आवंटन 1,32,296.85 करोड़ रुपये रहा है। यदि इसकी तुलना पिछले वित्त वर्ष (2025-26) के 1,16,132.5 करोड़ रुपये से की जाए, तो इसमें 16,164.35 करोड़ रुपये की सीधी वृद्धि देखी गई है।
जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के सचिव सुरेंद्र कुमार ने बजट पर चर्चा करते हुए कहा, “आंकड़ों में बढ़ोतरी स्पष्ट है, लेकिन यह विकास के बड़े बदलाव के बजाय क्रमिक प्रगति (Incremental Progress) का संकेत देती है। कुल केंद्रीय बजट में बच्चों की हिस्सेदारी अब भी मात्र 2.47 प्रतिशत है, जबकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बच्चे हैं। भारत सरकार की स्पष्ट दृष्टि सराहनीय है, लेकिन प्राथमिकताएं अभी भी सीमित दायरे में हैं।”
स्वास्थ्य और पोषण: ‘जल जीवन‘ की वापसी और पोषण 2.0 का सहारा
इस बजट में बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को लेकर कुछ ठोस कदम उठाए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ‘जल जीवन मिशन‘ को फिर से बाल बजट का हिस्सा बनाया गया है, जिसके लिए 6,736.36 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छ पेयजल सीधे तौर पर बच्चों की मृत्यु दर को कम करने और उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होगा।

वहीं, सरकार की प्रमुख योजना ‘सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0′ के बजट में 5.19 प्रतिशत की वृद्धि कर इसे 19,635 करोड़ रुपये कर दिया गया है। ‘पीएम पोषण शक्ति निर्माण योजना‘ (मिड-डे मील) को भी 2 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 12,749.99 करोड़ रुपये मिले हैं। इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों में कुपोषण की समस्या को जड़ से मिटाना है।
शिक्षा और नवाचार: आदिवासी क्षेत्रों पर विशेष ध्यान
शिक्षा के क्षेत्र में इस बार मिश्रित रुझान देखने को मिला है। समग्र शिक्षा अभियान को 42,100 करोड़ रुपये का आवंटन मिला है, जो पिछले वर्ष से 2.06 प्रतिशत अधिक है। सबसे बड़ी राहत आदिवासी बच्चों के लिए आई है, जहां ‘एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों‘ के बजट में 20 प्रतिशत से अधिक की भारी बढ़ोतरी कर इसे 7,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
नवाचार के क्षेत्र में ‘अटल टिंकरिंग लैब्स‘ के लिए 3,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो सरकारी स्कूलों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। साथ ही, ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम को बाल बजट में शामिल करना ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (NEP) के लक्ष्यों के अनुरूप है।

हाशिए पर खड़े समुदायों की अनदेखी?
क्राई की सीईओ पूजा मारवाहा ने अपनी प्रतिक्रिया में संतुलित निवेश की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य और शिक्षा में बढ़ोतरी स्वागत योग्य है, लेकिन समावेशी विकास के लिए बच्चों को और अधिक स्पष्ट प्राथमिकता देनी होगी।”
बजट विश्लेषण में यह चिंता भी जताई गई है कि अनुसूचित जाति (SC) के बच्चों के लिए प्री और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्तियों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इसी तरह ओबीसी, ईबीसी और दिव्यांग बच्चों की छात्रवृत्तियों में भी नाममात्र का इजाफा हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक समानता पर केंद्रित योजनाओं को पर्याप्त संसाधन नहीं मिलेंगे, तब तक हाशिए पर रहने वाले बच्चों का मुख्यधारा में आना कठिन होगा।
दीर्घकालिक सोच की जरूरत : कुल मिलाकर, बाल बजट 2026-27 यह दर्शाता है कि सरकार बच्चों के प्रति संवेदनशील तो है, लेकिन निवेश के मामले में अभी भी “सुरक्षित” रास्ता अपना रही है। यदि भारत को अपनी ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) का लाभ उठाना है, तो आने वाले वर्षों में बाल बजट को जीडीपी के 1 प्रतिशत तक ले जाने और वित्तीय योजनाओं के केंद्र में बच्चों को मजबूती से रखने की आवश्यकता होगी।
बाल बजट 2026-27: मुख्य आंकड़ों का तुलनात्मक विवरण
नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष बच्चों के कल्याण के लिए आवंटित बजट में किस तरह का बदलाव आया है:
| योजना/क्षेत्र | बजट 2025-26 (अनुमान) | बजट 2026-27 (अनुमान) | वृद्धि (प्रतिशत/राशि) |
| कुल बाल बजट (Total Child Budget) | ₹1,16,132.50 करोड़ | ₹1,32,296.85 करोड़ | ₹16,164.35 करोड़ (↑) |
| बजट में कुल हिस्सेदारी | 2.29% | 2.47% | 0.18% की वृद्धि |
| सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 | ₹18,666 करोड़ | ₹19,635 करोड़ | 5.19% की वृद्धि |
| समग्र शिक्षा अभियान | ₹41,250 करोड़ | ₹42,100 करोड़ | 2.06% की वृद्धि |
| एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय | ₹6,000 करोड़ | ₹7,200 करोड़ | 20% की वृद्धि |
| पीएम पोषण (मिड-डे मील) | ₹12,500 करोड़ | ₹12,749.99 करोड़ | 2% की वृद्धि |
| अटल टिंकरिंग लैब्स | – | ₹3,200 करोड़ | नया बड़ा आवंटन |
| मिशन वात्सल्य | ₹1,500 करोड़ | ₹1,550 करोड़ | 3.33% की वृद्धि |
विशेषज्ञों की राय: ‘विकास की सुस्त रफ्तार‘
जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के अनुसार, बजट के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर कुछ महत्वपूर्ण बिंदु उभर कर सामने आते हैं:
- जीडीपी में मामूली बढ़त: बच्चों के लिए जीडीपी का आवंटन पिछले साल के 0.33% से बढ़कर इस साल 0.34% हुआ है। यह 0.01% की बढ़ोतरी दर्शाती है कि बच्चों पर निवेश अभी भी राष्ट्रीय प्राथमिकता की सूची में बहुत नीचे है।
- सुरक्षित पेयजल पर ध्यान: ‘जल जीवन मिशन’ के लिए ₹6,736.36 करोड़ का प्रावधान यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि बच्चों को पानी से होने वाली बीमारियों से बचाया जा सके।
- समानता का अभाव: विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि जहाँ एकलव्य विद्यालयों के लिए बजट बढ़ा है, वहीं अनुसूचित जाति और दिव्यांग बच्चों की छात्रवृत्ति योजनाओं में कोई खास हलचल नहीं हुई है।
अंतिम संदेश: सरकार ने कदम तो आगे बढ़ाए हैं, लेकिन बच्चों की वास्तविक जरूरतों को देखते हुए ये कदम अभी भी ‘छोटे’ हैं। टिकाऊ भविष्य के लिए ‘बाल बजट’ में बड़े और साहसी निवेश की आवश्यकता है।




