विशेष विश्लेषण |

वर्तमान भारतीय समाज में जब शिक्षा, योग्यता और सामाजिक न्याय को लेकर तीखी बहसें सुनाई देती हैं—विशेषकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जुड़े हालिया विमर्शों और आरक्षण की नीतियों में—तब यह अनिवार्य हो जाता है कि हम केवल वर्तमान के तात्कालिक और सतही प्रश्नों में उलझकर न रह जाएँ। आज योग्यता (Merit) बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व के संघर्ष में एक ऐसा शोर पैदा हो गया है, जिसमें इतिहास के वे मूल तथ्य दब गए हैं जहाँ से हमारी सामाजिक यात्रा शुरू हुई थी।

यह लेख किसी वैचारिक पक्ष में फैसला सुनाने के बजाय एक गंभीर आग्रह करता है कि हम उस ऐतिहासिक मार्ग को “जैसा है, वैसा ही” समझें, ताकि आज की चर्चा सही दिशा में आगे बढ़ सके।

विराट पुरुष का रूपक: विभाजन नहीं, संतुलन का प्रतीक

भारतीय समाज की संरचना को लेकर होने वाली चर्चाओं का केंद्र अक्सर ऋग्वेद के १०वें मंडल का ‘पुरुषसूक्त’ होता है। ऋग्वेद (10.90.12) में कहा गया है:

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्, बाहू राजन्यः कृतः, ऊरू तदस्य यद्वैश्यः, पद्भ्यां शूद्रो अजायत।

अर्थात्, विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से राजन्य (क्षत्रिय), जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। सदियों से इस सूक्त की व्याख्या ऊँच-नीच के पायदान के रूप में की गई, जिसने समाज को श्रेणियों में बाँटा। लेकिन यदि हम इसके मूल अर्थ की गहराई में जाएँ, तो यह विभाजन का नहीं, बल्कि ‘संतुलन’ का प्रतीक था।

वैदिक काल का यह रूपक समाज को एक जीवित शरीर की तरह देखता था। जिस तरह शरीर के जीवित रहने के लिए मुख (ज्ञान-प्रसार), भुजा (रक्षा), जंघा (आर्थिक मजबूती) और पैर (श्रम और आधार) की समान महत्ता है, उसी तरह समाज के हर वर्ग की अपनी विशिष्ट भूमिका थी। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह वर्णन प्रतीकात्मक और कार्यात्मक था, न कि जैविक या जन्मगत। इस सूक्त में कहीं भी यह उल्लेख नहीं मिलता कि व्यक्ति जन्म से ही किसी श्रेणी में जकड़ा हुआ है। यह समाज की एक कार्यात्मक व्यवस्था थी, जहाँ हर अंग का सम्मान बराबर था क्योंकि एक भी अंग के बिना ‘विराट पुरुष’ यानी समाज पूर्ण नहीं हो सकता था।


एक घर, अनेक कर्म: जब हुनर से तय होती थी कुल की पहचान

वैदिक समाज के वास्तविक जीवन को समझने के लिए ऋग्वेद (9.112.3) का एक अत्यंत सहज और क्रांतिकारी संदर्भ मिलता है। यहाँ एक व्यक्ति कहता है:

मैं खेती करता हूँ। मेरी बहन गीत गाती है, मेरी माँ आटा पीसती है और मेरे पिता कोई अन्य कार्य करते हैं।”

यह मंत्र उस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है कि वैदिक काल में जाति एक बंद और जड़ व्यवस्था थी। यह दैनिक जीवन का चित्र स्पष्ट करता है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार के सदस्य अलग-अलग व्यवसायों में संलग्न थे। यहाँ सामाजिक पहचान ‘कुल’ या ‘जन्म’ से नहीं, बल्कि ‘हुनर’ और ‘कर्म’ से तय होती थी।

इस काल में योग्यता का पैमाना लचीला था। व्यक्ति सीख सकता था, अपनी क्षमता बढ़ा सकता था और अपनी सामाजिक भूमिका बदल सकता था। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ योग्यता (Merit) जन्म का मोहताज नहीं थी। यदि आज हम यूजीसी और उच्च शिक्षा में योग्यता की बात करते हैं, तो हमें याद करना होगा कि हमारे पूर्वजों ने योग्यता को किसी एक कुल की बपौती नहीं माना था।

इतिहास की फिसलन: कैसे लचीला समाज जड़ता की बेड़ियों में जकड़ा गया

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि शुरुआती समाज इतना गतिशील था, तो वह आज के जातिगत ढाँचे में कैसे बदला? यह एक ‘ऐतिहासिक फिसलन’ थी जो कई चरणों में पूरी हुई।

  1. स्मृति और धर्मसूत्रों का काल: उपनिषदों के बाद जैसे-जैसे समाज जटिल हुआ, कार्य-विभाजन को संहिताबद्ध करने की कोशिशें शुरू हुईं। यहाँ से ‘जन्म’ का महत्त्व बढ़ने लगा और व्यवसायों को वंशानुगत बनाने के नियम कड़े किए गए।
  2. सत्ता और नियंत्रण: मध्यकाल तक आते-आते यह विभाजन केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं रहा, बल्कि सत्ता और सामाजिक नियंत्रण का औज़ार बन गया। जातियों को ऊँच-नीच की सीढ़ियों में बाँट दिया गया ताकि संसाधनों पर एकाधिकार बना रहे।
  3. औपनिवेशिक प्रभाव: ब्रिटिश काल में जनगणना और प्रशासनिक वर्गीकरण ने इन भेदों को कानूनी जामा पहना दिया, जिससे समाज के वे खुले दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए जो वैदिक काल में खुले थे।

यही वह दौर था जब ‘विराट पुरुष’ का गतिशील शरीर जंजीरों से जकड़े हुए एक जड़ ढांचे में बदल गया, जहाँ पैरों को आधार नहीं बल्कि हीन समझा जाने लगा।

वर्तमान की चुनौती: चर्चा की सही शुरुआत और ऐतिहासिक सत्य का स्वीकार

आज जब हम सामाजिक न्याय, आरक्षण और योग्यता के मानकों पर बहस करते हैं, तो अक्सर हम इस इतिहास को भूल जाते हैं। वर्तमान की चुनौती यह नहीं है कि हम केवल आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में खड़े हों, बल्कि चुनौती यह है कि हम उस ‘लचीलेपन’ को पुनः प्राप्त करें जो हमारी जड़ों में था।

यूजीसी या शिक्षा नीति की बहसों में लगे बुद्धिजीवियों और नीति-निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस ऐतिहासिक यात्रा को समझें। सामाजिक न्याय केवल एक संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह उस प्राचीन व्यवस्था को पुनः प्राप्त करने का प्रयास है जहाँ व्यक्ति की उन्नति में उसका जन्म बाधा न बने।

यह लेख इसी बड़ी चर्चा की एक शुरुआती प्रवेशिका है। आज हमें यह स्वीकार करना होगा कि जिस व्यवस्था को हम ‘परंपरा’ कहकर बचाते या कोसते हैं, वह मूलतः वैसी नहीं थी। हमने रास्ते में कहीं न कहीं अपनी मूल दिशा खो दी है। जब तक हम यह नहीं समझते कि हम कहाँ से चले थे—जहाँ एक ही घर में किसान और विद्वान साथ रहते थे—तब तक हम एक समावेशी भविष्य का निर्माण नहीं कर पाएंगे।

, सामाजिक न्याय की बहस का अंत किसी को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि ‘विराट पुरुष’ के हर अंग को उसकी खोई हुई गरिमा वापस दिलाने में है। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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