कभी समाज ने सुनाई थी लानतें, अब सलाम करेगा बिहार; महादलित समुदाय की 6 बेटियां बनीं राज्य की पहली महिला बस ड्राइवर।

पटना | 25 जनवरी, 2026 बिहार के सामाजिक इतिहास में 26 जनवरी 2026 की तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने जा रही है। पटना का गांधी मैदान इस दिन न केवल गणतंत्र का उत्सव मनाएगा, बल्कि उस ‘इतिहास’ का गवाह भी बनेगा जिसे समाज के सबसे निचले पायदान से आने वाली छह जांबाज बेटियों ने अपने संघर्ष से गढ़ा है। आरती, रागिनी, अनीता, सावित्री, गायत्री और बेबी—मुसहर समुदाय की ये छह युवतियां बिहार की पहली महिला बस ड्राइवर के रूप में पिंक बस की कमान संभालकर परेड में अपना हुनर दिखाएंगी।

तस्‍वीर में एक साथ खड़ी 6 बेटियां , जो राज्य की पहली महिला बस ड्राइवर बन चुकी है

रूढ़ियों का गियर बदला, तानों को पीछे छोड़ा

इन लड़कियों का बस की स्टियरिंग तक पहुंचने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। अत्यंत निर्धन परिवारों से आने वाली इन बेटियों को सबसे पहले अपने ही समाज और आसपास के लोगों के तीखे कटाक्षों का सामना करना पड़ा।

पटना के पुनपुन की रहने वाली अनीता के लिए राहें तब और कठिन हो गईं जब उनके ससुराल तक ताने पहुंचने लगे। अनीता बताती हैं, लोग कहते थे कि बहू को इधर-उधर भेज देते हो, पता नहीं क्या करेगी। पुरुष मजाक उड़ाते थे कि हम बस नहीं संभाल पाते, यह लड़की 50 सवारी कैसे ढोएगी?” कुछ ऐसा ही दर्द रागिनी का भी था, जिन्हें शादी की उम्र और ‘भाग जाने’ जैसे ओछे तानों से डराया गया। बेबी को उनकी कम हाइट के लिए कमतर आंका गया, लेकिन आज उन्हीं के हाथ एक्सीलेटर पर हैं और हौसला आसमान पर।

जब सरकार को हार माननी पड़ी, तब इन बेटियों ने संभाली कमान

दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल जब ‘पिंक बस’ सेवा शुरू हुई, तो सरकार का संकल्प था कि इसमें सारा स्टाफ महिलाएं होंगी। कंडक्टर तो मिल गईं, लेकिन पूरे बिहार में बस चलाने के लिए एक भी महिला ड्राइवर नहीं मिली। मजबूरन पुरुष ड्राइवरों को रखा गया।

इस खाली जगह को भरने का बीड़ा उठाया पद्मश्री सुधा वर्गीज की संस्था ‘नारी गुंजन’ ने। उन्होंने महिला विकास निगम के साथ मिलकर इन लड़कियों को औरंगाबाद के IDTR संस्थान में प्रशिक्षण दिलाया। आज ये लड़कियां न केवल बस चला रही हैं, बल्कि परिवहन विभाग के लिए एक मिसाल बन गई हैं।

भविष्य की सारथी‘: सम्मान और रोजगार

परिवहन विभाग अब इन बेटियों के आत्मविश्वास को देखकर गदगद है। विभाग की नोडल अधिकारी ममता कुमारी की देखरेख में ये लड़कियां नियमित अभ्यास कर रही हैं।

  • वेतन और सुरक्षा: ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इन्हें 21 हजार रुपये प्रतिमाह का वेतन मिलेगा।
  • विस्तार: परिवहन मंत्री श्रवण कुमार के अनुसार, बिहार को फिलहाल 250 महिला ड्राइवरों की जरूरत है और सरकार अब इच्छुक महिलाओं को निशुल्क प्रशिक्षण देगी।
तस्‍वीर में बस की स्टियरिंग संभालती गायत्री

क्यों यह एक इतिहास है?

यह केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि एक ‘क्रांति’ है। मुसहर समुदाय, जिसे ‘महादलित’ श्रेणी में सबसे पिछड़ा माना जाता रहा है, वहां की बेटियों का बस चलाना लैंगिक और जातीय बेड़ियों को तोड़ने जैसा है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि अवसर मिले, तो ‘आधी आबादी’ का यह हिस्सा न केवल अपना घर, बल्कि पूरे राज्य की परिवहन व्यवस्था का चक्का घुमा सकता है।

जब 26 जनवरी को ये बेटियां गांधी मैदान की धूल उड़ाते हुए पिंक बस लेकर निकलेंगी, तो वह केवल एक परेड नहीं होगी, बल्कि उन तमाम रूढ़ियों की विदाई होगी जिन्होंने सदियों से इन लड़कियों को पीछे रोक रखा था।

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