विशेष रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर (सकरा) बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का सकरा प्रखंड इन दिनों पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। यहाँ की मिट्टी महज धूल नहीं, बल्कि 2500 साल पुराने गौरवशाली इतिहास के साक्ष्य उगल रही है। सकरा के तीन प्रमुख गांवों—गनियारी, पटसामा और कुतुबपुर—में बिखरे अवशेष चीख-चीखकर यह बता रहे हैं कि यहाँ कभी मौर्यकालीन और प्रारंभिक गुप्तकालीन सभ्यता की एक भव्य बस्ती हुआ करती थी। लेकिन विडंबना यह है कि जिसे दुनिया के सामने एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पेश किया जाना चाहिए था, वह आज उपेक्षा और अनभिज्ञता के कारण विनाश की कगार पर है।
आस्था के घेरे में दबा इतिहास: ‘यक्षिणी’ बनीं कुलदेवी
सकरा के गनियारी मध्य विद्यालय परिसर में इतिहास और आस्था का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है। विद्यालय निर्माण के समय जमीन की खुदाई के दौरान काले पत्थर की एक प्राचीन प्रतिमा मिली थी। पुरातत्व की समझ न होने के कारण स्थानीय ग्रामीणों ने इसे ईश्वरीय चमत्कार माना और श्रद्धावश एक पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया। आज लोग इसे ‘देवी’ मानकर पूज रहे हैं।

जब आरसी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. शांतनु सौरभ ने इस मूर्ति का सूक्ष्म अध्ययन किया, तो एक नया खुलासा हुआ। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों द्वारा पूजी जा रही यह प्रतिमा वास्तव में ‘यक्षिणी’ की है। प्राचीन भारतीय इतिहास में यक्ष-यक्षिणी को वैभव और प्रकृति का रक्षक माना जाता था। डॉ. सौरभ के अनुसार, ऐसी प्रतिमाओं का मिलना इस क्षेत्र में मौर्यकालीन धार्मिक प्रभाव की पुष्टि करता है। आस्था के कारण यह प्रतिमा बची तो हुई है, लेकिन खुले में रहने के कारण प्राकृतिक क्षरण का शिकार हो रही है।

पटसामा की ‘हल्की ईंटें’ और उन्नत तकनीक
कदाने नदी के किनारे स्थित पटसामा डीह (श्यामपुर डीह) प्राचीन स्थापत्य कला का जीवंत प्रमाण है। यहाँ खेतों की जुताई के दौरान ऐसी ईंटें निकलती हैं जो आकार में तो विशाल हैं, लेकिन वजन में आज की ईंटों से आधी हैं। इन ईंटों का रहस्य इनकी निर्माण तकनीक में छिपा है। मौर्यकाल में मिट्टी के साथ धान की भूसी, खरपतवार और विशेष प्रकार के अवशेष मिलाकर इन्हें पकाया जाता था, ताकि इमारतें भूकंपरोधी और हल्की बन सकें।

डेढ़ लाख वर्ग मीटर में फैले इस टीले के नीचे किसी विशाल राजप्रासाद या बौद्ध विहार के होने की संभावना प्रबल है। ग्रामीणों को अक्सर यहाँ से पत्थर की माला के मनके, प्राचीन सिलौटा और मिट्टी के पात्र (नाद) मिलते रहते हैं, जो एक समृद्ध व्यापारिक और घरेलू जीवन की ओर इशारा करते हैं।
कुतुबपुर डीह: 200 ईसा पूर्व की विकसित बस्ती
कुतुबपुर का ऐतिहासिक टीला लगभग दो लाख वर्ग मीटर के क्षेत्र को कवर करता है। यहाँ की भौगोलिक बनावट सामान्य भूमि से करीब तीन मीटर ऊंची है, जो किसी दबी हुई सभ्यता का स्पष्ट संकेत है। इस स्थल पर बिखरे हुए लाल और काले पॉलिश वाले मृदभांड (बर्तन) पुरातत्वविदों को 150 से 200 ईसा पूर्व के कालखंड में ले जाते हैं। यहाँ कभी दर्जनों प्राचीन कुएं हुआ करते थे, जो इस बात का प्रमाण थे कि यह एक सुनियोजित और सघन बस्ती थी। आज इनमें से अधिकांश कुएं और संरचनाएं मिट्टी के नीचे दम तोड़ चुकी हैं।

विरासत पर संकट: अनजाने में हम मिटा रहे हैं अपना वजूद
सकरा की इस विरासत पर अब दोतरफा खतरा मंडरा रहा है। एक तरफ प्रशासनिक उदासीनता है, तो दूसरी तरफ अनजाने में स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा नुकसान:

- खेती के लिए समतलीकरण: ऊंचे टीलों (डीह) को काटकर समतल खेत बनाए जा रहे हैं, जिससे जमीन के नीचे दबे साक्ष्य नष्ट हो रहे हैं।
- अतिक्रमण का जाल: कुतुबपुर डीह के पास गैर-मजरूआ जमीन की बंदोबस्ती और निजी निर्माण ने भविष्य में वैज्ञानिक खुदाई के रास्ते लगभग बंद कर दिए हैं।
- पहचान का संकट: गनियारी डीह पर स्कूल और मंदिरों के अनियोजित निर्माण ने प्राचीन टीले के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया है।


विशेषज्ञों की अपील: ‘एएसआई’ के हस्तक्षेप की जरूरत
डॉ. शांतनु सौरभ और अन्य शोधकर्ताओं ने सरकार से गुहार लगाई है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) या बिहार राज्य पुरातत्व विभाग जल्द हस्तक्षेप नहीं करता है, तो मुजफ्फरपुर का यह गौरवशाली अध्याय हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों से मिट जाएगा। उन्होंने स्थानीय जनता से भी अपील की है कि वे इन अवशेषों को पत्थर का टुकड़ा न समझें, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ हिस्सा मानकर इनकी रक्षा करें।

सकरा की जमीन के नीचे दफन यह सभ्यता न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत के लिए गौरव का विषय हो सकती है। जरूरत है एक इच्छाशक्ति की, ताकि ‘यक्षिणी’ की उस मूर्ति और ‘पटसामा की ईंटों’ को वह सम्मान मिल सके जिसकी वे हकदार हैं। यदि ऐसा हुआ, तो मुजफ्फरपुर का यह क्षेत्र वैशाली की तरह ही अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के केंद्र के रूप में उभर सकता है।




