सकरा के कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर ‘डीह’ की बदहाली पर विशेष पड़ताल
मुजफ्फरपुर, बिहार। ब्यूरो रिपोर्ट:
बिहार की मिट्टी के बारे में कहा जाता है कि यहाँ आप जहाँ भी फावड़ा चलाएंगे, वहां से इतिहास की कोई न कोई कहानी जरूर निकलेगी। लेकिन मुजफ्फरपुर जिले का सकरा प्रखंड इन दिनों किसी गौरवशाली गाथा के लिए नहीं, बल्कि अपनी बेबसी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण चर्चा में है। यहाँ की जमीन अपने भीतर एक ऐसी सभ्यता को दबाए बैठी है, जो आज से लगभग 3500 साल पुरानी है। प्रखंड के तीन प्रमुख पुरातात्विक स्थल— कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर — आज संरक्षण के अभाव में अपने अस्तित्व की अंतिम सांसे ले रहे हैं।

इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए ये स्थल ‘उत्तरी काली पॉलिशदार मृदभांड संस्कृति‘ (NBPW Phase) के अनमोल खजाने हैं। यह वह कालखंड था जब भारत में वैदिक सभ्यता का सूर्यास्त और शहरी लौह युगीन संस्कृति का उदय हो रहा था। आज इन तीनों स्थलों पर बिखरे हुए काली और लाल पॉलिश के मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े उस दौर के उन्नत शिल्प कौशल की चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है।
समान कालखंड, साझा बर्बादी
इन तीनों स्थलों—कुलेसरा, रामपुर भसौन और रघुवरपुर—में जो सबसे बड़ी समानता है, वह है इनका समकालीन होना। लगभग 700 ईसा पूर्व के आसपास, जब गंगा के मैदानी इलाकों में महाजनपदों (जैसे वज्जी और मगध) का उदय हो रहा था, तब ये क्षेत्र मानव बस्तियों और प्रशासनिक गतिविधियों से गुलजार थे।
विडंबना यह है कि जहाँ साढ़े तीन हजार साल की प्राकृतिक चुनौतियों, युद्धों और मौसम के थपेड़ों ने इन स्थलों को नहीं मिटाया, वहीं आधुनिक काल की प्रशासनिक उपेक्षा और स्थानीय लोगों की जागरूकता में कमी इन्हें समूल नष्ट कर रही है। स्थानीय ग्रामीण इन्हें महज ‘डीह‘ यानी पुरानी ऊँची जगह भर समझते हैं। उनके लिए यहाँ से निकलने वाली प्राचीन ईंटें और खपड़े सिर्फ निर्माण सामग्री या कचरा हैं। यही कारण है कि इन ऐतिहासिक धरोहरों पर संरक्षण की कोई मुकम्मल दीवार नहीं, बल्कि बदहाली की चादर लिपटी नजर आती है।

1. रामपुर भसौन: कदाने नदी के आगोश में समाती सभ्यता
रामपुर भसौन, जो बाजी बुजुर्ग पंचायत के अंतर्गत आता है, आज प्रकृति और समय की दोहरी मार झेल रहा है। शहीद द्वार से होकर गुजरने वाला ऊबड़-खाबड़ रास्ता सीधे उस इतिहास की ओर ले जाता है, जिसे काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान ने अपनी मुहर लगाकर प्रमाणित किया है।
पुरातत्व की गवाही और विशाल अवशेष
यहाँ की मिट्टी खोदते ही इतिहास बाहर आने लगता है। यहाँ से प्राप्त ईंटों का विशाल आकार (15 इंच लंबी, 9.5 इंच चौड़ी और 2.5 इंच मोटी) यह स्पष्ट संकेत देता है कि यहाँ मौर्यकालीन या उससे भी प्राचीन काल का कोई भव्य निर्माण रहा होगा। खेतों में जुताई के दौरान अक्सर बड़ी हांडियों और दीवारों के अवशेष मिलते रहते हैं।

प्रकृति का प्रहार और नदी का कटाव
इस टीले की सबसे बड़ी दुश्मन फिलहाल कदाने नदी बनी हुई है। नदी की लहरें धीरे-धीरे इस ऐतिहासिक टीले को काटकर अपने भीतर निगल रही हैं। नदी के पानी में आधी डूबी पुरानी दीवारें और तट पर बिखरे लाल-काले मृदभांड किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का दिल चीर देने के लिए काफी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान श्मशान घाट के पास कभी किसी प्राचीन महल या प्रशासनिक केंद्र की मुख्य इमारत रही होगी।
आस्था बनाम अस्तित्व
टीले के मुख्य भाग पर स्थित राम-जानकी मंदिर और मठ सदियों पुरानी परंपरा का केंद्र है। मंदिर के पुजारी शुकदेव दास के अनुसार, यहाँ पूजा-पाठ सैकड़ों वर्षों से होता आ रहा है, लेकिन टीले की वैज्ञानिक प्राचीनता को लेकर कभी कोई आधिकारिक प्रयास नहीं हुआ। आज 1.40 लाख वर्ग मीटर का यह क्षेत्र निजी खेती की चपेट में है, जहाँ प्राचीन कौड़ियां और ऐतिहासिक महत्व के खपड़े ट्रैक्टरों के टायरों के नीचे रौंदे जा रहे हैं।
2. कुलेसरा: ऊँचाई से ढलान की ओर बढ़ता ‘पुरातात्विक स्तूप‘
रामपुर मणि पंचायत में स्थित कुलेसरा डीह को सकरा का सबसे बड़ा और ऊँचा पुरातात्विक टीला होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन यह ‘गौरव’ अब केवल कागजों और यादों तक सीमित रह गया है।
विशालता और निरंतर क्षरण
लगभग 8 लाख वर्ग मीटर में फैला यह टीला कभी साढ़े तीन मीटर की ऊँचाई पर गर्व से खड़ा था। बीते तीन दशकों में विकास की अंधी दौड़ ने इसकी सूरत बदल दी। सड़क निर्माण के लिए यहाँ से अवैध रूप से मिट्टी काटी गई और अंधाधुंध खेती ने इस टीले की मूल संरचना को बिगाड़ दिया है। अब इसकी ऊँचाई घटकर मात्र डेढ़ से दो मीटर रह गई है।
‘सात कुओं‘ का रहस्य और हॉल का जाल
स्थानीय लोककथाओं और किंवदंतियों में यहाँ ‘सात कुओं‘ का जिक्र मिलता है। ग्रामीण बताते हैं कि हाल ही में सड़क निर्माण के दौरान एक प्राचीन कुएं का मुख दिखाई दिया था, जिसे बिना किसी जांच के फिर से मिट्टी से दबा दिया गया। यहाँ दबी हुई मिट्टी की दीवारें और समतल सतह किसी विशाल ‘हॉल’ या सामुदायिक भवन की ओर इशारा करती हैं।
नदी का विस्थापन और व्यापारिक केंद्र
कुलेसरा के पूरब और दक्षिण में कदाने नदी के पुराने बहाव के स्पष्ट निशान आज भी मौजूद हैं। पुरातत्वविदों का अनुमान है कि यह स्थल कभी एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह या जलमार्ग के किनारे स्थित कोई महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र रहा होगा। नदी के एक किलोमीटर दूर खिसक जाने से यहाँ की भौगोलिक स्थिति तो बदल गई, लेकिन जमीन के नीचे दबे साक्ष्य आज भी किसी बड़े खुलासे का इंतजार कर रहे हैं।

3. रघुवरपुर: रोटावेटर की मार और विकास की बलि
प्रखंड मुख्यालय से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित रघुवरपुर की स्थिति सबसे अधिक शोचनीय और हृदयविदारक है। एनएच-28 से सटा होने के बावजूद यह स्थल आज अपनी पहचान खो चुका है।
मिटा दिया गया अस्तित्व
80 के दशक तक के रिकॉर्ड बताते हैं कि यह टीला भी लगभग 3 मीटर ऊँचा था। लेकिन रेल मार्ग के विस्तार, भारी जल निकासी और आधुनिक निर्माण कार्यों के कारण यहाँ मिट्टी का इतना कटाव हुआ कि टीला पूरी तरह समतल हो गया है। जो जगह कभी इतिहास का शिखर थी, वह आज केवल एक निर्जन खेत बनकर रह गई है।
मशीनीकरण का कहर
यहाँ 1.40 लाख वर्ग मीटर भूमि पर अब गहन खेती होती है। रोटावेटर और हैरो जैसे आधुनिक कृषि यंत्रों ने मिट्टी के नीचे दबे उन प्राचीन मृदभांडों (Pottery) को चकनाचूर कर दिया है, जो 3500 सालों से सुरक्षित थे। किसान अनजाने में अपने ही पूर्वजों की विरासत को धूल में मिला रहे हैं।
विशेषज्ञ राय: क्यों महत्वपूर्ण हैं ये स्थल?
पुरातत्वविदों के अनुसार, NBPW (North Black Polished Ware) संस्कृति भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम काल है जब ‘द्वितीय नगरीकरण’ शुरू हुआ था। इसी दौर में सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ, लोहे का कृषि में बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ और बुद्ध-महावीर जैसे महापुरुषों का आगमन हुआ। सकरा के ये स्थल उसी कालखंड के ‘अर्बन सेंटर’ रहे होंगे। यदि यहाँ वैज्ञानिक उत्खनन होता है, तो वैशाली और पाटलिपुत्र के बीच के सांस्कृतिक संबंधों की एक नई कड़ी मिल सकती है।
निष्कर्ष: क्या हम अपनी जड़ों को खो रहे हैं?
सकरा के ये तीनों पुरातात्विक स्थल केवल मुजफ्फरपुर या बिहार के नहीं, बल्कि पूरे भारत की साझा विरासत हैं। वक्त की मांग है कि प्रशासन और समाज नींद से जागे।

तत्काल आवश्यक कदम:
- संरक्षण: पुरातत्व विभाग इन स्थलों को तुरंत ‘संरक्षित क्षेत्र’ घोषित करे और इनकी घेराबंदी (Fencing) कराए।
- वैज्ञानिक उत्खनन: इन स्थलों पर तत्काल ‘Excavation’ शुरू किया जाए ताकि मौर्य, बुद्ध और गुप्त काल के अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठ सके।
- जन-जागरूकता: स्थानीय स्कूलों और पंचायतों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जाए ताकि ग्रामीण इन ‘डीह’ को केवल मिट्टी का ढेर न समझकर अपनी ‘धरोहर’ समझें।
- संग्रहालय: इन स्थलों से प्राप्त अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर एक छोटा संग्रहालय बनाया जाए।

अगर आज प्रशासनिक स्तर पर सार्थक पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास को केवल कहानियों में सुनेंगी। धरातल पर दिखाने के लिए हमारे पास केवल धूल और पछतावा बचेगा। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को यह बताने के लायक बचेंगे कि जहाँ वे आज खड़े हैं, वहाँ साढ़े तीन हजार साल पहले एक महान सभ्यता सांस लेती थी?




