– एस. एस. कुमार पंकज
इतिहास अक्सर अपने पीछे निशान छोड़ जाता है—कभी पत्थरों की इबारत में, तो कभी मिट्टी के मूक अवशेषों में। लेकिन जब इतिहास पर आस्था की परतें चढ़ जाएं और साक्ष्यों के बीच जनश्रुतियों का द्वंद्व शुरू हो जाए, तो सच की तलाश बेहद रोमांचक हो जाती है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर, सकरा प्रखंड का एक छोटा सा गांव ‘रघुनाथपुर दोनमा’ आज एक ऐसे ही ऐतिहासिक और पुरातात्विक रहस्य का केंद्र बना हुआ है।
कदाने नदी के शांत तट पर स्थित एक विशाल मिट्टी का टीला (डीह), जो करीब तीन मीटर ऊँचा है, आज न केवल इतिहासकारों के लिए शोध का विषय है, बल्कि दो समुदायों की आस्था और एक अनसुलझे विवाद की गवाह भी है।

पुरातात्विक साक्ष्य: ईसा पूर्व 700 साल की पदचाप
रघुनाथपुर दोनमा का यह टीला कोई साधारण टीला नहीं है। काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तक ‘कैटलॉग ऑफ आर्किलॉजिकल साइट्स इन बिहार‘ (खंड 2, पृष्ठ 238, क्रम संख्या 13) में इसे विधिवत दर्ज किया गया है। इस पुस्तक में इसे ‘रघुनाथपुर दोनमा उर्फ रघुबरपुर उर्फ मोहम्मदपुर’ के नाम से उल्लेखित किया गया है।
इतिहास की शब्दावली में इस स्थल का काल निर्धारण एनबीपी डब्लू (NBPW – Northern Black Polished Ware) काल के रूप में किया गया है। इतिहास के अध्यापक डॉ. शांतनु सौरभ बताते हैं कि NBPW का अर्थ है ‘उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड’। यह काल भारतीय उपमहाद्वीप में ईसा पूर्व 700 से 200 ईसा पूर्व के बीच का माना जाता है।यानी जब मगध का उत्कर्ष हो रहा था, तब यहाँ के लोग उन्नत कोटि के चमकदार काले बर्तनों का उपयोग कर रहे थे। आज भी खेतों की जुताई में निकलने वाले घड़े के टुकड़े और प्राचीन चौकोर ईंटें इस समृद्ध काल की गवाही देते हैं।
यहाँ की मिट्टी आज भी ‘बोलती’ है। डीह के चप्पे-चप्पे पर काले और लाल मृदभांड (बर्तनों) के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। यहाँ मिलने वाले बर्तनों की चिकनाई और चमक आज भी वैसी ही है, जो उस दौर के उच्च स्तरीय हस्तशिल्प और अग्नि-प्रबंधन को दर्शाती है।



आस्था का संगम और अदृश्य दीवारें
वर्तमान में इस पुरातात्विक स्थल की सूरत ऐतिहासिक कम और धार्मिक ज्यादा नजर आती है। टीले के सबसे ऊँचे शिखर पर बाबा अजगैबीनाथ पीर की मजार है। स्थानीय किंवदंती है कि वे फारस (ईरान) से आए एक सूफी संत थे, जो साधना के लिए यहीं रुक गए।
हैरत की बात यह है कि इसी मजार के ठीक बगल में एक रामनामी झंडा लहरा रहा है और मिट्टी का एक पिंड (ब्रह्म स्थान/देव स्थान) स्थापित है। मजार और हिंदू देव-स्थान के बीच कोई भौतिक दीवार नहीं है। मजार के सेवादार बताते हैं कि “यहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों पीढ़ियों से आते हैं। हिंदू दूध और चादर चढ़ाते हैं, तो मुसलमान फातिहा पढ़ते हैं।” मजार और देव स्थान की सीमा को लेकर दोनों समुदायों के अपने-अपने दावे हैं। जहाँ एक पक्ष इसे प्राचीन काल से कब्रिस्तान बताता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेष मानता है।
लेकिन यह शांति केवल सतह पर दिखती है। इस स्थल की मिल्कियत और प्रकृति को लेकर एक गहरी कानूनी जंग मुजफ्फरपुर सिविल कोर्ट में जारी है। साल 2002 से यहाँ वाद संख्या 144/2002 (मो. एकरामुल हक एवं अन्य बनाम बिहार सरकार एवं अन्य) विचाराधीन है। पिछले 24 वर्षों से चल रहे इस मुकदमे ने इस स्थल के पुरातात्विक विकास को एक तरह से फ्रीज कर दिया है। ग्रामीण बताते हैं कि साल 2002 में ही मजार के पास स्थित देव-स्थान को लेकर हुए विवाद के बाद मामला कोर्ट पहुँचा था। आज यह वाद संख्या ही वह चाबी है, जिससे इस प्राचीन डीह के भविष्य का फैसला होना है।
‘अलशान मियां‘ और विध्वंस की दास्तां
खोजी पड़ताल के दौरान स्थानीय बुजुर्गों और ग्रामीणों के बयानों में एक नाम बार-बार उभरता है—शासक अलशान मियां। ग्रामीण धर्मचन्द राय, विश्वजीत सिंह और सुरेन्द्र राय का दावा है कि उनके पूर्वजों (दादा-परदादा) ने बताया था कि यहाँ एक भव्य मंदिर हुआ करता था।

वे बताते हैं कि करीब 12वीं शताब्दी के आसपास (प्रारंभिक मध्यकाल), उत्तर बिहार में इस्लाम के प्रवेश के समय यहाँ एक भीषण संघर्ष हुआ। कहा जाता है कि अलशान मियां के आक्रमण के दौरान मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। ग्रामीण मानते हैं कि उस युद्ध में जो लोग मारे गए, उन्हें इसी टीले पर दफना दिया गया, जिससे यह एक कब्रिस्तान में बदल गया। स्थानीय लोग आज भी उस दौर को ‘वर्ग संघर्ष’ के परिणाम के रूप में देखते हैं।

बाजी घाट का ‘काला पत्थर‘: मंदिर का आखिरी सबूत?
ग्रामीणों के इन दावों को एक ठोस आधार मिलता है पास के ही गौरी शंकर मंदिर से। बाजी घाट पुल के पास, कदाने नदी के दक्षिण तट पर स्थित इस मंदिर में काले पत्थर (Black Basalt) से बनी एक खंडित प्रतिमा का हिस्सा रखा हुआ है। यह वास्तव में एक मानव आकृति का बायां पैर है।

मान्यता है कि यह पैर उसी प्राचीन मंदिर की मूर्ति का हिस्सा है जिसे रघुनाथपुर दोनमा के डीह पर तोड़ा गया था। पीढ़ियों से लोग इस ‘पाषाण चरण’ की पूजा कर रहे हैं। इतिहासकारों के अनुसार, जिस काले पत्थर का उपयोग यहाँ दिखा है, वह पाल कालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) मूर्तिकला की विशेषता है। इसके अलावा, गौरी शंकर मंदिर का शिवलिंग भी अद्वितीय है, जिसमें लिंग के साथ शक्ति (सती) की आकृति उकेरी गई है, जो इस क्षेत्र में तंत्र और शैव मत के प्रभाव को दर्शाती है।

भौगोलिक बनावट और प्राचीन इंजीनियरिंग
यह स्थल प्राचीन इंजीनियरिंग का भी एक नमूना है। करीब 1,57,500 वर्ग मीटर में फैला यह मुख्य डीह चारों तरफ से उपजाऊ खेतों से घिरा है। यहाँ काम करने वाले किसान पवन कुमार महतो बताते हैं कि खेतों की जुताई करते समय अक्सर जमीन के अंदर पक्की दीवारें टकराती हैं। प्राचीन समय में यहाँ जल आपूर्ति के लिए कदाने नदी के अलावा, उत्तर और पश्चिम दिशा में ‘क्षारण‘ (प्राकृतिक जल मार्ग) बना था, जो सुरक्षा और सिंचाई दोनों के काम आता था।
स्थानीय निवासी धर्मचन्द राय और दिवंगत मुकेश सिंह ने इस स्थल की ऐतिहासिकता को बचाने के लिए काफी संघर्ष किया। उन्होंने यहाँ से मिलने वाले अवशेषों को व्यक्तिगत स्तर पर संग्रह कर सहेजने का सराहनीय कार्य किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों को पहचान सकें।

सरकारी उपेक्षा और मंडराता खतरा
रघुनाथपुर दोनमा की सबसे बड़ी त्रासदी इसकी उपेक्षा है। ‘कैटलॉग ऑफ आर्किलॉजिकल साइट्स’ में दर्ज होने के बावजूद, यहाँ पुरातत्व विभाग का कोई बोर्ड या सुरक्षा घेरा नहीं है।
- नाम का भ्रम: कैटलॉग में इसे ‘रघुबरपुर उर्फ मोहम्मदपुर’ कहा गया है, जबकि ग्रामीण बताते हैं कि रघुबरपुर यहाँ से 5 किमी दूर ढोली स्टेशन के पास एक अलग स्थल है। यह दस्तावेजी त्रुटि सुधार की बाट जोह रही है।
- अवैध गतिविधि: प्रशासन की अनुमति के बिना टीले की खुदाई करना या मिट्टी हटाना इसकी ऐतिहासिक परतों (Stratigraphy) को हमेशा के लिए नष्ट कर सकता है।
इतिहासकार चेतावनी देते हैं कि यदि यहाँ वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन (Excavation) किया जाए, तो यह स्थल एक बड़ा पर्यटन और शोध केंद्र बन सकता है।


रघुनाथपुर दोनमा का डीह केवल मिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि बिहार के उस गौरवशाली अतीत का हिस्सा है जिसने मौर्य काल से लेकर पाल काल और फिर सूफी संतों के आगमन तक के समय को देखा है। यहाँ की मजार, यहाँ का ब्रह्म स्थान और यहाँ के मृदभांड—ये सब मिलकर एक ऐसी कहानी बुनते हैं जो आस्था, विवाद और विज्ञान के बीच झूल रही है।

बड़ा सवाल: क्या सकरा के इतिहास को बचा पाएगा प्रशासन?
पुरातत्व विभाग की सूची में नाम होने के बावजूद, रघुनाथपुर दोनमा डीह पर न तो पूरी बाउंड्री है और न ही अवैध खुदाई पर रोक। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहाँ वैज्ञानिक उत्खनन (Excavation) हो, तो उत्तर बिहार के इतिहास की कई नई परतें खुल सकती हैं।
क्या प्रशासन इस अनमोल विरासत को ‘आस्था और विवाद’ की भेंट चढ़ने से बचाएगा, या मिट्टी के ये बुत हमेशा के लिए खामोश हो जाएंगे? अब गेंद प्रशासन और पुरातत्व विभाग के पाले में है। क्या हम इस 2700 साल पुराने पन्ने को इतिहास की किताब से फटने देंगे, या इसे सहेजकर दुनिया को दिखाएंगे? रघुनाथपुर के ‘बोलते बुत’ आज यही सवाल पूछ रहे हैं।

विशेष कवरेज के लिए देखें यह वीडियो: इस खबर से संबंधित विशेषज्ञों की राय, ग्रामीणों के दावे और पुरातात्विक साक्ष्यों को विस्तार से देखें


