देवघर (झारखंड) | विशेष रिपोर्ट : एस. एस. कुमार ‘पंकज’

भारत की सनातन परंपरा में भगवान विष्णु के पद चिह्नों का स्थान अत्यंत पावन माना गया है। जब भी विष्णुपद की चर्चा होती है, तो विश्व पटल पर बिहार के गया जी का नाम सबसे पहले आता है। गया जी के विष्णुपद मंदिर को ‘मोक्षदायी’ माना जाता है, जहाँ पितरों की मुक्ति के लिए पिंडदान और तर्पण किया जाता है। किंतु, बहुत कम लोग जानते हैं कि गया जी की ही तरह वैभवशाली और महिमामंडन से युक्त एक और विष्णुपद मंदिर झारखंड के देवघर जिले में स्थित है। इसे हरला जोरी विष्णुपद मंदिर कहा जाता है। जहाँ गया जी मोक्ष प्रदान करते हैं, वहीं हरला जोरी को ‘कामनादायी’ (मनोकामना पूर्ण करने वाला) माना जाता है।

देवघर स्थित हरला जोरी विष्णुपद मंदिर

आज यह मंदिर अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। शास्त्रों में उल्लेखित होने के बावजूद यह स्थान आज उपेक्षा और प्रशासनिक अनदेखी का शिकार है।


तीन विष्णुपद मंदिरों का रहस्य और तीसरे का लोप

धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार दुनिया में तीन प्रमुख विष्णुपद मंदिरों की चर्चा मिलती है।

  1. प्रथम: बिहार का गया जी शहर, जहाँ विष्णुपद मंदिर की ख्याति वैश्विक है।
  2. द्वितीय: झारखंड के देवघर जिला स्थित हरला जोरी विष्णुपद मंदिर, जिसकी पौराणिक महत्ता अद्वितीय है।
  3. तृतीय: माना जाता है कि तीसरा विष्णुपद मंदिर बिहार के मधुबनी जिले में बलिराजगढ़ के आसपास था। यह स्थान राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा से गहराई से जुड़ा है। हालांकि, समय के थपेड़ों और संरक्षण के अभाव में इस तीसरे मंदिर का भौतिक अस्तित्व अब लगभग समाप्त हो चुका है।

यद्यपि वर्तमान में कंबोडिया के अंकोरवाट और महाराष्ट्र के पंढरपुर को भी विष्णु के पद चिह्नों वाले मंदिर के रूप में प्रचारित किया जाता है, परंतु शास्त्रों और ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल में हरला जोरी का स्थान सर्वोपरि आता है।


पौराणिक गाथा: रावण, महादेव और विष्णु की लीला

हरला जोरी विष्णुपद मंदिर का इतिहास सीधे तौर पर रामायण काल और भगवान शिव की अमर कथा से जुड़ा है। इसकी चर्चा शिव पुराण और पद्म पुराण के साथ-साथ लोक कथाओं में प्रमुखता से मिलती है।

कथा प्रसंग: लंकाधिपति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे वरदान मांगा कि वे शिवलिंग के रूप में उसके साथ लंका चलें। महादेव तैयार हुए, लेकिन एक शर्त रखी—रास्ते में यह लिंग जहाँ भी भूमि को स्पर्श करेगा, वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण शिवलिंग लेकर कैलाश से लंका की ओर चला।

यात्रा के दौरान जब वह ‘हरतकी वन’ (वर्तमान हरला जोरी) पहुँचा, तो उसे तीव्र लघुशंका का बोध हुआ। इसी समय भगवान विष्णु ने देवताओं के कल्याण के लिए एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और रावण के सामने प्रकट हुए। रावण ने उस ब्राह्मण (छद्म वेशी विष्णु) को शिवलिंग पकड़ा दिया और स्वयं निवृत्त होने चला गया। भगवान विष्णु ने उसी स्थान पर पृथ्वी पर कदम रखे और शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। यही वह स्थान है जहाँ हरि (विष्णु) और हर (महादेव) का मिलन हुआ। आगे चलकर इसी शिवलिंग को देवघर के हृद्या पीठ (बैद्यनाथ धाम) में स्थापित किया गया।


शब्दों का रहस्य: क्या है हरिलाजोरीका अर्थ?

‘हरिलाजोरी’ शब्द का विग्रह इसके आध्यात्मिक महत्व को स्पष्ट करता है। यह शब्द हरि + ईला + जोरी के संगम से बना है:

  • हरि: भगवान विष्णु
  • ईला: पृथ्वी (धरती)
  • जोरी: मिलन (युग्म)

अर्थात, वह स्थान जहाँ भगवान विष्णु का पृथ्वी से मिलन हुआ, वह ‘हरिला जोड़ी’ कहलाया। प्राचीन शास्त्रों में इसे हरतकी वन भी कहा गया है, क्योंकि यहाँ औषधीय गुणों वाले ‘हर्रे’ के वृक्षों की अत्यधिक बहुलता थी। हरि के द्वारा रावण से शिवलिंग प्राप्त करने की इस मायावी लीला के कारण इस क्षेत्र को हरिकेली और हरिद्रा पीठ के नाम से भी अभिहित किया गया है। गुप्त काल में यह क्षेत्र क्रिमला प्रदेश के अंतर्गत आता था।


पद्म पुराण में वर्णित महिमा

पद्म पुराण के पातालखण्ड में इस स्थान की भौगोलिकता और प्राचीनता का जीवंत वर्णन मिलता है। संस्कृत के श्लोक इसकी महत्ता की पुष्टि करते हैं:

इदं तु कामद लिंगम् सर्वलिंगम् फलप्रदम् हार्द्राख्‍यपीठ मध्‍ये तु रावणेश्‍वर मुक्‍तमम् बैद्यनाथ जगन्‍नाथं सर्वकामार्थ सिद्धये पूर्वसागर गामिन्‍यां गंगायां दक्षिणतटे हरीतकीवने दिव्‍ये: दु:संचारे भयावहे

भावार्थ: यह कामना लिंग सभी लिंगों में श्रेष्ठ और फलदायी है। हरिद्रा पीठ (देवघर क्षेत्र) के मध्य रावणेश्वर (बैद्यनाथ) विराजमान हैं। गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित दिव्य हरतकी वन में, जहाँ संचरण करना अत्यंत कठिन और डरावना था, वहाँ आज भी चंडी और महेश्वर (बैद्यनाथ) मौजूद हैं, जो चिन्तामणि रत्न की तरह भक्तों की समस्त इच्छाएं पूर्ण करते हैं।


तस्‍वीर में देवघर स्थित हरला जोरी विष्णुपद मंदिर में पद चिह्न

वर्तमान संकट: घिसते पद चिह्न और संरक्षण का अभाव

हरला जोरी भारत का वह दुर्लभ मंदिर है जहाँ शिला पर उत्कीर्ण भगवान विष्णु के चरण चिह्नों की पूजा की जाती है। परंतु, आज यह विरासत खतरे में है।

  • भौतिक क्षरण: सदियों से लाखों श्रद्धालुओं द्वारा पूजा और स्पर्श किए जाने के कारण शिला पर अंकित पद चिह्न काफी घिस चुके हैं। यदि इनका वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो ये ऐतिहासिक निशान सदा के लिए मिट सकते हैं।
  • भू-विवाद की छाया: सबसे दुखद और चिंताजनक विषय मंदिर परिसर की जमीन का विवाद है। स्थानीय विद्वान पंडित काशीनाथ झा और अन्य जानकारों का आरोप है कि बंदोबस्ती के दौरान मंदिर की पैतृक जमीन को गलत तरीके से कुछ निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिया गया है।
  • साजिश का अंदेशा: सनातन की इस पावन देव भूमि को किसी गहरी साजिश के तहत हथियाने का प्रयास किया जा रहा है। स्वामित्व निजी और अक्षम हाथों में होने के कारण मंदिर का विकास पूरी तरह से बाधित है।

सरकार से न्याय की गुहार

तस्‍वीर में देवघर स्थित विष्णुपद मंदिर के आगे हरला जोरी शिव मंदिर का मुख्‍य द्वार

हरला जोरी के चारों ओर आज भी बड़े-बड़े झाड़ीनुमा वृक्ष मौजूद हैं, जो प्राचीन ‘हरतकी वन’ की उपस्थिति का एहसास कराते हैं। हालांकि आम लोगों को यहाँ दर्शन और पूजन में कोई कठिनाई नहीं होती, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का शून्य होना पर्यटकों और श्रद्धालुओं को खलता है।

स्थानीय निवासियों और धार्मिक संगठनों की मांग है कि झारखंड सरकार को इस मामले में तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। मंदिर परिसर की जमाबंदी की जांच होनी चाहिए और इस ‘कामनादायी’ तीर्थ को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराकर इसे एक भव्य धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए।


गया जी के बाद भारत का यह दूसरा विष्णुपद मंदिर हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल मोती है। ‘हरि-हर’ के मिलन का साक्षी यह हरला जोरी मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी है। इसकी रक्षा करना और इसे पुनर्जीवित करना न केवल प्रशासन का, बल्कि हर सनातन धर्मवलंबी का कर्तव्य है।

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