विशेष अन्वेषण: न्यूज़ भारत टीवी

भारत की सांस्कृतिक चेतना में कथाएं केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि वे समय के पदचिह्न हैं। झारखंड के देवघर जिले में स्थित बैद्यनाथ धाम (रावणेश्वर धाम) की महिमा तो जगत व्‍याप्‍त है, लेकिन मुख्य मंदिर से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसी जगह है, जहां अध्यात्म और आधुनिक विज्ञान के तर्क आपस में टकराते हैं। यह स्थान है हरला जोरी’, जहां मौजूद है— रावण कुंड

1. पौराणिक पृष्ठभूमि: कैलाश से लंका का वो अधूरा सफर

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, लंकाधिपति रावण अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर उन्हें लिंग स्वरूप में लंका ले जा रहा था। महादेव ने शर्त रखी थी कि “रावण, यदि तुमने मुझे रास्ते में कहीं भी पृथ्वी पर रखा, तो मैं वहीं अचल हो जाऊंगा।”

देवता नहीं चाहते थे कि शिव जैसी महाशक्ति का वास लंका में हो। जब रावण देवघर के समीप पहुँचा, तो वरुण देव ने उसके उदर में प्रवेश किया, जिससे उसे तीव्र लघुशंका (Urination) की अनुभूति हुई। रावण दुविधा में था। तभी वहां एक ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु प्रकट हुए। रावण ने उन्हें शिवलिंग थमाया और निवृत्त होने चला गया। वह लघुशंका इतनी दीर्घ और तीव्र थी कि वहां जल का एक बड़ा स्रोत बन गया, जिसे आज रावण कुंड या रावण जोर कहा जाता है।

हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर

2. भौगोलिक साक्ष्य: हरला जोरी का त्रिकोण

स्थानीय विद्वान पूर्णानंद ओझा की कृति हरिला जोरी तीर्थ महात्‍म्‍य’ इस स्थान के तीन प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित करती है:

  • हरला जोरी शिव मंदिर: जहां आज भी भक्त श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।
  • विष्णुपद मंदिर : हरला जोरी – गया (बिहार) के बाद भारत का यह दूसरा दुर्लभ मंदिर है जहां भगवान विष्णु के पदचिह्न पूजे जाते हैं। माना जाता है कि इसी स्थान पर विष्णु ने शिवलिंग हाथ में लिया था।
  • रावण कुंड: वह जलधारा जो रावण की लघुशंका से उत्पन्न मानी जाती है।

3. मेडिकल जांच का तर्क: क्या यह जल ‘यूरीन’ के गुणों से युक्त है?

आज का विज्ञान हर तथ्य को प्रमाण की कसौटी पर कसता है। सवाल यह है कि क्या हज़ारों साल बाद भी उस जल में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो उसे मानव मूत्र या किसी विशिष्ट जैविक द्रव्य (Biological Fluid) के करीब ले जाते हैं?

हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर के समीप रावण के द्रारा लघुशंका का प्रतीकरत्‍मक द्श्‍य
  • चमत्कारी उपचार: स्थानीय लोगों का दावा है कि इस कुंड के जल से स्नान करने पर असाध्य चर्म रोग, फोड़े और फुंसियां ठीक हो जाती हैं। आयुर्वेद में ‘स्व-मूत्र चिकित्सा’ (Shivambu Therapy) का वर्णन है। क्या इस कुंड के जल में यूरिया या अमोनिया के कोई सूक्ष्म अंश आज भी विद्यमान हैं?
  • पैथोलॉजिस्ट का नजरिया: एक जनरल फिजिशियन और पैथोलॉजिस्ट के अनुसार, सामान्यतः मूत्र में यूरिया, क्रिएटिनिन और यूरिक एसिड होता है। यदि हज़ारों साल पहले की किसी घटना के अवशेष जांचने हों, तो उसके लिए ‘सडिमेंटेशन’ और ‘आर्कियोलॉजिकल साइंस’ का सहारा लेना होगा।

4. वैज्ञानिक चुनौतियां और ‘राइट टाइमिंग’

यदि हम आज इस कुंड के जल का सैंपल लें, तो रिपोर्ट ‘नॉर्मल वाटर’ ही आएगी। इसके दो प्रमुख कारण हैं:

  1. प्रदूषण और मिक्सिंग: वर्तमान में रावण कुंड के पास पक्का नाला बना दिया गया है। बारिश के मौसम में आसपास का पहाड़ी पानी इसमें मिल जाता है, जिससे इसकी मौलिकता की जांच करना असंभव हो जाता है।
  2. मई-जून का इंतज़ार: वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इस रहस्य की तह तक जाना है, तो मई या जून की भीषण गर्मी सबसे उपयुक्त समय है। तब बरसाती नाले सूख जाते हैं और केवल वही जल शेष रहता है जो जमीन के भीतर से ‘सोते’ के रूप में निकलता है। तभी लिए गए सैंपल से वास्तविक रसायनिक संरचना का पता चल सकता है।
हरतकीनाथ धाम परिसर हरलाजोरी देवघर के समीप रावण के द्रारा किये गये लघुशंका स्‍थल का द्श्‍य

5. एक प्राकृतिक रहस्य: जमीन से स्वतः फूटता जल

दिलचस्प बात यह है कि हरला जोरी के पास श्यामा मंदिर परिसर में एक ऐसा हैंडपंप है, जिससे बिना चलाए ही पानी निकलता रहता है। यह इस क्षेत्र के एक विशेष ‘एक्विफर’ (भू-जल स्रोत) की ओर इशारा करता है। क्या रावण की कथा वास्तव में एक विशाल भू-वैज्ञानिक बदलाव (Geological Change) का आध्यात्मिक चित्रण है?

निष्कर्ष: आस्था और तर्क का संगम

रावण कुंड आज भी देवघर की उस लुप्त कड़ी के समान है, जिसे मुख्यधारा के पर्यटकों ने अभी पूरी तरह नहीं पहचाना है। यह स्थान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शोध का केंद्र बनने की योग्यता रखता है। जब तक विज्ञान इस पर अंतिम मुहर नहीं लगाता, तब तक यह आस्था का वह ‘अजस्र स्रोत’ बना रहेगा जो सदियों से बह रहा है और कभी सूखता नहीं।

आगामी अन्वेषण: मई की तपती गर्मी में रावण कुंडकी लाइव इन्वेस्टिगेशन

न्यूज भारत टीवी केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करता। हम तथ्यों की गहराई तक जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसलिए, हमने निर्णय लिया है कि हम इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए मई की भीषण गर्मी में एक विशेष लाइव इन्वेस्टिगेशन करेंगे।

हम मई का महीना ही क्यों चुन रहे हैं?

वर्तमान में, वर्षा ऋतु और सामान्य मौसम के कारण ‘रावण कुंड’ का मूल जल आसपास की पहाड़ियों से आने वाले सतही जल (Surface Water) के साथ मिल चुका है। किसी भी वैज्ञानिक जांच के लिए ‘शुद्ध और मूल नमूना’ (Pure Sample) अनिवार्य है।

  • प्राकृतिक शुद्धता: मई की चिलचिलाती धूप में जब आसपास के तमाम जल स्रोत और बरसाती नाले सूख जाते हैं, तब रावण कुंड का असली स्वरूप उभरता है।
  • सोते का रहस्य: उस समय जो जलधारा शेष रहेगी, वह सीधे जमीन के भीतर से आने वाला वह ‘सोता’ होगा जिसका वर्णन कथाओं में है।
  • गंध और संरचना: स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि भीषण गर्मी में इस कुंड के पानी के रंग और गंध में विशिष्ट बदलाव आते हैं, जो सामान्य जल से भिन्न होते हैं।

हमारी जांच के मुख्य बिंदु (Investigation Roadmap):

  1. साइंटिफिक सैंपलिंग (Scientific Sampling): हम विशेषज्ञों और पैथोलॉजिस्ट की एक टीम के साथ ‘हरला जोरी’ पहुंचेंगे। रावण कुंड के उस मूल स्थान से जल का नमूना लिया जाएगा जहां से धारा फूटती है। हम इसकी जांच लैब में कराएंगे ताकि यह पता चल सके कि क्या इसमें अमोनिया, यूरिया, या सल्फर जैसे तत्वों की मात्रा सामान्य से अधिक है।
  2. हाइड्रोलॉजिकल मैपिंग (Hydrological Mapping): हम भू-गर्भ वैज्ञानिकों (Geologists) से यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या यह केवल एक ‘आर्टिसियन वेल’ (पाताल तोड़ कुआं) की प्रक्रिया है या इस विशिष्ट स्थान की मिट्टी और पत्थरों में कुछ ऐसा है जो इस जल को औषधीय बनाता है।
  3. चमत्कार का साक्ष्य: कहा जाता है कि इस कुंड के पानी से चर्म रोग ठीक होते हैं। हम ऐसे लोगों से बात करेंगे जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से इस जल का लाभ उठाया है और इसकी तुलना मेडिकल साइंस के ‘एंटी-बैक्टीरियल’ सिद्धांतों से करेंगे।
  4. ऐतिहासिक साक्ष्यों का मिलान: ‘हरिला जोरी तीर्थ महात्म्य’ के पन्नों को पलटते हुए हम मौके पर उन स्मृति चिन्हों को खोजेंगे जो रावण और भगवान विष्णु के उस संवाद की पुष्टि करते हैं, जिसका उल्लेख विद्वान पूर्णानंद ओझा ने किया है।

एक चुनौती, एक खोज

यह इन्वेस्टिगेशन केवल एक खबर नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और विज्ञान के बीच के सेतु को खोजने का एक प्रयास है। क्या रावण का वह ‘वेग’ आज भी एक जलधारा के रूप में जीवित है? क्या प्राचीन कथाओं में छिपे भौतिक साक्ष्य आज के लैब टेस्ट में खरे उतरेंगे?

मई 2026 (संभावित) में न्यूज भारत टीवी की टीम देवघर की उस तपती धरती पर मौजूद रहेगी, जहां इतिहास और विज्ञान का आमना-सामना होगा।


सत्य वही है जो प्रमाण की कसौटी पर कसा जाए। बने रहिये हमारे साथ, क्योंकि हम लाएंगे उस रिपोर्ट का परिणाम, जिसका इंतज़ार सदियों से है।”

इस महा-अभियान से जुड़ने के लिए:

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