मुजफ्फरपुर, बिहार ना हो अभी, मगर आखिर तो कदर होगी मेरी, खुलेगा हाले-गुलाम आप पर, गुलाम के बाद।” प्रख्यात शायर हसरत मोहानी का यह शेर आज मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड स्थित ‘नुनफरा’ गांव की गलियों में सिसक रहा है। यह सिसकी किसी आम इंसान की नहीं, बल्कि अगस्त क्रांति के उस महान सेनानी की स्मृतियों की है, जिसने 1942 में अपनी युवा अवस्था की दहलीज पर खड़े होकर भारत माता के पैरों की बेड़ियां काटने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। हम बात कर रहे हैं अमर शहीद अमीर सिंह की, जिनकी शहादत के 83 वर्षों बाद भी आजाद भारत की व्यवस्था उनके जन्मस्थान और शहादत स्थल को उचित सम्मान देने में नाकाम रही है।

अगस्‍त क्रान्ति के शहीद, अमीर सिंह का तैल चित्र
अमर शहीद अमीर सिंह का तस्‍वीर

एक शहादत, जिसने इतिहास लिख दिया पर सम्मान नहीं पाया

11 अगस्त 1942 को जब समूचा देश महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के नारे से आंदोलित था, तब मुजफ्फरपुर का पूर्वी इलाका (सकरा-ढोली क्षेत्र) सशस्त्र क्रांति की ज्वाला में जल रहा था। 11 सितंबर 1942 का वह ऐतिहासिक दिन था। सकरा प्रखंड कांग्रेस आश्रम में स्वतंत्रता सेनानियों की एक गुप्त सभा हुई। जोश इतना था कि आंदोलनकारियों ने सबसे पहले ढोली रेलवे स्टेशन पर तिरंगा फहराया और संचार व्यवस्था ठप करने के लिए रेल की पटरियां उखाड़ दीं।

तत्कालीन थानेदार दीपनारायण सिंह की चेतावनियों को ठेंगा दिखाते हुए इन वीरों की टोली ‘सकरा थाना’ पर तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़ी। इसी टोली में शामिल थे 30 वर्षीय जांबाज अमीर सिंह। जब अंग्रेज पुलिस की गोलियां हवा में गूंज रही थीं, तब अमीर सिंह ने जान की परवाह किए बिना ‘सब निबंधन कार्यालय’ की छत पर तिरंगा फहराने का फैसला किया। जैसे ही वे ऊपर बढ़े, अंग्रेज सिपाहियों की एक गोली उनके सीने को चीरती हुई निकल गई। भारत मां का यह लाडला वहीं शहीद हो गया।

वह बलिदान जो इतिहास के पन्नों में भी धुंधला गया

अमीर सिंह के बलिदान की कहानी केवल उनके प्राण त्यागने तक सीमित नहीं है। उनके पीछे उनके परिवार ने जो झेला, वह रूह कंपा देने वाला है। उनकी पत्नी जयमाला देवी, जिनकी शादी को मात्र दो महीने हुए थे, पति की शहादत की खबर सुनकर सुध-बुध खो बैठीं। एक सुहागिन जिसने अभी अपने हाथों की मेहंदी का रंग भी नहीं उतरने दिया था, उसने अन्न-जल त्याग दिया और ठीक सात महीने बाद अपने पति के पास परलोक सिधार गईं। यह एक ऐसी प्रेम कथा और राष्ट्रभक्ति का संगम है, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

विडंबना: गुलामी के प्रतीक चमक रहे हैं, शहीदों के घर खंडहर

आज जब हम ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मना चुके हैं, तब मुजफ्फरपुर की धरती पर एक कड़वा सच मुंह चिढ़ा रहा है। जिस अंग्रेज प्रशासक ई.सी. डैनवी के आदेश पर अमीर सिंह पर गोलियां चली थीं, उसका आवास (जो अब ढोली कृषि महाविद्यालय का गेस्ट हाउस है) आज भी शान से चमक रहा है। प्रशासन उसे संवारने के लिए हर साल बजट खर्च करता है।

लेकिन, इसके विपरीत शहीद अमीर सिंह का पैतृक घर खंडहर में तब्दील हो चुका है। परिवार के लोग जैसे-तैसे उनकी यादों को सहेजे हुए हैं। क्या एक आजाद मुल्क में गुलामी के प्रतीकों का संरक्षण शहीदों की विरासत से ऊपर है?

जनप्रतिनिधियों की बेरुखी और जर्जर शहीद द्वार

1994 में शहादत के 52 वर्षों बाद तत्कालीन राजस्व मंत्री रमई राम ने बंदरा प्रखंड मुख्यालय से 4 किमी दूर नुनफरा गांव के मोड़ पर एक ‘शहीद द्वार’ बनवाया था। आज उस द्वार की हालत यह है कि उसका प्लास्टर झड़ चुका है, ईंटें बाहर निकल आई हैं और वह किसी भी क्षण गिर सकता है। विडंबना देखिए कि उस क्षेत्र से कई विधायक और सांसद चुनकर आए, लेकिन किसी भी ‘माननीय’ को इतनी फुर्सत नहीं मिली कि अपनी निधि से कुछ हजार रुपये खर्च कर इस द्वार का रंग-रोगन ही करा दें।

नुनफरा गांव के मोड़ पर जर्जर ‘शहीद द्वार’

नुनफरा के ग्रामीणों ने अपने स्तर पर गांव के स्कूल का नाम ‘शहीद अमीर सिंह’ के नाम पर रख दिया था। नेताओं ने खूब वाह-वाही लूटी, लेकिन सरकारी कागजों में आज भी वह नाम दर्ज नहीं हो सका। गांव की आपसी वैमनस्यता और प्रशासनिक सुस्ती ने स्कूल की दीवारों पर लिखा शहीद का नाम तक मिटा दिया है।

शिलापट्टों से नाम गायब: क्या यह षड्यंत्र है?

सकरा, मुरौल और बंदरा प्रखंडों के मुख्यालयों में स्वतंत्रता सेनानियों के नामों के शिलापट्ट लगे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि पूर्वी मुजफ्फरपुर के एकमात्र अगस्त क्रांति के शहीद होने के बावजूद, अमीर सिंह का नाम इन शिलापट्टों से नदारद है। जिन्होंने हजारीबाग जेल की हवा खाई, जिन्होंने सीने पर गोली झेली, उन्हें सरकारी सूचियों में स्थान न मिलना किसी ‘सौतेले व्यवहार’ से कम नहीं है।

76 साल बाद मिली प्रतिमा, पर वो भी उपेक्षित

अमर शहीद अमीर सिंह स्मारक समिति के लंबे संघर्ष के बाद, 2019 में शहादत स्थल (सकरा निबंधन कार्यालय परिसर) पर उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई। लेकिन सम्मान की यह लड़ाई भी आधी-अधूरी ही रही। प्रतिमा स्थल से मात्र 50 मीटर की दूरी पर निबंधन कार्यालय है और 100 मीटर पर थाना व प्रखंड कार्यालय। बावजूद इसके, शहीद दिवस पर किसी भी अधिकारी के पास दो फूल चढ़ाने का समय नहीं होता। स्थानीय कांग्रेस आश्रम के पास ही यह सब घटित होता है, लेकिन नई पीढ़ी के नेताओं को शायद अपनी विरासत का ज्ञान ही नहीं है।

केंद्र सरकार का वह अधूरा वादा

वर्ष 1993 में भारत छोड़ो आंदोलन की स्वर्ण जयंती पर तत्कालीन रेल मंत्री सी.के. जाफर शरीफ ने परिजनों को पत्र लिखकर ढोली रेलवे स्टेशन पर शहीद अमीर सिंह का जीवनवृत्त और चित्र लगाने का प्रस्ताव दिया था। परिजनों ने ढोली स्टेशन का नाम शहीद के नाम पर रखने की मांग की थी। तीन दशक बीत जाने के बाद भी वह फाइल रेल मंत्रालय के किसी कोने में धूल फांक रही है।

सोचिए  हमारी अगली पीढ़ी क्या सीखेगी?

यदि हम अपने शहीदों के प्रति इतने निष्ठुर रहेंगे, तो भविष्य की पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति का जज्बा कैसे पैदा होगा? अमीर सिंह ने अपने परिवार का भविष्य, अपनी पत्नी का सुहाग और अपना जीवन जिस देश के लिए कुर्बान किया, क्या वह देश उन्हें एक अदद साफ-सुथरा ‘शहीद द्वार’ और सरकारी अभिलेखों में सम्मानजनक स्थान भी नहीं दे सकता?

यह समय है कि प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज अपनी नींद से जागे। शहीद अमीर सिंह के जन्मस्थल का जीर्णोद्धार, ढोली स्टेशन का नामकरण और राजकीय सम्मान के साथ उनकी स्मृति को सहेजना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अन्यथा, आने वाला इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।

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