मुजफ्फरपुर (बिहार) बिहार की धरती अपनी कोख में न जाने कितने साम्राज्यों और सभ्यताओं का इतिहास समेटे हुए है। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड के अंतर्गत आने वाला लोहरगामा (लहरगामा) एक ऐसा ही पुरातात्विक स्थल है, जो आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। यहाँ वर्तमान में निर्माणाधीन ‘राम जानकी स्टेडियम’ की खुदाई ने उन अवशेषों को धरातल पर ला खड़ा किया है, जो सदियों से जमीन के नीचे दफन थे। लेकिन विडंबना यह है कि इन बेशकीमती साक्ष्यों को सहेजने के बजाय, उन्हें कंक्रीट के नीचे हमेशा के लिए दफन किया जा रहा है।

स्टेडियम निर्माण और मिट्टी से निकलता इतिहास
लोहरगामा पंचायत के राम जानकी मठ के समीप जब जेसीबी ने स्टेडियम के लिए खुदाई शुरू की, तो वह केवल मिट्टी नहीं बल्कि इतिहास उगलने लगी। खुदाई के दौरान भारी मात्रा में प्राचीन ईंटें, लोढ़ी, सिलौटी, चक्की (जांता) और विभिन्न प्रकार के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) बाहर आए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहाँ कई स्थानों पर मानव कंकालों के अवशेष भी मिले हैं। ये अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहाँ कभी एक सुव्यवस्थित बस्ती या सभ्यता निवास करती थी।

लेकिन इस पुरातात्विक महत्व को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। ग्रामीणों के अनुसार, स्टेडियम के पूर्वी छोर पर खुदाई के दौरान प्राचीन दीवार की संरचना मिली थी, जिसे मजदूरों ने बिना किसी जांच के पुनः नींव के अंदर दबा दिया।
सरकारी दस्तावेजों में पहचान और वर्तमान दुर्दशा
लोहरगामा केवल लोकश्रुतियों में नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों में भी दर्ज है। के.पी. जायसवाल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पटना द्वारा प्रकाशित ‘कैटलॉग ऑफ आर्केलाजिकल साइट्स इन बिहार‘ (भाग-2, पृष्ठ 10-11) में सकरा प्रखंड की सूची में इसे नौवें स्थान पर रखा गया है।
- ऐतिहासिक माप: अभिलेखों के अनुसार इस डीह (टीले) का रकबा 45 हजार वर्ग मीटर और ऊंचाई ढाई मीटर बताई गई है।
- अतीत बनाम वर्तमान: बुजुर्गों की मानें तो 35 वर्ष पहले इस मुख्य डीह की ऊंचाई 15 फीट से अधिक थी, जो आज अवैध अतिक्रमण और निर्माण के कारण मात्र 3 फीट रह गई है। यहाँ एक प्राचीन कुआँ था जिसे मिट्टी से भर दिया गया है, और उत्तर दिशा में स्थित एक विशाल तालाब अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें ले रहा है।
स्थापत्य कला और पुरातात्विक साक्ष्य
लोहरगामा से प्राप्त ईंटों का आकार इसकी प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहाँ से प्राप्त ईंटों की लंबाई 35 सेमी, चौड़ाई 14 सेमी और मोटाई 06 सेमी है। दिलचस्प बात यह है कि इसी आकार की ईंटें क्षेत्र के अन्य प्राचीन स्थलों जैसे भसौन के राम जानकी मठ और मतलुपुर के शिव मंदिर के जीर्णोद्धार के समय भी मिली थीं।
यहाँ मिले अवशेषों में दैनिक जीवन की वस्तुएं जैसे कौड़ी और चक्की भी शामिल हैं। जागरूकता की कमी का आलम यह है कि एक स्थानीय किसान यहाँ से प्राप्त प्राचीन चक्की (जांता) का उपयोग खेत में खूंटा ठोकने के लिए कर रहा है। यह हमारी विरासत के प्रति घोर उदासीनता का प्रतीक है।

बौद्ध धर्म से जुड़ाव की संभावना
विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का मानना है कि ‘लहरगामा’ शब्द में लगा ‘गामा‘ प्रत्यय इस स्थल के बौद्ध धर्म से जुड़े होने का संकेत देता है। प्राचीन काल में बौद्ध विहारों या केंद्रों के नाम के पीछे अक्सर ऐसे शब्द जुड़ते थे। यदि यहाँ वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई और शोध किया जाए, तो संभव है कि यह स्थल वैशाली या अन्य समकालीन बौद्ध केंद्रों की कड़ी के रूप में सामने आए।
विकास के नाम पर ‘इतिहास का कत्ल‘
लोहरगामा के मुख्य डीह पर बिना किसी पुरातात्विक अनापत्ति (NOC) के एक के बाद एक सरकारी निर्माण कराए जा रहे हैं।
- यहाँ पहले ही विद्यालय, पंचायत सरकार भवन और नलकूप बना दिए गए हैं।
- अब स्टेडियम का निर्माण शेष बची कड़ियों को भी नष्ट कर रहा है।
- पास ही बहने वाली कदाने नदी और यह टीला एक आदर्श प्राचीन सभ्यता की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हैं, जिसे अनदेखा किया जा रहा है।
इसके संरक्षण की आवश्यकता महत्वपूर्ण
लोहरगामा की मिट्टी से निकले अवशेष चीख-चीखकर पूछ रहे हैं कि क्या विकास का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना है? यहाँ मिले कंकाल किसके हैं? क्या यह किसी प्राचीन राजमहल का हिस्सा था या किसी भव्य मंदिर का? इन सवालों के जवाब केवल गहन पुरातात्विक जांच (Excavation) से ही मिल सकते हैं।
लोहरगामा पुरातात्विक स्थल के साथ की जा रही छेड़छाड़ केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि अपनी विरासत को बर्बाद करने का एक अपराध है। स्थानीय प्रशासन और बिहार सरकार के पुरातत्व विभाग को अविलंब इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। स्टेडियम निर्माण को रोककर पहले इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जाना अनिवार्य है।
“इतिहास केवल किताबों में नहीं होता, वह हमारी मिट्टी में भी धड़कता है। यदि आज हमने लोहरगामा को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें अपनी जड़ें मिटाने के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।”
लोहरगामा के संदर्भ में जिक्र किया, ‘गामा‘ प्रत्यय वाले गांवों का इतिहास बहुत गहरा है। भाषाई और ऐतिहासिक दृष्टि से ‘गामा’ शब्द संस्कृत के ‘ग्राम‘ का अपभ्रंश है, जो प्राकृत और पाली के प्रभाव से ‘गामा’ बना।
बिहार (विशेषकर मुजफ्फरपुर, दरभंगा और मिथिलांचल) और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इस प्रत्यय वाले कई प्रसिद्ध गांव आज भी हैं।
बिहार के प्रमुख ‘गामा‘ प्रत्यय वाले गांव
बिहार में ‘गामा’ अंत वाले गांव अक्सर प्राचीन बसावट या बौद्ध काल से जुड़े माने जाते हैं:
- लोहरगामा / लहरगामा: (मुजफ्फरपुर, सकरा) – यह एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है।
- सिंघिया-गामा: (समस्तीपुर/दरभंगा क्षेत्र) – यह इस क्षेत्र का काफी प्रसिद्ध गांव है।
- नैनगामा: (सहरसा/मधेपुरा क्षेत्र) – यह क्षेत्र भी अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है।
- भरगामा: (अररिया जिला) – यह एक पूरा प्रखंड (Block) भी है।
- कुशगामा: (दरभंगा जिला) – मिथिला क्षेत्र में स्थित।
- बहेड़ा-गामा: (दरभंगा/मधुबनी क्षेत्र)।
- पंडुगामा: (मुजफ्फरपुर और वैशाली के सीमावर्ती क्षेत्रों में)।
‘गामा‘ शब्द का ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व
इतिहासकारों और भाषाविदों के अनुसार, ‘गामा’ प्रत्यय वाले गांवों के पीछे कुछ विशेष तर्क दिए जाते हैं:
- बौद्ध कालीन जुड़ाव: पाली भाषा (जो बौद्ध धर्म की मुख्य भाषा थी) में ‘ग्राम’ को ‘गाम’ या ‘गामा’ कहा जाता था। भगवान बुद्ध के भ्रमण के दौरान कई स्थानों के नाम इसी तरह प्रचलित हुए। उदाहरण के लिए, पाली ग्रंथों में ‘कोटिगामा‘ (जो आज वैशाली के पास है) का उल्लेख मिलता है।
- प्राकृत प्रभाव: संस्कृत के शब्दों के सरलीकरण के दौरान ‘ग्राम’ शब्द ‘गाम’ और फिर स्थानीय बोली में ‘गामा’ हो गया।
- मठ और विहार: अक्सर जिन गांवों के नाम के अंत में ‘गामा’ लगा होता है, वहां प्राचीन काल में कोई बड़ा मठ, विहार या शिक्षण केंद्र होने के साक्ष्य मिलते हैं (जैसा कि आपके लोहरगामा में मिल रहे हैं)।
सिर्फ बिहार ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों और पड़ोस में भी इसके मिलते-जुलते रूप मिलते हैं:
- हरियाणा/पंजाब एवं जम्मू काश्मीर : यहाँ ‘गाम’ या ‘गाँव’ का प्रयोग अधिक होता है।
- श्रीलंका: यहाँ भी कई स्थानों के नाम के पीछे ‘गामा‘ लगता है (जैसे: महारगामा), जो शुद्ध रूप से बौद्ध संस्कृति और पाली भाषा के प्रभाव को दर्शाता है।


