विशेष खोजी आलेख: एस.एस. कुमार ‘पंकज’ (sskr.pankaj@gmail.com) की प्रस्तुति: न्यूज़ भारत टीवी
इतिहास के मलबे में दबी एक गौरवगाथा
इतिहास की यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अक्सर उन पन्नों को खो देता है, जहाँ किसी संस्कृति की नींव रखी गई होती है। बिहार के समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड का वैनी गांव आज अपनी इसी गुमनामी पर सिसक रहा है। यह केवल एक साधारण गांव नहीं, बल्कि मध्यकालीन मिथिला की वह धड़कन थी, जिसकी गूँज कभी दिल्ली की सल्तनत से लेकर बंगाल के पंचगौर तक सुनाई देती थी। यह वह पवित्र भूमि है, जिसकी मिट्टी में महाकवि विद्यापति का बचपन बीता, जहाँ उन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं को शब्द दिए और जहाँ ओइनवार राजवंश के प्रतापी राजाओं का राज्याभिषेक हुआ।
आज न्यूज़ भारत टीवी की इस विशेष और विस्तृत रिपोर्ट में हम वैनी (प्राचीन ओइनी) के गौरवशाली अतीत, इसके साहित्यिक महत्व, स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका और वर्तमान में प्रशासनिक उपेक्षा की पड़ताल करेंगे।
इतिहास के दर्पण में ओइनी की पहचान
ओइनी गांव की ऐतिहासिकता निर्विवाद है। प्रसिद्ध भाषाविद डॉ. ग्रियर्सन ने स्वतंत्रता पूर्व ही अपने शोध पत्रों में इस स्थल को रेखांकित किया था। दरभंगा गजेटियर के अनुसार, 1325 से 1525 ईस्वी के बीच मिथिला पर ओइनवार राजवंश का शासन रहा।
जब कर्नाट वंश के अंतिम शासक हरिसिंह देव गयासुद्दीन तुगलक के आक्रमण के कारण नेपाल की पहाड़ियों में चले गए, तब मिथिला में अराजकता फैल गई थी। उस संक्रमण काल में प्रशासनिक और सांस्कृतिक स्थिरता लाने का श्रेय इसी ओइनवार राजवंश को जाता है, जिसकी पहली राजधानी ओइनी (वैनी) ही थी। समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर भी इसे ऐतिहासिक स्थल के रूप में स्वीकार किया गया है।
ओइनवार शासक और ओइनी का वैभव
कामेश्वर ठाकुर के बाद भोगेश्वर ठाकुर और गणेश्वर ठाकुर ने ओइनी से ही शासन किया। इतिहास के अनुसार, इस वंश में कुल 17 राजा हुए। गणेश्वर ठाकुर के शासनकाल में ओइनी अपनी समृद्धि के शिखर पर था।
हालांकि, सत्ता के संघर्ष में गणेश्वर ठाकुर की छल से हत्या कर दी गई, जिसके बाद उनके पुत्रों—कीर्ति सिंह और वीर सिंह—को निर्वासित जीवन जीना पड़ा। उन्होंने ओइनी से कुछ दूर ‘विरसिणपुर’ (वर्तमान कल्याणपुर के पास) में शरण ली। बाद में जौनपुर के सुल्तान की मदद से कीर्ति सिंह ने पुनः अपना राज्य प्राप्त किया। करीब 75 वर्षों तक ओइनी मिथिला की राजधानी बनी रही, जब तक कि देवसिंह देव ने राजधानी को लहेरियासराय के निकट ‘देकुली’ नहीं बदल दिया।
ओइनी से ‘चकले वैनी‘ का सफर—नामकरण और भूगोल का रहस्य
समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड का वैनी गांव आज एक उपेक्षित पुरातात्विक स्थल बनकर रह गया है। लेकिन यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पता चलता है कि यह स्थल कभी तत्कालीन मिथिला राज्य की राजधानी रहा है।
बौद्ध काल से मुगल काल तक का सफर
इतिहासकार बताते हैं कि बौद्ध काल में इस क्षेत्र को ‘अयणी‘ गांव के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र अपनी उर्वरता और नदियों के समीप होने के कारण हमेशा से सामरिक महत्व का रहा। समय के साथ बदलते-बदलते बारहवीं शताब्दी तक यह नाम ‘अयणी’ से अपभ्रंश होकर ‘ओइनी‘ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इसी ‘ओइनी’ शब्द से इस क्षेत्र पर शासन करने वाले ब्राह्मण राजवंश का नाम ‘ओइनवार राजवंश‘ पड़ा।
अंग्रेजी ‘उच्चारण दोष‘ और वैनी का जन्म
मुगल काल के पतन के बाद जब भारत में अंग्रेजों का शासन आया, तो उनके भाषाई उच्चारण दोष ने इस गांव की पहचान को नया मोड़ दे दिया। अंग्रेज अधिकारियों के लिए ‘ओइनी’ बोलना कठिन था, सो अंग्रेज अधिकारी इसे वइनी बोलने लगे, और वहीं से उन्होंने दस्तावेजों में इसे ‘वइनी‘ (Waini) लिखना शुरू किया। आज राजस्व दस्तावेजों में इसका नाम विस्तारित होकर ‘चकले वैनी‘ हो चुका है।
स्वतंत्रता की ज्वाला—खुदीराम बोस और पूसा रेलवे स्टेशन
वैनी का इतिहास केवल मध्यकालीन राजाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान और भावुक कर देने वाली घटना भी इसी मिट्टी से जुड़ी है।
पूसा रेलवे स्टेशन : मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर रेलखंड पर स्थित खुदीराम बोस पूसा रेलवे स्टेशन वास्तव में इसी वैनी गांव की जमीन पर अवस्थित है। प्रारंभ में इस स्टेशन का नाम ‘वैनी पूसा‘ ही था। 18 साल की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे को चूमने वाले महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस की गिरफ्तारी इसी पूसा (वैनी) रेलवे स्टेशन के पास से हुई थी।
11 अगस्त 1908 को जब वे किंग्सफोर्ड पर बम फेंकने के बाद भाग रहे थे, तब वे पैदल ही कई मील का सफर तय कर वैनी पहुंचे थे। थके-हारे और भूखे खुदीराम ने यहाँ पानी मांगा और यहीं पुलिस के हत्थे चढ़ गए। आज स्टेशन का नाम बदलकर खुदीराम बोस पूसा कर दिया गया है, जो इस गांव के लिए गौरव की बात है, लेकिन इसके कारण वैनी की प्राचीन ‘राजधानी’ वाली पहचान कहीं पीछे छूट गई है।
आज यह गांव शहरीकरण और राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के प्रभाव में अपनी मौलिक पहचान खो रहा है। नई पीढ़ी इसे केवल ‘पूसा रोड’ के नाम से जानती है, और ‘वैनी’ शब्द जनमानस की स्मृति से ओझल होता जा रहा है।

साहित्य का तीर्थ—हिंदी और मैथिली के लिए ‘काशी‘ से कम नहीं
हिंदी और मैथिली साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों और छात्रों के लिए वैनी गांव का महत्व किसी ‘काशी‘ या ‘प्रयाग’ से कमतर नहीं है। यह वह स्थल है जहाँ साहित्य की धारा ने अपना रुख मोड़ा था।
विद्यापति की कर्मभूमि और गुरु परंपरा
विद्यापति ने ओइनवार राजवंश के जिन राजाओं के आश्रय में रहकर अपनी रचनाओं को लिखा, उनकी चर्चा के बिना हिंदी साहित्य का इतिहास अधूरा है। कीर्ति सिंह देव, शिव सिंह देव और भव सिंह देव जैसे राजाओं का उल्लेख विद्यापति के साहित्य में गौरव के साथ मिलता है। विद्वानों का मत है कि विद्यापति कीर्तिलता और कीर्तिपताका जैसी कालजयी रचनाएं इसी ओइनी की मिट्टी पर बैठकर लिखी गईं।
विद्यापति ने यहाँ पंडित हरिमिश्र के सानिध्य में विद्या अध्ययन किया था। पंडित हरिमिश्र का भतीजा पक्षधर मिश्र विद्यापति के सहपाठी थे। साहित्य के छात्रों के लिए यह स्थल एक ‘जीवंत पुस्तकालय’ की तरह है, जहाँ विद्यापति के ‘खेलन कवि’ से ‘महाकवि’ बनने का सफर दफन है।
ओइनवार राजवंश—मिथिला के नए युग का सूत्रपात
वैनी के इतिहास को समझने के लिए हमें ओइनवार राजवंश के उदय को समझना होगा। यह मिथिला के इतिहास का वह अध्याय है जिसने ‘कर्नाट वंश’ के पतन के बाद इस क्षेत्र की बागडोर संभाली।
कौन थे ओइन ठाकुर?
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि कर्नाट वंश के अंतिम शासक राजा हरिसिंह देव के अत्यंत विश्वासपात्र और राजपुरोहित कामेश्वर झा (ठाकुर) ओइनी गांव के ही मूल निवासी थे। उनके पूर्वजों के बारे में उल्लेख मिलता है कि जगतपुर निवासी हिंगू ठाकुर के पुत्र और जयपति ठाकुर के पौत्र नाथ ठाकुर को तत्कालीन शासकों द्वारा सरैसा परगना का ‘ओइनी’ गांव छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) या धार्मिक अनुदान के रूप में मिला था। ओइनी गांव का स्वामी होने के कारण नाथ ठाकुर के वंशज ‘ओइनवार‘ कहलाए।
1353 ईस्वी: एक ऐतिहासिक मोड़
समय था चौदहवीं शताब्दी का। दिल्ली की सल्तनत पर गयासुद्दीन तुगलक के बाद फिरोजशाह तुगलक का प्रभाव बढ़ रहा था। 1323-24 के आसपास जब तुगलक सेना ने मिथिला के सिमरांवगढ़ (नेपाल की तराई) पर धावा बोला, तो राजा हरिसिंह देव ने प्रतिरोध के बजाय अपने परिवार और खजाने के साथ हिमालय की कंदराओं में शरण लेना बेहतर समझा। जाने से पहले उन्होंने शासन का गुरुतर दायित्व अपने विद्वान पुरोहित कामेश्वर ठाकुर को सौंपा।
आगे चलकर 1353 ईस्वी में सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने आधिकारिक तौर पर कामेश्वर ठाकुर को मिथिला का ‘करद राजा’ (Tributary King) नियुक्त किया। कामेश्वर ठाकुर ने ओइनी को अपनी प्रथम राजधानी बनाया और यहीं से ओइनवार राजवंश का 174 वर्षों का शासनकाल शुरू हुआ।
ओइनवार शासक और ओइनी का स्वर्णकाल
ओइनी गांव केवल एक निवास स्थान नहीं था, बल्कि यह शक्ति का केंद्र था। कामेश्वर ठाकुर द्वारा स्थापित इस राजवंश में कुल 17 राजा हुए, जिन्होंने मिथिला की कला, संस्कृति और न्याय व्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
गणेश्वर ठाकुर का शासन और त्रासदी
कामेश्वर ठाकुर के बाद भोगेश्वर ठाकुर और उनके उपरांत गणेश्वर ठाकुर ने ओइनी से शासन किया। गणेश्वर ठाकुर के समय में ओइनी एक समृद्ध नगरी के रूप में विकसित हुई। लेकिन 1371 ईस्वी के आसपास, ‘अस्लान’ (अलसान) नामक एक विश्वासघाती और साम्राज्यलोभी तुर्क हमलावर ने गणेश्वर ठाकुर की छल से हत्या कर दी। इस घटना ने ओइनी को रक्तपात से भर दिया। गणेश्वर के छोटे पुत्रों (कीर्ति सिंह और वीर सिंह) को अपनी जान बचाने के लिए ओइनी छोड़कर निर्वासित जीवन जीना पड़ा।
कीर्ति सिंह और ओइनी की पुनर्वापसी
विद्यापति की पुस्तक ‘कीर्तिलता’ में इस निर्वासन और संघर्ष का मार्मिक वर्णन है। गणेश्वर ठाकुर के पुत्रों ने जौनपुर के सुल्तान इब्राहिम शाह शर्की से मदद मांगी। एक भीषण युद्ध के बाद उन्होंने अपने पिता के हत्यारे अस्लान को पराजित किया। इस युद्ध में वीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन कीर्ति सिंह ने 1402 ईस्वी में पुनः मिथिला का सिंहासन प्राप्त किया और ओइनी को फिर से राजधानी के गौरव से मंडित किया।
राजधानी का स्थानांतरण: इस वंश के शासक देवसिंह ने पहली बार ओइनी से हटाकर ‘देकुली’ (लहेरियासराय के पास) को राजधानी बनाया। हालांकि, सांस्कृतिक केंद्र के रूप में ओइनी का महत्व बना रहा।
विद्यापति की कर्मस्थली—साक्ष्यों और तर्कों की कसौटी पर
मिथिलांचल का बच्चा-बच्चा विद्यापति की पदावली गाते हुए बड़ा होता है। लेकिन विद्यापति के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कालखंड कहाँ बीता? इस पर शोधार्थियों के बीच गहन चर्चा है। वैनी के विद्वानों और ऐतिहासिक स्रोतों का दावा है कि विद्यापति का किशोरावस्था और उनकी लेखनी का उत्कर्ष इसी ओइनी की मिट्टी में हुआ।
गणपति ठाकुर का ओइनी निवास
विद्यापति के पिता गणपति ठाकुर, राजा गणेश्वर ठाकुर के मुख्य सभासद और राज पंडित थे। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो राजा की राजधानी ओइनी थी। विद्यापति का पैतृक घर मधुबनी जिले के ‘बिस्फी’ गांव में था। ओइनी से बिस्फी की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। 14वीं शताब्दी में, जब रास्ते दुर्गम थे और बीच में गंडक, बागमती तथा कमला जैसी नदियाँ उफान पर रहती थीं, यह किसी भी तरह संभव नहीं था कि गणपति ठाकुर प्रतिदिन बिस्फी से ओइनी दरबार आ सकें। अतः यह स्पष्ट है कि गणपति ठाकुर अपने परिवार के साथ ओइनी के राजदरबार के समीप ही निवास करते थे।
‘खेलन कवि‘ और शिवसिंह की मित्रता
विद्यापति राजा शिवसिंह के बाल सखा थे। शिवसिंह, देवसिंह के पुत्र थे। विद्यापति ने अपने साहित्य में स्वयं को ‘खेलन कवि‘ कहा है। इसका अर्थ है वह कवि जो राजा के साथ खेलते-कूदते बड़ा हुआ। यदि राजा का बचपन ओइनी की राजधानी में बीता, तो निश्चित रूप से विद्यापति का बचपन भी इसी मिट्टी में बीता। पंडित हरि मिश्र के गुरुकुल की चर्चा आती है, जहाँ विद्यापति और शिवसिंह ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी। वैनी गांव के आसपास ऐसे प्राचीन गुरुकुलों के अवशेषों पर अनुसंधान की भारी आवश्यकता है।
कीर्तिलता की रचना स्थली
विद्यापति ने ‘कीर्तिलता’ की रचना 1402 से 1410 के बीच की थी। उस समय कीर्ति सिंह ओइनी से शासन कर रहे थे। ग्रंथ की भाषा और उसमें वर्णित ओइनी के वैभव तथा विध्वंस का चित्रण इस बात का प्रमाण है कि विद्यापति ने इसकी रचना ओइनी के राजदरबार में बैठकर ही की थी।
पुरातात्विक संपदा—मिट्टी में दबे साम्राज्य के अवशेष
वैनी गांव के उत्तर में दो विशाल टीले हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ‘शिवसिंह डीह‘ के नाम से पुकारते हैं। ये टीले आज भी अपने भीतर इतिहास के कई रहस्य दबाए हुए हैं।
खुदाई में मिले अवशेष
ग्रामीणों के अनुसार, इन टीलों के पास अक्सर प्राचीन वस्तुएं मिलती रहती हैं:
- सिक्के और मुद्राएं: यहाँ से स्वर्ण और ताम्र सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- काले पत्थर की मूर्तियां: खेती के दौरान नरसिंह भगवान की खंडित प्रतिमाएं मिली हैं।
- मृदभांड: गुप्तकालीन और मध्यकालीन मिट्टी के बर्तन।
- नर कंकाल: 25 जून 2011 को यहाँ खुदाई के दौरान एक नर कंकाल मिला था, जो बैठने की मुद्रा में था। इससे पहले भी ऐसे अवशेष मिले हैं, जिन्हें प्रशासन ने रहस्य की चादर में लपेट दिया।
वैनी मठ और प्राचीन कुएं
गांव में स्थित वैनी मठ और उसके पास का पुराना कुआँ अपनी बनावट में अनूठा है। मठ की नींव में प्रयुक्त होने वाली ईंटें (खजुरिया ईंट) अत्यंत प्राचीन हैं। मठ के वर्तमान मठाधीश डॉ. नरसिंह दास के अनुसार, यह स्थल कभी तीन बड़े मठों का केंद्र था, जो अब विध्वंस के कारण लुप्त हो रहे हैं।

विदेशी आक्रमण और ओइनी का विध्वंस
ओइनी का पतन दो बार हुए विदेशी आक्रमणों के कारण हुआ।
- पहला विध्वंस अस्लान (अलसान) के सैनिकों ने किया, जिसने राजा गणेश्वर ठाकुर की हत्या के बाद ओइनी में भयंकर रक्तपात मचाया।
- दूसरा विध्वंस तब हुआ जब जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह ने आक्रमण किया। उसने राजा शिवसिंह की पैतृक राजधानी ओइनी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। यही कारण है कि आज यहाँ भव्य महलों के स्थान पर केवल मिट्टी के टीले बचे हैं।
वर्तमान त्रासदी—प्रशासनिक उपेक्षा और अतिक्रमण
यह इस न्यूज़ रिपोर्ट का सबसे कड़वा सच है। जिस स्थल को ‘राष्ट्रीय विरासत’ घोषित होना चाहिए था, वह आज ‘पंचायत सरकार भवन‘ के नाम पर ढहाया जा रहा है।
इतिहास पर कंक्रीट का प्रहार
शिवसिंह डीह के पश्चिमी हिस्से पर पंचायत भवन की नींव डालकर इसके इतिहास को मटियामेट करने का प्रयास किया गया है। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि भवन निर्माण के लिए की गई खुदाई के दौरान कई बहुमूल्य पुरावशेष गायब कर दिए गए।

विद्यापति कर्मभूमि उत्थान मंच का संघर्ष
स्थानीय ग्रामीण और विद्वान रमेश झा ‘गुलाब‘ के नेतृत्व में ‘विद्यापति कर्मभूमि उत्थान मंच’ के माध्यम से वर्षों से इस स्थल के संरक्षण की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने विद्यापति की निर्वाण भूमि (विद्यापति नगर) को तो पर्यटन मानचित्र पर स्थान दिया, लेकिन उनकी कर्मभूमि वैनी को लावारिस छोड़ दिया।
मंच के अध्यक्ष रमेश झा ‘गुलाब‘ कहते हैं, “जिले भर में विद्यापति से संबंधित एक ‘विद्यापति नगर‘ ही प्रसिद्ध है, जहाँ उन्होंने प्राण त्यागे थे। लेकिन जहाँ विद्यापति ने अपना बहुमूल्य समय बिताया, उस ओइनी का सरकारी स्तर पर कोई नाम लेने वाला नहीं है। अब तो इस ऐतिहासिक धरती पर पंचायत भवन बनाकर इसे हमेशा के लिए मिटाने की कोशिश हो रही है।”
एक अपील : क्या हम अपनी जड़ों को बचा पाएंगे?
वैनी (ओइनी) केवल एक गांव नहीं, बल्कि मिथिला की अस्मिता का प्रतीक है। यह वह स्थान है जहाँ से मिथिला के महानतम कवि की प्रेरणा का स्रोत फूटता था। जहाँ की मिट्टी में गोनू झा, गंगेश उपाध्याय और दामोदर मिश्र जैसे विद्वानों के पैरों की छाप है।
प्रशासनिक उपेक्षा का आलम यह है कि इतने महत्वपूर्ण स्थल को जिला स्तरीय पर्यटन सूची में भी शामिल नहीं किया गया है। यदि आज हम इस ‘विस्मृत राजधानी’ को नहीं बचाते हैं, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें इस सांस्कृतिक अपराध के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।
न्यूज़ भारत टीवी इस विस्तृत रिपोर्ट के माध्यम से बिहार सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और संस्कृति मंत्रालय से अपील करता है कि:
- वैनी के शिवसिंह डीह का वैज्ञानिक उत्खनन कराया जाए।
- पंचायत भवन जैसे अवैध निर्माणों को रोककर इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए।
- यहाँ एक ‘विद्यापति शोध केंद्र’ और संग्रहालय की स्थापना की जाए।
- वैनी को राजकीय सम्मान के साथ ‘विद्यापति की कर्मभूमि’ और ‘स्वतंत्रता संग्राम स्मारक’ के रूप में विकसित किया जाए।
- हिंदी और मैथिली के छात्रों के लिए यहाँ शोध केंद्र की स्थापना हो।
मिथिला का गौरव तभी सुरक्षित रहेगा जब हम अपनी जड़ों का सम्मान करना सीखेंगे। वैनी की मिट्टी आज भी पुकार रही है—क्या कोई है जो उसके दफन इतिहास को आवाज दे सके?
ब्यूरो रिपोर्ट: न्यूज़ भारत टीवी (समस्तीपुर) विशेष सहयोग: स्थानीय ग्रामीण एवं प्रबुद्ध नागरिक


