ताने सहकर भी नहीं थमे कदम: चूल्हे-चौके से निकलकर ‘विजेता’ ने तय किया नेशनल फुटबॉल तक का सफर

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    मुजफ्फरपुर। अक्सर कहा जाता है कि प्रतिभा सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, लेकिन मुजफ्फरपुर के पिपरी गांव की विजेता ने इस जुमले को हकीकत में जीकर दिखाया है। एक ऐसा गांव जहां शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है, वहां एक लड़की भोर के अंधेरे में फुटबॉल लेकर निकलती है ताकि वह अपने उन सपनों को सच कर सके, जो उसने खुली आंखों से देखे हैं।

    तानाकशी और मैदानकी जंग

    विजेता का सफर कभी आसान नहीं था। ग्रामीण परिवेश में जहां लड़कियों के लिए पढ़ाई ही बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, वहां फुटबॉल जैसे ‘शारीरिक और आक्रामक’ खेल को चुनना किसी बगावत से कम नहीं था। जब विजेता शॉर्ट्स पहनकर मैदान में उतरती थीं, तो राह चलते लोगों की टिप्पणियां और ताने उनके कानों तक पहुँचते थे। लेकिन विजेता का ‘फोकस’ गोल पोस्ट पर था।

    आज वही लोग, जो कभी उपहास उड़ाते थे, विजेता के घर के बाहर पदक देखने के लिए अब घर आते हैं। कामयाबी ने न सिर्फ आलोचकों के मुंह बंद किए हैं, बल्कि विजेता को पूरे जिले का गौरव बना दिया है।

    मेडल एवं प्रमाणपत्र को दिखाती नेशनल अवार्ड से सम्‍मानित विजेता
    प्रमाण पत्र एवं पदक के साथ विजेता की तस्‍वीर

    एक सूटकेसजो छोटा पड़ गया

    विजेता की काबिलियत का सबसे बड़ा गवाह उनके घर में रखा वह बड़ा सा नीला सूटकेस है। आमतौर पर सूटकेस कपड़ों के लिए होते हैं, लेकिन विजेता का सूटकेस प्रमाणपत्रों, मेडल और ट्रॉफियों से लबालब भरा है।

    • राज्य खेल सम्मान (2022): असम के गुवाहाटी में आयोजित नेशनल जूनियर महिला फुटबॉल में शानदार प्रदर्शन के लिए 29 अगस्त को उन्हें यह प्रतिष्ठित अवार्ड मिला।
    • बिहार खेल सम्मान (2021): खेल में उनके निरंतर उत्कृष्ट योगदान के लिए राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित किया।
    • सफरनामा: कटक (ओडिशा) से लेकर मध्य प्रदेश, हरियाणा, मणिपुर और आंध्र प्रदेश के मैदानों तक विजेता के जूतों के निशान छपे हैं।

    पढ़ाई बनाम खेल: जब जुनून ने चुनी राह

    विजेता वर्तमान में मुजफ्फरपुर के एमडीडीएम कॉलेज में इंटर (विज्ञान) की छात्रा हैं। उनके जीवन में एक वक्त ऐसा आया जब उनके सामने दो रास्ते थे—एक तरफ इंटर की बोर्ड परीक्षा और दूसरी तरफ ‘खेलो इंडिया’ के लिए मध्य प्रदेश जाने का अवसर। एक सामान्य छात्र परीक्षा चुनता, लेकिन विजेता ने खेल को चुना। 1 फरवरी से शुरू होने वाली परीक्षा छोड़कर वह मैदान में उतर गईं। यह फैसला उनके उस अटूट विश्वास को दर्शाता है कि उनकी असली पहचान मैदान से ही बनेगी।

    पिपरी के स्‍कूल  के मैदान में भाई सुधीर के साथ अभ्‍यास करते हुए विजेता की तस्‍वीर

    चूल्हा, चक्की और फुटबॉल का तालमेल

    विजेता की असलियत किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। एक तरफ वह राष्ट्रीय स्तर पर डिफेंडर्स को छकाती हैं, तो दूसरी तरफ घर लौटकर अपनी माँ उषा देवी के साथ लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हैं। उनके ‘रीडिंग रूम’ के नाम पर एक साधारण सा तख्त है जहां कुछ किताबें रखी हैं, लेकिन इसी तख्त पर बैठकर उन्होंने 10वीं में 65% अंक हासिल कर अपनी मेधा का परिचय दिया।

    परिवार: जीत की असली बैकबोन

    पिता कमलेश राय, जो खुद एक शिक्षक हैं, ने अपनी बेटी को वह पंख दिए जो अक्सर ग्रामीण समाज में काट दिए जाते हैं। घर का माहौल किसी स्पोर्ट्स एकेडमी जैसा है:

    • भाई सुधीर: जो विजेता के लिए कोच की भूमिका निभाता है और तकनीक पर काम करता है।
    • बहन रागिनी: जो अभ्यास के दौरान साये की तरह साथ रहती है, कभी पानी लेकर तो कभी हौसला बढ़ाकर।
    • प्रशिक्षण: घर के बाहर उन्हें तरुण प्रकाश और जिला कोच असगर हुसैन की पारखी नजरों ने तराशा है।

    लक्ष्य: अब नीली जर्सीका इंतजार

    मुजफ्फरपुर की इस बेटी का मिशन अब बिल्कुल साफ है। वह अब केवल राज्यों के लिए नहीं, बल्कि देश के लिए खेलना चाहती हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करना और दुनिया को दिखाना है कि बिहार के सुदूर गांवों में कितनी ‘विजेता’ छिपी हुई हैं।


    विजेता की कहानी उन हजारों लड़कियों के लिए मशाल है जो अभावों के कारण अपने सपनों को दम तोड़ते देख रही हैं। वह बताती हैं कि भले ही पैर मिट्टी में सने हों और पेट में भूख हो, लेकिन अगर नजरें ‘लक्ष्य’ पर जमी हैं, तो आसमान छूना नामुमकिन नहीं है।

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