विशेष रिपोर्ट: न्यूज़ भारत टीवी
बिहार की भूमि को यदि ‘इतिहास की जननी’ कहा जाए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब हम बिहार के पुरातात्विक मानचित्र पर दृष्टि डालते हैं, तो नालंदा के खंडहर, वैशाली का लोकतंत्र, राजगीर की पहाड़ियाँ और गया के आध्यात्मिक अवशेष स्वतः ही मस्तिष्क में उभर आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी बिहार के हृदय स्थल में बसा समस्तीपुर जिला आज एक ऐसी पुरातात्विक क्रांति की दहलीज पर खड़ा है, जो बिहार के प्राचीन इतिहास के कई पन्नों को फिर से लिखने की क्षमता रखता है?
हालिया शोधों और काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान की रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। समस्तीपुर जिले में 135 से अधिक पुरातात्विक स्थलों को चिन्हित किया गया है। ये स्थल केवल मिट्टी के ढेर नहीं हैं, बल्कि नवपाषाण काल से लेकर गुप्त काल तक के छह सांस्कृतिक चरणों के मूक गवाह हैं।

पुरातात्विक उपेक्षा और छिपे हुए खजाने
पूरे बिहार में पुरातात्विक स्थलों की संख्या 2,500 से अधिक है, और यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। विडंबना यह है कि इनमें से केवल 5 प्रतिशत जानकारी ही आम जनता तक पहुँच पाई है, वह भी आधी-अधूरी। शेष 95 प्रतिशत विरासत आज भी सरकारी फाइलों में कैद है। समस्तीपुर के ये 135 स्थल भी एक ऐसे कुशल शोधकर्ता और उत्खनन की राह देख रहे हैं, जो इन्हें काल के गर्त से निकालकर इनकी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित कर सके।
न्यूज़ भारत टीवी ने इस अनकही कड़ी को एक सूत्र में पिरोने का बीड़ा उठाया है। हम केवल उन 135 स्थलों की बात नहीं कर रहे, बल्कि उन दर्जनों अन्य क्षेत्रों को भी प्रकाश में ला रहे हैं जो पर्यटन और शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, किंतु आधिकारिक सूचियों से अब तक गायब हैं।
नाम के पीछे का इतिहास: सोमवस्ती से समस्तीपुर तक
समस्तीपुर का नामकरण अपने आप में एक ऐतिहासिक पहेली है। इसके पीछे कई रोचक किंवदंतियाँ और ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं:
- सोमवस्ती और आर्य परंपरा: प्राचीन काल में इस क्षेत्र को ‘सोम बस्ती’ या ‘सोमवती’ कहा जाता था। सोम, जो आर्यों के प्रमुख देवता थे, के नाम पर इसका नाम ‘सोमवस्तीपुर’ पड़ा, जो कालांतर में ‘समवस्तीपुर’ और अंततः ‘समस्तीपुर’ बन गया।
- शम्सुद्दीन इलियास का प्रभाव: एक अन्य मत के अनुसार, बंगाल के सुल्तान हाजी शम्सुद्दीन इलियास ने इस शहर को बसाया था, जिससे इसका नाम ‘शम्सुद्दीनपुर’ पड़ा और बाद में यह समस्तीपुर के रूप में विख्यात हुआ।
- मिथिला का प्रवेश द्वार: समस्तीपुर को मिथिला का प्रवेश द्वार माना जाता है। लोकश्रुति है कि यहाँ आकर मिथिला की ‘समस्त अस्थियां’ (सीमाएं या अवशेष) समाप्त हो जाती थीं, इसलिए इसे समस्तीपुर कहा गया।
- सिल्लिंग और सिक्के: दलसिंहसराय के पगड़ा पंचायत में उत्खनन के दौरान कुषाणकालीन सिक्के और ब्राह्मी लिपि में ‘समस’ अंकित सिल्लियां मिली हैं, जो इसके नामकरण पर ऐतिहासिक प्रकाश डालती हैं।
सांस्कृतिक विरासत के छह चरण
समस्तीपुर की मिट्टी में सभ्यता के विकास के छह प्रमुख चरण दबे हुए हैं। यहाँ नवपाषाण काल के पत्थरों के औजारों से लेकर गुप्त काल की भव्य मूर्तिकला तक के अवशेष मिलते हैं। इस क्षेत्र ने ओइनवार, खण्डेवाल और द्रोणवार जैसे प्रतापी राजवंशों का शासन देखा है।
पांड का उत्खनन: एक नई दिशा
दलसिंहसराय का ‘पांड’ आज पुरातत्वविदों के लिए आकर्षण का केंद्र है। चेचर और चिरांद के बाद, पांड ही वह स्थल है जिसने बिहार के प्राचीन इतिहास को नई गहराई दी है। यहाँ के उत्खनन ने साबित कर दिया है कि समस्तीपुर प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों का मुख्य केंद्र था।
प्रमुख पुरातात्विक स्थल और उनकी महत्ता
समस्तीपुर के विभिन्न प्रखंडों में बिखरी विरासत की एक संक्षिप्त झलक नीचे दी गई है:
| स्थल का नाम | संबंधित काल/महत्ता | विशेषता |
| पांड (दलसिंहसराय) | ताम्रपाषाण से मध्यकाल | बिहार का महत्वपूर्ण उत्खनन स्थल |
| गरीया डीह | कुषाण काल | प्राचीन सिक्कों और मिट्टी के बर्तनों के अवशेष |
| विशनपुर मेढ़ी व बेला मेघ | गुप्त काल | स्थापत्य कला और धार्मिक अवशेष |
| नेमी डीह (हसनपुर) | ताम्रपाषाण काल | पांड के समान प्राचीन और विस्तृत |
| गनपुर डीह (सरायरंजन) | कुषाण काल | व्यापारिक केंद्र होने के साक्ष्य |
| सूरजपुर (मोरवा) | कुषाण काल | सांस्कृतिक विकास का कालखंड |
| मोरवा गढ़ | गुप्त काल | सामरिक और प्रशासनिक महत्व |
| करियन डीह (शिवाजीनगर) | प्राचीन काल | महान दार्शनिक उदयनाचार्य की कर्मभूमि |
सामाजिक और धार्मिक सद्भाव की स्थली
समस्तीपुर केवल ईंटों और पत्थरों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह लोक आस्था का भी संगम है:
- बाबा अमरसिंह स्थान (षिउरा): निषाद समाज की अटूट आस्था का केंद्र।
- विद्यापति धाम: महान मैथिली कवि विद्यापति की निर्वाण स्थली, जो शिव भक्तों के लिए काशी के समान है।
- खुदनेश्वर स्थान (मोरवा): हिंदू-मुस्लिम एकता का अनूठा प्रतीक, जहाँ एक ही परिसर में मंदिर और मजार स्थित हैं।
- संत दरिया आश्रम (पटोरी): दरियापंथियों का सबसे बड़ा केंद्र, जो मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की याद दिलाता है।
- रोसड़ा कबीर मठ और निरंजन स्थान: यहाँ की विविध धार्मिक परंपराओं को दर्शाते हैं।
आधुनिक इतिहास और विद्वता की धाक
अंग्रेजों के आगमन से पहले ही दिल्ली, जौनपुर और बंगाल के शासकों की नजर समस्तीपुर की उर्वर भूमि पर थी, जिसे ‘सोना उगलने वाली मिट्टी’ कहा जाता था। 1874 में बिहार में पहली बार रेल का इंजन इसी जिले की धरती पर दौड़ा था, जो इसके आर्थिक महत्व को दर्शाता है।
साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में भी यहाँ के विद्वानों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धाक रही है। शिवाजीनगर प्रखंड के करियन डीह से ‘श्रुति संदेश’ नामक पत्रिका का संपादन हुआ, जिसे भारत की संभवतः प्रथम हस्तलिखित पत्रिका माना जाता है। यह तथ्य प्रमाणित करता है कि यहाँ की धरती सदियों से बौद्धिक चेतना का केंद्र रही है।
आज समस्तीपुर की यह समृद्ध विरासत संकट में है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण कई पुरातात्विक टीलों (डीह) पर बस्तियाँ बस गई हैं। अतिक्रमण और जागरूकता के अभाव में प्राचीन अवशेष नष्ट हो रहे हैं। ‘काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान’ की सूची में शामिल 135 स्थल आज भी केवल फाइलों तक सीमित हैं।
समस्तीपुर जिले के कण-कण में इतिहास रचा-बसा है। यदि इन 135 स्थलों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और पर्यटन विकास किया जाए, तो समस्तीपुर न केवल बिहार बल्कि वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नालंदा और वैशाली के समकक्ष खड़ा हो सकता है। न्यूज़ भारत टीवी का यह प्रयास समाज और सरकार को जगाने की एक कोशिश है ताकि हम अपनी जड़ों को पहचान सकें और उन्हें सहेज सकें।
इन स्थलों को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि हम सभी की है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह बता पाएंगे कि जिस मिट्टी पर वे चल रहे हैं, उसके नीचे सम्राटों का वैभव और ऋषियों का ज्ञान दबा पड़ा है?


