सकरा, मुजफ्फरपुर । सकरा हाई स्कूल रोड स्थित ‘विजन वैली हॉल’ के प्रांगण में रविवार को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एक भव्य और विचारोत्तेजक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रखंड के विभिन्न गांवों से आई सैकड़ों महिलाओं ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को उनके गौरवशाली इतिहास से परिचित कराना और वर्तमान समय में उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना था।

इतिहास के पन्नों से: शिकागो की वह क्रांति और ‘जारा‘ का बलिदान
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता नमिता सिंह ने अपने संबोधन की शुरुआत अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उस रक्तरंजित और गौरवशाली इतिहास से की, जिससे आज की पीढ़ी का बड़ा हिस्सा अनभिज्ञ है। उन्होंने विस्तार से बताया कि महिला दिवस महज एक औपचारिकता या उत्सव नहीं है, बल्कि यह दशकों लंबे दमन के खिलाफ उठी क्रांति की उपज है।
नमिता सिंह ने ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए बताया कि इसकी शुरुआत साल 1908 में अमेरिका के शिकागो शहर से हुई थी। वहां एक कपड़ा मिल में काम करने वाली ‘जारा‘ नाम की महिला और उनके साथ काम करने वाली अन्य महिला कामगारों ने बंधुआ मजदूरी जैसी अमानवीय स्थितियों के खिलाफ बिगुल फूंका था। उस समय महिलाओं से 15-15 घंटे काम लिया जाता था, न उन्हें आराम का समय मिलता था और न ही अपने परिवार के साथ बिताने का वक्त।
जारा के नेतृत्व में महिलाओं ने दुनिया के सामने एक क्रांतिकारी मांग रखी थी: “8 घंटा काम, 8 घंटा आराम और 8 घंटा निजी काम”। 24 घंटे के इस न्यायपूर्ण बंटवारे की मांग को दबाने के लिए मिल मालिकों ने बर्बरता का सहारा लिया। मिल में आग लगवा दी गई और पुलिस द्वारा गोलियां चलवाई गईं, जिसमें जारा और उनके साथ कई जांबाज महिलाएं शहीद हो गईं। उन्हीं के इस महान बलिदान की याद में बाद में 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दी।
नमिता सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा, “आज हम फिर उसी दिशा में जा रहे हैं। निजी कंपनियों और क्षेत्रों में काम के घंटे 8 से बढ़कर 10-12 हो रहे हैं। यह आधुनिक गुलामी की आहट है, जिसके खिलाफ हमें अपनी एकजुटता बनाए रखनी होगी।”

शिक्षा: स्वाभिमान और सुरक्षा का एकमात्र शस्त्र
विशिष्ट वक्ता कामिनी कुमारी ने महिलाओं की वर्तमान स्थिति और सुरक्षा पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि आज भी महिलाएं घर, बाहर और समाज में खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती हैं। इसका समाधान केवल कानून में नहीं, बल्कि ‘शिक्षा’ में छिपा है।
कामिनी कुमारी ने जोर देकर कहा, “शिक्षा वह हथियार है जिससे समाज की हर बेड़ी को काटा जा सकता है। बिना शिक्षित हुए हम अपने अधिकारों—जैसे समान काम के लिए समान वेतन और सामाजिक सम्मान—की लड़ाई नहीं लड़ सकते।” उन्होंने उपस्थित माताओं से अपील की कि चाहे कितनी भी कठिनाई आए, वे अपने बच्चों, विशेषकर बेटियों को जरूर पढ़ाएं। जब महिलाएं शिक्षित होंगी, तभी समाज में उनके साथ होने वाला भेदभाव समाप्त होगा।

जीवन दर्शन, स्वास्थ्य और मानसिक शांति का संदेश
कार्यक्रम में केवल अधिकारों की ही नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और नैतिकता पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने जीवन दर्शन के महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के स्वार्थपूर्ण युग में किसी की मजबूरी का लाभ उठाना सबसे बड़ा अधर्म है। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, इसलिए हमें प्रेम और भाईचारे के साथ जीवन जीना चाहिए।
सफलता के सूत्र बताते हुए कहा गया कि केवल सपने देखने से मंजिल नहीं मिलती, उसके लिए कठिन परिश्रम और कड़े अनुशासन की आवश्यकता होती है। यदि संघर्ष में हार मिले, तो उसे एक ‘सीख’ मानकर निरंतर प्रयास करना चाहिए।

स्वास्थ्य पर विशेष सत्र में यह संदेश दिया गया कि “स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी पूंजी है।” धन-दौलत का कोई मूल्य नहीं रह जाता यदि शरीर स्वस्थ न हो। महिलाओं को अपनी व्यस्त दिनचर्या में से खुद के लिए समय निकालने, योग, प्राणायाम और सकारात्मक सोच को अपनाने की सलाह दी गई।
विजन वैली हॉल की सराहनीय पहल: मातृशक्ति को समर्पित मंच
इस कार्यक्रम की एक और विशेषता विजन वैली हॉल के संचालक राजेश कुमार की संवेदनशीलता रही। उन्होंने न केवल इस पूरे कार्यक्रम के लिए अपना हॉल निशुल्क उपलब्ध कराया, बल्कि स्वयं मंच संचालन की जिम्मेदारी भी निभाई।
राजेश कुमार ने मंच से भावुक होते हुए कहा, “मैं आज जो कुछ भी हूं, अपनी माता के आशीर्वाद से हूं। उन्होंने मुझे जन्म दिया और संस्कार दिए। आज का यह आयोजन उन सभी माताओं और बहनों के सम्मान में मेरी ओर से एक छोटी सी सेवा है। महिला शक्ति के इस कार्यक्रम के लिए मेरा मंच हमेशा उपलब्ध रहेगा।” उनके इस कदम की कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों ने सराहना की।

सम्मान और एकजुटता का संकल्प
कार्यक्रम के अंतिम चरण में क्षेत्र की सक्रिय महिलाओं और उपस्थित अतिथियों को मंच पर बुलाकर माला पहनाकर सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाली महिलाओं में ममता कुमारी, प्रतिभा कुमारी, चंद्रकला देवी, मिनती देवी, महेश्वरी देवी, बीना कुमारी, संगीता कुमारी, तारा देवी और अन्य शामिल थीं।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख लोगों में राजेश कुमार, नमिता सिंह, कामिनी कुमारी, शोभा देवी, रंजीता, लक्ष्मी कुमारी, प्रेमा कुमारी, विमल कुमारी, सुधा देवी, पिंकी कुमारी, रेखा देवी, उर्मिला, सौदा खातून, अनुराधा देवी, सुनील कुमार और रमई राम सहित कई गणमान्य व्यक्ति शामिल रहे।
सकरा के इस कार्यक्रम ने यह संदेश साफ कर दिया कि जब तक महिलाएं जाति, धर्म और आर्थिक भेदभाव को भुलाकर एक सूत्र में नहीं बंधेंगी, तब तक पूर्ण परिवर्तन संभव नहीं है। महिलाओं को घर की ‘नींव’ बताते हुए वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि जब नींव मजबूत होगी, तभी समाज और राष्ट्र का भविष्य उज्ज्वल होगा।





