सकरा (मुजफ्फरपुर): राजनीति में संघर्ष अब पसीने से नहीं, बल्कि ‘पिक्सेल’ से तय होने लगा है। ताजा मामला सकरा प्रखंड कांग्रेस कमेटी का है, जहाँ ‘जनता के मुद्दों’ पर विरोध प्रदर्शन कम और ‘कैमरे’ के लिए इवेंट मैनेजमेंट ज्यादा देखने को मिला। महंगाई और रसोई गैस की किल्लत के खिलाफ आयोजित पुतला दहन कार्यक्रम ने संघर्ष के कई नए और ‘डिजिटल’ मायने पेश किए हैं।

200 मीटर का महासंग्राम!
आमतौर पर आंदोलन में मीलों पैदल चलकर नारेबाजी की जाती है, लेकिन सकरा कांग्रेस ने ऊर्जा बचाने का नया मॉडल पेश किया। पार्टी कार्यालय से निकले नेताजी लोग मात्र 200 मीटर की ‘लंबी दूरी’ तय कर आश्रम चौक पहुँचे और पुतला फूंक कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली। न कोई जोश, न कोई शोर, बस चिलचिलाती धूप में एक अदद फोटो खिंचवाने की जल्दी। शायद प्लान यह था कि जनता जाने न जाने, मीडिया में खबर छप जाए तो क्रांति सफल!

सकरा ब्लौक गेट (आश्रम चौक) पर पुतला दहन करते सकरा प्रखंड कांग्रेस इकाई के नेतागण
आंखों देखी और तस्वीरों की मानें तो मौके पर सिर्फ एक ही पुतला मौजूद था। लेकिन मीडिया को जो विज्ञप्ति भेजी गई, उसमें दावा किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पेट्रोलियम मंत्री, दोनों का पुतला दहन हुआ है। अब यह चमत्कार है या कलाकारी, यह तो सकरा कांग्रेस ही जाने। आश्चर्य तो तब हुआ जब जारी की गई चार तस्वीरों में एक तस्वीर किसी दूसरे ही कार्यक्रम की चिपका दी गई, जिसमें सिलेंडर का कट-आउट दिख रहा है। संघर्ष के इस ‘शॉर्टकट’ को क्या जनता के साथ ‘चार सौ बीसी’ नहीं कहा जाना चाहिए?
पुतला दहन या फोटो इवेंट? गायब नेताजी का नाम विज्ञप्ति में देख जनता हैरान।
सबसे दिलचस्प पहलू पूर्व प्रत्याशी उमेश कुमार राम का रहा। मिडिया में जारी विज्ञप्ति में उनका नाम प्रमुखता से दर्ज है, लेकिन भेजी गई किसी भी तस्वीर में उनका चेहरा ढूंढे नहीं मिल रहा। सकरा की राजनीति को जानने वाले हैरान हैं कि जिस कार्यक्रम में उमेश राम हों और वो फ्रेम के बीचों-बीच न दिखें, ऐसा मुमकिन नहीं। जब इस बाबत उनसे बात करने की कोशिश की गई, तो मुद्दे पर आते ही कॉल कट गया। क्या नेताजी ‘वर्चुअल’ तरीके से आंदोलन में शामिल थे?
‘हाईजैक‘ होती प्रखंड कांग्रेस और अंदरूनी कलह
सकरा प्रखंड अध्यक्ष का छलका दर्द— “हमारा तो नाम तक नहीं लिया जाता!” , इस पूरे ड्रामे के पीछे की कड़वी सच्चाई तब सामने आई जब प्रखंड अध्यक्ष राम सागर प्रसाद से संपर्क किया गया। पहले तो उन्होंने ‘डॉक्टर के पास होने’ का बहाना बनाकर टालना चाहा, फिर दबी जुबान में दर्द छलक ही गया। उन्होंने कहा, “प्रोग्राम जिला से था, पर सारा नाम उन्हीं लोगों का रहता है, हम लोगों का नाम दिया ही नहीं जाता।” साफ है कि सकरा प्रखंड कांग्रेस के अंदर असंतोष की आग सुलग रही है। ऐसा लग रहा है जैसे संगठन को ‘हाइजैक’ कर लिया गया हो। तस्वीरों से असली चेहरों का गायब होना और कागजों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना, शायद यही वह कारण था जिसने पिछले चुनाव में हार तय की थी और लगता है उस हार से फिलहाल कोई सबक नहीं लिया गया है।




