“धर्म के नाम पर फैले डर से मुक्ति ही सच्ची साधना है: सहजता में ही ईश्वर है”
आध्यात्मिक डेस्क (न्यूज़ भारत टीवी): आज का मनुष्य तकनीक के शिखर पर बैठकर भी आंतरिक रूप से उतना ही भयभीत और असुरक्षित है। इसी असुरक्षा की कोख से जन्म लेता है—’पाखंड’। आज धर्म के नाम पर बाहरी आडंबरों, ज्योतिषीय गणनाओं और तथाकथित चमत्कारों का एक ऐसा मायाजाल बुना जा चुका है, जिसमें फंसा सामान्य व्यक्ति अपने विवेक की शक्ति खो बैठा है। लेकिन सनातन दर्शन का एक शाश्वत सत्य हमें झकझोरता है—‘विधि का विधान‘। क्या हम वास्तव में अनुष्ठानों से उस नियति को बदल सकते हैं, जिसे स्वयं ईश्वर के अवतारों ने स्वीकार किया?

मुहूर्त की मर्यादा और अवतारों का मौन
भारतीय संस्कृति में काल गणना का अपना महत्त्व है, किंतु क्या कोई मुहूर्त ईश्वरीय इच्छा से ऊपर हो सकता है? मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन की दो सबसे बड़ी घटनाएं—विवाह और राज्याभिषेक—इसका जीवंत प्रमाण हैं। कुलगुरु वशिष्ठ जैसे त्रिकालदर्शी ऋषि ने राज्याभिषेक का ‘सर्वश्रेष्ठ’ मुहूर्त निकाला था, किंतु उस मुहूर्त ने राम को सिंहासन नहीं, बल्कि 14 वर्ष का वनवास दिया। माता सीता के साथ विवाह भी शुभ लग्न में हुआ, किंतु नियति ने उन्हें वियोग की अग्नि में झोंक दिया।
जब भरत अत्यंत शोकाकुल होकर गुरुदेव के पास पहुंचे, तब वशिष्ठ जी ने एक कालजयी सत्य कहा था:
“सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहु मुनिनाथ। लाभ हानि जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ॥”
अर्थात, जो नियति ने निर्धारित कर दिया है, उसे टालना असंभव है। जब साक्षात ब्रह्म (राम) की नियति उनके द्वारा तय मुहूर्त के अनुसार नहीं चली, तो हम साधारण मनुष्य बाहरी कर्मकांडों के पीछे भागकर किसे चुनौती दे रहे हैं?

महाशक्तियों की विवशता या प्रकृति का अनुशासन?
इतिहास साक्षी है कि संसार की महानतम विभूतियों ने भी प्रकृति के नियमों में हस्तक्षेप नहीं किया। भगवान शिव, जो स्वयं ‘महामृत्युंजय’ हैं, माता सती की मृत्यु को नहीं टाल सके। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने सब कुछ जानते हुए भी गांधारी के श्राप को स्वीकार किया और अपने कुल का विनाश तथा स्वयं का अंत भी उसी सहजता से स्वीकार किया।
सिख गुरुओं—गुरु अर्जुन देव जी से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी तक—ने भीषण कष्ट झेले, बलिदान दिए, पर ‘हुकुम’ (ईश्वरीय आदेश) को सिर माथे रखा। आधुनिक युग में रामकृष्ण परमहंस ने कैंसर जैसी व्याधि को शरीर का प्रारब्ध मानकर सहा। विचारणीय है कि जब ये महाशक्तियां अपनी नियति के आगे मौन रहीं, तो आज का ‘बाजारू धर्म’ कुछ रुपयों के दान या पत्थरों को पहनने से भाग्य बदलने का दावा कैसे कर सकता है?
प्रारब्ध का गणित: क्या है पूर्व-निर्धारित?
सनातन धर्म के अनुसार, मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का परिणाम है। इसे ‘प्रारब्ध’ कहा जाता है। मान्यता है कि जन्म के साथ ही पांच चीजें निश्चित हो जाती हैं: आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु। जब यह ढांचा पूर्व-निर्धारित है, तो मनुष्य का डर और उसके पीछे का आडंबर उसकी अज्ञानता को ही दर्शाता है। असली आध्यात्मिकता हमें निर्भय बनाती है, जबकि पाखंड हमें मानसिक रूप से अपाहिज बनाता है।
कर्म ही एकमात्र विकल्प: फल की चिंता क्यों?
श्रीमद्भगवद्गीता का मर्म ‘कर्म’ है। श्रीकृष्ण कहते हैं—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”। इसका गहरा अर्थ यह है कि परिणाम तुम्हारे नियंत्रण में नहीं है, केवल ‘कर्म’ ही तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में है। जो बीत गया वह प्रारब्ध था, जो हो रहा है वह नियति है, लेकिन आप जो ‘कर रहे हैं’, वही आपका भविष्य है।
कर्म ही व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाता है। एक व्यक्ति जो दीन-दुखियों की सेवा करता है, वह उस व्यक्ति से कहीं श्रेष्ठ है जो भय के कारण घंटों मंदिर में बैठकर कर्मकांडों में उलझा रहता है। मानवता का कल्याण बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धता में है।
सहजता ही सच्ची साधना है : जीवन का अर्थ कर्मकांडों की जटिलता में नहीं, बल्कि सहजता में है। जब न जन्म हमारे हाथ में था और न मृत्यु का समय हमारे वश में है, तो बीच के इस छोटे से जीवन को पाखंड के बोझ तले क्यों दबाना ? संदेश स्पष्ट है, सरल बनें, सहज रहें। भय को त्यागकर ‘सत्कर्म’ को अपनाएं। आडंबरों के जाल से निकलकर विवेक की मशाल जलाएं। क्योंकि अंततः, नियति के पन्ने पर आपकी ईमानदारी और सेवाभाव ही स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। शेष सब कुछ तो समय के प्रवाह में विलीन हो जाना है।




