विज्ञान, समाजवाद और शुचिता के शिखर पुरुष डॉ. जगदीश साहु

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शब्‍द संयोयन- एस.एस. कुमार ‘पंकज’ (sskr.pankaj@gmail.com) 

मुजफ्फरपुर, बिहार। इतिहास की धूल में अक्सर कई ऐसे हीरे दब जाते हैं जिनकी चमक सूरज को मात देने वाली होती है। बिहार की ज्ञान-भूमि मुजफ्फरपुर के ‘रघुनाथपुर दोनमा’ गाँव (सकरा प्रखण्‍ड) से निकला एक ऐसा ही नाम है— डॉ. जगदीश साहु। वे केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के एक ऐसे ‘ऋषि’ थे जिन्होंने एक हाथ में विज्ञान की मशाल थामी थी और दूसरे हाथ में समाजवाद का झंडा। यह कहानी एक ऐसे महामानव की है जिसने नेहरू के लोकसभा ऑफर को ठुकराया, ऑक्सफोर्ड में रिकॉर्ड बनाया और अंततः ‘पारस पत्थर’ के रहस्य को सुलझाते हुए दुनिया से विदा ली।

डॉ. जगदीश साहु

अभावों की भट्टी में तपा बचपन: संकल्पों का उदय

डॉ. जगदीश साहु का जन्म 1 जनवरी 1925 को एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री जुगेश्वर साहु पेशे से सोनार थे। गाँव की तंग गलियों और फटेहाली के बीच जगदीश का बचपन बीता। अक्सर गरीबी मेधा का गला घोंट देती है, लेकिन यहाँ पिता का संकल्प फौलादी था।

जब गाँव के लोग ताना देते कि “सोनार का बेटा पढ़कर क्या करेगा, इसे दुकान पर बैठाओ”, तब जुगेश्वर साहु ने ऐतिहासिक शब्द कहे थे: “मैं भूखा रह जाऊँगा, घर बेच दूँगा, पर जगदीश को पढ़ाऊँगा।”

जगदीश ने भी पिता के मान को गिरने नहीं दिया। अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए वे बचपन से ही छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। जिला स्‍कूल मुजफ्फरपुर से  1943 में मैट्रिक प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर उन्होंने अपनी मेधा का पहला परिचय दिया।


संघर्षों से स्वर्ण पदक तक: पटना का वह कठिन दौर

उच्च शिक्षा के लिए वे पटना विश्वविद्यालय पहुँचे, लेकिन नियति ने यहाँ उनकी परीक्षा ली। एम.एससी. (M.Sc.) के दौरान पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए। घर का चूल्हा और पिता की दवा, दोनों की जिम्मेदारी जगदीश के कंधों पर आ गई।

उन्होंने पढ़ाई छोड़ने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। वे दिन में पटना सचिवालय में सहायक (Assistant) के रूप में नौकरी करते और रात भर लैम्प की रोशनी में पढ़ते। 1953 का वह साल मुजफ्फरपुर के लिए गौरव का क्षण था जब जगदीश साहु ने पूरे विश्वविद्यालय में स्वर्ण पदक (Gold Medal) के साथ एम.एससी. उत्तीर्ण की।


ऑक्सफोर्ड का ऐतिहासिक सफर: डेढ़ साल में रची क्रांति

डॉ. साहु की असली उड़ान तब शुरू हुई जब उन्होंने विश्वविख्यात वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन का एक शोध पत्र पढ़ा। उन्होंने अपना शोध सारांश (Synopsis) बॉवेन को भेजा। बॉवेन उनकी प्रतिभा से इतने दंग रह गए कि उन्हें तुरंत ऑक्सफोर्ड बुला लिया।

विश्वविख्यात वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन के साथ प्रयोगशाला में डॉ. जगदीश साहु

11 सितंबर 1956 को वे इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। वहाँ डॉ. साहु ने वह कर दिखाया जो आज भी एक रिकॉर्ड है। जिस पीएचडी (Ph.D.) को पूरा करने में गोरे वैज्ञानिकों को 4 साल लगते थे, डॉ. साहु ने उसे मात्र डेढ़ वर्ष में पूरा कर लिया। उनके शोध पत्र अमेरिका की ‘केमिकल सोसाइटी’ और ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ में प्रमुखता से छापे गए।


विदेशी प्रलोभन और चरित्र की शुचिता: ‘सच्‍चे भारतीय ‘

ऑक्सफोर्ड में प्रवास के दौरान उनके सामने एक ऐसा प्रलोभन आया जो किसी भी युवा को डगमगा सकता था। एक बड़े विदेशी वैज्ञानिक ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी बेटी से विवाह का प्रस्ताव दिया। साथ ही, इंग्लैंड में ही स्थायी प्रोफेसर की नौकरी और ऐशो-आराम का प्रलोभन भी दिया गया, जिसे इन्‍होंने  अस्‍वीकार कर दिया, इस घटना के कुछ ही दिनों के बाद, इन्‍हें रसायन विज्ञान से जुड़े एक विशेष शोध कार्य के लिए ऑक्सफोर्ड में ही आमंत्रित किया गया, जिसमें पत्‍नी का स्‍नातक उत्‍तीर्ण होने की बाध्‍यता रखी गई, लेकिन डा. साहु पहले से शादी सुदा थे, और पत्‍नी स्‍नातक नहीं थी, जिसके कारण इन्‍होंने  शोध को अस्‍वीकार कर दिया, जब ये किसी झासे में (प्रस्‍ताव पर सहमत) नहीं हुए और जब ये स्‍वदेश के लिए वापस चल दिए, तो इनको वहां रोकने का हर संभव प्रयास किया गया, बाद में  प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के हस्‍तक्षेप के बाद ये भारत वापस आ सके,

लेकिन डॉ. साहु का चरित्र हिमालय जैसा अडिग था। भारत में उनकी पत्नी इंतज़ार कर रही थीं, जो सामाजिक पैमानों पर शायद उतनी सुंदर नहीं मानी जाती थीं। परंतु डॉ. साहु के लिए वे उनकी अर्द्धांगिनी थीं। उन्होंने उस सुनहरे विदेशी प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया— ” मेरा वतन और मेरा परिवार  मेरे लिए सर्वोपरि है।” यह उनके ‘समर्पित पति’ और सच्चे भारतीय होने का सबसे बड़ा प्रमाण था।


स्वदेश वापसी और राजनीति का दंश

डॉ. साहु अपनी मेधा का लाभ बिहार को देना चाहते थे, इसलिए वे 1960 में भारत लौट आए। लेकिन यहाँ उन्हें ‘भाई-भतीजावाद’ और गंदी राजनीति का सामना करना पड़ा। बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने उनके नाम की सिफारिश की, लेकिन कुछ रसूखदारों ने उनकी नियुक्ति रुकवा दी।

आहत होकर वे 1961 में लीबिया चले गए। लीबिया विश्वविद्यालय में उन्हें प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष (HOD) का पद मिला। वहाँ उन्होंने धन और यश दोनों कमाया, लेकिन अपनी मिट्टी की खुशबू उन्हें 1964 में वापस मुजफ्फरपुर खींच लाई।


हिंदी में विज्ञान लेखन: एक क्रांतिकारी पहल

डॉ. साहु का मानना था कि विज्ञान जब तक आम आदमी की भाषा में नहीं होगा, देश आगे नहीं बढ़ेगा। उन्होंने उस दौर में लगभग 20 पुस्तकें हिंदी में लिखीं। ‘मोतीलाल बनारसीदास’ जैसे प्रकाशकों ने उनकी किताबों को घर-घर पहुँचाया। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने उन्हें इस सेवा के लिए विशेष रूप से सम्मानित किया।


राजनीति के चाणक्य और नेहरू का प्रस्ताव

डॉ. साहु केवल विज्ञान के कमरे में बंद नहीं रहे। वे बिहार की राजनीति के केंद्र बन गए।

  • नेहरू का ऑफर: देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें मुजफ्फरपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने का टिकट ऑफर किया। लेकिन डॉ. साहु ने विनम्रता से कहा— “नेहरू जी, राजनीति के लिए बहुत लोग हैं, मुझे विज्ञान और शिक्षा की सेवा करने दीजिए।”
  • नेताओं के मार्गदर्शक: वे जननायक कर्पूरी ठाकुर, डॉ. रामचन्द्र पूर्वे, डॉ. शीतल राम और डॉ. कुमकुम कटियार जैसे बिहार के राजनेताओं  के पथ-प्रदर्शक (Mentor) रहे। इन नेताओं ने डॉ. साहु के समाजवादी विचारों से ही अपनी राजनीति को सींचा।
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बिहार के मुजफ्फरपुर शहर में स्थित डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय का दृश्‍य

सच्चे समाजवादी: ‘लोहिया कॉलेज’ का निर्माण

डॉ. साहु डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनन्य प्रशंसक थे। जब उन्होंने मुजफ्फरपुर में कॉलेज की स्थापना की, तो लोग चाहते थे कि वे इसे अपने माता-पिता का नाम दें। लेकिन इस सच्चे समाजवादी ने उसे एक स्‍मारक के रूप में  ‘लोहिया कॉलेज’ का नाम दिया। उन्होंने अपनी लीबिया की सारी कमाई इस कॉलेज को खड़ा करने में लगा दी।


मुजफ्फरपुर शहर में स्थित डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय परिसर में स्‍थापित डा. जगदीश साहु एवं डा. लोहिया के स्‍टैचु का दृश्‍य

विलक्षण क्षमता: दोनों हाथों से एक साथ लेखन

डॉ. साहु की मेधा का एक और अद्भुत पक्ष था— उनकी ‘एम्बिडेक्सट्रस’ (Ambidextrous) शक्ति। वे ब्लैकबोर्ड पर एक साथ दोनों हाथों से अलग-अलग विषयों के जटिल समीकरण लिख सकते थे। यह दृश्य उनके छात्रों के लिए किसी जादू से कम नहीं होता था। यह उनके मस्तिष्क की असीमित क्षमता का परिचायक था।


अंतिम मिशन: ‘पारस पत्थर’ और अधूरा सपना

अपने जीवन के अंतिम दिनों में डॉ. साहु एक क्रांतिकारी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। बचपन में पिता से सुनी ‘पारस पत्थर’ की लोक-कथाओं को उन्होंने वैज्ञानिक आधार दिया। वे तत्वों के रूपांतरण (Transmutation of Elements) के जरिए सोना बनाने की तकनीक विकसित करने के बहुत करीब पहुँच चुके थे। उनके नोट्स बताते हैं कि वे उस रहस्य की दहलीज पर थे, जिसने सदियों से वैज्ञानिकों को ललचाया था। लेकिन 1969 के दशक में एक अचानक आए हृदय घात (Heart Attack) ने इस महान वैज्ञानिक की जीवन-लीला समाप्त कर दी। उनके साथ ही वह ‘पारस’ का रहस्य भी दफन हो गया।

एक युग का अंत

डॉ. जगदीश साहु का जीवन हमें सिखाता है कि गरीबी केवल एक स्थिति है, अंत नहीं। उन्होंने मुजफ्फरपुर की गलियों से ऑक्सफोर्ड के हॉलों तक का सफर अपनी नैतिकता, मेधा और संघर्ष के दम पर तय किया। आज जब हम लोहिया कॉलेज को देखते हैं या उनकी हिंदी विज्ञान पुस्तकों को पढ़ते हैं, तो हमें उस महान आत्मा का अहसास होता है जिसने सत्ता को ठुकराकर सत्य (विज्ञान) को चुना।


संघर्ष से सफलता का शिखर: मेधा शक्ति और लेखनी के बूते डॉ. जगदीश साहु ने वह किया जो शहर के बड़े अरबपतियों को नसीब नहीं,

सच्चे समाजवादी: डॉ. राम मनोहर लोहिया के प्रति अटूट श्रद्धा

डॉ. जगदीश साहु के जीवन का एक ऐसा पहलू है जो उन्हें अन्य विद्वानों से अलग खड़ा करता है। वे डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से गहरे प्रभावित थे। जब उन्होंने मुजफ्फरपुर में एक कॉलेज की स्थापना का बीड़ा उठाया, तो उनके सामने अपने माता-पिता के नाम पर संस्थान बनाने का विकल्प मौजूद था, जो उस समय एक सामान्य परंपरा थी।

  • निस्वार्थ कदम: अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता को देने के बावजूद, उन्होंने अपने व्यक्तिगत गौरव के बजाय समाजवाद के पुरोधा डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम को चुना। उन्होंने मुजफ्फरपुर में ‘लोहिया कॉलेज’ की स्थापना की।
  • विचारधारा की जीत: यह कदम उनके सच्चे समाजवादी होने का प्रमाण था। वे चाहते थे कि शिक्षा का केंद्र किसी व्यक्ति या परिवार की संपत्ति न बनकर एक ऐसी विचारधारा का प्रतीक बने जो समाज के वंचित और पिछड़े वर्ग के उत्थान की बात करती हो।
  • त्याग की प्रतिमूर्ति: डॉ. साहु ने लीबिया से कमाया हुआ धन और अपना कीमती समय इस कॉलेज को सींचने में लगा दिया। अपने पूर्वजों के नाम के बजाय एक जननायक के नाम पर शिक्षण संस्थान खोलना उनकी उदारता और महानता को दर्शाता है।
डा. राम मनोहर लोहिया समारक महाविद्यालय परिसर में डा. जगदीश साहु के नाम पर रसायन विज्ञान विभाग का बाहरी दृश्‍य

डॉ. जगदीश साहु के जीवन को रेखांकित करता घटना क्रम : जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रसायन विज्ञान (Chemistry) के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया।

प्रमुख शोध पत्र (Research Papers)

डॉ. साहु के शोध मुख्य रूप से ‘फोटो केमिस्ट्री’ (Photo Chemistry) और ‘भौतिक रसायन’ (Physical Chemistry) पर केंद्रित थे। उनके कार्यों को अमेरिका और इंग्लैंड के शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों ने मान्यता दी:

  • The Fluorescence of Acridine and Acridone solutions: यह शोध पत्र अक्टूबर 1958 में अमेरिका की ‘केमिकल सोसाइटी’ द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस कार्य की महत्ता इतनी अधिक थी कि लंदन के ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ ने भी इसे विशेष अनुमति के साथ प्रकाशित किया।
  • The Absorption spectra of Hill-Reaction oxidants: कैलिफोर्निया के ‘स्टैंडर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के वैज्ञानिकों (जैसे रूडोल्फ जे. मार्कस और जेम्स एल. हैचेट) ने अपने शोध में डॉ. साहु के इस कार्य की सहायता ली थी।
  • The Effect of Temperature and Viscosity on Fluorescence: 1960 में ‘जर्नल इंडियन केमिकल सोसाइटी’ (Vol. 37) में प्रकाशित इस शोध में उन्होंने कार्बनिक यौगिकों पर तापमान और श्यानता के प्रभाव का अध्ययन किया था।
  • The Reduction of Kinetics of Nitrobenzene by Acid Stannous Chloride: यह शोध भी 1960 में ‘जर्नल इंडियन केमिकल सोसाइटी’ में प्रकाशित हुआ, जो रासायनिक अभिक्रियाओं की गतिशीलता (Kinetics) पर आधारित था।
  • The Effect of Temperature on Fluorescence of Solution: 1959 में ‘द जर्नल ऑफ फिजिकल केमिस्ट्री’ (अमेरिकन केमिकल सोसाइटी) में प्रकाशित इस शोध को उनके गुरु डॉ. ई.जे. बॉवेन के साथ संयुक्त रूप से लिखा गया था।

प्रकाशित पुस्तकें (Published Books)

डॉ. साहु ने उस दौर में विज्ञान को हिंदी में लिखने का साहस किया जब विज्ञान की अधिकांश उच्च स्तरीय सामग्री केवल अंग्रेजी में उपलब्ध थी:

  • विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें: उन्होंने माध्यमिक कक्षाओं से लेकर कॉलेज स्तर तक के छात्रों के लिए लगभग 20 पुस्तकें लिखीं।
  • प्रकाशन संस्थान: उनकी पुस्तकें प्रसिद्ध प्रकाशक ‘मोतीलाल बनारसीदास’ और ‘बिहार पब्लिकेशन हाउस, पटना’ द्वारा प्रकाशित की गई थीं।
  • ऐतिहासिक महत्व: डॉ. साहु संभवतः उस समय के पहले ऐसे प्रोफेसर थे जिन्होंने पूरे भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए इतनी बड़ी संख्या में विज्ञान की पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध कराईं। उनकी इन पुस्तकों ने हिंदी माध्यम के छात्रों के बीच विज्ञान के प्रति विश्वास पैदा किया।
  • Photo Chemistry in the Liquid and Solid States: इस नाम की एक पुस्तक में उनके शोध प्रबंधों (Thesis) और महत्वपूर्ण खोजों को संकलित किया गया है, जिसे ‘द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ से संबद्ध माना जाता है।

सम्मान और मान्यता

  • स्वर्ण पदक (Gold Medal): 1953 में एम.एससी. में प्रथम आने पर उन्हें स्वर्ण पदक मिला।
  • ऑक्सफोर्ड रिकॉर्ड: उन्होंने अपनी पीएचडी मात्र डेढ़ वर्ष में पूरी की, जो ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के इतिहास में एक रिकॉर्ड माना गया।
  • बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्: हिंदी में विज्ञान की महान सेवा के लिए उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का ‘सम्मानित सदस्य’ मनोनीत किया गया था।

डॉ. साहु का मानना था कि “सर्वेगुणाः कांचनाश्रयन्ति” (सभी गुण सोने/धन के आश्रित होते हैं) वाली सोच गलत है; उनके लिए ज्ञान और उसकी अभिव्यक्ति (विशेषकर मातृभाषा में) सबसे ऊपर थी।

ऑक्सफोर्ड का संघर्ष: डेढ़ साल में रचा इतिहास

डॉ. साहु 11 सितंबर 1956 को ऑक्सफोर्ड के लिए रवाना हुए थे। वहाँ का जीवन उनके लिए आर्थिक और मानसिक रूप से एक बड़ी परीक्षा थी:

  • अभूतपूर्व गति: डॉ. साहु ने शोध का विषय ‘फोटो केमिस्ट्री ऑफ एरोमैटिक्स कम्पाउंड्स’ चुना था। जिस शोध कार्य को अन्य छात्र आमतौर पर 3 से 4 वर्षों में पूरा करते थे, डॉ. साहु ने उसे मात्र डेढ़ वर्ष में ही पूरा कर लिया। यह ऑक्सफोर्ड के इतिहास में एक रिकॉर्ड जैसा था।
  • आर्थिक अभाव और पार्ट-टाइम काम: विदेश में पढ़ाई के दौरान उनके पास पैसों की भारी कमी थी। पत्राचार और रहने का खर्च बहुत अधिक था। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए वे खाली समय में ‘पोर्ट’ (बंदरगाह) पर भारी काम करते थे और रात के समय अस्पताल में रोगियों की सेवा-सुश्रुषा (नर्सिंग हेल्प) का कार्य करते थे ताकि पढ़ाई जारी रह सके।
  • डॉ. बॉवेन के साथ गुरु-शिष्य संबंध: अंतरराष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक डॉ. ई.जे. बॉवेन उनके गुरु थे। डॉ. साहु की मेहनत से वे इतने प्रभावित हुए कि जब डॉ. साहु भारत लौटे, तो डॉ. बॉवेन स्वयं उनसे मिलने और उनकी चर्चा करने के लिए दिल्ली आए थे।

लीबिया का दौर: आत्म-सम्मान के लिए निर्वासन

भारत लौटने के बाद डॉ. साहु को अपनी ही मातृभूमि में उपेक्षा का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उन्हें लीबिया जाना पड़ा:

  • राजनीति का शिकार: डॉ. साहु जब ऑक्सफोर्ड से लौटे, तो बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) ने उन्हें ‘रीडर’ पद के लिए अनुशंसित (Recommend) किया था। लेकिन तत्कालीन राजनीति और भाई-भतीजावाद के कारण उनकी नियुक्ति नहीं होने दी गई। इस घटना ने उन्हें मानसिक रूप से काफी चोट पहुँचाई।
  • लीबिया में सम्मान: बिहार में उचित स्थान न मिलने पर उन्हें विदेश से बुलावा आया। 25 नवंबर 1961 को वे लीबिया विश्वविद्यालय चले गए। वहाँ उन्हें ‘विश्वविद्यालय प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष’ (Head of Department) का प्रतिष्ठित पद मिला।
  • सफलता और संपत्ति: लीबिया में उन्होंने लगभग तीन साल (1964 तक) बिताए। वहाँ उन्होंने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यश कमाया, बल्कि अच्छी संपत्ति (यश और धन) भी अर्जित की।
  • वतन की याद: लीबिया में सफलता के बावजूद उन्हें हमेशा अपना वतन याद आता था। वे मानते थे कि “अपने वतन में रहने का ठौर-ठिकाना होना चाहिए।” इसी इच्छा के कारण 1964 में वे सब कुछ छोड़कर वापस मुजफ्फरपुर लौट आए।

मुजफ्फरपुर वापसी और अंतिम पड़ाव

जब वे लीबिया से लौटे, तो बिहार विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. प्यारे लाल श्रीवास्तव के प्रयासों से उन्हें ‘भौतिक रसायन’ के रीडर पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने मुजफ्फरपुर के आमगोला क्षेत्र में जमीन खरीदी और वहाँ बस गए। इसके बाद उनकी ख्याति इतनी फैली कि उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों से उन्हें लगातार व्याख्यानों और परीक्षाओं के लिए निमंत्रण मिलने लगे।

डॉ. साहु का जीवन सिखाता है कि योग्यता को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। डॉ. जगदीश साहु केवल एक महान वैज्ञानिक ही नहीं थे, बल्कि वे एक उच्च कोटि के इंसान और समाजसेवी भी थे।

सादगी और विनम्रता

इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद, डॉ. साहु का जीवन सादगी की मिसाल था। ऑक्सफोर्ड से लौटने और विदेशों में रहने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया। वे मुजफ्फरपुर में ‘एक साधारण शिक्षक’ की तरह ही रहे। वे अक्सर छात्रों और आम लोगों से बड़ी आत्मीयता से मिलते थे।

मातृभाषा के प्रति अटूट प्रेम

उस दौर में जब वैज्ञानिक समुदाय में केवल अंग्रेजी का बोलबाला था, डॉ. साहु ने हिंदी भाषा को विज्ञान के प्रचार-प्रसार का माध्यम चुना। उनका मानना था कि जब तक विज्ञान आम आदमी की भाषा में नहीं होगा, देश तरक्की नहीं कर सकता। इसी उद्देश्य से उन्होंने माध्यमिक से लेकर कॉलेज स्तर तक की विज्ञान की पुस्तकें हिंदी में लिखीं, जो उनकी दूरगामी सोच को दर्शाती हैं।

सामाजिक गतिविधियाँ और मार्गदर्शन

  • शिक्षण के प्रति समर्पण: वे मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज और बिहार विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। वे केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि छात्रों को शोध (Research) की बारीकियां और वैश्विक दृष्टिकोण सिखाते थे।
  • अकादमिक योगदान: वे उत्तर प्रदेश और बिहार के कई विश्वविद्यालयों में विशेषज्ञ (Expert) के रूप में बुलाए जाते थे। उन्होंने विज्ञान की कठिन गुत्थियों को सरल बनाकर समाज के हर वर्ग तक पहुँचाया।
  • प्रेरणा पुंज: डॉ. साहु अपने गाँव ‘रघुनाथपुर दोनमा’ और मुजफ्फरपुर के युवाओं के लिए एक जीवंत उदाहरण थे। वे अक्सर युवाओं को अभावों से लड़कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

सम्मान के प्रति तटस्थता

उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का ‘सम्मानित सदस्य’ बनाया गया और कई अन्य सम्मान मिले, लेकिन वे प्रचार-प्रसार से दूर रहते थे। उनका असली सम्मान उनके द्वारा लिखे गए शोध पत्र और वे पुस्तकें थीं, जो आज भी विज्ञान के छात्रों का मार्गदर्शन करती हैं।

डॉ. जगदीश साहु का अकादमिक जीवन विश्व के कुछ अत्यंत प्रतिष्ठित संस्थानों और विद्वानों के सान्निध्य में बीता। उनके जीवन को गढ़ने वाले संस्थानों और गुरुओं का विवरण इस प्रकार है:

प्रमुख संस्थान जिनसे वे जुड़े रहे

  • लंगट सिंह (L.S.) कॉलेज, मुजफ्फरपुर: डॉ. साहु ने यहीं से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। यह कॉलेज बिहार के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक रहा है, जहाँ उन्होंने अपनी वैज्ञानिक नींव रखी।
  • पटना विश्वविद्यालय, बिहार: यहाँ से उन्होंने अपनी एम.एससी. (M.Sc.) की पढ़ाई की। इसी संस्थान में संघर्ष करते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया, जिसने उनके लिए अंतरराष्ट्रीय रास्ते खोले।
  • ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, इंग्लैंड: डॉ. साहु के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्थान। यहाँ के ‘केमिकल सोसाइटी’ और प्रयोगशालाओं में उन्होंने वह शोध कार्य किया जिसने उन्हें वैश्विक ख्याति दिलाई।
  • लीबिया विश्वविद्यालय (University of Libya): यहाँ उन्होंने ‘प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष’ के रूप में सेवा दी। इस संस्थान ने उन्हें वह अंतरराष्ट्रीय सम्मान और मंच प्रदान किया जिसकी बिहार में उस समय कमी महसूस की गई थी।
  • बिहार विश्वविद्यालय ( बी.आर. अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय), मुजफ्फरपुर: स्वदेश वापसी के बाद वे यहीं भौतिक रसायन के रीडर बने और जीवन के अंतिम पड़ाव तक शिक्षण कार्य से जुड़े रहे।

प्रेरणादायी गुरु और वैज्ञानिक संबंध, डॉ. साहु के जीवन पर उनके गुरुओं का गहरा प्रभाव रहा:

  • डॉ. ई.जे. बॉवेन (Dr. E.J. Bowen): ये ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के विश्वविख्यात वैज्ञानिक थे। डॉ. साहु ने इन्हीं के मार्गदर्शन में अपनी पीएचडी पूरी की। डॉ. बॉवेन अपने इस भारतीय शिष्य की प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने डॉ. साहु के साथ मिलकर कई महत्वपूर्ण शोध पत्र लिखे, जो अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के जर्नल में प्रकाशित हुए।
  • रूडोल्फ जे. मार्कस और जेम्स एल. हैचेट: कैलिफोर्निया के ‘स्टैंडर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के इन वैज्ञानिकों के साथ डॉ. साहु का अकादमिक जुड़ाव रहा। उन्होंने डॉ. साहु के शोध ‘हिल-रिएक्शन’ (Hill-Reaction) की मदद से अपनी वैज्ञानिक गुत्थियां सुलझाई थीं।

शोध का मुख्य केंद्र: फोटोकेमिस्ट्री (Photo-Chemistry)

डॉ. साहु का अधिकांश शोध कार्य फोटोकेमिस्ट्री पर आधारित था। यह रसायन विज्ञान की वह शाखा है जो प्रकाश और रासायनिक अभिक्रियाओं के अंतर्संबंधों का अध्ययन करती है।

उनके शोध का मुख्य विषय ‘फ्लोरोसेंस’ (Fluorescence) था, जिसका उपयोग आज आधुनिक चिकित्सा और फोरेंसिक विज्ञान में व्यापक रूप से होता है। उनके गुरु डॉ. बॉवेन और उनके द्वारा की गई खोजें आज भी इस क्षेत्र के शोधार्थियों के लिए संदर्भ का काम करती हैं।

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