विशेष रिपोर्ट: मुजफ्फरपुर ब्यूरो
मुजफ्फरपुर। तिरहुत प्रमंडल के निजी स्कूलों में शिक्षा के नाम पर चल रहे ‘मुनाफाखोरी के धंधे’ और अभिभावकों की जेब पर पड़ने वाले डाके को रोकने के लिए प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने निर्णायक युद्ध का ऐलान कर दिया है। आयुक्त ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक पत्र जारी करते हुए प्रमंडल के सभी जिलाधिकारियों (DM) और जिला शिक्षा पदाधिकारियों (DEO) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि अब स्कूलों की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। प्रशासन के इस ‘एक्शन मोड’ में आने से शिक्षा माफियाओं में हड़कंप मच गया है।

15 अप्रैल की ‘डेडलाइन‘: हर स्कूल की कुंडली खंगालेगा प्रशासन
आयुक्त ने इस लड़ाई को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसके लिए समय-सीमा (Deadline) भी तय कर दी है। उन्होंने सभी DEO को आदेश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में स्कूलों का औचक निरीक्षण करें और 15 अप्रैल तक विस्तृत प्रतिवेदन (Report) क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक के माध्यम से आयुक्त कार्यालय को सौंपें। इस रिपोर्ट में स्कूलों की फीस संरचना, पिछले साल हुई वृद्धि का प्रतिशत और प्राप्त शिकायतों पर की गई कार्रवाई का पूरा ब्यौरा होगा।
अधिनियम 2019 का ‘ब्रह्मास्त्र‘: 7% से ज्यादा बढ़ाना कानूनन जुर्म
आयुक्त ने चेतावनी दी है कि ‘बिहार निजी विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2019′ का पालन करना हर निजी स्कूल के लिए अनिवार्य है। अधिनियम के मुख्य प्रावधान अब स्कूलों के लिए गले की फांस बनेंगे:
- 7% की लक्ष्मण रेखा: कोई भी विद्यालय एक शैक्षणिक सत्र में 7 प्रतिशत से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकता। यदि इससे अधिक वृद्धि करनी है, तो सत्र शुरू होने से 3 माह पूर्व आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति से अनुमति लेनी होगी।
- वेबसाइट पर पारदर्शिता: स्कूलों को अपनी आधिकारिक वेबसाइट और सूचना पट्ट (Notice Board) पर एडमिशन फीस, मासिक शुल्क, विकास शुल्क और अन्य सभी शुल्कों का विस्तृत विवरण (Breakdown) देना होगा।
- गुप्त शुल्कों पर पाबंदी: ‘हिडन चार्जेस’ के नाम पर अभिभावकों को लूटने वाले स्कूलों पर सीधे ‘क्रिमिनल केस’ जैसी कार्रवाई की जा सकती है।
किताब-यूनिफॉर्म के ‘कमीशन के खेल‘ पर बड़ा प्रहार
अक्सर देखा जाता है कि स्कूल किसी खास दुकान से ही किताब, कॉपी और ड्रेस खरीदने का दबाव बनाते हैं, जहाँ भारी कमीशनखोरी होती है। आयुक्त ने इस पर पूर्ण विराम लगा दिया है:
- अभिभावकों को आजादी: अब अभिभावक अपनी पसंद की किसी भी दुकान से शैक्षिक सामग्री खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं।
- बाध्य किया तो खैर नहीं: यदि किसी स्कूल ने किसी विशेष वेंडर का दबाव बनाया, तो उसकी शिकायत मिलने पर तुरंत कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।
विशेष कॉलम: सशक्त ‘शिकायत निवारण तंत्र‘ (Grievance Redressal Mechanism)
अभिभावकों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे अपनी शिकायत लेकर कहाँ जाएं। आयुक्त ने अब एक त्रि-स्तरीय मजबूत व्यवस्था को जमीन पर उतार दिया है:
1. जिला स्तरीय ‘शिकायत निवारण सेल‘: प्रत्येक जिले में एक विशेष ‘सेल’ का गठन किया गया है। अभिभावक अपनी लिखित शिकायत सीधे जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) के कार्यालय में दे सकते हैं। आयुक्त ने इन सेल को ‘एक्टिव’ रहने और प्राप्त शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई का आदेश दिया है।
2. क्षेत्रीय शुल्क विनियमन समिति (Regional Committee): यह प्रमंडल स्तर की सबसे पावरफुल बॉडी है, जिसकी अध्यक्षता स्वयं प्रमंडलीय आयुक्त करते हैं। इसके पास ‘सिविल कोर्ट‘ जैसी शक्तियां हैं।

- जांच का अधिकार: यह समिति किसी भी स्कूल के बैंक खातों, ऑडिट रिपोर्ट और बैलेंस शीट की जांच कर सकती है।
- सुनवाई का अवसर: निर्णय लेने से पहले यह समिति स्कूल प्रबंधन और पीड़ित अभिभावक, दोनों का पक्ष सुनती है।
3. दंडात्मक कार्रवाई और वसूली (Penalties): यदि शिकायत सही पाई गई, तो यह तंत्र निम्नलिखित सजा दे सकता है:
- फीस रिफंड: स्कूल को आदेश दिया जाएगा कि वह वसूली गई अतिरिक्त राशि तुरंत अभिभावकों को वापस (Refund) करे या अगले महीनों की फीस में एडजस्ट (Adjust) करे।
- मान्यता रद्द करना: बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द करने के लिए संबंधित बोर्ड (CBSE/ICSE/Bihar Board) को अनुशंसा भेजी जाएगी।
- भारी आर्थिक जुर्माना: पहली बार दोषी पाए जाने पर लाखों का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
“शिक्षा सेवा है, व्यापार नहीं”: आयुक्त की दो टूक
प्रमंडलीय कार्यालय से जारी पत्र में साफ कहा गया है कि बिहार में निजी विद्यालय ‘गैर-लाभकारी संस्थाओं‘ (Non-profit entities) के रूप में संचालित होते हैं। स्कूल से होने वाली आय का उपयोग मालिक की व्यक्तिगत विलासिता के लिए नहीं किया जा सकता। इस राशि को केवल स्कूल के विकास, शिक्षकों के प्रशिक्षण और छात्रों की सुविधाओं पर ही खर्च करना होगा।
अभिभावकों में जगी उम्मीद की किरण
आयुक्त के इस कड़े रुख से मुजफ्फरपुर सहित पूरे तिरहुत प्रमंडल के लाखों अभिभावकों में खुशी की लहर है। ‘अभिभावक संघ’ का कहना है कि यह पहली बार है जब प्रशासन ने इतनी बारीकी और सख्ती के साथ स्कूलों की ‘लूट-तंत्र’ पर प्रहार किया है। यदि 15 अप्रैल तक सही मायने में निरीक्षण हो जाता है, तो मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ काफी कम हो जाएगा।
प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने अपनी कलम से शिक्षा के बाजारीकरण के खिलाफ जो ‘हंटर’ चलाया है, उसने भ्रष्ट स्कूल प्रबंधनों की चूलें हिला दी हैं। अब समय है कि जिला स्तर के अधिकारी भ्रष्टाचार मुक्त होकर इस आदेश को लागू करें ताकि शिक्षा की पवित्रता बनी रहे और अभिभावक राहत की सांस ले सकें।


बड़ी बातें:
- 15 अप्रैल तक सभी DEO को देनी है रिपोर्ट।
- मनमाने ढंग से बढ़ी फीस होगी वापस।
- किसी भी दुकान से सामान खरीदने को स्वतंत्र होंगे अभिभावक।
- वेबसाइट पर फीस सार्वजनिक न करने वाले स्कूलों पर होगी एफआईआर (FIR)।



