कपकपाती ठंड और गरीबी का साया

हाल ही में समाजसेवी राजेश कुमार राम द्वारा इस टोले में वस्त्र वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह केवल कपड़ों का वितरण नहीं था, बल्कि उन अभावों को उजागर करने का एक जरिया भी था, जिसमें यह समुदाय जी रहा है। टोले के बच्चे और बुजुर्ग फटे-पुराने कपड़ों में ठंड से ठिठुरने को मजबूर थे। वितरण के दौरान जब बच्चों के चेहरे पर मुस्कान आई, तो उनकी आँखों में छिपी गरीबी और लाचारी को साफ पढ़ा जा सकता था।

गंदगी और बीमारी का अंबार

मांझी टोला में प्रवेश करते ही सबसे पहली चीज जो ध्यान खींचती है, वह है चारों ओर पसरी गंदगी। नालियों का अभाव और स्वच्छता के प्रति जागरूकता की कमी के कारण यह क्षेत्र बीमारियों का केंद्र बना हुआ है। राजेश कुमार राम ने वितरण के दौरान ग्रामीणों को साफ-सफाई के महत्व के बारे में विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि कैसे कचरा और जमा हुआ पानी एवं जानवरों का सीधा सम्‍पर्क उनके बच्चों के स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। “गरीबी अलग चीज है, लेकिन स्वच्छता हमारे हाथ में है,” यह संदेश उन्होंने घर-घर पहुँचाने की कोशिश की।

प्रशासनिक उपेक्षा: बिना पहियों की जिंदगी

इस टोले की सबसे मार्मिक तस्वीर तब सामने आई जब एक विकलांग बच्चा दिखाई दिया। सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, इस मासूम को अब तक चलने के लिए ट्राइसाइकिल (व्हीलचेयर) तक नसीब नहीं हुई है। वह बच्चा आज भी अपनी शारीरिक अक्षमता के साथ जमीन पर घिसटने को मजबूर है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार गुहार लगाने के बाद भी सरकारी तंत्र की नजर इस टोले की जरूरतों पर नहीं पड़ी है।

विकास की मुख्यधारा से कटा समाज

मांझी टोला आज भी बुनियादी सुविधाओं—शिक्षा, स्वास्थ्य और सुलभ रास्तों—से कोसों दूर है। यहाँ के लोग आज भी दिहाड़ी मजदूरी और अभावों में अपना जीवन काट रहे हैं। राजेश कुमार राम द्वारा किया गया यह छोटा सा प्रयास सराहनीय तो है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि आखिर कब तक यह टोला केवल समाजसेवियों के भरोसे रहेगा? सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक क्यों नहीं पहुँच रहा?

तुलसी मोहनपुर के इस मांझी टोले को आज किसी सहानुभूति की नहीं, बल्कि ठोस सरकारी कार्रवाई और विकास की नीतियों की जरूरत है, ताकि यहाँ के बच्चे भी एक स्वच्छ और गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।


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