मुजफ्फरपुर के सकरा में मौजूद है दुनिया का दुर्लभ ‘गौरी-शंकर’ शिवलिंग; यहाँ पत्थर में उभरते हैं सती के स्वर्ण नेत्र

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रिपोर्ट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’

मुजफ्फरपुर (बिहार) बिहार की पावन भूमि सदैव से ही आध्यात्मिकता, रहस्य और ऐतिहासिक गौरव का संगम रही है। वैशाली के लोकतंत्र से लेकर गया की ज्ञान-भूमि तक, इस प्रदेश का हर जिला अपने आंचल में इतिहास की अनमोल कड़ियाँ समेटे हुए है। इसी कड़ी में उत्तर बिहार का मुजफ्फरपुर जिला, जो अपनी मीठी लीची और बाबा गरीबनाथ की कृपा के लिए विश्वविख्यात है, अब एक ऐसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रहस्य के कारण चर्चा में है, जो न केवल धर्मशास्त्रियों बल्कि पुरातत्वविदों को भी अचंभित कर रहा है।

‘गौरी शंकर मंदिर’ बाजी घाट स्थित दुर्लभ शिवलिंग की तस्‍वीर

मुजफ्फरपुर के सकरा प्रखंड के अंतर्गत बाजी घाट स्थित गौरी शंकर मंदिर आज एक वैश्विक पहेली बन चुका है। यहाँ एक ऐसा दुर्लभ शिवलिंग स्थापित है, जिसे दुनिया का एकमात्र दूसरा ऐसा शिवलिंग माना जाता है, जहाँ लिंग रूप में भगवान शिव के साथ माता सती (शक्ति) की मुखाकृति साक्षात विराजमान है। इस शिवलिंग की सबसे बड़ी खूबी इसकी वह कलाकारी है, जिसमें पत्थर के भीतर से माता सती के स्वर्ण जड़ित नेत्र भक्तों को निहारते प्रतीत होते हैं।


कदाने नदी का तट और अलौकिक अवस्थिति

सकरा प्रखंड के सबहा-बरियारपुर मार्ग पर चलते हुए जब आप कदाने नदी के समीप पहुँचते हैं, तो बाजी घाट पुल के ठीक बगल में एक प्राचीन मंदिर है। नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह गौरी शंकर मंदिर सदियों से स्थानीय जनजीवन की आस्था का केंद्र रहा है। लेकिन हालिया शोध और ऐतिहासिक तथ्यों के उजागर होने के बाद इसकी महत्ता कई गुना बढ़ गई है।

इतिहासकारों के अनुसार, यह मंदिर और यहाँ का शिवलिंग भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। नदी का तट होने के कारण यह प्राचीन काल में व्यापार और संस्कृति का एक मुख्य मार्ग रहा होगा, जिसकी पुष्टि यहाँ बिखरे अवशेष करते हैं।


स्थापत्य कला का शिखर: पालकालीन शिवलिंग और स्वर्ण नेत्रों का रहस्य

बाजी घाट स्थित ‘गौरी शंकर मंदिर’ में शिवलिंग पर जलाभिषेक की तस्‍वीर

इस मंदिर का मुख्य आकर्षण यहाँ का शिवलिंग है। विशेषज्ञों और पुरातत्वविदों के प्रारंभिक अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि यह शिवलिंग पालकालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) है। पाल साम्राज्य अपनी उत्कृष्ट पत्थर नक्काशी और धातु कला के लिए जाना जाता था।

कसौटी पत्थर की अजेय चमक: यह शिवलिंग काले कसौटी पत्थर से निर्मित है। आश्चर्य की बात यह है कि हजारों साल बीत जाने के बाद भी इसकी चमक वैसी ही बरकरार है, जैसी निर्माण के समय रही होगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि पत्थर की आभा ऐसी है मानो इस पर अभी-अभी पॉलिश की गई हो।

सती के स्वर्ण नेत्र: इस शिवलिंग के अग्रभाग पर माता सती की मुखाकृति अत्यंत बारीकी से उकेरी गई है। सबसे विस्मयकारी तथ्य यह है कि माता के नेत्रों को स्वर्ण परत (Gold Layer) से मढ़ा गया है। जब मंदिर के गर्भगृह में घी का दीपक जलता है, तो स्वर्ण नेत्रों से परावर्तित होने वाली रोशनी एक अलौकिक ऊर्जा का संचार करती है। यह शिल्प कला का वह दुर्लभ नमूना है जहाँ पाषाण और स्वर्ण का ऐसा अद्भुत संगम दिखता है।


लाा घेरे में खंडित प्रतिमा की तस्‍वीर जिसमें पैर का अंकण दिखाया गया है

मुगलकाल का वह रूई व्यापारीऔर चमत्कारिक पुनर्निर्माण

मंदिर का इतिहास जितना प्राचीन है, इसका पुनरुद्धार उतना ही रोमांचक है। मंदिर से जुड़े स्थानीय ग्रामीण सह आचार्य पंडित राम कुमार झा बताते हैं कि मंदिर का वर्तमान गर्भगृह लगभग साढ़े चार सौ साल पुराना है। इसका सीधा संबंध मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल से जुड़ता है।

कथा कुछ इस प्रकार है कि अकबर के समय में दिल्ली का एक खत्री व्यवसायी, जो रूई का बड़ा व्यापार करता था, बाजी घाट के रास्ते अपने माल के साथ गुजर रहा था। उस समय यह प्राचीन शिवलिंग एक खंडहर अवस्था में खुले आकाश के नीचे उपेक्षित पड़ा था।

थकान मिटाने के लिए जब वह व्यापारी बाजी घाट पर रुका और महादेव की वह दुर्दशा देखी, तो उसके मन में गहरी संवेदना जागी। उसने अनायास ही एक संकल्प लिया— हे महादेव, यदि इस बार मेरे रूई के व्यापार में अप्रत्याशित लाभ हुआ, तो मैं यहाँ आपका एक भव्य मंदिर बनवाऊँगा।”

ईश्वरीय कृपा ऐसी हुई कि अगले ही दिन उस व्यापारी का सारा माल आश्चर्यजनक रूप से ऊंचे दामों पर बिक गया। उसे इतना मुनाफा हुआ कि उसने अपनी प्रतिज्ञा को मान देते हुए, मात्र एक दिन के मुनाफे से इस मंदिर के गर्भगृह का भव्य पुनर्निर्माण करवाया। यह कथा आज भी सकरा की लोक-संस्कृति का अभिन्न अंग है।


इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना: खजूरिया ईंटें और भूकंप की गवाही

मंदिर की बनावट आज के आधुनिक इंजीनियरों के लिए भी शोध का विषय है। वर्तमान सरपंच डॉ. कामेश्वर झा बताते हैं कि मंदिर के गर्भगृह की दीवारें खजूरिया ईंटों (प्राचीन छोटी ईंटें) से निर्मित हैं।

  • दीवारों की मजबूती: मंदिर की दीवारों की मोटाई लगभग तीन फीट है।
  • ईंटों का माप: यहाँ प्रयुक्त ईंटों की लंबाई साढ़े अठारह सेंटीमीटर, चौड़ाई ग्यारह सेंटीमीटर और मोटाई चार सेंटीमीटर है।
  • भूकंप का परीक्षण: वर्ष 1934 में जब बिहार में महाविनाशकारी भूकंप आया था, जिसमें बड़े-बड़े शहर जमींदोज हो गए थे, उस समय भी इस मंदिर का मुख्य ढांचा और शिवलिंग अडिग रहा। हालांकि उत्तरी अहाते का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन मुख्य मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।

100 साल पुराने कैडस्ट्रल सर्वे मैप में भी इसे बाजी बंजरिया गांव के एकमात्र मंदिर के रूप में दर्शाया गया है, जो इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता को पुख्ता करता है।


अहाते में खंडित प्रतिमा: एक अनसुलझा राज

गौरी शंकर मंदिर के अहाते में काले पत्थर की एक खंडित प्रतिमा का हिस्सा रखा हुआ है, जो अपने आप में कई सवालों को जन्म देता है।

अहाते में खंडित प्रतिमा की तस्‍वीर जिसमें पैर का अंकण दिखाया गया है
  • प्रतिमा का केवल बायां पैर दिखाई पड़ता है, जिसमें बहुत ही सुंदर पायल अंकित है।
  • प्रतिमा के आकार को देखकर विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि यह मूल रूप से लगभग 5 फीट की विशाल प्रतिमा रही होगी।

स्थानीय निवासी अमरनाथ साह के अनुसार, यह प्रतिमा कैसे खंडित हुई, इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। लेकिन एक प्रबल मान्यता यह है कि यह प्रतिमा समीप के ही पुरातात्विक स्थल रघुनाथपुर दोनमा के किसी ध्वस्त मंदिर का हिस्सा है। रघुनाथपुर दोनमा को पहले ही नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर‘ (NBPW) संस्कृति के रूप में चिन्हित किया जा चुका है। यदि इस प्रतिमा के शेष हिस्सों की तलाश की जाए, तो इस क्षेत्र के प्राचीन वैभव का एक नया अध्याय खुल सकता है।


खेतों में बिखरा इतिहास: मृदभांड और शोध की आवश्यकता

मंदिर के आसपास के खेतों में आज भी इतिहास बिखरा पड़ा है। पूरब की ओर के खेतों में काले एवं लाल मृदभांड (Pottery) के टुकड़े अक्सर खुदाई या जुताई के दौरान मिलते रहते हैं। ये मृदभांड इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि यहाँ जमीन के नीचे कोई प्राचीन नगरी या सभ्यता दबी हुई है।

रघुनाथपुर दोनमा का पुरातात्विक स्थल यहाँ से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर है। नदी के दोनों तटों पर फैली यह पुरातात्विक बेल्ट वैज्ञानिक उत्खनन की मांग कर रही है। यदि भारत सरकार और पुरातत्व विभाग यहाँ गहन शोध करे, तो यह स्थल वैशाली और नालंदा की तरह ही महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।


सकरा का यह गौरी शंकर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बिहार के इतिहास का वह खोया हुआ पन्ना है जिसे अभी तक पूरी तरह पढ़ा नहीं गया है। पालकालीन कला, अकबरकालीन निर्माण, और प्राचीन मृदभांडों का यह संगम दुर्लभ है। यहाँ का हर पत्थर, स्वर्ण जड़ित नेत्रों वाली माता सती की वह मुस्कान और कदाने नदी की लहरें—सब मिलकर एक ऐसी गाथा कहते हैं जो सदियों पुरानी है।

आज आवश्यकता है कि इस स्थान को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए और यहाँ की ऐतिहासिकता का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हो। यह मंदिर न केवल मुजफ्फरपुर का गौरव है, बल्कि यह संपूर्ण देश की सांस्कृतिक धरोहर है।

मुजफ्फरपुर के बाजी घाट पर स्थित यह गौरी-शंकरधाम पुकार रहा हैइतिहासकारों को, भक्तों को और उन शोधकर्ताओं को जो मिट्टी के नीचे दबे सच को बाहर लाने का साहस रखते हैं। यहाँ पत्थर बोलते हैं, और स्वर्ण नेत्र साक्षात देवत्व का आभास कराते हैं।

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