रिर्पोट: एस. एस. कुमार ‘पंकज’

मुजफ्फरपुर (मुरौल): सरकारी फाइलों में डिजिटल इंडिया के सपने सजाए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर ‘डिजिटल धांधली’ का ऐसा खेल चल रहा है जिसे देखकर आप दंग रह जाएंगे। मामला नगर पंचायत मुरौल का है, जहाँ की आधिकारिक वेबसाइट e-murol.com पर मुरौल की नहीं, बल्कि कटिहार जिले के बारसोई नगर पंचायत की तस्वीर चमक रही है। यह महज एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि मुरौल की जनता की अस्मिता और उनके खून-पसीने की कमाई (टैक्स) के साथ किया गया एक भद्दा मजाक है।

तस्‍वीर में नगर पंचायत मुरौल के बदले  कटिहार जिले के ‘बारसोई नगर पंचायत’ की चमकती तस्वीर, नीचे लाल इनसेट में ‘बारसोई नगर पंचायत’ की जूम इन  तस्‍वीर

लाखों की बंदरबांट, फिर भी वेबसाइट उधारकी?

हैरानी की बात यह है कि इस वेबसाइट के नाम पर कंपनी को लाखों रुपये का भुगतान किया जा चुका है। बावजूद इसके, साइट पर मुरौल की कोई पहचान नहीं दिखती। यहाँ तक कि भौगोलिक जानकारी में गलतियां भरी पड़ी हैं। वार्ड संख्या 3 के पार्षद आनंद कंद साह ने सीधे तौर पर प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि, नगर पंचायत की नींव ही कमजोर है, यहाँ प्रशासक और प्रशासन दोनों पूरी तरह विफल हैं। लाखों रुपये डकारने के बाद भी वेबसाइट पर होल्डिंग टैक्स या ग्रीवांस रिड्रेसल का कोई विकल्प काम नहीं करता।”

क्या कटिहार प्रेम में डूबा है मुरौल का प्रशासन?

मुरौल के पूर्व मुख्य पार्षद प्रत्याशी वीरेंद्र राय ने एक सनसनीखेज आरोप लगाते हुए इस लापरवाही के तार सीधे कार्यपालक पदाधिकारी (EO) के ससुराल से जोड़ दिए हैं। उन्होंने कहा, पैसा मुरौल की जनता का लग रहा है और प्रचार कटिहार के बारसोई का हो रहा है। ईओ साहिबा का ससुराल कटिहार में है, इसीलिए स्ट्रीट लाइट से लेकर सीसीटीवी और वेबसाइट तक का सारा काम कटिहार की एजेंसियां ही देख रही हैं।” ### सफेद झूठबोल रहीं कार्यपालक पदाधिकारी! जब इस संबंध में नगर कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी से सवाल किया गया, तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से कह दिया कि उन्होंने बारसोई की तस्वीर नहीं देखी। उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया, जबकि वेबसाइट का स्क्रीनशॉट चिल्ला-चिल्लाकर लापरवाही की गवाही दे रहा है। सवाल यह है कि एक पढ़ी-लिखी अधिकारी को अपनी ही संस्था की वेबसाइट का हाल क्यों नहीं पता? क्या यह ‘अनजान’ बने रहने का नाटक भ्रष्टाचार को ढंकने की एक कोशिश है?

न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर, तिमूल के पूर्व चेयरमैन एवं  नगर पंचायत मुरौल के पूर्व मुख्य पार्षद प्रत्याशी वीरेंद्र राय

मौन साधे माननीयऔर जनता की बेबसी

नगर पंचायत अध्यक्ष नरेश मेहता इस पूरे विवाद पर अंत-अंत तक बयान देने से बचते रहे। उनकी यह चुप्पी दर्शाती है कि वे भी इस लापरवाही में बराबर के हिस्सेदार हैं। पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार कहते हैं, बोर्ड की बैठकों में क्या फैसले होते हैं, यह सार्वजनिक नहीं किया जाता। पारदर्शिता का घोर अभाव है और जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है।”

एक नजर: संस्थान के लिए क्या है वेबसाइट का महत्व?

आज के डिजिटल युग में किसी भी सरकारी संस्थान की वेबसाइट उसका ‘डिजिटल चेहरा’ होती है। यह न केवल सूचना का केंद्र है, बल्कि जनता और सरकार के बीच संवाद का एकमात्र पारदर्शी सेतु है। जब वेबसाइट ही गलत तथ्यों और दूसरी जगह की तस्वीरों से भरी हो, तो जनता का भरोसा प्रशासन से उठना लाजमी है। एक आधिकारिक वेबसाइट के जरिए ही लोग घर बैठे टैक्स जमा करते हैं और अपनी समस्याएं दर्ज कराते हैं, लेकिन मुरौल में यह ‘सेतु’ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है।

न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर, हकीकत बयां करते नगर पंचायत मुरौल के वार्ड संख्या चार के पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार ,एवं  सामने लैपटॉप पर ‘बारसोई नगर पंचायत’ की तस्‍वीर दिखाते हुए,   

पार्षद बबलू कुमार का तीखा प्रहार: यह भ्रष्टाचार का जीता-जागता नमूना है

इस पूरे मामले में वार्ड संख्या चार के पार्षद बबलू कुमार उर्फ दिलीप कुमार ने प्रशासन की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने इस लापरवाही को सीधे तौर पर भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए कहा:

मज़ाक तो सर्वदा से हो रहा है जब से नगर पंचायत बना है। और वेबसाइट जो बना है, उस पर लाखों रुपया का बंदरबांट किया गया है। वेबसाइट कंपनी को पैसा भुगतान कर दिया गया है, लेकिन वेबसाइट पर आज भी बारसोई नगर पंचायत का तस्वीर लगा हुआ है। जब हम लोग आवाज़ उठाते हैं, तो कहा जाता है कि सुधार हो जाएगा, लेकिन सुधार आज तक नहीं हुआ। यह सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार का नमूना है। जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है और धरातल पर कोई काम नहीं हो रहा है।”

बबलू कुमार यहीं नहीं रुके, उन्होंने वेबसाइट पर दिए गए संपर्क विवरणों की पोल खोलते हुए प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारी को उजागर किया। उन्होंने बताया कि सरकारी वेबसाइट पर किसी आधिकारिक कार्यालय नंबर के बजाय एक एमटीएस (MTS) कर्मी का निजी नंबर दिया गया है। पार्षद ने सवाल उठाया:

किसी भी सरकारी वेबसाइट पर कार्यालय का आधिकारिक नंबर या टोल-फ्री नंबर होना चाहिए ताकि जनता अपनी समस्याओं को दर्ज करा सके। एक निजी कर्मी का नंबर देना यह दर्शाता है कि प्रशासन कितना गैर-जिम्मेदार है। यह केवल खानापूर्ति की जा रही है ताकि दिखाया जा सके कि वेबसाइट चल रही है। पारदर्शिता का यहाँ पूरी तरह अभाव है।”

तस्‍वीर में नगर पंचायत मुरौल के साइट पर प्रदर्शित मोबाइल नम्‍बर एवं ईमेल  

आखिर क्यों गंभीर है यह लापरवाही?

किसी भी सरकारी संस्थान के लिए वेबसाइट उसका डिजिटल हस्ताक्षर होती है। इसे ‘अस्मिता से खिलवाड़’ क्यों कहा जा रहा है, इसे इन बिन्दुओं से समझा जा सकता है:

  1. पहचान की चोरी: मुरौल की जनता का पैसा जिस पोर्टल के रखरखाव के लिए जा रहा है, वह पोर्टल किसी दूसरे जिले की नगर पंचायत का पहचान दिखा रहा है। यह स्थानीय गौरव का अपमान है।
  2. राजस्व की हानि: वेबसाइट का मुख्य उद्देश्य होल्डिंग टैक्स, ट्रेड लाइसेंस और अन्य नागरिक सुविधाओं को ऑनलाइन करना होता है। जब वेबसाइट ही भ्रमित करने वाली हो, तो राजस्व संग्रह (Collection) प्रभावित होता है।
  3. सुरक्षा और डेटा: एक सरकारी वेबसाइट पर निजी कर्मियों के नंबर होना डेटा सुरक्षा और आधिकारिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन है।
  4. प्रशासनिक दूरदर्शिता का अभाव: यदि अधिकारी अपनी वेबसाइट तक को मॉनिटर नहीं कर पा रहे, तो वे क्षेत्र के भौतिक विकास की निगरानी कैसे करेंगे?

कार्यपालक पदाधिकारी का अनजानरवैया: सवालों के घेरे में बयान

जब इस गंभीर विसंगति को लेकर नगर कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी से जवाब मांगा गया, तो उनका जवाब किसी को भी हैरान कर सकता है। उन्होंने कहा:

नहीं, बारसोई का तो नहीं आता है। मैं तो जब भी ओपन करती हूँ तो मुरौल नगर पंचायत का ही आता है। इसके रिगार्डिंग मैं बात करती हूँ एजेंसी से। अगर ऐसा है तो उसको देखती हूँ।”

हैरानी की बात यह है कि जिस वेबसाइट को दुनिया देख रही है, जिस पर बारसोई का चित्र स्पष्ट रूप से अंकित है, उसे विभाग की मुख्य अधिकारी ने कभी ‘देखा’ ही नहीं। जब उनसे कटिहार की एजेंसी को काम देने और स्थानीय पार्षदों के असंतोष पर सवाल किया गया, तो उन्होंने संक्षिप्त में कहा:

कटिहार की एजेंसी नहीं है। यह बिल्कुल गलत है। सारे काम नियमानुसार और पारदर्शिता के साथ ही होते हैं।”


नगर पंचायत मुरौल की कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर पक्ष रखते हुए बायें से एवं अपने मातहत कर्मचारी से टैब पर साइट खुलवा कर जानकारी लेती , साथ ही के फोन पर नगर पंचायत मुरौल की वेबसाइट मेन्‍टेनेन्‍स करने वाली एजेन्‍सी से बात करती हुई

बयान बनाम हकीकत: ईओ का काल्पनिकडिजिटल लोक

प्रशासनिक लापरवाही का सबसे हास्यास्पद और शर्मनाक पहलू तब सामने आया जब नगर कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी ने कैमरे पर रिकॉर्डेड बयान में एक ऐसी वेबसाइट का जिक्र किया, जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने आधिकारिक तौर पर ‘murol.in-nagarpalika’ नामक साइट का हवाला दिया, जबकि इंटरनेट की दुनिया में इस नाम का कोई पोर्टल मौजूद नहीं है। हकीकत यह है कि मुरौल के नाम पर दो वेबसाइटें ऑनलाइन दिख रही हैं—एक https://muraul.e-nagarpalika.com और दूसरी e-murol.com। विडंबना देखिए कि जिस e-murol.com पर ‘बारसोई नगर पंचायत’ की तस्वीरें और गलत तथ्य भरे पड़े हैं, उसे ईओ साहिबा ने ‘मुरौल की अपनी साइट’ मानने से ही इनकार कर दिया। एक जिम्मेदार पद पर बैठी अधिकारी द्वारा ऐसी ‘काल्पनिक’ वेबसाइट का नाम लेना और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध साक्ष्यों को नकारना यह साफ करता है कि नगर पंचायत मुरौल का आईटी तंत्र और प्रशासनिक नेतृत्व न केवल दिशाहीन है, बल्कि जनता को गुमराह करने में भी माहिर है। जब अधिकारी को अपनी संस्था के सही वेब एड्रेस तक का ज्ञान न हो, तो उस वेबसाइट के नाम पर होने वाले लाखों के भुगतान पर सवाल उठना लाजिमी है।


तकनीकी दिवालियापन: स्मार्ट गवर्नेंस के नाम पर डिजिटल अंधेरा

नगर पंचायत मुरौल का यह पूरा प्रकरण केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उस तकनीकी दिवालियापन का प्रमाण है जो सरकारी तंत्र में दीमक की तरह लगा हुआ है। एक तरफ बिहार सरकार और केंद्र सरकार ‘स्मार्ट सिटी’ से लेकर ‘स्मार्ट पंचायत’ तक के नारे बुलंद कर रही हैं, डिजिटल भुगतान और पारदर्शी शासन के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन मुरौल की हकीकत इन दावों के गाल पर एक तमाचा है।

हैरानी की बात यह है कि नगर पंचायत के सबसे जिम्मेदार पद पर बैठी कार्यपालक पदाधिकारी कल्पना कुमारी को खुद यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी जनता किस पोर्टल का उपयोग करे। कैमरे पर उन्होंने जिस ‘murol.in-nagarpalika’ का नाम लिया, वह अस्तित्वहीन है। यह स्थिति उस जनता के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है, जो अपना होल्डिंग टैक्स या अन्य सरकारी शुल्क ईमानदारी से जमा करना चाहती है। जब विभाग के मुखिया को ही ‘सही डिजिटल पते’ का ज्ञान न हो, तो आम नागरिक ठगी और भ्रम का शिकार क्यों न हो?

यह तकनीकी दिवालियापन ही है कि लाखों रुपये वेबसाइट मेंटेनेंस के नाम पर डकारे जा रहे हैं, लेकिन पोर्टल पर पहचान किसी और शहर (बारसोई) की है। यह दर्शाता है कि प्रशासन के लिए ‘डिजिटल’ होने का मतलब केवल एक वेबसाइट बनवाना और भुगतान करना है, उसकी गुणवत्ता और सत्यता से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। एक पढ़े-लिखे अमले के होते हुए ऐसी अंधेरगर्दी यह साबित करती है कि मुरौल नगर पंचायत में ‘स्मार्टनेस’ केवल फाइलों तक सीमित है, जबकि हकीकत में यहाँ डिजिटल अंधेरा छाया हुआ है।


न्‍यूज भारत टी.वी. के कैमरे पर, हकीकत बयां करते नगर पंचायत मुरौल के वार्ड संख्या तीन के पार्षद आनंद कंद साह

पार्षद आनंद कंद साह और वीरेंद्र राय के गंभीर आरोप

वार्ड संख्या तीन के पार्षद आनंद कंद साह ने तो यहाँ तक कह दिया कि नगर पंचायत का नींव ही कमजोर है। उन्होंने आरोप लगाया कि यहाँ “काला अक्षर भैंस बराबर” वाली स्थिति है। उनके अनुसार, प्रशासक और प्रशासन दोनों पूर्ण रूप से विफल हैं और उन्हें इस बात की फुर्सत नहीं है कि वे देखें कि सरकारी पोर्टल पर क्या चल रहा है।

वहीं, पूर्व प्रत्याशी वीरेंद्र राय ने सीधे तौर पर ‘कटिहार कनेक्शन’ पर ऊँगली उठाई। उन्होंने दावा किया कि मुरौल नगर पंचायत का पैसा कटिहार के लोगों और एजेंसियों को फायदा पहुँचाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है, क्योंकि कार्यपालक पदाधिकारी का ससुराल कटिहार में है। उन्होंने चुनौती दी कि ईओ साहिबा कैमरे के सामने आकर टेंडर और भुगतान का ब्योरा जनता को दें।


नगर पंचायत अध्यक्ष की चुप्पी: मौन सहमति या लाचारी?

नगर पंचायत के अध्यक्ष नरेश मेहता इस पूरे विवाद के केंद्र में होने के बावजूद मौन साधे हुए हैं। एक निर्वाचित प्रतिनिधि के नाते यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे जनता के टैक्स के पैसे का हिसाब लें। लेकिन उनका बयान देने से बचना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं इस ‘महालापरवाही’ में वे भी बराबर के हिस्सेदार हैं।


अस्मिता का सौदा: किसी और की पहचान कब तक ढोएगा मुरौल?

किसी भी क्षेत्र की अस्मिता उसके इतिहास, भूगोल और उसकी अपनी पहचान से जुड़ी होती है। लेकिन नगर पंचायत मुरौल के सरकारी पोर्टल की सूरत देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन की नजर में मुरौल की अपनी कोई विशिष्ट पहचान है ही नहीं। अपनी वेबसाइट पर किसी दूसरे नगर पंचायत (बारसोई) की तस्वीर को बेशर्मी से ढोना, केवल एक ‘अपलोड’ की गलती नहीं है, बल्कि यह मुरौल के प्रत्येक नागरिक के स्वाभिमान पर सीधी चोट है।

नगर पंचायत मुरौल के कार्यालय का एक दृश्‍य

क्या मुरौल इतना विपन्न है कि उसके पास अपनी एक तस्वीर तक नहीं? क्या यहाँ की हरियाली, यहाँ की सड़कें या यहाँ के गौरवशाली संस्थान (जैसे ढोली एग्रीकल्चर कॉलेज) इतने कमतर हैं कि उन्हें वेबसाइट पर जगह देने के बजाय कटिहार के बारसोई का सहारा लेना पड़ा? यह स्थिति दर्शाती है कि वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारियों के लिए मुरौल केवल एक ‘रेवेन्यू कोड’ या ‘फाइल का नाम’ मात्र है। उनके लिए इस मिट्टी की गरिमा का कोई मूल्य नहीं है।

जब मुरौल का आम नागरिक टैक्स भरता है, तो वह बदले में केवल सुविधा नहीं, बल्कि सम्मान और अपनी पहचान की सुरक्षा भी चाहता है। लेकिन जब उसे अपनी ही सरकारी वेबसाइट पर किसी दूसरे शहर का चेहरा देखना पड़ता है, तो यह ‘अस्मिता के सौदे’ जैसा प्रतीत होता है। प्रशासन का यह रवैया साफ़ संदेश देता है कि उनके लिए मुरौल की विशिष्टता और यहाँ के लोगों की भावनाएं कोई मायने नहीं रखतीं। यह मानसिक गुलामी और प्रशासनिक आलस का वह चरम है, जहाँ लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी हम अपनी पहचान तक गिरवी रख देते हैं।


यह खबर केवल एक वेबसाइट की तस्वीर बदलने की नहीं है, बल्कि उस कार्यप्रणाली को बदलने की है जहाँ जनता के पैसे को अपनी जागीर समझकर लुटाया जाता है। अगर एक पढ़ा-लिखा प्रशासनिक अमला अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर दूसरे शहर की तस्वीर नहीं पहचान पा रहा, तो यह उनकी योग्यता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

पढ़े-लिखे अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की फौज होने के बावजूद अगर ऐसी भारी चूक हो रही है, तो यह ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है। क्या जिला प्रशासन इस ‘वेबसाइट घोटाले’ और कटिहार कनेक्शन की जांच कराएगा? या मुरौल की जनता इसी तरह अपनी पहचान के लिए तरसती रहेगी?

पार्षद बबलू कुमार की बातों ने स्पष्ट कर दिया है कि नगर पंचायत मुरौल में पारदर्शिता केवल कागजों तक सीमित है। अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट के बाद जिला प्रशासन जागता है या मुरौल की जनता बारसोई के साये में ही ‘डिजिटल विकास’ का आनंद लेती रहेगी।


स्‍वीर में नगर पंचायत मुरौल के वेबसाइट के स्‍क्रीन शॉट का एक  विहंगम दृश्‍य

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