खास रिपोर्ट: सकरा (मुजफ्फरपुर)

बिहार के खेतों में धान और गेहूं की लहलहाती फसलें देखना आम बात है, लेकिन अगर हम कहें कि मुजफ्फरपुर की तपती गर्मी में अब कश्मीरी सेव के गुच्छे लटक रहे हैं, तो शायद आपको यकीन न हो। लेकिन सकरा प्रखंड के हसनपुर बंगाही गांव में यह हकीकत बनकर उभर रहा है। यहां के एक प्रयोगधर्मी युवा किसान हर्ष रंजन उर्फ सोनू जी ने अपनी मेहनत से बिहार की मिट्टी पर ‘सेव का सपना’ साकार कर दिया है। इन्‍हों  ने अपनी मेहनत और नवाचार से वह कर दिखाया है जो कभी नामुमकिन लगता था। बिहार की उपजाऊ मिट्टी में अब सेव की फसल न केवल लहलहा रही है, बल्कि उसमें फूल और फल भी आने लगे हैं।

47 डिग्री का टॉर्चर और सेव की बहार

आमतौर पर माना जाता है कि सेव केवल ठंडे प्रदेशों की फसल है। लेकिन सोनू जी के बागान में हरमन 99′ प्रजाति के 125 पौधों ने इस धारणा को बदल दिया है। जहां पारा 46-47 डिग्री तक पहुंच जाता है, वहां जेठ की तपती दुपहरी और बरसात के थपेड़ों के बीच सेव के ये पौधे न केवल जीवित हैं, बल्कि अब फूलों और फलों से लद चुके हैं। यह बिहार के कृषि इतिहास में एक मील का पत्थर है।

सकरा प्रखंड के हसनपुर बंगाही गांव के एक युवा किसान, हर्ष रंजन उर्फ सोनू अपने सेव के खेत में

मल्टी-लेयर फार्मिंग: एक खेत, चार फसलें और बंपर कमाई

सोनू जी ने केवल खेती नहीं की, बल्कि खेती की कला को विज्ञान से जोड़ा है। उन्होंने आधे एकड़ की जमीन का ऐसा ‘मैनेजमेंट’ किया है कि जानकार भी हैरान हैं:

  1. मुख्य फसल: सेव की बागवानी।
  2. पूरक फसल: सेव की कतारों के साथ पपीते के पेड़।
  3. बीच का सदुपयोग: पपीते और सेव के बीच खाली जगह में मिर्च की खेती।
  4. मिट्टी की उर्वरता: बचे हुए हिस्सों में मसूर की दाल की बुआई।

फायदा क्या है? सोनू जी बताते हैं कि सेव की फसल अप्रैल-मई में तैयार होती है। तब तक पपीता और मिर्च किसान को निरंतर आमदनी देते रहते हैं। साथ ही, पपीते और सेव दोनों को पानी की समान मात्रा चाहिए होती है, जिससे सिंचाई का खर्च और मेहनत आधी हो जाती है।

बिना यूरिया-DAP: पूरी तरह केमिकल फ्रीबागवानी

आज के दौर में जहां फसलों में जहरीले कीटनाशकों की भरमार है, वहीं सोनू जी ने पूर्णतः जैविक (Organic) तरीका अपनाया है।

  • कीटों के लिए हनी ट्रैप‘: पौधों को कीड़ों से बचाने के लिए उन्होंने बाजार से जहर खरीदने के बजाय ‘कीट ट्रैप मशीन’ का इस्तेमाल किया। यह एक लैंपनुमा डब्बा है जिसमें मादा कीड़ा की सुगंध होती है, जिसके आकर्षण में आकर सारे नर कीड़े डब्बे में फंस जाते हैं।
  • स्मार्ट सिंचाई: गर्मी में तापमान को नियंत्रित रखने के लिए पूरे खेत में पाइपलाइन का जाल बिछाया गया है, जिससे जरूरत के अनुसार नमी बरकरार रखी जाती है।

बिहार के किसानों के लिए उम्मीद की किरण

सोनू जी ने 20 फरवरी 2022 को इस सफर की शुरुआत की थी। शुरुआती चुनौतियों में कुछ पौधे सूखे भी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आज उनका बागान सुकून देने वाला नजारा पेश कर रहा है। सेव का पेड़ अमरूद के पेड़ जैसा दिखता है और तीन साल में पूरी तरह फलदार हो जाता है।

मुजफ्फरपुर का यह प्रयोग अब पूरे बिहार के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। सकरा की यह कामयाबी चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो बिहार की मिट्टी सोना भी उगल सकती है और कश्मीर के स्वाद को अपने आंगन में उतार सकती है। अब बिहार के किसान भी सेव बेचकर लाखों रुपये कमाने का सपना देख सकते हैं।

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