एस.एस. कुमार ‘पंकज’
मुजफ्फरपुर, बिहार। आगामी 26 जनवरी को जब पूरा देश 77वें गणतंत्र दिवस के गौरव में डूबा होगा, जब राजपथ पर सैन्य शक्ति का प्रदर्शन होगा और आसमान तिरंगे के रंगों से सराबोर होगा, ठीक उसी समय मुजफ्फरपुर के सकरा में ‘राष्ट्रीय शर्म’ की एक और कड़वी तस्वीर बेपर्दा होने की पूरी आशंका है। यह दास्तां है अगस्त क्रांति के उस जांबाज शहीद अमीर सिंह की, जिन्होंने 1942 में अपनी छाती पर ब्रिटिश हुकूमत की गोली सिर्फ इसलिए खाई थी ताकि आने वाली पीढ़ियां एक आजाद और सम्मानजनक गणतंत्र में सांस ले सकें। लेकिन अफसोस, आज उसी गणतंत्र के नुमाइंदे— स्थानीय प्रखंड अधिकारी, थानेदार, चिकित्सा पदाधिकारी, बैंक मैनेजर, और न जाने कितने सफेदपोश नेता—अपनी कृतघ्नता से इस शहादत को हर दिन कुचल रहे हैं।

तमाशा गणतंत्र का: 50 मीटर की दूरी, फिर भी श्रद्धा सुमन को ‘वक्त‘ नहीं
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए, 26 जनवरी को सकरा प्रखंड मुख्यालय और सकरा थाने में धूमधाम से झंडोत्तोलन होगा। सरकारी अधिकारी ‘अमर शहीदों के सपनों’ को पूरा करने की कसमें खाएंगे, देशभक्ति के तराने गूंजेंगे और मिठाइयां बांटी जाएंगी। लेकिन इस उत्सव के भव्य पांडाल से महज 100 से 200 मीटर के दायरे में शहीद अमीर सिंह की प्रतिमा एक मूक दर्शक की तरह सिस्टम की बेरुखी और कृतघ्नता को देख रही होगी।

हैरानी की बात यह है कि पिछले कई सालों का रिकॉर्ड गवाह है कि यहाँ के ‘साहबों’ (बीडीओ, सीओ, थानेदार) के सरकारी शेड्यूल में शहीद की प्रतिमा पर दो पुष्प अर्पित करना शामिल ही नहीं होता।
- सकरा निबंधन कार्यालय: दूरी मात्र 50 मीटर।
- सकरा थाना: दूरी मात्र 100 मीटर।
- सकरा प्रखंड कार्यालय: दूरी मात्र 200 मीटर।

क्या इन साहबों का ‘प्रोटोकॉल‘ इतना बड़ा हो गया है कि जिस मिट्टी के शहीद ने इन्हें ये कुर्सियां और रसूख दिया, वहां जाने में इन्हें परहेज है? जिन दफ्तरों में बैठकर ये अधिकारी आज लोकतांत्रिक व्यवस्था का आनंद ले रहे हैं, उसकी नींव में अमीर सिंह जैसे वीरों का ही खून है। क्या सरकारी साहबों को लगता है कि शहीद की प्रतिमा पर जाना उनकी शान के खिलाफ है? या फिर ‘गणतंत्र’ अब सिर्फ फाइलों, भाषणों और सरकारी दफ्तरों की चारदीवारी तक सिमट कर रह गया है?

शहीद स्थल या कचरा स्थल? नगर पंचायत सकरा की संवेदनहीनता पर सवाल
सकरा निबंधन कार्यालय परिसर स्थित शहीद अमीर सिंह का शहादत स्थल आज बदहाली के आंसू रो रहा है। सकरा नगर पंचायत के अधिकारी और इसके नुमांइदे को यह ज्ञान नहीं है कि शहीद अमीर सिंह , सकरा के लिए प्रेरणा पुंज है, गौरव हैं । शहादत स्थल पर जहाँ श्रद्धा की सुगंध और पवित्रता होनी चाहिए, वहां साल भर गंदगी का अंबार लगा रहता है। शहीद की प्रतिमा धूल फांक रही है और आलम यह है कि यह स्थान शहीद स्मारक न होकर ‘कचरा स्थल’ में तब्दील हो चुका है।

सवाल सकरा नगर पंचायत के अधिकारियों से है: आपका आलीशान कार्यालय यहाँ से महज 200 मीटर दूर है, फिर भी आपके सफाईकर्मियों को यहाँ झांकने तक की फुर्सत नहीं मिलती? जब एक राष्ट्रीय नायक के स्मारक का यह हाल है, तो सकरा नगर पंचायत के अन्य इलाकों में सफाई की स्थिति कितनी नारकीय होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। क्या नगर पंचायत के अधिकारी केवल कागजों पर ‘स्वच्छ भारत’ का ढिंढोरा पीटते हैं?

विरासत की अनभिज्ञता: कांग्रेस का ‘सूना‘ आश्रम और भाजपा की ‘सियासत‘
शहादत स्थल से महज 200 मीटर की दूरी पर वह ऐतिहासिक कांग्रेस आश्रम स्थित है, जिसने आजादी की लड़ाई के दौरान क्रांतिकारियों के भीतर ज्वाला फूंकी थी। दुखद पहलू यह है कि आज की पीढ़ी के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को शायद अपनी ही विरासत और इतिहास का ज्ञान नहीं है। जिस तिरंगे के सम्मान के लिए अमीर सिंह ने सीने पर गोली खाई, उसी पार्टी के कार्यकर्ता आज अपने शहीद की सुध लेना भूल गए हैं।

राजनीति के इसी शून्य का लाभ विपक्षी दल उठाते हैं। जहाँ कांग्रेस अपनी विरासत सहेजने में विफल रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता इन अवसरों को भुनाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। लेकिन सवाल राजनीति से ऊपर नैतिकता का है—क्या शहीद अमीर सिंह किसी एक दल के थे? क्या वे पूरे राष्ट्र की सामूहिक थाती नहीं हैं? आखिर क्यों राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले दल शहीद की प्रतिमा की सफाई और गरिमा के लिए आगे नहीं आते?
‘नुनफरा‘ का स्कूल और गुमनाम होती शहादत
शहीद अमीर सिंह के पैतृक गांव नुनफरा की स्थिति और भी पीड़ादायक है। ग्रामीणों ने शहीद के सम्मान में स्थानीय प्राथमिक विद्यालय का नाम ‘अमीर सिंह’ के नाम पर रख दिया था। विद्यालय की मुख्य दीवार पर नाम अंकित भी किया गया, लेकिन गांव की ओछी राजनीति और सरकारी तंत्र की ढिलाई ने उस नाम को सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं होने दिया। आज दीवार पर लिखा वह नाम भी मिट चुका है। एक तरफ सरकार विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करती है, वहीं दूसरी तरफ एक शहीद को उसके अपने ही गांव में उसकी पहचान से वंचित रखा जा रहा है।

विधायक कोमल सिंह की पहल ने जगाई उम्मीद
बंदरा प्रखंड के नुनफरा गाँव का ‘शहीद द्वार’ वर्षों तक खंडहर बना रहा। 1994 में तत्कालीन राजस्व मंत्री रमई राम ने इसका निर्माण कराया था, लेकिन बाद के जनप्रतिनिधियों ने इसे मरने के लिए छोड़ दिया। इस उपेक्षा के दौर में गायघाट की वर्त्तमान विधायक कोमल सिंह धन्यवाद की पात्र हैं, जिन्होंने शहीद की सुध ली और इस द्वार का जीर्णोद्धार कराया। यह साबित करता है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो बजट का रोना नहीं रोया जाता। लेकिन क्या केवल एक द्वार का बन जाना काफी है? शहीद के जन्मस्थल पर आज भी एक प्रतिमा लगाने की मांग वर्षों से लंबित है।

जयमाला देवी का ‘मूक बलिदान‘ और गुलाम मानसिकता का प्रतीक ‘डैनवी आवास‘
अमीर सिंह की शहादत अधूरी है यदि उनकी पत्नी जयमाला देवी का जिक्र न हो। शादी के मात्र सात माह बाद विधवा हुई उस वीरांगना ने अन्न-जल त्याग दिया और शहादत की घटना के दो माह के भीतर प्राणों की आहुति दे दी। क्या आजाद भारत के किसी सरकारी दस्तावेज में इस बलिदान को जगह मिली?
एक तरफ वह अंग्रेज अफसर ई.सी. डैनवी है, जिसके आदेश पर गोलियां चलीं, उसका आवास (तिरहुत कृषि महाविद्यालय ढोली का गेस्ट हाउस) आज भी राजकीय अतिथि की तरह चमक रहा है। दूसरी तरफ हमारे देश के रक्षक का जन्मस्थान मिट्टी में मिल रहा है। यह गणतंत्र का जश्न है या हमारी आज भी कायम गुलाम मानसिकता का प्रदर्शन?
26 जनवरी को सकरा, मुरौल और बंदरा के अधिकारियों से सीधे सवाल:
आगामी गणतंत्र दिवस पर जनता की अदालत में ये प्रश्न खड़े होंगे:
- क्या इस बार बीडीओ साहब, थानेदार और नगर पंचायत अधिकारी अपनी वातानुकूलित गाड़ियों से उतरकर शहीद की प्रतिमा पर फूल चढ़ाने की हिम्मत करेंगे?
- क्या ढोली रेलवे स्टेशन का नाम ‘शहीद अमीर सिंह रेलवे स्टेशन‘ करने की रुकी हुई फाइल पर चढ़ी धूल साफ होगी?
- क्या नुनफरा के स्कूल को सरकारी तौर पर शहीद का नाम मिलेगा, या इस बार भी केवल ‘आश्वासन‘ की मिठाई बांटी जाएगी?
- सकरा, मुरौल और बंदरा प्रखंडों के सरकारी शिलापट्टों पर शहीद अमीर सिंह का नाम कब दर्ज होगा?
शहीद अमीर सिंह का लहू इस मिट्टी की गहराई में मिला है। अगर इस 26 जनवरी को भी उन्हें गंदगी और उपेक्षा के बीच छोड़ दिया गया, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि हम एक राष्ट्र के रूप में केवल पाखंड कर रहे हैं। कृतघ्न समाज और संवेदनहीन प्रशासन कभी महान लोकतंत्र का निर्माण नहीं कर सकते।
क्या इस 26 जनवरी टूटेगी उपेक्षा की यह परंपरा?
शहीद अमीर सिंह की उपेक्षा का एक बड़ा कारण सिस्टम की वह जड़ता है, जिसमें ‘शहादत’ को सरकारी ड्यूटी चार्ट का हिस्सा ही नहीं माना गया। सकरा में पोस्टिंग पर आने वाले अधिकांश अधिकारी बाहरी क्षेत्रों के होते हैं, जिन्हें स्थानीय इतिहास और यहाँ की माटी के नायकों के बलिदान की जानकारी तक नहीं दी जाती। यह प्रशासन की विफलता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी अनभिज्ञता की आड़ में शहीद अमीर सिंह को उनके ही शहादत स्थल पर बेगाना बना दिया जा रहा है।
क्या इस बार स्थानीय प्रशासन के द्वारा गणतंत्र दिवस के समारोह पर सरकारी शेड्यूल में शहीद अमीर सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण को आधिकारिक रूप से शामिल किया जाएगा? यदि इस बार भी अधिकारी महज 100 मीटर की दूरी तय नहीं कर पाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि तंत्र के लिए ‘शहादत’ की कोई कीमत नहीं है और हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक कृतघ्न समाज सौंप रहे हैं।

“अगर आज हम चुप रहे, तो कल कोई अमीर सिंह देश के लिए गोली खाने से पहले हजार बार सोचेगा। सकरा के इस महान शहीद की प्रतिमा आज गंदगी और उपेक्षा के बीच आंसू बहा रही है। इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि सोए हुए अधिकारियों की नींद टूट जाए!”
अगस्त क्रांति के विस्मृत नायक शहीद अमीर सिंह: सीने पर गोली खाई ताकि हम आजाद रहें, पर आजाद भारत में उनके शहादत को उचित सम्मान नहीं–
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