मुजफ्फरपुर (बिहार): बिहार की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक धरती पर एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड अंतर्गत मतलुपुर में स्थित प्राचीन बाबा खगेश्वरनाथ महादेव मंदिर अब नए कलेवर में नजर आएगा। यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक महत्ता बल्कि अपनी अद्भुत पुरातात्विक विरासत के लिए भी चर्चा में है। नेपाल के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू हो चुका है, जिसके पूर्ण होते ही यह उत्तर बिहार का एक प्रमुख पर्यटन और आस्था का केंद्र बन जाएगा।
खुदाई में मिला इतिहास का ‘टाइम कैप्सूल‘
मंदिर के बाहरी स्वरूप को भव्य बनाने के लिए जब मुख्य गर्भ गृह के चारों ओर खुदाई शुरू हुई, तो वहां से इतिहास की ऐसी परतें निकलीं जिन्होंने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है। करीब 12 फीट की गहराई तक की गई खुदाई में मंदिर निर्माण के तीन अलग-अलग कालखंड (लेयर्स) स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं:

- ऊपरी परत (करीब 200-300 साल पुरानी): सतह से 4 फीट की गहराई तक जो ईंटें और दीवारें मिली हैं, वे आधुनिक काल से ठीक पहले के निर्माण को दर्शाती हैं।
- मध्य परत (करीब 800 साल पुरानी): 8 फीट की गहराई पर मिली संरचनाएं मध्यकालीन भारत की वास्तुकला की याद दिलाती हैं।
- प्राचीनतम आधार (3000-3500 साल पुराना): सबसे निचली परत और शिवलिंग का आधार तल पुरातत्वविदों के अनुसार 3500 साल तक पुराना हो सकता है। शिवलिंग जिस ‘कसौटी पत्थर’ के आधार पर टिका है, वह इसकी प्राचीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
यहाँ से पूर्व में भी पाल कालीन काली पत्थर की मूर्तियाँ प्राप्त हुई थीं, जिन्हें मंदिर प्रशासन ने ससम्मान परिसर में ही स्थापित किया है।
पशुपतिनाथ की प्रतिकृति: भक्तों का अनूठा संकल्प
इस मंदिर का कायाकल्प किसी सरकारी अनुदान से नहीं, बल्कि आम जनमानस के सहयोग से हो रहा है। मंदिर के चारों ओर पशुपतिनाथ मंदिर (काठमांडू) की तर्ज पर नक्काशीदार दीवारों और भव्य गुंबद का निर्माण शुरू हो गया है। मंदिर परिसर में पशुपतिनाथ मंदिर की एक विशाल प्रतिकृति (तस्वीर) लगाई गई है, जिसे गाइड मानकर कारीगर दिन-रात काम कर रहे हैं।

विशिष्ट पहचान: लाल शिवलिंग और माता पार्वती का ‘लिंग‘ स्वरूप
खगेश्वरनाथ मंदिर की तुलना अक्सर काशी विश्वनाथ और रामेश्वरम से की जाती है। इसका कारण यहाँ स्थापित दुर्लभ लाल पत्थर का शिवलिंग है। पूरे भारत में ऐसे शिवलिंग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।
इसके साथ ही, यहाँ एक ऐसी विशेषता है जो दुनिया में कहीं और नहीं देखी गई— माता पार्वती का ‘लिंग‘ स्वरूप। यद्यपि यह पुरातात्विक मूर्ति खंडित अवस्था में है, लेकिन इसकी महत्ता को देखते हुए इसे सुरक्षित रखा गया है और उसी विधान से पूजा की जाती है। इस खंडित मूर्ति की ऐतिहासिकता को देखते हुए 1950 में पास में ही माता पार्वती की भगवान शिव को नमन करती हुई एक अन्य सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई थी।
रामायण काल से जुड़ा नाता और ‘खगेश्वर‘ नाम की महिमा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही भूमि है जहाँ भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी का निवास था। रामायण युद्ध के दौरान जब मेघनाद ने नागपाश से राम-लक्ष्मण को बांध दिया था, तब गरुड़ जी ने ही उन्हें मुक्त कराया था। उस समय गरुड़ जी के मन में श्री राम के ईश्वर होने पर संशय उत्पन्न हुआ था।
कहा जाता है कि गरुड़ जी (पक्षियों के राजा यानी ‘खग’) की जिज्ञासा और शंका का समाधान भगवान शिव ने इसी स्थान पर संवाद के माध्यम से किया था। इसी कारण इस स्थान का नाम खगेश्वरनाथ पड़ा। आज भी यहाँ गरुड़ जी की अत्यंत प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जो खुदाई के दौरान ही प्राप्त हुई थी।
काशी जैसी परंपरा : मंदिर और श्मशान का संगम
इस मंदिर की एक और दुर्लभ बात इसका श्मशान से सटा होना है। मंदिर के उत्तर-पूर्व दिशा में ‘पूरनी पोखर‘ श्मशान स्थित है। सनातन परंपरा में काशी के अलावा बहुत कम ऐसे स्थान हैं जहाँ मंदिर और श्मशान एक साथ हों। यह संरचना भगवान शिव के ‘महाकाल’ स्वरूप और जीवन-मृत्यु के शाश्वत सत्य को प्रदर्शित करती है।
मतलुपुर का यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सभ्यता का गवाह है। जैसे-जैसे निर्माण कार्य आगे बढ़ रहा है, लोग न केवल इसके भव्य स्वरूप को देखने के लिए उत्सुक हैं, बल्कि यहाँ की मिट्टी से निकल रहे इतिहास को जानने के लिए भी लालायित हैं। आने वाले समय में बाबा खगेश्वरनाथ महादेव मंदिर अपनी प्राचीनता और भव्यता के संगम से पूरे देश को गौरवान्वित करेगा।


