समस्तीपुर: जिला प्रशासन द्वारा पेट्रोल पंपों पर डिब्बे, बोतल या गैलन में ईंधन (पेट्रोल-डीजल) देने पर लगाई गई रोक ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रशासन के इस आदेश को भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह ने अव्यावहारिक और तुगलकी करार देते हुए तीखा हमला बोला है।

क्या है पूरा मामला?

हाल ही में जिला प्रशासन, समस्तीपुर द्वारा जारी एक पत्र के माध्यम से सभी रिटेल आउटलेट संचालकों को निर्देशित किया गया है कि किसी भी परिस्थिति में वाहन के अलावा किसी अन्य कंटेनर (डब्बा, बोतल, गैलन आदि) में ईंधन की आपूर्ति न की जाए। प्रशासन का तर्क है कि ईंधन की कमी की अफवाहों के चलते विधि-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है, जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है।

प्रतीकात्‍मक (काल्‍पनिक ) तस्‍वीर : क्‍या अब आदेश के बाद यह स्थिति देखना पड़ेगा  

यह कमाल का आदेश है! अगर डब्बा-बोतल-गैलन में डीजल-पेट्रोल नहीं मिलेगा, तो क्या लोग अपना भारी-भरकम जेनरेटर या खेती का पम्पिंग सेट कंधे पर लादकर पेट्रोल पंप पर जाएंगे?”सुरेंद्र प्रसाद सिंह, माले नेता


आदेश पर उठे गंभीर सवाल

माले नेता ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह आदेश जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटा हुआ है। इस फरमान से सबसे ज्यादा प्रभावित निम्नलिखित वर्ग होंगे:

  • किसान: सिंचाई के लिए पंपसेट चलाने हेतु डीजल की जरूरत होती है। पंपसेट को खेत से उखाड़कर पंप तक ले जाना असंभव है।
  • छोटे व्यवसायी: दुकानों और संस्थानों में पावर बैकअप के लिए जेनरेटर का इस्तेमाल होता है, जिनमें ईंधन गैलन के जरिए ही भरा जाता है।
  • आम नागरिक: शादी-ब्याह या अन्य आयोजनों में बिजली कटने पर जेनरेटर ही एकमात्र सहारा होता है।

अफवाह रोकने के नाम पर अव्यवस्था

प्रशासन का कहना है कि राज्य में ईंधन का पर्याप्त भंडार है और यह पाबंदी केवल ‘पैनिक बाइंग’ और अफवाहों को रोकने के लिए लगाई गई है। लेकिन जानकारों का मानना है कि ऐसे प्रतिबंधों से जनता में और भी अधिक डर (पैनिक) पैदा होता है।

एक ओर सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और किसान कल्याण की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे प्रतिबंधात्मक आदेश आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। अब देखना यह है कि विरोध के बाद क्या जिला प्रशासन इस आदेश में कोई संशोधन करता है या किसान अपनी मशीनों को पंप तक खींचने पर मजबूर होंगे।

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