शिक्षा का अर्थ केवल हुनर सीखना नहीं, जीवन को ‘उत्तमोत्तम’ बनाना है: डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह
मुजफ्फरपुर | निज प्रतिनिधि |भारतीय शिक्षण मंडल के 57वें स्थापना दिवस के अवसर पर शुक्रवार को लंगट सिंह महाविद्यालय (एलएस कॉलेज) का मुख्य प्रशाल वैचारिक मंथन का केंद्र बना। “शिक्षा में रामत्व” विषय पर आयोजित इस भव्य समारोह में प्रख्यात विद्वानों ने भारतीय शिक्षा पद्धति और भगवान राम के आदर्शों के अंतर्संबंधों को गहराई से स्पष्ट किया।

राम का चरित्र: शिक्षा का वास्तविक निदर्शन
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित धर्म समाज संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह ने “शिक्षा में रामत्व” की व्याख्या करते हुए कहा कि राम का चरित्र ही वास्तव में शिक्षा का सच्चा निदर्शन (उदाहरण) है। उन्होंने कहा, “राम के व्यक्तित्व में त्याग, तप, बलिदान, करुणा, प्रेम और सौहार्द का जो समन्वय है, वही हमारे नैतिक मूल्यों का आधार है। भारतीय मनीषा के अनुसार, शिक्षा केवल पैसा कमाने या हुनर सीखने का जरिया नहीं है, बल्कि यह जीवन को ‘उत्तमोत्तम‘ बनाने की एक साधना है।” उन्होंने रामायण के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए गुरु-शिष्य परंपरा और कर्म की महत्ता को समझाया।
नर से नारायण बनने की यात्रा
मुख्य अतिथि एवं संस्कृत के उद्भट विद्वान डॉ. अमरेन्द्र ठाकुर (पूर्व प्रधानाचार्य, एमपीएस साइंस कॉलेज) ने कहा कि राम का चरित्र भारत का शाश्वत आदर्श है। उन्होंने विस्तार से बताया कि रामायण वास्तव में ‘नर से नारायण’ बनने की एक प्रक्रिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति में ‘रामत्व’ के गुणों को जागृत करने की आवश्यकता है, क्योंकि राममय होना ही मानवता का सच्चा प्रतीक है।
चरित्र-निर्माण और भारतीयता का संकल्प
विशिष्ट वक्ता डॉ. अवधेश ठाकुर ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि राम के बिना भारतीय शिक्षा और संस्कृति की परिकल्पना ही असंभव है। उन्होंने कहा कि जब हम ज्ञान के साथ चरित्र-निर्माण को जोड़ते हैं, वही ‘रामत्व’ का वास्तविक स्वरूप है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अजीत कुमार ने कहा कि राम हमारे समाज के नायक हैं और वर्तमान शिक्षा में संस्कार एवं संस्कृति का जुड़ाव ही ‘रामत्व’ की स्थापना है।
भारतीय शिक्षण मंडल के प्रांत मंत्री डॉ. नवीन तिवारी ने विषय-प्रवेश कराते हुए मंडल के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संगठन का मूल लक्ष्य शिक्षा में ‘भारतीयता’ को उपस्थापित करना है। उन्होंने आह्वान किया कि शैक्षिक अध्ययन, अध्यापन, अनुसंधान और प्रकाशन का आधार भारतीय मूल्य ही होने चाहिए।

सम्मान एवं गरिमामयी उपस्थिति
समारोह का शुभारंभ डॉ. राजेश्वर प्रसाद सिंह, डॉ. अमरेन्द्र ठाकुर, डॉ. अवधेश ठाकुर एवं श्री अजीत कुमार ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर आगत अतिथियों को पुस्तक और शाल देकर सम्मानित किया गया। धन्यवाद ज्ञापन व्यवस्था प्रमुख विजय कुमार शर्मा ने किया, जबकि मंच का सफल संचालन डॉ. नवीन तिवारी ने किया।
कार्यक्रम में इनकी रही सक्रिय भागीदारी: समारोह में डॉ. ललित किशोर, डॉ. हरिशंकर भारती, कैप्टन बालेश्वर राय, डॉ. गणेश कुमार सिंह, डॉ. राकेश रंजन, डॉ. अमरेन्द्र झा, डॉ. रवि कुमार, डॉ. पवन कुमार, डॉ. मनोज कुमार, प्रशांत गौतम, प्रभात मिश्रा, मयंक मिश्रा, अभिनव राज, पुष्कर सिंह, कार्तिक पाण्डेय, अंशुमान, संतोष सिंह, दिव्य लता, अभियंता बलराम सिंह, अभियंता सुबोध कुमार, मनोज शुक्ला, रवींद्र प्रसाद सिंह तथा शिक्षक अनिल कुमार, सरोज कुमार, राकेश कुमार सहित भारी संख्या में छात्र-छात्राएं और शिक्षक उपस्थित थे।



