मुजफ्फरपुर, बिहार। भक्ति की शक्ति जब मौन में विलीन होती है, तो वह ‘सिद्धि’ बन जाती है। उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक ऐसा ही आध्यात्मिक केंद्र है, जो दिखावे की चकाचौंध से कोसों दूर, अपनी दिव्यता और शांति के लिए जाना जाता है। हम बात कर रहे हैं त्राहि अच्युत आश्रम, डिहुली की। यह न केवल एक मंदिर है, बल्कि हजारों भक्तों की आस्था का वह केंद्र है जहाँ पहुँचते ही मन की सारी व्याकुलता शांत हो जाती है। एनएच-28 (NH-28) के करीब स्थित यह आश्रम आज उत्तर बिहार के ‘जगन्नाथ पुरी’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है।
प्रथम दर्शन: जब शिखर ध्वज से मिला हृदय को सुकून
राष्ट्रीय राजमार्ग 28 पर मुजफ्फरपुर से बरौनी की ओर बढ़ते हुए, सकरा प्रखंड के पिपरी चौक के पास जैसे ही आप पहुँचते हैं, आपकी नजरें आसमान को छूते एक विशाल मंदिर के शिखर पर जाकर ठहर जाती हैं। लगभग एक किलोमीटर दूर से ही मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर लहराता हुआ ध्वज भक्तों को अपनी ओर आमंत्रित करता प्रतीत होता है।
अक्सर यात्रियों के कदम यहाँ अनायास ही ठिठक जाते हैं। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। एनएच की गाड़ियों का शोर पीछे छूट जाता है और एक असीम शांति का अनुभव होता है। यहाँ आने वाले भक्तों का कहना है कि यहाँ की मिट्टी में कुछ ऐसी ऊर्जा है कि जो एक बार आता है, वह बार-बार खिंचा चला आता है। लोग आते हैं, ध्यान लगाते हैं, अपनी ‘अर्जी’ महाप्रभु के चरणों में सौंपते हैं और जीवन पथ पर नई शक्ति के साथ वापस लौटते हैं।

स्थापत्य कला: उत्तर बिहार की भूमि पर दक्षिण का सौंदर्य
डिहुली स्थित भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्थापत्य कला की दृष्टि से भी अद्भुत है। इस मंदिर का निर्माण ओडिशा (भुवनेश्वर) के प्रशिक्षित कारीगरों द्वारा किया गया है। मंदिर की बनावट में दक्षिण भारतीय और ओड़िया शैली का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी इतनी बारीकी से उकेरी गई है कि हर आकृति जीवंत जान पड़ती है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में दक्षिण शैली का यह विशाल मंदिर एक ‘अतिरेक आनंद’ की अनुभूति कराता है। मंदिर के प्रवेश द्वार (सिंह द्वार) पर भगवान के रक्षक ‘जय‘ और ‘विजय‘ की प्रतिमाएं स्थापित हैं, साथ ही भैरव जी की उपस्थिति मंदिर की सुरक्षा और धार्मिक मर्यादा को सुनिश्चित करती है।
गर्भगृह की दिव्यता: नीम की लकड़ी से निर्मित विग्रह
त्राहि अच्युत आश्रम के सबसे पावन हिस्से, यानी गर्भगृह में जाने पर वह दृश्य सामने आता है जो आमतौर पर केवल ओडिशा के पुरी में देखने को मिलता है। यहाँ भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाड़ली बहन सुभद्रा के विग्रह स्थापित हैं।
- विशिष्ट निर्माण: ये मूर्तियाँ सामान्य पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि विशेष नीम की लकड़ी से बनी हैं। इन मूर्तियों को पुरी के पास बालाकोट में उसी पद्धति से बनाया गया है, जिस पद्धति से पुरी के मुख्य मंदिर की मूर्तियाँ बनती हैं।
- क्रम: सिंहासन पर बाईं ओर बलभद्र जी, मध्य में देवी सुभद्रा और दाहिनी ओर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) सुदर्शन चक्र के साथ विराजमान हैं।
- शयन व्यवस्था: मंदिर में सेवा का विधान अत्यंत सूक्ष्म है। भगवान के लिए एक शयन कक्ष बनाया गया है, जहाँ रात्रि विश्राम हेतु तीन अलग-अलग रंगों के बिछावन बिछाए जाते हैं। माता सुभद्रा के लिए लाल, बलभद्र जी के लिए हरा और महाप्रभु जगन्नाथ के लिए पीला बिछावन सुरक्षित है।

‘प्रचार नहीं, कर्म‘: आश्रम की अछूती परंपराएं
आज के व्यावसायिक युग में, जहाँ छोटे-छोटे मंदिरों का भी सोशल मीडिया पर जोर-शोर से प्रचार किया जाता है, त्राहि अच्युत आश्रम ने खुद को इस चमक-धमक से दूर रखा है।
आश्रम के सेवादारों और संचालकों की नीति स्पष्ट है—“कर्म ही पूजा है।” जब न्यूज़ भारत टीवी की टीम पहली बार यहाँ पहुँची, तो सेवादारों ने शुरू में बात करने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि वे प्रचार के लिए नहीं, बल्कि जनकल्याण के लिए यहाँ हैं। आश्रम के वर्तमान संचालक महात्मा कपिल जी ने बिना कैमरा और बिना रिकॉर्डिंग के घंटों संवाद किया। उनके विचारों में सादगी और दर्शन की गहराई थी। अंततः, आश्रम के पुराने ट्रस्टी लालबाबू के सहयोग और महात्मा जी की सहृदयता से पहली बार मंदिर के गर्भगृह का दृश्य कैमरे में कैद करने की अनुमति मिली। यह आश्रम की उस नीति का हिस्सा है जहाँ वे भक्त की श्रद्धा को विज्ञापन से ऊपर रखते हैं।
रेत पर ध्यान और ‘दालमा‘ का महाप्रसाद
इस मंदिर की कुछ अनूठी विशेषताएं इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं:
- वटगोस्वामी और रेत साधना: मंदिर के सामने ही यज्ञ मंडप और वटगोस्वामी (पीपल/बरगद का पवित्र स्थान) स्थित है। यहाँ आने वाले भक्त फर्श या कुर्सियों के बजाय रेत (बालू) पर बैठकर ध्यान लगाते हैं। ऐसी मान्यता है कि वटगोस्वामी की परिक्रमा करने से भक्त के मन की बात सीधे इष्ट देव तक पहुँच जाती है।
- दालमा प्रसाद: यहाँ आने वाले भक्तों को एक विशेष प्रकार का पकवान ‘प्रसाद’ के रूप में दिया जाता है, जिसे ‘दालमा‘ कहा जाता है। यह दाल और सब्जियों के मिश्रण से बनी मीठी खिचड़ी जैसा होता है, जिसका स्वाद और सुगंध भक्तों को तृप्त कर देती है।
- सूत्र बंधन: आश्रम का ‘गादी गृह’ वह स्थान है जहाँ भक्तों को मंत्र दीक्षा और रक्षा सूत्र प्रदान किया जाता है। महापुरुष के निर्देशों के अनुसार, यहाँ ‘सूत्र बंधन’ की प्रक्रिया होती है, जिसे भक्त अपनी सुरक्षा और आध्यात्मिक प्रगति का कवच मानते हैं।

दीवारों पर अंकित ‘कृष्ण लीला‘
मंदिर के प्रथम खंड, जिसे प्रार्थना कक्ष भी कहा जाता है, में प्रवेश करते ही भक्त द्वापर युग की यात्रा पर निकल जाता है। दीवारों पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनके मथुरा जाने तक की घटनाओं का सजीव चित्रण किया गया है।
- वासुदेव द्वारा यमुना पार कर बाल कृष्ण को नंदगांव पहुँचाना।
- पूतना, बकासुर और शकटासुर वध।
- कालिया नाग का दमन और गोपियों संग रास।
- इंद्र का अभिमान चूर करने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाना। इन चित्रों के ऊपर नवग्रह, नवदुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी इतनी कुशलता से सजी हैं कि पूरा परिसर एक ‘दिव्य कला दीर्घा’ सा प्रतीत होता है।
चार दशकों का यश: स्थापना से अब तक
इस भव्य आश्रम की यात्रा बहुत पुरानी नहीं है, लेकिन इसकी प्रगति चमत्कारिक है।
- 31 अक्टूबर 1992: इस दिन सबसे पहले ‘गादी गृह’ की नींव रखी गई और स्थापना की गई।
- देखते ही देखते, अगले चार दशकों में इस स्थान ने उत्तर बिहार के सबसे प्रमुख धार्मिक केंद्रों में अपनी जगह बना ली।
- आज यहाँ साल भर में पांच बड़े उत्सव मनाए जाते हैं:
- जन्माष्टमी: श्री कृष्ण का जन्मोत्सव।
- राधाष्टमी: राधारानी का प्राकट्य दिवस।
- अष्ट प्रहरी जन्मोत्सव: वैशाख कृष्ण पक्ष में होने वाला अखंड कीर्तन।
- स्थापना दिवस: हर साल 31 दिसंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
- वार्षिक यज्ञ: फाल्गुन शुक्ल पक्ष में आयोजित होने वाला विशाल यज्ञ, जिसमें दूर-दूर से साधु-संत और श्रद्धालु जुटते हैं।
आस्था का यह आधुनिक केंद्र
मुजफ्फरपुर का डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम इस बात का प्रमाण है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो, तो बिना किसी शोर-शराबे के भी ईश्वर की महिमा जन-जन तक पहुँच जाती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि लोगों को मानसिक शांति और जीवन की नई दिशा भी प्रदान कर रहा है।
यदि आप कभी एनएच-28 से गुजरें, तो सकरा के इस दिव्य धाम में रुकना न भूलें। यहाँ के ‘दालमा’ प्रसाद का स्वाद और वटगोस्वामी की छाँव में मिलने वाली शांति आपके जीवन की भागदौड़ के बीच एक संजीवनी का काम करेगी।
त्राहि अच्युत आश्रम: सेवा प्रकल्प और व्यवस्थाएं
सेवा प्रकल्प (Service Initiatives)
आश्रम का मूल मंत्र “नर सेवा ही नारायण सेवा” है। यहाँ कई ऐसे कार्य किए जाते हैं जो समाज के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाते हैं:
- अन्नपूर्णा सेवा (नि:शुल्क भोजन): आश्रम में आने वाले भक्तों और साधुओं के लिए भोजन की विशेष व्यवस्था रहती है। जैसा कि पहले बताया गया है, यहाँ का ‘दालमा’ और महाप्रसाद विशेष रूप से तैयार किया जाता है। उत्सवों के समय यहाँ विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जहाँ हजारों लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
- आध्यात्मिक परामर्श एवं मंत्र दीक्षा: गादी गृह के माध्यम से महापुरुषों द्वारा मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया जाता है। यहाँ जाति-पाति के भेदभाव के बिना सभी को ‘सूत्र बंधन’ और मंत्र प्राप्ति का अधिकार है।
- गौ सेवा: आश्रम परिसर में भारतीय नस्ल की गायों के लिए एक गौशाला का संचालन किया जाता है। इन गायों की सेवा को भक्ति का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है और इनके दूध का उपयोग भगवान के भोग और आश्रम की रसोई में किया जाता है।
- शिक्षा और संस्कार: समय-समय पर यहाँ बच्चों के लिए संस्कार शिविर आयोजित किए जाते हैं, जहाँ उन्हें भारतीय संस्कृति, योग और नैतिकता की शिक्षा दी जाती है।
ठहरने की व्यवस्था (Accommodation)
चूँकि यह आश्रम एनएच-28 के किनारे स्थित है, यहाँ बड़ी संख्या में दूर-दराज के भक्त आते हैं। उनके रुकने के लिए आश्रम में व्यवस्थित इंतजाम हैं:
- अतिथि गृह (Dharamshala): आश्रम परिसर के भीतर ही भक्तों के ठहरने के लिए कमरे बने हुए हैं। ये कमरे आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस होने के बजाय सादगीपूर्ण और स्वच्छ हैं, ताकि भक्त पूरी तरह से आध्यात्मिक वातावरण में रह सकें।
- साधु-संत निवास: बाहर से आने वाले महात्माओं और साधुओं के लिए अलग से कुटिया और निवास स्थान की व्यवस्था है। यहाँ के वातावरण को पूरी तरह से शांत रखा जाता है ताकि साधना में कोई बाधा न आए।
- विश्राम क्षेत्र: उन यात्रियों के लिए जो केवल कुछ घंटों के लिए रुकना चाहते हैं, बड़े हॉल और छायादार विश्राम स्थल बनाए गए हैं, जहाँ वे मंदिर की शांति का लाभ उठा सकते हैं।
नियम और अनुशासन
आश्रम में रुकने या दर्शन करने वाले भक्तों के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- नशा निषेध: आश्रम परिसर के भीतर किसी भी प्रकार का नशा (बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू आदि) पूर्णतः वर्जित है।
- शाकाहार: पूरे परिसर में केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन की ही अनुमति है।
- शांति और मौन: मंदिर के गर्भगृह और ध्यान केंद्र (वटगोस्वामी क्षेत्र) में बातचीत करना मना है, ताकि अन्य भक्तों की एकाग्रता भंग न हो।
कैसे पहुँचें?
- सड़क मार्ग: मुजफ्फरपुर से बरौनी जाने वाले मार्ग (NH-28) पर सकरा प्रखंड के पिपरी चौक से करीब 1 किमी अंदर डिहुली गांव में यह आश्रम स्थित है। ऑटो या निजी वाहन से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
- रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन मुजफ्फरपुर जंक्शन है, जहाँ से आश्रम की दूरी लगभग 20-25 किलोमीटर है।
मुजफ्फरपुर के डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम में आयोजित होने वाले उत्सवों में ‘वार्षिक महायज्ञ‘ सबसे प्रमुख है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था का एक ऐसा सैलाब है जिसमें पूरा उत्तर बिहार उमड़ पड़ता है।
यहाँ होने वाले विशेष उत्सवों और उनकी पूरी प्रक्रिया का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

त्राहि अच्युत आश्रम के विशेष उत्सव: एक विस्तृत विवरण
वार्षिक महायज्ञ (फाल्गुन शुक्ल पक्ष)
यह आश्रम का सबसे भव्य और महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। यह प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आयोजित किया जाता है (जो अक्सर फरवरी या मार्च के महीने में पड़ता है)।
- प्रक्रिया और अनुष्ठान:
- ध्वजारोहण: यज्ञ की शुरुआत भव्य ध्वजारोहण के साथ होती है, जहाँ जगन्नाथ स्वामी के विशेष झंडे को मंत्रोच्चार के बीच शिखर पर स्थापित किया जाता है।
- कलश यात्रा: इस अवसर पर हजारों की संख्या में महिला श्रद्धालु और कुंवारी कन्याएं पीत वस्त्र धारण कर पास की पवित्र नदियों या सरोवरों से जल भरकर कलश यात्रा निकालती हैं। यह दृश्य अत्यंत मनोरम होता है।
- अखंड संकीर्तन: यज्ञ के दौरान ‘हरे कृष्ण-हरे राम’ और ‘त्राहि अच्युत’ मंत्रों का अखंड जाप चलता है। इसे ‘अष्ट प्रहरी’ या उससे भी अधिक समय के लिए निरंतर जारी रखा जाता है।
- आहुति और पूर्णाहुति: विद्वान पंडितों और आश्रम के महात्माओं की देखरेख में अग्नि कुंड में आहुतियां दी जाती हैं। समापन के दिन ‘पूर्णाहुति’ होती है, जिसमें शामिल होने के लिए भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है।
- सांस्कृतिक कार्यक्रम: यज्ञ के दौरान शाम को प्रवचन, भजन संध्या और झांकियों का आयोजन किया जाता है, जो भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
स्थापना दिवस (31 दिसंबर)
आश्रम के लिए 31 दिसंबर का दिन ऐतिहासिक है, क्योंकि इसी दिन 1992 में ‘गादी गृह’ की स्थापना हुई थी।
- विशेषता: जहाँ पूरी दुनिया नए साल के जश्न में डूबी होती है, यहाँ भक्त आध्यात्मिक उत्सव मनाते हैं।
- प्रक्रिया: इस दिन सुबह विशेष अभिषेक और पूजन होता है। इसके बाद आश्रम के संस्थापक और गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस दिन विशेष ‘महाभंडारा’ आयोजित होता है, जिसमें हजारों लोगों को प्रसाद खिलाया जाता है।
वैशाख कृष्ण पक्ष : अष्ट प्रहरी जन्मोत्सव
यह उत्सव वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है।
- प्रक्रिया: इसमें 24 घंटे का अखंड कीर्तन होता है। भक्त टोलियों में बँटकर मृदंग और झाल के साथ झूमते हुए कीर्तन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस निरंतर ध्वनि से आश्रम का वातावरण पूरी तरह शुद्ध और ऊर्जावान हो जाता है।
जन्माष्टमी एवं राधाष्टमी (भाद्रपद मास)
चूँकि यह भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) का मंदिर है, इसलिए जन्माष्टमी यहाँ का प्राण है।
- प्रक्रिया:
- अर्धरात्रि पूजन: रात्रि 12 बजे भगवान कृष्ण का दुग्धाभिषेक और विशेष श्रृंगार किया जाता है।
- नंदोत्सव: अगले दिन ‘नंद के आनंद भयो’ के जयकारों के साथ खिलौने और मिठाइयाँ बांटी जाती हैं।
- राधाष्टमी: इसके ठीक 15 दिन बाद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी मनाई जाती है, जिसमें माता राधा के विग्रह का विशेष पूजन होता है।
सूत्र बंधन और गुरु पूर्णिमा
आश्रम में गुरु-शिष्य परंपरा का बहुत महत्व है।
- गुरु पूर्णिमा: इस दिन भक्त अपने आध्यात्मिक गुरु (महापुरुष) का दर्शन करने और आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं।
- प्रक्रिया: यहाँ भक्तों को ‘सूत्र बंधन‘ की दीक्षा दी जाती है। यह एक रक्षा सूत्र होता है जिसे मंत्रों द्वारा सिद्ध किया जाता है। माना जाता है कि यह सूत्र भक्तों की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है और उन्हें सद्मार्ग पर रखता है।
उत्सव के दौरान भक्तों के लिए विशेष निर्देश
यदि आप इन उत्सवों में शामिल होना चाहते हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है:
- पंजीकरण: बड़े यज्ञों में शामिल होने और ठहरने के लिए अक्सर पहले से सूचना देनी होती है।
- वस्त्र धारण: उत्सवों के दौरान पीला या सफेद वस्त्र धारण करना आश्रम की परंपरा के अनुकूल माना जाता है।
- सेवा भाव: यहाँ उत्सवों में ‘श्रमदान’ का बड़ा महत्व है। लोग खुद से झाड़ू लगाना, भोजन परोसना और जूते-चप्पलों की देखभाल करना (जोड़ा सेवा) अपनी खुशी से करते हैं।
मुजफ्फरपुर के डिहुली स्थित त्राहि अच्युत आश्रम में फाल्गुन मास का वार्षिक यज्ञ एक ऐसा अवसर होता है जब पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो जाता है।
फाल्गुन वार्षिक यज्ञ 2026: संभावित तिथियाँ
आश्रम का मुख्य वार्षिक यज्ञ फाल्गुन शुक्ल पक्ष में आयोजित होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में फाल्गुन मास की महत्वपूर्ण तिथियाँ इस प्रकार रह सकती हैं:
- संभावित समय: फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च के पहले सप्ताह के बीच।
- मुख्य तिथियाँ: फाल्गुन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा (होली) से पहले तक मुख्य आयोजन होते हैं।
- विशेष दिन: आमतौर पर फाल्गुन एकादशी से पूर्णिमा के बीच यज्ञ की पूर्णाहुति और विशाल भंडारा होता है।
- नोट: सही तिथि के लिए फरवरी माह के प्रारंभ में आश्रम के सूचना पटल या स्थानीय सेवादारों से संपर्क करना उचित रहता है, क्योंकि तिथियाँ चंद्रमा की गणना और स्थानीय पंचांग पर आधारित होती हैं।

आश्रम पहुँचने के लिए परिवहन के साधन
डिहुली (सकरा) स्थित त्राहि अच्युत आश्रम NH-28 पर स्थित होने के कारण यातायात के दृष्टिकोण से बहुत ही सुलभ स्थान पर है।
1. सड़क मार्ग (सबसे सुविधाजनक)
यह आश्रम मुजफ्फरपुर-बरौनी नेशनल हाईवे (NH-28) के बिल्कुल करीब है।
- निजी वाहन/टैक्सी: यदि आप मुजफ्फरपुर शहर से आ रहे हैं, तो मुजफ्फरपुर-समस्तीपुर मार्ग पर करीब 22-25 किलोमीटर की दूरी तय कर पिपरी चौक पहुँचें। वहाँ से गाँव की ओर जाने वाली सड़क से 1 किमी अंदर आश्रम है।
- बस सेवा: मुजफ्फरपुर बस स्टैंड (इमलीचट्टी) से समस्तीपुर, बरौनी या बेगूसराय की ओर जाने वाली किसी भी बस में बैठें और पिपरी चौक पर उतरें। यहाँ से मंदिर के लिए ई-रिक्शा और ऑटो हमेशा उपलब्ध रहते हैं।
2. रेल मार्ग
- निकटतम बड़ा स्टेशन: मुजफ्फरपुर जंक्शन (MFP)। यहाँ से देश के सभी प्रमुख शहरों (दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, पटना) के लिए ट्रेनें उपलब्ध हैं। स्टेशन से बाहर निकलकर आप सीधे टैक्सी या बस ले सकते हैं।
- स्थानीय स्टेशन: ढोली रेलवे स्टेशन (DOL)। यह आश्रम के काफी करीब है (लगभग 8-10 किमी)। यहाँ कुछ पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें रुकती हैं। ढोली से ऑटो लेकर आप सीधे डिहुली आश्रम पहुँच सकते हैं।
3. हवाई मार्ग
- निकटतम हवाई अड्डा: जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, पटना (PAT)।
- पटना हवाई अड्डे से आश्रम की दूरी लगभग 90-100 किलोमीटर है। हवाई अड्डे से आप सीधे टैक्सी किराए पर ले सकते हैं, जो हाजीपुर होते हुए मुजफ्फरपुर के रास्ते आपको करीब 2.5 से 3 घंटे में आश्रम पहुँचा देगी।
श्रद्धालुओं के लिए सुझाव
- भीड़ का प्रबंधन: वार्षिक यज्ञ के दौरान यहाँ लाखों की भीड़ उमड़ती है। यदि आप शांति से दर्शन करना चाहते हैं, तो यज्ञ शुरू होने के एक-दो दिन पहले पहुँचें।
- ठहरने की अग्रिम सूचना: यदि आप आश्रम के अतिथि गृह में रुकना चाहते हैं, तो बड़े कार्यक्रमों के दौरान कमरे पहले से भर जाते हैं। इसके लिए आश्रम के पुराने ट्रस्टी या सेवादारों से पहले संपर्क करना बेहतर होता है।
- मौसम: फरवरी-मार्च में बिहार का मौसम सुहावना रहता है, लेकिन शाम के समय हल्की ठंड हो सकती है, इसलिए थोड़े ऊनी कपड़े साथ रखें।




